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पेरियार की पत्रकारिता

पेरियार द्वारा संपादित अखबारों में ‘कुदी आरसु’ और ‘विदुथलाई’ के बाद ‘रिवोल्ट’ तीसरा महत्वपूर्ण अखबार था। पहले दोनों अखबार तमिल में थे, जबकि ‘रिवोल्ट’ को अँग्रेजी पाठकों के लिए निकाला गया था। उसका पहला अंक 7 नवंबर, 1928 को इरोद से निकला था। पेरियार द्वारा प्रकाशित/संपादित पत्र-पत्रिकाओं से परिचित करा रहे हैं ओमप्रकाश कश्यप

ई.वी. रामासामी पेरियार (17 सितंबर, 1879 – 24 दिसंबर, 1973) पर विशेष

पेरियार का सार्वजनिक जीवन बेहद सक्रिय और बहुआयामी था। तमिल समाज, विशेष रूप से गैर-ब्राह्मणों में आत्ससम्मान की भावना जाग्रत करने तथा उनके अधिकारों के लिए वे कई मोर्चो पर एक साथ लड़ रहे थे। जातीय भेदभाव, राजनीतिक-सामाजिक वर्चस्ववाद, धार्मिक आडंबरवाद, सामाजिक कुरीतियां और रूढ़ियां, स्त्री-स्वतंत्र्य, जातीय विषमता, देवदासी प्रथा, विधवा समस्या, बाल-विवाह आदि। मानव समाज का कोई ऐसा सरोकार था जो उनका अपना सरोकार हो। न कोई ऐसी त्रासदी नहीं थी, जिससे वे जूझे न हों। वे व्यापारी, नेता, समाज सुधारक, चिंतक, विचारक, भाषा-वैज्ञानिक, तर्कशास्त्री, आंदोलनकर्मी, मार्गदर्शक आदि सभी कुछ एक साथ थे। इसके अलावा उनका एक रूप और भी था। वह था, पत्रकार-संपादक का। अधिकांश लोग उनके इस रूप के बारे में ज्यादा नहीं जानते। हालांकि इस क्षेत्र में भी उनका योगदान इतना महत्वपूर्ण और मौलिक है कि यदि उनके दूसरे कार्यों को छोड़ दिया जाए तब भी वेपेरियार(महान) कहे जा सकते हैं। ‘कुदी आरसु’ (1925), ‘द्रविड़ियन’ (1927), ‘रिवोल्ट’ (1928), ‘पुरात्ची’ (1933), ‘पागूथरिवु (1934), ‘विदुथलाई’ (1935), ‘जस्टिस’ (1942), ‘उन्मई’ (1970) तथा दि माडर्न रेशनिलष्ट (1971) जैसे पत्र-पत्रिकाओं से उनका संबंध रहा। इनमें से कुछ की स्थापना उन्होंने स्वयं की। वहीं कुछ का संपादन दायित्व संभाला। अपनी अर्जित पूंजी का बड़ा हिस्सा उन्होंने इन अखबारों पर खर्च किया। व्यापारिक घाटा सहा। यहाँ तक कि जेल यात्राएं भी कीं। लेकिन अपने सरोकारों पर आंच आने दी। मानव मूल्यों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता हमेशा बनी रही।

1925 में कांग्रेस से अलग होने के बाद, उन्होंने ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ की नींव रखी। चूंकि ब्राह्मण वर्चस्व वाले पत्र-पत्रिकाओं में गैर-ब्राह्मण मुद्दों के लिए कोई स्थान नहीं था। इसलिए ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ की वैचारिकी तथा उसके कार्यक्रमों को जनता तक पहुँचाने के लिए उन्होंने पत्रकारिता के क्षेत्र में कदम रखा। शुरुआत ‘कुदी आरसु’ से की गई। आगे पेरियार द्वारा संपादित और प्रकाशित समाचार पत्र-पत्रिकाओं का संक्षिप्त परिचय दिया जा रहा है। 

कुदी आरसु

‘कुदी आरसु’ के मायने हैं— ‘जनता का राज’ यानी ‘गणतंत्र। पेरियार ने इस साप्ताहिक की स्थापना अपने विचारों को लोगों तक पहुँचाने के लिए की थी। उसका पहला अंक 2 मई 1925 को इरोड से प्रकाशित हुआ था। प्रथम संपादक थे, के.एम. थेंगापेरुमल पिल्लई; तथा मूल्य था—एक आना। वार्षिक चंदा 3 रुपये और बरंबारता साप्ताहिक थी। अखबार इरोड में ही कतचेरी रोड स्थित ‘उन्मै विलक्कम अचगम’ (सत्य प्रदर्शनी प्रेस) नामक छापाखाने से प्रकाशित होकर, प्रत्येक रविवार को पाठकों तक पहुँचता था। अखबार निकालने की आवश्यकता पर पेरियार ने ‘कुदी आरसु’ के पहले ही अंक में लिखा था—

‘इस देश में अनेकानेक समाचारपत्र हैं। किंतु वे अपनी आत्मा, अपने विवेक के प्रति ईमानदार नहीं हैं। उन सबके विपरीत मैं ‘कुदी आरसु’ में, सत्य की साहसपूर्ण अभिव्यक्ति, जैसा कि मैं उसे देखता हूंदेने को संकल्पबद्ध हूं।’ [1] 

पहले अंक में ‘भारतमाता के चित्र के साथ, चरखा कातती हुई स्त्री, हल लिए हुए एक किसान, बुनाई करते हुए जुलाहे का चित्र, साथ में धार्मिक सौहार्द्र के प्रतीक के रूप में चर्च और मंदिर के प्रतीक चिह्नों को प्रकाशित किया गया था। अखबार के संपादकीय में पेरियार ने स्पष्ट किया था— 

‘उन लोगों से जो हमारे समाचार माध्यम के आदर्शों के बारे में जानने की इच्छा रखते हैं—मैं जोर देकर कहना चाहूंगा कि हमारे देश में समाज, राजनीति, अर्थव्यवस्था और नैतिक मूल्यों का विकास होना चाहिए। अखबार के माध्यम से हम जनसाधारण के विकास के साथ-साथ धर्म, समाज, संस्कृति एवं कला की उन्नति हेतु अनथक प्रयत्न करेंगे। अन्य सभी मानवादर्शों को किनारे कर, सिर्फ राष्ट्र एवं राष्ट्रवाद के नारे लगाना हमारी पत्रिका का अभीष्ट नहीं है। हमारा मानना है राष्ट्र और राष्ट्रवाद को मानव समाज में आत्मसम्मान, समाजवाद एवं बंधुत्व के विकास में मददगार होना चाहिए, ताकि लोग एक-दूसरे के साथ प्रेम और सद्भावमय जीवन बिता सकें। ऊंच-नीच और सामाजिक भेदभाव, जातीय विद्वेषों को बढ़ावा देते हैं। वे समाज के एक हिस्से को दंभी और निरंकुश बनाते हैं, जबकि दूसरे हिस्से से उसका मान-सम्मान, यहाँ तक कि उनका आत्मविश्वास तक छीन लेते हैं। इन बुराइयों के समाहार हेतु समाज में बराबरी का एहसास होना जरूरी है। धर्म के नाम पर धोखादड़ी तथा अदालती फैसलों के बीच भगवान को लाने की प्रवृत्ति को हतोत्साहित किया जाना चाहिए। जनकल्याण की वांछा में यह साप्ताहिक इन आदर्शों के साथ-साथ दूसरे समाजादर्शों को भी प्राप्त करने के लिए संकल्पित है।’ [2] 

आगे चलकर यह समाचारपत्र पेरियार के विचारों का मुखपत्र सिद्ध हुआ। अखबार के लिए लिखे गई आरंभिक लेखों में ही पेरियार के आत्मसम्मान आंदोलन के बीजतत्व छिपे थे। आने वाले अंकों के माध्यम ने पेरियार ने साफ कर दिया था कि आमजन के विकास तथा उससे जुड़े मुद्दों की उपेक्षा करके, केवल राष्ट्र और राष्ट्रीयता की बात करना, उसके नाम पर विभिन्न वर्गों के बीच नफरत पैदा करना—उनकी पत्रिका का अभीष्ट नहीं है। पेरियार का मानना था कि जाति और वर्ण के नाम पर श्रेष्ठतादंभ अथवा हीनता का एहसास जातिवाद को मजबूत बनाते हैं। यह भावना तत्काल समाप्त जो जानी चाहिए। यह सत्य कि सभी मनुष्य एक समान हैं, सभी लोगों तक पहुँच जाना चाहिए। पत्रिका के आवरण संदेश के लिए पेरियार ने भारतीदसन की कविता को उद्धृत किया गया था। तदनुसार ‘कुदी आरसु’ निकालने के पीछे उनका उद्देश्य था

