भाजपा की पसमांदा नीति : नीतीश की राह पर नरेंद्र मोदी

जिस तरह नीतीश कुमार ने पसमांदा राजनीति को हवा देकर लालू प्रसाद के सामाजिक समीकरण को बिगाड़ अपनी सत्ता स्थापित करने में सफलता प्राप्त की, वैसे ही अब भाजपा भी करने जा रही है। हाल ही में उसने यूपी चुनाव को ध्यान में रखकर पसमांदा समाज को तरजीह देना शुरू किया है। बता रहे हैं फैयाज अहमद फैजी

साल 2014 में भारतीय जनता पार्टी ने केंद्र सरकार में वापसी के साथ ही, राज्यों के चुनावों में भी कामयाबी के झंडे गाड़ती चली गई। इन चुनावों में उसकी जीत की वजह सिर्फ यह नहीं थी कि उसने एक नये नेता को चुना था, बल्कि एक खास तरह की रणनीति थी, जिसके कारण विपक्षी पार्टियों के सारे समीकरण धरे के धरे रह गए। भाजपा ने सामाजिक न्याय की पार्टियों को उनकी ही भाषा में जवाब देते हुए उनके मतदाताओं को अपने पक्ष में कर लिया था, जिन्हें मंडल कमीशन के बाद उभरी सामाजिक न्याय की पार्टियों ने भाजपा को बहुत पीछे धकेल दिया था। 

परंतु, भाजपा के रणनीतिकारों ने इसका हल ढूंढते हुए पार्टी संगठनों में अपितु सरकार में भी दलित-पिछड़ों को भागीदारी देना शुरू किया और यह भागीदारी केवल निम्न पदो पर ना होकर उच्च पदों पर भी थी। मसलन, राष्ट्रपति के रूप में भाजपा ने दलित वर्ग के आनेवाले रामनाथ कोविंद को आगे किया। इसके अलावा रामविलास पासवान (अब दिवंगत), अनुप्रिया पटेल आदि के पास कम सीटें होने के बावजूद अपने मंत्रिपरिषद में शामिल किया।

दूसरी ओर बिहार की मुख्य विपक्षी पार्टी राष्ट्रीय जनता दल और उत्तर प्रदेश की समाजवादी पार्टी आदि सामाजिक न्याय की पार्टियां पिछड़ों और दलितों के सभी समुदायों को भागीदारी देने में पिछड़ती चली गईं और उस उसका नजीता यह हुआ कि ये पार्टियां जाति विशेष की पार्टी के रूप में पहचाने जाने लगीं। वहीं अन्य पिछड़े और दलित समुदायों ने निराशा की इस अवस्था में अपनी अपनी नई पार्टियां बनाकर अपने हिस्सेदारी की आवाज को बुलंद करना प्रारंभ किया। 

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

भाजपा ने जहां एक ओर अपने संगठन में इन वंचित समुदायों को जगह दिया वहीं इन छोटी-छोटी पार्टियों से गठबंधन कर उनको एक सम्मानजनक स्थिति में ला दिया, जिसका लाभ भाजपा को चुनावों में सीटों के जीत के साथ मिलने लगा, जिसका उदाहरण उत्तर प्रदेश का पिछला लोकसभा चुनाव है जहां सपा-बसपा का भरी भरकम गठबंधन भी टिक नही सका और वो भाजपा को सत्ता में पहुंचने से नही रोक सकीं और सामाजिक न्याय और तथाकथित सेकुलर पार्टियां अपने सिकुड़ते जनाधार की तरह सिकुड़ते चली गई। अभी ये पार्टियां भाजपा की इस रणनीति का ढंग से जवाब तैयार कर पाती इससे पहले भाजपा ने मुस्लिम समाज के सामाजिक न्याय के प्रश्न को छेड़ दिया है। विशेष रूप से उत्तर प्रदेश के चुनाव को सामने रखते हुए मुस्लिम समाज के वंचितों को जोड़ने की नीति के तहत मुस्लिम बहुल रामपुर में हुनर हाट मेले का आयोजन किया गया। यह सर्वविदित है कि मुस्लिम समाज का वंचित तबका जिसे पसमांदा समाज भी कहा जाता है, में अधिकतर शिल्पकार होतें। हुनर हाट के आयोजन के पीछे इन्हें अपने खेमे में लाने की कोशिशें भाजपा द्वारा की जा रही है। 

यह एक कामयाब आजमाया हुआ नुस्खा है, जिसे भाजपा उत्तर प्रदेश में एक प्रयोग के रूप में आजमा रही है। यह बात स्पष्ट है कि उत्तर प्रदेश एक ऐसा प्रदेश रहा है जो पूरे देश की राजनैतिक दशा एवं दिशा तय करता रहा है।

