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पंजाब में बदलाव की शुरुआत है चन्नी का मुख्यमंत्री बनना

पंजाब के दलितों ने अपने तथाकथित ‘निचले दर्जे’ को कभी अपनी नियति के रूप में स्वीकार नहीं किया। सिक्ख धर्म के समतावादी मूल्यों और उसके एकेश्वरवादी आध्यात्मिक दर्शन से उद्भूत नैतिक और सामाजिक बल के सहारे वे राजनैतिक और सामाजिक जागरूकता उत्पन्न करने के लिए कठिन संघर्ष करते आये हैं

पिछले कुछ वक्त से सत्ता के शीर्ष स्तर पर दलितों की हिस्सेदारी सन् 2022 में पंजाब में होने वाले चुनावों पर चर्चा के केंद्र में आ गई है। सभी राजनैतिक दल वायदा कर रहे हैं कि अगर उन्हें पंजाब में सरकार बनाने का मौका मिला तो वे दलित समुदाय (जो राज्य का आबादी का लगभग एक-तिहाई है) को समुचित सम्मान देते हुए किसी दलित को उपमुख्यमंत्री या मुख्यमंत्री बनाएंगे। लेकिन बाजी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने मार ली। पंजाब कांग्रेस विधायक दल की बैठक में रामदसिया दलित सिक्ख और अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षित प्रतिष्ठित चमकौर साहिब निर्वाचन क्षेत्र से विधायक चरणजीत सिंह चन्नी को राज्य के 17वें मुख्यमंत्री के रूप में निर्वाचित किया गया।

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लेखक के बारे में

रौनकी राम

रौनकी राम पंजाब विश्वविद्यालय,चंडीगढ़ में राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर हैं। उनके द्वारा रचित और संपादित पुस्तकों में ‘दलित पहचान, मुक्ति, अतेय शक्तिकरण’, (दलित आइडेंटिटी, इमॅनिशिपेशन एंड ऍमपॉवरमेंट, पटियाला, पंजाब विश्वविद्यालय पब्लिकेशन ब्यूरो, 2012), ‘दलित चेतना : सरोत ते साररूप’ (दलित कॉन्सशनेस : सोर्सेए एंड फॉर्म; चंडीगढ़, लोकगीत प्रकाशन, 2010) और ‘ग्लोबलाइजेशन एंड द पॉलिटिक्स ऑफ आइडेंटिटी इन इंडिया’, दिल्ली, पियर्सन लॉंगमैन, 2008, (भूपिंदर बरार और आशुतोष कुमार के साथ सह संपादन) शामिल हैं।

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