  1. जनता के बीच आत्मसम्मान, समानता और बंधुत्व की भावना का विस्तार करना तथा;
  2. सामाजिक भेदभाव जैसे कि ऊंच-नीच, की भावना जातिगत टकरावों को भड़काने का काम करती है। मानव-मात्र के बीच सद्भाव और सौहार्द्र की भावना विकसित करने के लिए उसे तत्काल समाप्त हो जाना चाहिए।

‘कुदी आरसु’ के माध्यम से पेरियार का उद्देश्य आत्मसम्मान आंदोलन की गतिविधियों के बारे में जनता को परचाने तक सीमित नहीं था। उनका उद्देश्य था, सामाजिक न्याय, जाति-प्रथा, धर्माडंबर और हिंदू धर्म की अन्यान्य कुरीतियों के बारे में जनता को सावधान करना। अपनी निर्भीक आवाज में उन्हें लोगों तक पहुँचाना। अपने प्रकाशन के बाद से ही ‘कुदी आरसु’ का स्वर विद्रोहपरक रहा था। ठीक वैसा ही जैसा पेरियार ने सोचा था। ‘कुदी आरसु’ में ऐसे लेखों को प्रकाशित किया गया था, जो जातीय भेदभाव, धर्माडंबरों और पौराणिक मिथों पर कटाक्ष करते थे। लेखों की भाषा सहज परंतु व्यंग्यात्मक होती थी—‘दान के लिए उपयुक्त कौन है—ब्राह्मण’, ‘हम ब्राह्मणों की आलोचना क्यों करते हैं?’, ‘तीर्थ और तीर्थस्थलों का सच’, “‘कुदी आरसु’ द्वारा ब्राह्मणों की आलोचना क्या तर्कसम्मत है? जैसे शीर्षक न केवल ब्राह्मणवाद पर सीधा प्रहार करते थे, अपितु धर्म की उस जकड़बंदी की ओर भी इशारा करते थे, जिससे उस समय पूरा हिंदू समाज ग्रस्त था। 

पेरियार द्वारा प्रकाशित पत्र कुदी आरसु की एक प्रति का मुख्य पृष्ठ तथा पेरियार की तस्वीर

अपने प्रकाशन के साथ ‘कुदी आरसु’ ने घोषणा की थी कि वह मानव मात्र की आत्मनिर्भरता तथा उसके कल्याण के लिए काम करेगा। धार्मिक-सामाजिक आडंबरों और विकृतियों पर उसकी नजर रहेगी। अखबार ने यह भी साफ कर दिया था कि राजनीतिक मतभेदों में उलझने के बजाय वह रचनात्मक राजनीति का समर्थन करेगा। कांग्रेस तथा दूसरे राजनीतिक दलों; और उस समय के दूसरे अखबारों की भांति ‘कुदी आरसु’ राष्ट्रवादी अखबार नहीं था। पेरियार भी देश की आजादी चाहते थे। मगर उनके लिए सामाजिक विसंगतियों जैसे जाति और जातिभेद छूआछूत, ब्राह्मणवाद, धर्म के नाम पर तरह-तरह के आडंबरों से मुक्ति देश की आजादी जितनी ही आवश्यक थी। इसलिए ‘कुदी आरसु’ का ज़ोर सामाजिक विसंगतियों के समाधान पर था। इसलिए उसमें उस समय के लगभग सभी बड़े नेताओं, जो खुद को राष्ट्रवादी बताते थे—की खुली आलोचना प्रकाशित होती थी। सरोकारों और तेवरों के आधार पर ‘कुदी आरसु’ का उदय, तमिलनाडु की पत्रकारिता के इतिहास में क्रांतिकारी कदम था। 

16 पृष्ठों वाले कुदी आरसु’ का मुख्य पाठक वर्ग समूचा तमिल भाषायी क्षेत्र था। उसकी आरंभ में मात्र दो हजार प्रतियां प्रकाशित होती थीं। अपने अच्छे दिनों में प्रतियों की संख्या 10000 तक जा पहुँची थी। मगर प्रतियों की संख्या के आधार पर पाठक संख्या का सही-सही आकलन कर पाना संभव नहीं है। क्योंकि ऐसे काफी लोग थे, जिनकी आर्थिक स्थिति अखबार पर पैसे खर्च करने लायक नहीं थी। गांवों में अखबार प्रायः आत्मसम्मान आंदोलन के नेता के पते पर जाता था। वहाँ उसे पूरे गांव को पढ़कर सुनाया जाता था। पत्रिका को देश से बाहर, खासतौर पर मलाया में बसे तमिल भाषी पाठकों तक पहुँचाने में, थेमिझिवेल जी. सारंगपानी का बहुत बड़ा योगदान था। पेरियार उसके प्रकाशक थे। उनकी विदेश यात्राओं तथा गिरफ्तारी के दिनों में अखबार के प्रकाशन की जिम्मेदारी उनकी पत्नी नागम्मल, बहन कनम्मल और भाई कृष्णास्वामी संभालते थे। उसके नियमित लेखकों में पेरियार के अलावा मलायापुरम सिंगरावेलु चेट्टियार जैसे प्रतिबद्ध और संघर्षधर्मा लोग शामिल थे। ध्यातव्य है कि साधारण मछुआ परिवार में जन्मे सिंगरावेलु चेट्टियार ‘कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया’ के पितृ संस्थापक थे। उन्हें भारतीय श्रमिक-आंदोलन का पितामह कहा जाता है। कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना से पहले उन्होंने जाति एवं छूआछूत के विरोध में लंबा संघर्ष किया था। भारत में एक मई को ‘श्रमिक दिवस’ रूप में मनाने की शुरुआत (1 मई 1923 से) करने का श्रेय भी उन्हीं को जाता है। उन्होंने ही कम्युनिस्ट पार्टी के कार्यकर्ताओं के लिए पहली बार ‘कामरेड’ संबोधन का उपयोग किया था। पेरियार उनसे प्रभावित थे। उन्होंने ही सिंगरावेलु से ‘कुदी आरसु’ के लिए लिखने का आग्रह किया था। पेरियार के भीतर विज्ञान की समझ और वैज्ञानिक बोध पैदा करने में सिंगरावेलु का बड़ा योगदान था। गौरतलब है कि ‘कुदी आरसु’ के माध्यम से ही पेरियार ने जनता से अपील की थी कि आगे से उन्हें ‘थोशर’ (कामरेड) संबोधित किया जाए। [3] इसलिए पत्रिका के अगले अंक से उन्हें ‘थोशर’ संबोधित किया गया था। [4] ‘ब्राह्मणोफोबिया’ शब्द का उपयोग भी ‘कुदी आरसु’ में अकसर किया जाता था। 

पत्रिका में प्रकाशित लेखों के मुख्य स्वर स्त्री समानता समर्थक, जातिवाद एवं छूआछूत विरोधी तथा नास्तिकता पर केंद्रित होते थे। निर्भीक और प्रतिरोधी पत्रकारिता के कारण ‘कुदी आरसु’ को अनेक बार सरकार का कोपभाजन बनना पड़ा। कई बार उसपर देशद्रोह के मुक़दमे चले। 1933 में प्रकाशित एक लेख से तो सरकार इतनी कुपित हुई थी कि संपादक और मुद्रक दोनों पर एक-एक हजार रुपये का जुर्माना थोप दिया। लेख के कारण पेरियार को जेल भी जाना पड़ा था। नास्तिकता एवं साम्यवादी विचारधारा के प्रचार-प्रसार का दोषी मानते हुए उसे जब-तब प्रतिबंधित किया जाता रहा। ‘कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो’ तथा भगत सिंह के दस्तावेजी आलेख ‘मैं नास्तिक क्यों हूं’ का तमिल अनुवाद, 1935 में पेरियार ने, ‘कुदी आरसु’ में ही प्रकाशित किया था। उनके प्रकाशित होते ही परंपरावादी विरोध पर उतर आए थे। उनके दबाव में सरकार ने ‘कुदी आरसु’ को प्रतिबंधित कर, पेरियार तथा तमिल अनुवादक पी. जीवनधन को गिरफ्तार कर लिया गया। तमाम अवरोधों और व्यवधान के बावजूद पत्रिका लगभग 25 वर्षों तक प्रकाशित होती रही। तमिल समाज के नवजागरण में ‘कुदी आरसु’ का बड़ा ही योगदान रहा। उसका अंतिम अंक 5 नवंबर 1949 को प्रकाशित हुआ था। 

