पेरियार से दलित-बहुजन नेताओं ने किया किनारा, आम लोगों ने आगे बढ़कर मनाई जयंती

बहुजन साप्ताहिकी के तहत इस बार पढ़ें बिहार के सुदूर बिस्फी में पेरियार जयंती समारोह के आयोजन व हिंदी प्रदेशों के सियासी गलियारे में इस मौके पर उदासीनता के बारे में। साथ ही एक खबर ओमप्रकाश वाल्मिकी स्मृति सम्मान-2021 के संबंध में। इस बार प्रो. नामदेव सहित दस दलित-बहुजन साहित्यकारों को यह पुरस्कार दिया जाएगा

भारत के हिंदी प्रदेशों में पेरियार और उनके विचार महत्वपूर्ण होते जा रहे हैं। कल 17 सितंबर, 2021 को उत्तर प्रदेश और बिहार के सुदूर इलाकों में दलित-बहुजनों ने पेरियार की जयंती समारोहों का आयोजन किया। जबकि दलित-बहुजन नेताओं ने पेरियार से किनारा किया तथा द्विज वर्गों के विश्वकर्मा पूजा के साथ खुद को जोड़ा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी पेरियार जयंती के मौके पर ट्वीट नहीं किया। उनहोंने विश्वकर्मा को याद किया और देशवासियों को बधाई दी। वहीं बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भी नरेंद्र मोदी की नकल की और पेरियार से किनारे कर लिया। उन्होंने विश्वकर्मा पूजा की शुभकामना 16 सितंबर को ही जारी कर दिया था और इसके लिए सूचना एवं जनसंपर्क विभाग का इस्तेमाल किया। बहुजन समाज पार्टी की प्रमुख मायावती को भी पेरियार की याद नहीं आई। हालांकि उन्होंने विश्वकर्मा पूजा की शुभ्कामना भी नहीं दी। वहीं उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और समाजवादी पार्टी के सर्वेसर्वा अखिलेश यादव ने कल लखनऊ स्थित अपने पार्टी कार्यालय में विश्वकर्मा पूजा का आयोजन किया और आरती उतारते नजर आए। यही हाल झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन का भी रहा। उनके लिए भी पेरियार का कोई मतलब नहीं।

उत्तर भारत के दलित-पिछड़े नेताओं में एक राष्ट्रीय जनता दल के नेता तेजस्वी यादव खास रहे। उन्होंने पेरियार जयंती के मौके पर ट्वीट जारी किया। अपने ट्वीट में उन्होंने ब्राह्मणवाद और कर्मकांड के खिलाफ संघर्ष का संकल्प व्यक्त किया। लेकिन एक दूसरे ट्वीट में उन्होंने विश्वकर्मा की बधाई देते हुए अपने पहले ट्वीट को अर्थहीन बना दिया।

लखनऊ में अपने दल के कार्यालय में विश्वकर्मा की आरती उतारते सपा प्रमुख अखिलेश यादव

यूपी और बिहार में याद किए गए पेरियार

दूसरी ओर आम दलित-बहुजनों ने धूमधाम के साथ पेरियार की 143वीं जयंती मनाई। एक खास आयोजन उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के दारूल शफा (विधायक आवास) के कॉमन हॉल सभागार में किया गया। इस मौके पर “लोकतंत्र प्रहरी मा. कांशीराम” का विमोचन भी किया गया। साथ ही, फुले-पेरियार-आंबेडकरी विचारधारा को प्रचारित-प्रसारित करने के लिए कई सामाजिक कार्यकार्तओं का सम्मान किया। इस मौके पर पूर्व मंत्री दद्दू प्रसाद, राजबहादुर, बशीरूददीन खां, चंद्रभूषण यादव, ए आर अकेला और अधिवक्ता जे. एस. कश्यप सहित अनेक गणमान्य उपस्थित थे।

द्विज कवि विद्यापति के डीह में पेरियार 

वहीं बिहार के बिस्फी में सामाजिक न्याय मंच, बिस्फी के तत्त्वावधान में पेरियार जयंती का आयोजन किया गया। यह आयोजन विद्यापति डीह, बिस्फी स्थित कन्वेंशन सेंटर में किया गया। कार्यक्रम के आयोजन में वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता शिव शंकर राय एवं संजीव कुमार की अहम भूमिका रही। कार्यक्रम की अध्यक्षता डा. जय नारायण गिरि ने किया। वहीं समारोह का उद्घाटन ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय के राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर (डा.) मुनेश्वर यादव ने दीप प्रज्वलित कर किया। विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थिति रहे विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के प्रो. (डा.) सुरेन्द्र प्रसाद सुमन तथा सामाजिक न्याय आंदोलन के प्रखर प्रवक्ता राम सुदिष्ट यादव। इन वक्ताओं के अतिरिक्त जयंती समारोह को संबोधित करने वालों में लेखक व शिक्षक रामनरेश यादव, सेवानिवृत श्रम प्रवर्तन पदाधिकारी रवीन्द्र नाथ शर्मा, रामावतार यादव, ईश्वरचंद्र यादव, श्री दिलीप कुमार, विनोद कुमार सिंह तथा उदय भूषण प्रसाद निराला प्रमुख रहे। 

