हम नगालैंड के ‘संहार’ के ख़िलाफ़ खामोश क्यों हैं?

ज़रा सोचिए कि अगर ऐसा कुछ उत्तर भारत में हुआ होता तो क्या होता? क्या यहां का समाज उसे भी इसी तरह खामोश होकर देखता रहता या उसने आसमान सर पर उठा लिया होता? पक्की तौर पर पूरा समाज आंदोलित हो जाता। कहीं मोमबत्तियों का जुलूस निकल रहा होता तो कहीं लोग पुलिस और प्रशासन से जूझ रहे होते। मगर नगालैंड की घटना पर तो सन्नाटा है। सवाल उठा रहे हैं वरिष्ठ पत्रकार डॉ. मुकेश कुमार

नगालैंड के मोन में सुरक्षा बलों की ओर से किया गया ‘संहार’ अगर दुखद और दुर्भाग्यपूर्ण है तो उसके प्रति शेष भारत में उपेक्षा का भाव और भी विचलित करने वाला है। अगर विपक्षी दलों और मानवाधिकारों की चिंता करने वालों को छोड़ दें तो, इस क़त्ले आम को लेकर कहीं कोई हलचल, कोई प्रतिक्रिया नहीं दिखाई देती। कुछ इस तरह का ठंडापन है, मानो ये वारदात अपने मुल्क में न होकर कहीं दूर किसी अपरिचित देश में हुई हो।

ज़रा सोचिए कि अगर ऐसा कुछ उत्तर भारत में हुआ होता तो क्या होता? क्या यहां का समाज उसे भी इसी तरह खामोश होकर देखता रहता या उसने आसमान सर पर उठा लिया होता? पक्की तौर पर पूरा समाज आंदोलित हो जाता। कहीं मोमबत्तियों का जुलूस निकल रहा होता तो कहीं लोग पुलिस और प्रशासन से जूझ रहे होते। मगर नगालैंड की घटना पर तो सन्नाटा है। 

उत्तर भारत में घटी ऐसी घटना सरकार के लिए मुसीबत बन जाती। सरकार खेद प्रकट करके और एसआईटी से जांच के आदेश देकर बच नहीं जाती। हत्यारे सुरक्षा बलों को चूक की आड़ में बचाने के उसके तमाम उपक्रम नाकाम हो जाते। उसे कुछ अधिक ठोस कार्रवाई करने और अधिक संवेदनशीलता दिखाने के लिए मजबूर होना पड़ता। 

हमारा राष्ट्रवादी मीडिया भी तब आंखें न मूंद पाता या सेना की जय-जयकार करते हुए उसके पापों को धोने में कामयाब न हो पाता। निश्चय ही वह तब भी सरकार को बचा रहा होता, अलगाववाद से लड़ाई में सेना की चुनौतियों को सामने रखकर मानवाधिकारों की बात करने वालों को धिक्कारता। मगर तब शायद दब ज़ुबान में ही सही ग़लत को ग़लत कहने के लिए उसे बाध्य भी होना पड़ता जो कि नगालैंड के ‘संहार’ के बारे में वह नहीं कर रहा है।

ये दूरी, ये अजनबियत और ये संवेदनहीनता क्यों है? उत्तर भारत में होने वाली घटना पर जिस तरह की प्रतिक्रिया होती है वैसी इस घटना पर क्यों नहीं हो रही है?

नगालैंड के मोन में भारतीय सेना की गोलियों से मृत अपने परिजन की ताबूत को बिलखती एक महिला

इसका जवाब बहुत पेचीदा नहीं है। इस उदासीनता की सबसे बड़ी वज़ह तो ये है कि पूर्वोत्तर को भारत के भू-भाग का हिस्सा तो माना जाता है, मगर दूसरे तमाम अर्थों में वह पराया ही है। जिस तरह का राष्ट्रवाद हमारे दिल-ओ-दिमाग़ पर छाया हुआ है, उसमें राष्ट्रीय एकता और अखंडता का अर्थ केवल और केवल भूगोल तक सिमटा हुआ है। इस राष्ट्रवाद में भौगोलिक एकता की चिंता तो रहती है, मगर सामाजिक-आर्थिक-भावनात्मक एकता की बिल्कुल भी परवाह नहीं की जाती। 