द्रविड़ियन

‘द्रविड़ियन’ एक दैनिक समाचार पत्र था। इसकी शुरुआत जून 1917 में हुई थी। शुरू करने वाली संस्था का नाम था—‘साउथ इंडियन पीपुल्स ऐसोशिएसन’। आगे चलकर उसका नाम ‘जस्टिस पार्टी’ कर दिया गया था। अखबार का उद्देश्य, जैसा उसके नाम से ही स्पष्ट है, तमिलनाडु में गैर-ब्राह्मण राजनीति को बढ़ावा देना था। उस समय सभी पत्र-पत्रिकाओं पर ब्राह्मणों अथवा ऊंची जातियों का कब्जा था। जो सांस्थानिक समाचारपत्र थे, वे भी उनकी स्वार्थपूर्ण राजनीतिक-सांस्कृतिक दुर्नीति के हिस्सेदार थे। इसलिए ऐसे अखबार की सख्त आवश्यकता थी, जो गैर-ब्राह्मणों की समस्याओं पर संवाद कर सके। ‘द्रविड़ियन’ का प्रकाशन केंद्र मद्रास था। उसकी शुरुआत भी ठीक-ठाक हुई थी। मगर धीरे-धीरे वह लड़खड़ाने लगा। स्थापना के बाद से अगले दस वर्षों में उसके पांच संपादक बदल चुके थे। जे. भक्तवत्सलम पिल्लई (1917-1922), एस. सोमसुंदरम (1919), जे. एन. रामानाथन (1920-21) और ए. षड्मुगम पिल्लई (1923)। 1924 से उसके संपादक जे. एस. कन्नापर थे। 

फरवरी 1927 ‘जस्टिस पार्टी’ का जनाधार खिसकना शुरू हुआ तो उसे जनमानस पर पकड़ बनाने में सक्षम नेताओं की जरूरत पड़ने लगी। तब पार्टी अध्यक्ष राजा पानंगल और ए. रामासामी मुदलियार ने पेरियार से अखबार को संभालने का अनुरोध किया। उन दिनों ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ और ‘जस्टिस पार्टी’ मिलकर काम कर रहे थे। दोनों के सरोकार भी एक समान थे। पेरियार ‘कुदी आरसु’ आरंभ कर चुके थे, लेकिन वह साप्ताहिक पत्र था। ‘द्रविड़ियन’ दैनिक अखबार था। आखिकरकार ‘जस्टिस पार्टी’ और ‘आत्मसम्मान आंदोलन’, दोनों की खातिर पेरियार ने 1928 में ‘द्रविड़ियन’ के संपादन की जिम्मेदारी ओट ली। उनकी आकर्षक संवाद शैली, लोकहित के मुद्दों पर सीधी पकड़ और जुझारू मानसिकता का लाभ ‘द्रविड़ियन’ को भी मिला। उसकी ग्राहक संख्या बढ़ने लगी। 

‘द्रविड़ियन’ के नियमित लेखकों में के. एस. चिदंबरनार, नीलावती और गोपाल आदि शामिल थे। प्रकाशित लेखों का उद्देश्य सामाजिक-सांस्कृतिक सुधार तथा गैर-ब्राह्मणों में राजनीतिक चेतना का विकास करना था। कुछ नेताओं को ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ और ‘जस्टिस पार्टी’ की एकता से जलन थी। पेरियार की छवि गैर-ब्राह्मण नेता के साथ-साथ ऐसे नेता की भी थी जो हिंदू धर्म के अंधविश्वासों, धर्मग्रंथों के मिथकीय आख्यानों का मुखर आलोचक था। जो धार्मिक कर्मकांडों को ब्राह्मणवादी षड्यंत्र मानता था। इसलिए पेरियार का ‘द्रविड़ियन’ से जुड़ना उनके लिए और भी आपत्तिजनक था। ऐसे लोग अपनी भड़ास तरह-तरह से निकाल रहे थे—

‘अभी तक ‘जस्टिस पार्टी’ के नेता ब्राह्मणों, जो उदार और सहिष्णु हैं, जिनमें प्रतिरोध की क्षमता का अभाव है—के विरुद्ध निंदा अभियान चला रहे थे। अब ऐसा लगता है कि बेईमानी से उनमें कुछ स्वाभिमानी भारतीय, ब्राह्मण या गैर-ब्राह्मण, भी शामिल हो चुके हैं, जिनके वैचारिक मतभेद सुस्पष्ट हैं।’ [5] 

‘दि मद्रास मेल’ ने जो संभावना जताई थी, वह गलत नहीं थी। ‘जस्टिस पार्टी’ में पेरियार के विरोधी मौजूद थे। जनवरी 1931 में उन्होंने अखबार को पेरियार के हाथों से निकालने के लिए अप्रत्यक्ष रास्ता अपनाया। जनवरी 1931 में सरकार की ओर से ‘द्रविड़ियन’ को प्रतिभूतियां जमा करने का आदेश मिला। इसपर पेरियार ने कहा कि धनराशि के अभाव में उनके लिए वैसा कर पाना संभव नहीं है। उन्होंने अखबार को बंद करने की सलाह दी। लेकिन वह स्थगन अस्थायी था। 1931 से, जस्टिस पार्टी के नेता ए. अम्मल के संपादन में ‘द्रविड़ियन’ दुबारा निकलने लगा। एक अप्रतिबद्ध नेता के हाथों में अखबार जाने से जो नुकसान संभव था, वही ‘द्रविड़ियन’ को झेलना पड़ा। ए. अम्मल ने ऐलान किया कि आगे से अखबार धार्मिक, सामाजिक मान्यताओं तथा लोकविश्वासों के प्रति तटस्थता की नीति का पालन करेगा। 

रिवोल्ट

पेरियार द्वारा संपादित अखबारों में ‘कुदी आरसु’ और ‘विदुथलाई’ के बाद ‘रिवोल्ट’ तीसरा महत्वपूर्ण अखबार था। पहले दोनों अखबार तमिल में थे, जबकि ‘रिवोल्ट’ को अँग्रेजी पाठकों के लिए निकाला गया था। उसका पहला अंक 7 नवंबर, 1928 को इरोद से निकला था। ‘रिवोल्ट’ इरोद स्थित ‘उन्मई विलाक्कम प्रेस’ से प्रकाशित होता था। पेरियार की पत्नी नागम्मल उसकी प्रकाशक और मुद्रक थीं। वह ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ का मुखपत्र था। अखबार के प्रथम अंक में ही, उसके औचित्य पर प्रकाश डालते हुए, एस. रामानाथन ने लिखा था—

‘वे (ब्राह्मण राजनेता) हमें ऐसे क्षेत्रों में चुनौती दे सकते हैं, जहां ‘कुदी आरसु’ की पहुँच नहीं है। वे विदेशी भाषाओं में अपना अभियान चला सकते हैं। हमारी जरूरतें बढ़ी हुई हैं, इसलिए अपने आंदोलन के विस्तार के लिए, अपने विचारों को अँग्रेजी भाषी पाठकों तक पहुँचाने के लिए, हमें अँग्रेजी अखबार की जरूरत है।’ [6] 

अपरिहार्य कारणों से ‘रिवोल्ट’ के प्रकाशन को कुछ दिनों के लिए मद्रास अंतरित करना पड़ा था। बाद में उसे पुनः इरोद ले आया गया। ‘रिवोल्ट’ के लिए आरंभ में पेरियार ने अपनी ओर से निवेश किया था। आगे चलकर, जैसे-जैसे उसकी लोकप्रियता बढ़ी, अखबार ग्राहकों और चंदे के भरोसे निकाला जाने लगा। लेकिन सभी स्रोतों से ‘रिवोल्ट’ की इतनी आय नहीं थी कि खर्च को लेकर निश्चिंत रहा जा सके। 