बिहार के बिस्फी में आयोजित पेरियार जयंती समारोह का दृश्य

खचाखच भरे सभागार को संबोधित करते हुए विद्वान वक्ताओं ने पेरियार को याद करते हुए उनके जीवन par प्रकाश डाला तथा जातिवार जनगणना की आवश्यकता के समर्थन में अपने तर्क रखे। प्रो. मुनेश्वर यादव ने उनके द्वारा संगठित सामाजिक न्याय आंदोलन के इतिहास पर प्रकाश डालते हुए कहा कि पेरियार ने आत्मसम्मान आंदोलन के माध्यम से तमिलनाडु में वैज्ञानिक चेतना का प्रसार किया। लोगों को स्वाभिमानी बनाया तथा ईश्वर की अवधारणा से उत्पन्न बुराईयों से लोगों को दूर करने का निरंतर प्रयास करते रहे। वहीं शिव शंकर राय ने कहा कि पेरियार के विचार तबतक प्रासंगिक बने रहेंगे जबतक समाज में धर्म, जाति तथा लिंग आधारित भेदभाव का अस्तित्व रहेगा। रवीन्द्र कुमार शर्मा ने कहा कि हिंदी भाषी इलाके के लोगों को द्रविड़ों के आंदोलन से सीख लेने की जरूरत है। 

फूलो-झानो आर्शीवाद अभियान की सफलता का दावा किया झारखंड के सीएम हेमंत सोरेन ने

झारखंड में फूलो-झानो आशीर्वाद अभियान योजना से आदिवासी महिलाओं के जीवन में बदलाव आ रहा है। यह कहना है वहां के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन का। बीते 16 सितंबर, 2021 को उन्होंने ग्रामीण विकास विभाग के एक कार्यक्रम को संबोधित किया। अमर शहीद सिदाे-कान्हू की बहनें रहीं फूलो और झानो को उनकी बहादुरी के लिए याद किया जाता है। मुख्यमंत्री ने कहा कि इस योजना के जरिए ग्रामीण महिलाओं को सशक्त बनाया जा रहा है। उन्होंने कहा कि गांवों में अनेक महिलाएं हैं, जो हंड़िया (देसी शराब) बनाने का काम करती हैं, इस योजना के जरिए उन्हें जोड़ा जा रहा है ताकि वे रोजी-रोजगार के अन्य विकल्प अपना सकें। मुख्यमंत्री ने कहा कि इस योजना की शुरूआत एक साल पहले की गयी थी और एक साल के अंदर ही 13 हजार 456 महिलाओं को लाभ दिया गया। इस मौके पर उपस्थित महिलाओं को दस-दस हजार रुपए ब्याज मुक्त ऋण के रूप में दिए गए।

दस दलित-बहुजन साहित्यकारों को ओमप्रकाश वाल्मीकि स्मृति साहित्य सम्मान 

साहित्य चेतना मंच, सहारनपुर (उत्तर प्रदेश) द्वारा साहित्य के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान हेतु दस साहित्यकारों को 17 नवंबर, 2021 को ओमप्रकाश वाल्मीकि स्मृति साहित्य सम्मान दिया जाएगा। ऑनलाइन कार्यक्रम के जरिए सभी विजेताओं को यह सम्मान प्रदान किया जाएगा।। साहित्य चेतना मंच के संयोजक नरेंद्र वाल्मीकि ने इस संबंध में बताया कि दूसरे ओमप्रकाश वाल्मीकि स्मृति साहित्य सम्मान जिन दस साहित्यकारों को प्रदान किया जाएगा उनमें दिल्ली के प्रो. नामदेव व डॉ. सुमित्रा मेहरोल, बिहार के संतोष पटेल, उत्तर प्रदेश के डॉ. अमित धर्मसिंह व आर. एस. आधात, पश्चिम बंगाल के डॉ. कार्तिक चौधरी, हरियाणा की डॉ. सुरेखा, राजस्थान के डॉ. चैन सिंह मीणा व सुनील पंवार और उत्तराखंड के डॉ. राम भरोसे शामिल हैं।

विमुक्तों के संघर्ष की कहानियों पर केंद्रित किताब का लोकार्पण

नवयाना, नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित किताब “विमुक्त : फ्रीडम स्टोरीज” का लोकार्पण ऑनलाइन कार्यक्रम के जरिए आज 18 सितंबर, 2021 को देर शाम आठ बजे किया जाएगा। प्रकाशक नवायाना द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार औपनिवेशिक काल में लगभग दो सौ जातियों को “क्रिमिनल ट्राइब” कहा गया और जिन्हें भारतीय संविधान में विमुक्त, घूमंतू, अद्धघूमंतू व गैर अधिसूचित की संज्ञा दी गई है। किताब में इन जातियों के लोगों की संघर्ष गाथाओं को शामिल किया गया है। इस किताब के ऑनलाइन विमोचन के मौके पर संपादकद्वय दक्क्षिण बजरंगे और हेनी स्क्वार्ज के अलावा नृवंशशास्त्री व फिल्म निर्माता ऐलिस तिल्श, लखनऊ विश्वविद्यालय की प्रोफेसर मधु सिंह, बुधन थियेटर (अहमदाबाद) से संबद्ध अभिनेत्री कल्पना गागडेकर, भाषा शोध केंद्र (बड़ौदा) की सोना बक्शी और देहरादून के फिल्मकार शाश्वती तालुकदार मौजूद रहेंगीं। 

(संपादन : अनिल)


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