यह कमोबेश कश्मीर जैसी ही स्थिति है। हो सकता है कि असम के बारे में ये धारणा उतनी मज़बूत न हो, मगर बाक़ी राज्यों के साथ इसका संबंध भी कुछ इसी तरह का है। राष्ट्रवाद ने उन्हें अपना दुश्मन मान रखा है और इसके लिए एक आधार धर्मों को भी बना दिया गया है। चूंकि अधिकांश जनजातीय प्रधान पूर्वोत्तर के राज्यों में ईसाईयों की बहुलता है, इसलिए उन्हें ये राष्ट्रवाद अखंड भारत की अवधारणा में बाधा मानता है।  

इसके पीछे एक नस्लीय सोच तो है ही। रंग-रूप, कद-काठी और रहन-सहन की वज़ह से पूरे भारत में पूर्वोत्तर के लोग किस तरह प्रताड़ित किए जाते रहे हैं, यह किसी से छिपा नहीं है। उनको जगह-जगह निशाना बनाया जाता है, उनसे भेदभाव किया जाता है। यही व्यवहार है, जो पूर्वोत्तर के उन लोगों को भी देश की मुख्यधारा से जुड़ने नहीं देता, जो ऐसा करने की कोशिश करते हैं। 

एक गहरी खाई है, जिसे संघ परिवार और मोदी-शाह-हिमंत बिस्वसरमा जैसे नेता गहरी करते चले जा रहे हैं। नेहरू के ज़माने में आदिवासी समाजों को उनकी संस्कृति और अस्मिता के संबंध में एक क़िस्म की आश्वस्ति मिली हुई थी, मगर बाद में उस पर बार-बार प्रहार होते गए। विभिन्न दलों को द्वारा की गई पहचान की राजनीति ने टकराव, हिंसा और अलगाव को बढ़ावा दिया।

इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि पूर्वोत्तर के अलगाववादी आंदोलनों को पड़ोसी देशों से मदद मिलती रही है, मगर इसमें हमारी सरकारों की भूमिका कोई कम नहीं रही। उनकी दमनकारी नीतियों ने आदिवासी समाजों में असंतोष और अलगाववाद की भावना को गहरा किया है। 

ऐसी एक-दो नहीं, दर्ज़नों मिसालें हैं, जो बताती हैं कि भारतीय फौजों ने स्थानीय लोगो के साथ किस तरह के और किस पैमाने पर अत्याचार किए हैं। बलात्कार से लेकर फ़र्ज़ी एनकाउंटर तक एक लंबा सिलसिला है। एक लंबा सिलसिला न्याय न मिलने का भी है। बहुत कम मामलों में अपराध करने वाले सैनिकों और अफसरों को दंडित किया गया है। 

सशस्त्र सेना विशेषाधिकार अधिनियम एक ऐसा काला कानून है, जिसकी आड़ में हमारी सेना ढेरों जघन्य अपराध किए हैं और उसका बाल भी बांका नहीं हुआ है। इस कानून ने उन्हें कुछ भी करने की खुली छूट दे रखी है। सेना के उच्च अधिकारी और सरकारें उनका हर हाल में बचाव करती रही हैं, इसीलिए पूर्वोत्तर के लोगों का उन पर से विश्वास कब का उठ चुका है। 

नगालैंड की घटना इस अविश्वास को बढ़ाने वाली साबित होगी और इसमें न्याय नहीं हुआ, जिसकी उम्मीद कम ही है, तो ये अलगाववाद की आग में घी का काम करेगी। उम्मीद इसलिए कम है कि एक तो आम तौर पर न्याय न मिलने का ही इतिहास है और दूसरे मौजूदा सरकार का मिजाज़ सैन्यवादी है। 

उसका राष्ट्रवाद यही कहता है कि सेना जो भी करती है, सही करती है और उसे हर हाल में बचाना ही है, क्योंकि उसका इस्तेमाल हिंदू राष्ट्र के निर्माण के लिए किया जाना है। हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी विभिन्न मौक़ों पर इस तरह के संदेश देते रहते हैं। कभी सैनिक वेशभूषा पहनकर तो कभी उनकी तुष्टिकरण वाले भाषण देकर। 

एक लोकतांत्रिक समाज मे सेना की भूमिका क्या है, उसे किन सीमाओं में रहकर काम करना चाहिए, उसका ध्यान न सैन्य अधिकारियों को है और न ही सरकार को। बल्कि सरकार तो उनका इस्तेमाल कर रही है, उनसे राजनीतिक बयान दिलवाकर, उन्हें राजनीति मे अवसरों का लालच देकर। 

तो सरकार से तो कोई उम्मीद नहीं की जा सकती, मगर इस देश का नागरिक समाज क्यों खामोश है? वह क्यों नहीं नगालैंड के पीड़तों की आवाज़ के साथ आवाज़ मिला रहा है?


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