उल्लेखनीय है कि 1928 में, जबसे ‘रिवोल्ट’ का प्रकाशन आरंभ हुआ था, मद्रास प्रांत में गैर-ब्राह्मणों की साक्षरता दर मात्र 7 प्रतिशत थी। उनमें अँग्रेजी पढ़ने-समझने वालों की संख्या तो और भी कम थी। बावजूद इसके पेरियार ने अँग्रेजी में अखबार निकालने का साहस किया था। दरअसल ‘रिवोल्ट’ के माध्यम से वे अपने विचारों को उस वर्ग तक पहुँचाना चाहते थे जो खुद को पढ़ा-लिखा और प्रबुद्ध मानता था, लेकिन तरह-तरह के सामाजिक-सांस्कृतिक और धार्मिक कुरीतियों का शिकार था, जो ‘विश्वास’ को ‘विवेक’ से ऊपर मानता था। ‘रिवोल्ट’ के प्रकाशन के बारे में ज्यूडिशयल मजिस्ट्रेट के समक्ष की गई घोषणा में उसकी प्रकाशक-मुद्रक नागम्मल ने लिखा था—

‘‘रिवोल्ट’ से मेरा अभिप्राय है—निरर्थक प्रतिबंधों का निषेध। उन प्रतिबंधों का निषेध जो प्रकृति और मानवीय विवेक की अवहेलना करते हैं; तथा उनके विरुद्ध हैं। राजनीति, नौकरशाही, लैंगिक एवं जातीय भेदभाव, पूंजीवाद आदि द्वारा उत्पन्न जो भी बाधाएं मानव प्रकृति तथा उसके विकास के आड़े आती हैं—‘रिवोल्ट’ उन सबके विरुद्ध मुखर होकर, आवाज उठाने का काम करेगा।’’ [7] 

‘रिवोल्ट’ के माध्यम से पेरियार का उद्देश्य ब्राह्मणों द्वारा आत्मसम्मान आंदोलन की आलोचनाओं का उत्तर देना भी था। धार्मिक-सामाजिक एवं राजनीतिक प्रतिरोध, आर्थिक बाधाओं के बावजूद वह 1930 तक लगातार प्रकाशित होता रहा। इस छोटी-सी अवधि में उसने धार्मिक और सामाजिक सुधार से जुड़े राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर खुलकर लिखा। उसमें महाकाव्यों एवं पुराणों के मिथकीय आख्यानों पर उसमें लंबी-लंबी लेख-मालाएं प्रकाशित होती थीं। उनमें ब्राह्मणवाद तथा उसके धर्माडंबरों, जातिवादी मानसिकता की मुक्त समीक्षा की जाती थी। भारतीय पत्रकारिता के इतिहास में वह पहला अखबार था जो महाकाव्यों और पुराणों के मिथकीय आख्यानों तथा उनके औचित्य पर सीधे सवाल खड़े करके, उनपर बहस का अवसर देता था। 

‘रिवोल्ट’ न केवल ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ का मुखपत्र था, अपितु पेरियार के विचारों का संवाहक भी था। जाति उन्मूलन, हिंदू-मुस्लिम एकता, श्रमिकों की समस्याएं, बालविवाह, देवदासी उन्मूलन, महिला अधिकार, धर्म और परंपरा के नाम पर फैलाए गए अंधविश्वासों तथा छुआछूत के उन्मूलन से जुड़े आलेख, कांग्रेस की परंपरापोषी राजनीति, गाँधी के अंतर्विरोधों से जुड़े आलेख ‘रिवोल्ट’ में नियमित प्रकाशित होते थे। ‘रिवोल्ट’ के माध्यम से पेरियार ने अफगानिस्तान में अमीर अमानुल्लाह के धार्मिक सुधारों, छूआछूत उन्मूलन के प्रति कांग्रेस के ढुलमुल रवैये, औपनिवेशिक सरकार के प्रति कांग्रेस का दुहरी नीतियों, हेगेल के द्वंद्ववाद, कैथरीन मेयो की पुस्तक ‘मदर इंडिया’ पर उठे विवाद, मंदिर प्रवेश के लिए चल रहे रहे संघर्ष पर खुलकर न केवल अपने विचार प्रकट किए थे, अपितु समकालीन अखबारों के माध्यम से एक जीवंत बहस को जन्म दिया था। ‘रिवोल्ट’ के आरंभिक अंकों का संपादन पेरियार ने एस. रामानाथन के सहयोग से किया था। उसमें अनेक लेखक उपनामों का सहारा लेते थे। ‘रिवोल्ट’ के लिए लिखे गए कई बहुचर्चित आलेख ‘किर्क’ (पागल या दीवाना), ‘फाउंटेन पेन’, ‘राइटस, बी. जी.’ जैसे उपनामों से लिखे गए थे। उसके नियमित लेखकों में पी. चिदंबरम पिल्लै, जॉर्ज जोसेफ, के. एम. बालासुब्रनियम, आर. विश्वनाथन, गुरुस्वामी आदि प्रमुख थे। यहाँ तक कि यदा-कदा डॉ. आंबेडकर भी उसे अपने आलेखों और प्रतिक्रियाओं से समृद्ध करते रहते थे। पेरियार के समर्थक गुरुस्वामी की शैली व्यंग्यात्मक थी। उनके लेखों ने ‘रिवोल्ट’ को चर्चित करने में बड़ी भूमिका निभाई थी। 

लेखों के अलावा उसमें ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ के प्रमुख नेताओं यथा आर. के. षड्मुगम, पेरियार, रामासामी मुदलियार के भाषण भी प्रकाशित होते रहते थे। उसमें संतराम बी.ए. के ‘जात-पात तोड़क मंडल’, नारायण गुरु के ‘श्री नारायण धर्म परिपालन योगम’ तथा डॉ. आंबेडकर से जुड़ी खबरें; तथा उनके आंदोलन और उपलब्धियों पर भी चर्चा होती थी। 

लगभग दो साल के जीवनकाल में साप्ताहिक ‘रिवोल्ट’ के कुल 55 अंक निकल सके। लगातार आर्थिक घाटे के कारण उस अखबार को बंद कर देना पड़ा। उस समय तक ऐसे कई अखबार आरंभ हो चुके थे, जो ब्राह्मणवाद के बौद्धिक आतंक से न केवल मुक्त थे, अपितु उसका सामना करने का साहस भी रखते थे। इनमें ‘थोंदन’, ‘सुयमरियाथाई थोंदन’ और ‘कुमारन’ प्रमुख थे, जो क्रमश: तिरुनेल्वेल्ली, इरोड और कराईकुडी से प्रकाशित होते थे। ‘रिवोल्ट’ के बंद होने से ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ को जो क्षति पहुँची थी, इन अखबारों ने उसकी आंशिक भरपाई करने की कोशिश की थी। बहरहाल, इस अल्प अवधि में ‘रिवोल्ट’ ने जो काम किया, वह बुद्धिवादी और जनसरोकारों से संबद्ध पत्रकारिता का श्रेष्ठतम उदाहरण माना जाता है। ‘रिवोल्ट’ की निर्भीक पत्रकारिता का नमूने के तौर पर हम 22 नवंबर, 1929 को प्रकाशित ‘धर्म खतरे में है’ का एक अंश उद्धृत कर रहे हैं—

‘भारत में स्थिति एकदम अलग है। यहाँ एक एक ऐसा धर्म है जिसका नाम हिंदुओं के किसी भी तथाकथित धर्मशास्त्र में नहीं मिलता। जो केवल चमत्कारों और अंधविश्वासों पर टिका हुआ है। उसके कुछ अनुयायी कहते हैं कि उनके धर्म का आधार-स्रोत वेद हैं। उधर वेदों के बारे में दंभपूर्ण घोषणा की जाती है कि वे परमात्मा की भाषा में, उन्हीं के वाणी से अवतरित हुए हैं। उनके बारे में कहा जा सकता है कि वे प्रयोग-बाह्यः मृत-भाषा में लिखे गए हैं। उन्हें केवल हिंदुओं की दैवी संतानों (ब्राह्मणों), जिनकी संख्या कुल हिंदुओं का मात्र 3 प्रतिशत है—द्वारा पढ़ा और सुना जाना चाहिए। 97 प्रतिशत जनसंख्या को शूद्र की संज्ञा दी गई है। इस शब्द का अर्थ—गुलाम या ब्राह्मणों की रखैलों की संतान है। यदि शूद्र वेदों को पढ़ने का दुस्साहस करें तो उनकी जुबान को काट लेना चाहिए। यदि वे वेद मंत्र को सुन लें तो उनके कानों में पिघला हुआ सीसा भर देना चाहिए। यदि वे वेदों के किसी हिस्से को हृदयंगम कर लें तो उनके हृदयों को आग के हवाले कर देना चाहिए।’ [8] 