सिर्फ यही नहीं उत्तर प्रदेश सरकार ने अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष के रूप में अशफाक सैफी, मदरसा शिक्षा परिषद के अध्यक्ष के रूप में इफ्तिखार अहमद जावेद और उर्दू अकादमी के अध्यक्ष के रूप में चौधरी कैफी-उल-वरा को मनोनीत कर अपनी बदली हुई रणनीति को सामने रखा है।इनमें अशफाक सैफी बढ़ई समाज के तथा शेष दो कोरी समुदाय से संबंध रखते हैं। इस तरह ऐसे महत्वपूर्ण संस्थानों के अध्यक्ष पद पर जो अब तक परंपरागत रूप से मुस्लिम समाज के उच्च वर्ग के लोग के लिए ही आरक्षित थे, वंचित पसमांदा समाज के लोगो को नियुक्त कर इस दिशा में एक आमूलचूल परिवर्तन कर वंचित मुस्लिम समाज को अपने पाले में करने का दांव चला है। 

दरअसल, भाजपा की यह नीति पश्चिम बंगाल चुनाव से सीख का भी नतीजा है जहां मुस्लिम समाज ने ओवैसी और फुरफुरा शरीफ फैक्टर को नकारते हुए एक ब्लॉक के रूप में वोट किया था। जिस कारण भाजपा को अनुमानित परिणाम नहीं मिल सका था।

मुस्लिम समाज के सामाजिक न्याय के मुद्दे की रणनीति कोई नई या पहली बार नहीं है। पड़ोस के बिहार राज्य में इसका एक बार सफल प्रयोग हो चुका है, जहां लालू यादव के सफल फॉर्मूला एमवाय (मुस्लिम-यादव) जो कि दरअसल मुस्लिम और यादव कॉम्बिनेशन था, में लाभ अधिकांशत: अशराफ मुसलमानों को मिलता था, को नीतीश कुमार ने समझा। उन्होंने मुस्लिम समाज के अंदर सामाजिक न्याय की बात उठाकर मुस्लिम समाज के वंचितों को अपने साथ जोड़ लालू के किले में सेंधमारी करने में कामयाबी हासिल की। और इस तरह वे बिहार के सत्ता पर भाजपा के सहयोग से पिछले डेढ़ दशक से काबिज हैं। 

यह एक कामयाब आजमाया हुआ नुस्खा है, जिसे भाजपा उत्तर प्रदेश में एक प्रयोग के रूप में आजमा रही है। यह बात स्पष्ट है कि उत्तर प्रदेश एक ऐसा प्रदेश रहा है जो पूरे देश की राजनैतिक दशा एवं दिशा तय करता रहा है। अगर उत्तर प्रदेश में भाजपा का यह प्रयोग जैसा कि उम्मीद किया जा रहा है सफल रहा तो निश्चय ही यह देश की राजनीति को एक नया मोड़ देगा। 

भाजपा की इस नीति के जवाब में अभी भी तथाकथित सेकुलर और सामाजिक न्याय की पार्टियों के पास कोई विशेष नीति नहीं हैं और अभी भी ये पार्टियां पूरे मुस्लिम समाज को एक समरूप मानकर बैठी हुई हैं और भाजपा के हिंदुत्व की राजनीति के दबाव में अपने हिन्दू मतदाताओं के खिसकने के डर से मुस्लिम प्रश्न पर उदासीनता बरत रहीं हैं, जिसके परिणाम स्वरूप परंपरागत मुस्लिम नेतृत्व अशराफ वर्ग में बेचैनी देखी जा रही है, जो ओवैसी को आगे कर तथाकथित सेक्युलर पार्टियों पर दबाव बनाने का प्रयास कर रहा है ताकि यह पार्टियां पूर्ववत अपनी अपनी पार्टियों में मुस्लिम भागीदारी के नाम पर शासक वर्गीय अशराफ नेताओ को ही जगह दें। 

हाल के चुनाव परिणामों से यह स्पष्ट होता है कि ओवैसी फैक्टर से भाजपा को ही लाभ होता है। मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य में ऐसा दृष्टिगोचर हो रहा है कि अगर भाजपा ने अपनी इस नई नीति के दम पर पसमांदा वोटरों, जिनकी संख्या उत्तर प्रदेश में लगभग 16 प्रतिशत बताई जा रही है, में से केवल कुछ प्रतिशत भी अपने पक्ष में कर ले गई तो स्थिति बहुत भिन्न हो सकती है, जो तथाकथित सेकुलर पार्टियों को और पीछेधकेल देंगी। और फिर कही ऐसा ना हो कि जिस तरह से हिंदुत्व व छोटी-छोटी राजनीतिक पार्टियों को साथ मिलाकर परिस्थितियों को भाजपा अपने पक्ष में करने सफल रही है, वैसे ही वंचित पसमांदा को भागीदारी देकर एक बार फिर तथाकथित सेकुलर और सामाजिक न्याय की पार्टियों से बढ़त हासिल कर ले। ।

(संपादन : नवल/अनिल)


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