ऐसी सत्साहसी पत्रकारिता की शुरुआत केवल और केवल कोई ‘पेरियार’ ही कर सकता था। हिंदू धर्म के मिथों पर सीधा प्रहार करने के कारण ‘कुदी आरसु’ और रिवोल्ट की पाठक संख्या अपेक्षित रूप से कम थी। लेकिन पेरियार को उसकी चिंता नहीं थी। वे सभाओं के माध्यम से जनता से सीधे संवाद करने पर विश्वास करते थे। जरूरत पड़ने पर वे दिन में कई-कई सभाओं को संबोधित करते थे। इसपर टिप्पणी करते हुए द्रविड़ फेडरेशन(द्रविड़ कड़गम) के महासचिव टी. पी. वेदाचलम ने कहा था—‘पेरियार जैसे प्रचारक, अतीत में बहुत कम हुए हैं, न ही भविष्य में उनके जैसे प्रचारक के होने की संभावना है।’ उनके भाषण का मुख्य थीम होता था—‘ब्राह्मणवाद सभी बुराइयों का जड़ है।’ ‘रिवोल्ट’ के माध्यम से इसी को तार्किक रूप से जनता तक पहुँचाया जाता था।

पुरात्ची 

यह मानते हुए कि समाचारपत्र अपने विचारों को लोगों तक पहुँचाने का सशक्त माध्यम है, पेरियार ने कई पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन किया था। उनमें एक था, ‘पुरात्ची’, जिसका शब्दार्थ है—’क्रांति। ‘पुरात्ची’ की संपादक पेरियार की बहन कन्नमबल थीं। 

‘पुरात्ची’ का प्रकाशन 1933 में शुरू किया गया था। उससे कुछ महीनों पहले ही पेरियार विदेश यात्रा से लौटे थे। उनका सबसे लंबा और महत्वपूर्ण दौरा सोवियत संघ का था, जिसने उन्हें बेहद प्रभावित किया था। इतना कि उन्होंने ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ की रूपरेखा तथा संगठन में भी साम्यवादी विचारधारा के अनुरूप बदलाव किए थे। इस बीच सरकार के हस्तक्षेप के चलते उन्हें कुछ दिनों के लिए ‘कुदी आरसु’ को स्थगित करना पड़ा था। 

नाम के अनुरूप पेरियार ने ‘पुरात्ची’ के माध्यम से अपने क्रांतिकारी विचारों को प्रकाशित करना शुरू कर दिया। सरकार की उनपर नजर थी। सरकार उन दिनों कम्युनिज्म से बुरी तरह चिढ़ी हुई थी। ब्राह्मणवादियों को भी वह खतरा दिखाई पड़ता था। इसी के चलते 2 जून 1934 को पेरियार के भाई ई. वी. कृष्णासामी को गिरफ्तार कर लिया गया। उनपर सरकार के विरुद्ध साजिश रचने का आरोप लगाया गया था। ‘पुरात्ची’ के कार्यालय की तलाशी ली गई। बाद में कृष्णासामी को जमानत पर रिहा कर दिया गया। मगर अखबार को पुन: शुरू करने से पहले मुद्रक एवं प्रकाशक को दो हजार रुपये की जमानत राशि जमा करने का आदेश दिया गया। जमानत राशि जमा करने के बजाय पेरियार ने अखबार को बंद कर देना ही उचित समझा। 

पागूथरिवु

पुरात्ची के बंद होने के बाद पेरियार ने 1934 में ‘पागूथरिवु’ का प्रकाशन आरंभ किया था। ‘पागूथरिवु’ का अर्थ है—’बुद्धिवाद’ अथवा तर्कसंगत। इस समाचार पत्र की प्रकाशन तिथि को लेकर विद्वानों में मतभेद हैं। के. वीरामणि ने इसकी प्रकाशन तिथि 12 जनवरी 1934 माना है। [9] जबकि अन्य लेखक इसकी प्रकाशन तिथि 26 अगस्त 1934 मानते हैं। [10] एक तरह से यह ‘कुदी आरसु’ का ही विस्तार था। इस अखबार की महत्ता इसलिए भी है कि पेरियार ने 1932 तमिल अक्षरों में सुधार किया तो नए अक्षरों को पहली बार ‘पागूथरिवु’ में ही प्रकाशित किया था। 

‘पागूथरिवु’ में उन्होंने समाजवाद, कम्युनिज्म, तर्कवाद जैसे विषयों पर अनेक गूढ़ आलेखों का प्रकाशन किया था। 1934 तक पेरियार खुद को पूरी तरह नास्तिक घोषित कर चुके थे। 

इसलिए हिंदू धर्म के अलावा बाकी धर्म भी उनकी आलोचना के दायरे में थे। 1934 के ‘पागूथरिवु में उन्होंने लिखा था कि धार्मिक बुराइयां इस्लाम, ईसाई सहित सभी धर्मों में मौजूद हैं। अखबार ने ‘दि प्रीस्ट, वूमेन एंड कन्फेशन’ से तमिल में अनूदित एक आलेख प्रकाशित किया था। उसमें पादरी को दकियानूसी विचारों का प्रचार करते हुए दिखाया गया था। बताया गया था कि ईसाई धर्म भी अवैज्ञानिक और अतार्किक बातों को बढ़ावा देता है। उन्हीं दिनों एक संपादकीय के माध्यम से अखबार ने हिंदू धर्म की कमजोरियों पर निशाना साधते हुए लिखा था कि हिंदुओं के— 

धार्मिक पर्व और त्योहार सार्वजानिक स्थानों पर मनाए जाते हैं। उनके लिए पंडाल सड़क के बीचोंबीच लगाए जाते हैं। उस समय सड़क पूरी तरह कब्जा जी जाती है। ऐसे ही जैसे विजयनगर के देवता को समुद्र में प्रवाहित करने के ले जाते समय होता है। इससे सांप्रदायिक हिंसा भड़कने की भारी संभावना रहती है। यदि जुलूस के रास्ते में मस्जिद पड़ जाए और वहाँ बहुसंख्यक आबादी मुस्लिमों की हो तो दंगे भड़कने की संभावना और भी बढ़ जाती है। नवरात्रि के दिनों में प्रतिद्विंद्वी समूहों द्वारा दुर्गापूजा के नाम पर लोगों से जबरदस्ती चंदा उगाहा जाता है। यह दिखाता है कि हमारे पर्व और त्योहार सार्वजानिक सुरक्षा और शांति के लिए कितना बड़ा खतरा बन चुके हैं….।)’ [11]

इस अखबार में अर्थशास्त्र से जुड़े कई आलेख प्रकाशित हुए। उनमें राष्ट्रीय और निजी कर्जों को तत्काल समाप्त करने की मांग की गई थी। ‘पुरात्ची’ की तरह यह समाचारपत्र भी करीब एक साल ही निकल सका।

विदुथलाई

पेरियार द्वारा स्थापित समाचारपत्रों में ‘विदुथलाई’ का स्थान बहुत ऊंचा है। ‘विदुथलाई’ का अर्थ है, आजादी। 1935 में स्थापित यह पत्र तमिल भाषा में प्रकाशित होता था। यह दैनिक अखबार था। 1935 तक ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ जनमानस में अपनी पैठ बना चुका था। हर जिले, कस्बे में उसकी शाखाएं बन चुकी थीं। आत्मसम्मान आंदोलन के कार्यकर्ताओं तथा आम जनता तक अपने विचारों को पहुँचाने के लिए पेरियार ने ‘विदुथलाई’ की स्थापना की थी। अखबार के प्रकाशक ई. वी. कृष्णासामी और संपादक मुत्तुसामी पिल्लई थे। अखबार का मुख्य उद्देश्य था, ब्राह्मणवादी टोने-टोटकों, पाखंडों और कर्मकांडों के प्रति जनता को जागरूक करना। उनमें वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा देना। इसलिए उसमें वेद-पुराण आदि धर्मग्रंथों में दर्ज मिथकीय आख्यानों पर जमकर प्रहार किया जाता था। इससे एक वर्ग उससे खासा नाराज रहता था। आर्यों और द्रविड़ों में मतभेद पैदा करने, दोनों के बीच नफरत पेदा करने के आरोप में अखबार के संपादक मुत्तुसामी को एक बार छह महीने जेल की सलाखों के पीछे भी जाना पड़ा था। [12] 

‘विदुथलाई’ के प्रत्येक अंक में, दूसरे पृष्ठ पर एक या दो सूक्तियां दी जाती थीं। आमतौर पर दैनिक अखबारों में आलेख छोटे छापे जाते हैं। उनका विषय भी समसामयिक रखा जाता है, जिससे वह प्रतिदिन बदलता रहता है। मगर विदुथलाई के साथ ऐसा नहीं था। दैनिक होने के बावजूद उसमें एक ही विषय को लेकर आलेखों की शृंखला प्रकाशित होती थी। उनमें एक खास लेखमाला थी—‘वैश्विक इतिहास में बुद्धिवाद’। विश्व के किसी भी कोने में होने वाले वैज्ञानिक आविष्कार तथा विज्ञान से जुड़ी खबरें, नियमित रूप से ‘विदुथलाई’ में प्रकाशित होती रहती थीं। बुद्धिवादी होने के कारण विदुथलाई का स्वर सरकार और ब्राह्मणवादी आंडबरों, पुराणादि ग्रंथों में दर्ज मिथों पर आलोचना से भरा रहता था। इसके कारण उसे अनेक बार ब्राह्मणवादियों के कोप का सामना करना पड़ा था। 

‘विदुथलाई’ का प्रकाशन आज भी जारी है। के. वीरामणि उसके संपादक है। वे 1956 में ही इस अखबार से जुड़ चुके थे। 1978 से वे ‘विदुथलाई’ के संपादक के पद पर हैं।

उन्मई

तमिल शब्द ‘उन्मई’ का अर्थ है—अस्तित्व अथवा वास्तविक। वह पेरियार द्वारा प्रकाशित पाक्षिक तमिल भाषी अखबार था। उसका पहला अंक 14 जनवरी 1970 को प्रकाशित हुआ था। पेरियार ने अखबार को भारतीय समाज में हो रहे परिवर्तनों को समर्पित किया था। प्रथम अंक के मुख्य पृष्ठ पर बुद्ध की तस्वीर छापी गई थी। जबकि दूसरे पृष्ठ पर बुद्ध के सुभाषितों को जगह मिली थी। पेरियार द्वारा संपादित बाकी अखबारों की तरह उन्मई भी ब्राह्मणवाद, जाति तथा सामाजिक भेदभाव, लिंगभेद के खात्मे को समर्पित था। उन्मई आज भी डिजिटल रूप में प्रकाशित हो रहा है। उसके संपादक हैं, के. वीरामणि। 

दि माडर्न रेशनलिष्ट

‘दि माडर्न रेशनलिष्ट’ मासिक अँग्रेजी पत्रिका है, जिसका पहला अंक 1971 में पेरियार के चित्र के साथ प्रकाशित हुआ था। उसके बाद इसके मुखपृष्ठ पर देश के बड़े नेताओं यथा इंदिरा गाँधी, कामराज, अन्नादुरई, आदि के चित्र प्रकाशित होते रहे हैं। जैसा कि नाम से स्पष्ट है कि ‘दि माडर्न रेशनलिष्ट’ के प्रकाशन का उद्देश्य पाठकों में तर्क और बुद्धि के प्रति विश्वास पैदा करना है। पत्रिका में दुनिया भर के बुद्धिवादी विचारकों गैलिलियो, थॉमस जेफरसन, वॉल्टेयर, कॉपरनिकस, डार्विन, ब्रूनो, एनेक्सागोरस, कन्फ्युशियस, हक्सले, थॉमस पेन, हीगेल, रूसो आदि के विचार समय-समय पर प्रकाशित हुए थे। इसके अलावा एक नियमित कॉलम पेरियार के लेखों और भाषणों के लिए आरक्षित होता था। पत्रिका में वैज्ञानिक आविष्कारों के लिए भी एक कॉलम सुरक्षित रखा गया है। हिंदू धर्मदर्शन की आलोचनात्मक समीक्षा भी माडर्न रेशनलिष्ट की विशेषता है। 

पेरियार के विचारों को समर्पित यह देश में अपनी तरह की इकलौती पत्रिका है। इसका उद्देश्य अंधविश्वासों तथा पाखंडों के साथ-साथ उनके लिए चलाए जा रहे प्रचार अभियान का भी पर्दाफाश करना है। ‘दि माडर्न रेशनलिष्ट’आज भी प्रकाशित हो रही है। 

बुद्धिवादी पुस्तक प्रकाशन समिति 

बुद्धिवाद ने पश्चिम में पंद्रहवीं-सोलहवीं शताब्दी में दस्तक दी थी। भारत उन दिनों क्रांति-प्रतिक्रांति के दौर से साथ-साथ गुजर रहा था। एक ओर रैदास तथा कबीर जैसे संत कवि सामाजिक-सांस्कृतिक कुरीतियों के विरुद्ध जंग लड़ते हुए लोगों की आंखों में क्रमश: ‘बेगमपुरा’ और ‘अमरदेसवा’ का सपना रोपने की कोशिशों में थे। दूसरी ओर तुलसी और सूर जैसे कवि, जाने-अनजाने भक्ति की आड़ में वर्णाश्रम व्यवस्था को मजबूत करने वाले षड्यंत्र के भागीदार बने हुए थे। बीसवीं शताब्दी में पश्चिम में जब बौद्धिक पुनरोदय का लंबा चक्र करीब-करीब पूरा हो चुका था; और वे अपने समाज को आधुनिकतम जीवन मूल्यों के अनुरूप ढालने की प्रक्रिया में थे—भारत में ऊंचे-ऊंचे पदों पर विद्यमान बुद्धिजीवी, सांस्कृतिक नवजागरण की आड़ लेकर, पश्चिम से आने वाली वैचारिक चेतना को रोकने में लगे थे। उन्हें अपनी समकालीन राजनीतिक और आर्थिक ताकतों का पूरा समर्थन प्राप्त था। पेरियार का सामना ऐसे ही लोगों से था। वे प्रखर बुद्धिवादी थे। चाहते थे कि लोग अपने विवेक से काम लेना सीखें। धर्म के नाम पर फैलाई गई कुरीतियों से बाहर निकलें। इसके लिए जनसाधारण को आधुनिकतम विचार-शैलियों से परचाना आवश्यक था। 

शास्त्रों का मुक़ाबला केवल आधुनिकतम जीवन मूल्यों से लैस पुस्तकों द्वारा किया जा सकता है, इसीलिए पेरियार ने ‘कुदी आरसु’, ‘पुरात्ची’, ‘विदुथलाई’ जैसे अखबारों के प्रकाशन/संपादन की ज़िम्मेदारी अपने सिर ली थी। इस दिशा में उनका एक और महत्वपूर्ण योगदान था—‘बुद्धिवादी पुस्तक प्रकाशन समिति’ की स्थापना। इस समिति की स्थापना 13 दिसंबर 1932 को की गई थी। पंजीकरण एक लिमिटेड कंपनी के रूप में कराया गया था। ‘समिति’ मूलत: ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ की शाखा थी। इरोड उसका मुख्यालय था। पेरियार का लक्ष्य समिति के शेयर बेचकर अंशधारकों से, प्रति शेयर 10 रुपये के हिसाब से, 30,000 रुपये जुटाना था। समिति का प्रमुख उद्देश्य था, बौद्धिक विमर्श पर केंद्रित देशी-विदेशी साहित्य का प्रकाशन। पेरियार लंदन स्थित ‘रेशनलिष्ट प्रेस एसोशिएसन ऑफ लंदन’ से प्रभावित थे। आत्मसम्मान आंदोलन से भी कई अच्छे लेखक-विचारक जुड़े थे। पेरियार का लक्ष्य उनके विचारों को, चारों दक्षिण भारतीय भाषाओं के माध्यम से, पूरे द्रविड़ समुदाय तक पहुँचाना था। ‘समिति’ द्वारा आरंभ में केवल तमिल में पुस्तकों का प्रकाशन किया गया। प्रथम चरण में दुनिया-भर के प्रखर बुद्धिवादियों की 20 पुस्तकें, मामूली कीमत पर पाठकों तक पहुँचाई गईं। [13] 

प्रकाशित पुस्तकों में ‘भौतिकवाद’ और ‘कुदी आरसु कुलंबगम’ (कुदी आरसु संचयन) पेरियार की थीं। क्रमश: 72 और 120 पृष्ठ की वे पुस्तिकाएं आत्मसम्मान आंदोलन की सभाओं में, समय-समय पर दिए गए भाषणों तथा ‘कुदी आरसु’, ‘पुरात्ची’, ‘विदुथलाई’ आदि में शामिल निबंधों और संपादकीय आलेखों का संचयन थीं। उस समय तक पेरियार धर्म, ईश्वर और पुरोहितवाद को लेकर काफी मुखर हो चुके थे। वे निरंतर उनपर हमला कर रहे थे। बाकी पुस्तकों में भी धर्म और ईश्वरवाद पर तीखा हमला किया गया था। शामिल लेखों में धर्म, ईश्वर, कर्मकांड आदि की तीखी आलोचना थी। समिति द्वारा प्रकाशित प्रमुख अन्य पुस्तकों में एम. सिंगरावेलु द्वारा लिखित, ‘वैज्ञानिक प्रविधियां और अंधविश्वास’, रोबर्ट जी. इंगरसोल की, ‘ईश्वर तथा मैं संशयवादी क्यों बना?’, बर्ट्रेंड रसेल की, ‘क्या सभ्यताकरण में धर्म का कोई मौलिक योगदान है?’, जोसफ मेक्काब की, ‘क्या मृत्यु के बाद भी जीवन है?’, आर. जी. तौंसेंड फॉक्स ऑफ दरहम की, ‘पुजारियों का ब्रह्मचर्य’ आदि शामिल थीं। [14] विभिन्न लेखकों द्वारा अलग-अलग समय में लिखी गई उन पुस्तकों में एक बात सामान्य थी कि वे सभी धर्म और ईश्वर के औचित्य पर सवाल उठाती थीं। उनका संदेश था कि ईश्वर, धर्म, आत्मा-परमात्मा, पाप-पुण्य, स्वर्ग-नर्क वगैरह महज मनुष्य की परिकल्पनाएं हैं। ये अल्पसंख्यक पुरोहितों द्वारा अपने स्वार्थ के लिए रचे गए हैं। वे काल्पनिक परलोक के लिए इहलोक की उपेक्षा का संदेश देकर मनुष्य को भरमाते हैं। मनुष्य विवेकशील प्राणी है। विवेकशील बने रहने में ही उसकी इयत्ता है। इसलिए तर्क और विवेक के आधार पर पंडे-पुरोहितों द्वारा थोपे गए जड़ विश्वासों का खंडन किया जाना चाहिए। वैज्ञानिक सोच, तर्क और विवेक की मदद से ईश्वर, धर्म, स्वर्ग-नर्क, पाप-पुण्य, पूजा-पाठ जैसे मानवीय विवेक की अवमानना करने वाले अंधविश्वासों को कुचल देना चाहिए। 

‘बुद्धिवादी पुस्तक प्रकाशन समिति’ द्वारा प्रकाशित पुस्तकों में से अनेक अँग्रेजी से अनूदित थीं। उनमें ईसाई धर्म और चर्च को निशाना बनाया गया था। इसलिए कैथोलिक चर्च का नाराज होना स्वाभाविक था। उसने पेरियार और आत्मसम्मान आंदोलन के विरुद्ध शिकायत दर्ज करा दी। परिणामस्वरूप मद्रास सरकार ने ‘कुदी आरसु’ के संपादक और प्रकाशक को गिरफ्तार कर लिया। मुकदमे का दौरान अदालत ने उन्हें सामाजिक सौमनस्य को क्षति पहुँचाने के आरोप में एक-एक हजार की जमानत राशि जमा कराने का आदेश दिया। कैथोलिक चर्च को इसी से तसल्ली न थी। उसने अपने अनुयायियों से अपील की कि वे धर्मद्रोहियों की बातों में आने के बजाय, चर्च के प्रति अपनी आस्था को बनाए रखें। धर्म और ईश्वर के औचित्य पर सवाल उठाकर भौतिकवाद का प्रचार करने वाली पुस्तकों के बारे में चर्च की टिप्पणी थी, ‘ये पुस्तकें पश्चिम में बहुत पहले लिखी गई पुस्तकों का तमिल में पुन:प्रकाशन मात्र हैं। वे अपने लेखकों के कुतर्कों तथा उनकी विवेकहीनता को दर्शाती हैं।’ ‘आंदोलन’ के नेताओं के बारे में उसका बयान था कि अपने कुतर्कों और मिथ्या विश्वासों के दास बन जाने के बावजूद, पुस्तकों के प्रकाशक खुद को ‘स्वाभिमानी’ कहते हैं। 

एक ओर सरकार का दबाव, दूसरी ओर चर्च का हमला। ब्राह्मण तो धर्म और संस्कृति का द्रोही बताकर पेरियार की आलोचना करते ही रहते थे। उन सबकी इच्छा पेरियार तथा उनके सहयोगियों को हतोत्साहित करने की थी। बावजूद इसके ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ तेजी से लोकप्रिय हो रहा था। पेरियार और उनके सहयोगी अपने साम्यवादी एजेंडे को कुशलतापूर्वक आगे बढ़ा रहे थे। भौतिकवाद का प्रचार-प्रसार उसी का हिस्सा था। 1934-1935 के बीच आंदोलन की गतिविधियों का तेजी से प्रसार हुआ था। इससे आम जनता में उसकी गतिविधियों के प्रति आकर्षण बढ़ा था। अनुकूल अवसर देखते हुए पेरियार ने 13 जनवरी 1935 से ‘कुदी आरसु’ का पुनर्प्रकाशन आरंभ कर दिया। आंदोलन के लिए वह बड़ी उपलब्धि थी। ‘कुदी आरसु’ के प्रकाशन की शुरुआत के समय उसकी केवल 2000 प्रतियां प्रकाशित की जाती थीं। बढ़ते-बढ़ते उनकी संख्या 10000 तक पहुँच चुकी थीं। प्रतियों की संख्या के अनुपात में उसकी पाठक संख्या कई गुना थी। जनसाधारण तक अपने विचारों के प्रसार के हेतु ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ की शाखाओं ने दूर-दराज के गांवों में पाठक-केंद्र बनाए हुए थे। वहाँ पहुँचने वाली हर प्रति, पाठक-केंद्र के माध्यम से, दर्जनों पाठकों तक पहुँचती थी। जगह-जगह उनका सामूहिक वाचन किया जाता था। कभी-कभी तो पूरे गांव के सामने उन्हें पढ़ा जाता था। फलस्वरूप एक प्रति सैकड़ों पाठकों/श्रोताओं तक वैचारिक संप्रेषण का काम करती थी। उन्हीं दिनों ‘आंदोलन’ की विचारधारा को समर्थित नई पत्रिका ‘तमिलन’ का प्रकाशन आरंभ हुआ। वह आंदोलन के बढ़ते प्रभाव को दर्शाता था। 

उधर आंदोलन के विरोधी भी सक्रिय थे। उनकी शिकायत पर 20 जनवरी 1935 को पुलिस ने, ‘कुदी आरसु’ तथा ‘बुद्धिवादी पुस्तक प्रकाशन समिति’ के कार्यालयों पर छापा मारकर वहाँ की सघन तलाशी ली। उसी दिन प्रधान संपादक ई. वी. कृष्णासामी के आवास पर भी छापा मारा गया। अगले दिन 21 जनवरी को ‘समधर्म’ के जोलारपेट स्थित कार्यालय पर छापा पड़ा। उसके बाद कृष्णासामी और जीवानंदम को गिरफ्तार कर लिया गया। [15] जीवानंदम ‘समधर्म’ के मानद संपादक थे। दोनों पर सरकार के विरुद्ध षड्यंत्र रचने का आरोप लगाया गया था। ‘समधर्म’ का प्रकाशन जारी रखने के लिए उसके संपादक को 3000 राशि जमा कराने का आदेश दिया गया। जमानत राशि जमा कराने का आशय था, सरकार की निगाह में हमेशा-हमेशा के लिए आ जाना। जिस तरह से विरोधी सक्रिय रहते थे, उसे देखते हुए भविष्य में कार्यवाही की संभावना से इंकार नहीं किया जाता था। काफी सोच-विचार के बाद ‘समधर्म’ के प्रकाशन को बंद करने का निर्णय लिया गया। दिसंबर 1934 से उसके प्रकाशन को बंद कर दिया गया। उन दिनों ‘आंदोलन’ इरोड और नागापट्टिनम से दो मासिक क्रमश: ‘पागूथरिवु’ और ‘कैपिटल’ के प्रकाशन की योजना पर काम कर रहा था। चिढ़ी हुई सरकार ने उपर्युक्त अखबारों के प्रकाशन की मंजूरी देने से पहले जमानत राशि लेने पर विचार करने लगी। सरकार की चिढ़ के पीछे भगतसिंह की पुस्तक ‘मैं नास्तिक क्यों हूं’ का प्रकाशन भी था। उसका तमिल अनुवाद जीवानंदन ने किया था। प्रकाशित किया था इरोड स्थित ‘उन्मई विलक्कम प्रेस’ ने। छपने के साथ ही उस पुस्तक की प्रतियों को ब्रिटिश सरकार ने जब्त कर लिया था। विरोधियों को लगता था चौतरफा दबाव से आत्मसम्मान आंदोलन के नेताओं के हौसले पस्त हो जाएंगे। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। साम्यवाद तथा उसकी पूरक वैचारिकी भौतिकवाद में उनका विश्वास तब भी कायम था। ‘कुदी आरसु’ तथा ‘पागूथरीवु’ में उसकी प्रशंसा से भरपूर लेख नियमित रूप से प्रकाशित हो रहे थे। रूस उनके लिए आदर्श देश था। अखबारों के माध्यम से उसका गुणगान लगातार जारी था। सरकार की नाराजगी, चर्च की आलोचना, अखबारों में ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ को लेकर छप रहीं तरह-तरह की खबरें तथा उसके कार्यालयों पर पड़ने वाले पुलिस के छापे—लोगों में भ्रम पैदा कर रहे थे। उनके निवारण के लिए पेरियार ने 6 मार्च को 1935 को एक लिखित बयान जारी किया। बयान में उन्होंने ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ के कार्यों तथा उद्देश्यों को लेकर उत्पन्न गलतफहमियों को दूर करने का प्रयास किया था। उन्होंने लिखा था—

“मैंने देखा है कि पिछले कुछ समय से ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ के उद्देश्यों और संकल्पों के प्रति जनता में भारी भ्रम फैलाया गया है। इन गलतफहमियों का बड़ा कारण ‘आंदोलन’ के दुश्मनों द्वारा उसके बारे में गलत और दुर्भावनापूर्ण प्रचार है। अतः लोगों के मन में आंदोलन के बारे में बनी गलत धारणाओं के निवारण तथा उन्हें शरारती तत्वों के झूठे एवं मनगढंत प्रचार से बचाने के लिए स्पष्टीकरण देना आवश्यक हो जाता है।” 

उन्होंने आगे लिखा था— 

“यह बात बहुत पहले, भली-भांति स्पष्ट की जा चुकी है कि ‘आत्मसम्मान आंदोलन का मूलभूत उद्देश्य दक्षिण भारत की दमित एवं शोषित जातियों को उनके दैन्य से मुक्ति दिलाकर, सुधार की ओर अग्रसर करना है। इसके साथ-साथ स्त्रियों की दशा में सुधार करना भी ‘आंदोलन का लक्ष्य है। इस लक्ष्य की प्राप्ति हेतु ‘आंदोलन’ का ठोस, समेकित सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक विचारधारा के अनुसार कार्य करते रहना आवश्यक है। अतएव ‘आंदोलन’ के प्रमुख सूत्रधार के रूप में मैं उसके कार्यों को उपर्युक्त तीन क्षेत्रों (सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक) तक सीमित रखने के लिए प्रतिबद्ध हूं।” [16] 

पेरियार के वक्तव्य से लगता था कि वे सरकार के दबाव के आगे झुक रहे हैं। वस्तुतः साम्यवाद के प्रति झुकाव और आंदोलन की धर्म संबंधी नीतियों के कारण सरकार उनसे काफी नाराज थी। उसके घातक हमलों से बचाने के लिए इस तरह का स्पष्टीकरण समीचीन था। उसकी विभिन्न लोगों पर अलग-अलग प्रतिक्रिया हुई थी। दरअसल, ‘कुदी आरसु’ के जिस अंक में पेरियार का उपर्युक्त स्पष्टीकरण प्रकाशित हुआ था, उसी में ‘समिति’ द्वारा जीन मेसलियर की सद्यःप्रकाशित पुस्तक का विज्ञापन भी प्रकाशित हुआ था। वह ‘समिति’ की ओर से प्रकाशित भौतिकवाद पर केंद्रित, बीसवीं पुस्तक थी, जो ईश्वर, आत्मा, धर्म और चर्च से जुड़ी अनेक मान्यताओं पर प्रहार करती थी। 

संदर्भ :

  1. कुदी आरसु, 2 मई 1925 
  2. कुदीआरसु, 2 मई 1925, रेवती थॉमस, ई.वी.आर. पेरियार एज पब्लिसिष्ट : प्रेस एज एन इंस्ट्रूमेंट फॉर सोशल चेंज (1925-1949), शोधप्रबंध, मनोनमणियम सुंदरनार यूनीवर्सिटी, तिरुनेलवेलि, 2008 से उद्धृत। 
  3. कुदी आरसु, 13 नवंबर 1932 
  4. कुदी आरसु 20 नवंबर, 1932
  5. ‘दि मद्रास मेल’ के 27 जुलाई 1928 
  6. डॉ. ई. सा. विश्वनाथन द्वारा उद्धृत, “दी पॉलिटिकल करिअर ऑफ ई.वी.रामासामी नायक : अ स्टडी इन दी पॉलिटिक्स ऑफ तमिलनाडु, 1920-1949”, 1983, मद्रास पृष्ठ-84 
  7. कुदी आरसु, 22 अप्रैल, 1928, वी. गीता और एस. वी. राजदुरई, द्वारा ‘रिवोल्ट-ए रेडीकल वीकली इन कोलोनियल मद्रास’ से उद्धृत। 
  8. रिवोल्ट, 22 मई 1929 
  9. कलेक्टिड वर्क्स ऑफ पेरियार, दी पेरियार सेल्फ रेस्पेक्ट प्रोपगेंडा इंस्टीट्यूशन, 2007
  10. बी. एस. चंद्रबाबू, सोशल प्रोटेस्ट एंड इट्स इंपेक्ट इन तमिल नाडु, एमराल्ड पब्लिशर्स, 1993, पृष्ठ 49-93 तथा रेवती थॉमस, ई.वी.आर. पेरियार एज पब्लिशिष्ट, पृष्ठ-169।
  11. पागूथरिवु, 11 नवंबर, 1934
  12. गवर्नमेंट रिपोर्ट, संख्या 17 वर्ष 1938, खंड 36, 21 नवंबर, 1938 तमिलनाडु
  13. एन. के. मंगलामुरुगेसन, सेल्फ रेस्पेक्ट मूवमेंट (1920-1949), पृष्ठ 125
  14. वही, पृष्ठ 125
  15. वही, पृष्ठ 128 
  16. वही, पृष्ठ 129

(संपादन : नवल/अनिल)


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साहित्यकार एवं विचारक ओमप्रकाश कश्यप की विविध विधाओं की तैतीस पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं। बाल साहित्य के भी सशक्त रचनाकार ओमप्रकाश कश्यप को 2002 में हिन्दी अकादमी दिल्ली के द्वारा और 2015 में उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान के द्वारा समानित किया जा चुका है। विभिन्न पत्रपत्रिकाओं में नियमित लेखन

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अश्विनी कुमार पंकज के मुताबिक, एक लंबे अरसे तक राजकीय संरक्षण हासिल होने के बाद भी संस्कृत आज खत्म हो रही है। वहीं नागा,...