यूपी : बदल रहा है चुनाव का नॅरेटिव

स्वामी प्रसाद मौर्य ने उत्तर प्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री पद से इस्तीफा दिया तो सूबे की सियासत में भूचाल आ गया। उनके पीछे-पीछे बीजेपी से जिन विधायकों ने इस्तीफा दिया, वह भी दलित या ओबीसी वर्ग से हैं। इससे नॅरेटिव बन रहा है कि पिछड़े और दलित समाजवादी पार्टी के साथ लामबंद हो रहे हैं। बता रहे हैं सैयद जै़गम मुर्तजा

स्वामी प्रसाद मौर्य, हरेंद्र मलिक, लालजी वर्मा, रामअचल राजभर, चौधरी विजेंद्र सिंह, राकेश राठौर, आरके चौधरी, ब्रजेश प्रजापति, रौशन लाल वर्मा, भगवती प्रसाद सागर, दारा सिंह चौहान और माधुरी वर्मा में क्या समानता है? ये तमाम नेता पिछड़े या दलित वर्ग से ताल्लुक़ रखते हैं और ये सभी अब समाजवादी पार्टी की साइकिल पर सवार हैं। ये तमाम नेता पिछले एक डेढ़ साल में बीजेपी, कांग्रेस और बहुजन समाज पार्टी छोड़कर आए हैं। 

हालांकि उत्तर प्रदेश की सियासत में दल-बदल नई घटना नहीं है। चुनाव के समय या इससे कुछ पहले तमाम नेता नए समीकरणों के लिहाज़ से नए घर की तलाश करते रहे हैं। मगर इस बार जो नई बात है वो है दलित और पिछड़े वर्ग की नुमाइंदगी करने वाले तमाम नेता एक मंच पर आते दिख रहे हैं। वहीं दलबदल करने वालों में ब्राह्मण और मुसलमान नेताओं की भी बड़ी संख्या है, लेकिन प्रदेश की राजनीति में पिछड़ों और दलितों की गोलबंदी राज्य की सियासत को लंबे समय के लिए नई दिशा में मोड़ सकती है। जिस राज्य में लोगों ने मान लिया था कि अब सियासत मंदिर, मस्जिद और मज़हब के अलावा कुछ नहीं है, वहां दलित और पिछड़ों का अलग दिशा में चल पड़ना बदलाव का संकेत हो सकता है।

यह पहली बार नहीं है कि राज्य में दलित और पिछड़े अपने-अपने वर्ग की अनदेखी, उत्पीड़न और नुमाइंदगी के सवाल पर मुखर हैं और एक ऐसे मंच की तलाश में हैं, जहां से अपनी समस्यओं का हल खोज सकें। 1990 के दौर में उत्तर प्रदेश की जनता इस तरह की गोलबंदी का असर देख चुकी है। तब भी बीजेपी की गाय, मंदिर, गंगा, और कमंडल राजनीति का तोड़ पिछड़े और दलितों की गोलबंदी ही बनी थी। हालांकि बीजेपी ने कल्याण सिंह को चेहरा बनाकर बहुत दिनों तक ओबीसी को शांत रखा, लेकिन जैसे ही राज्य की कमान राजनाथ सिंह और राम प्रकाश गुप्ता जैसे लोगों के हाथ गई, दलित और पिछड़ों ने अपने लिए नए ठिकाने तलाश लिए। इसका फायदा बारी-बारी से समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी को मिला। 

पिछले तीन-चार साल में राज्य की सियासत में दो बड़ी घटनाएं हुई हैं। एक बहुजन समाज पार्टी का क्षरण और दूसरा बीजेपी में दलित और पिछड़ों को किनारे लगाने की मुहिम। उत्तर प्रदेश के कुल वोटरों में क़रीब 19 फीसदी दलित और 45 फीसद ओबीसी हैं। अगर ओबीसी में मुसलमानों को अलग कर भी लिया जाए तब भी क़रीब 60 फीसद वोटर हैं जो एक जगह हों तो हर हाल में अपराजेय हैं। लेकिन लंबे अरसे से होता यह रहा है कि दलितों में जाटव बनाम ग़ैर-जाटव और ओबीसी में कहीं यादव बनाम ग़ैर-यादव, कहीं जाट बनाम ग़ैर-जाट, कुर्मी बनाम ग़ैर-कुर्मी और गूर्जर बनाम ग़ैर-गूर्जर के जैसे ध्रुवीकरण होता रहा है। इसका फायदा ज़ाहिर सी बात है एक राष्ट्रीय पार्टी को मिलता है, सो इस तरह की खेमेबाज़ी कराने का इलज़ाम भी इसी दल पर है।

स्वामी प्रसाद मौर्य और अखिलेश यादव की तस्वीर

बहरहाल, उत्तर प्रदेश चुनाव में इस बार तीन ऐसे मुद्दे हैं जो दलित, और ओबीसी से जुड़े हैं। पहला खेती और सहायक कामों में लगातार बढ़ता घाटा। दूसरा है धर्म की राजनीति की वजह से दलित और पिछड़ों के पारंपरिक कार्यों को पहुंची चोट और तीसरा है राज्य में जातीय उत्पीड़न, पुलिस एनकाउन्टर, और बढ़ते अपराधों का शिकार बने लोगों में दलित-ओबीसी की बड़ी तादाद। ओमप्रकाश राजभर जैसे नेता अपनी हर सभा में दलित और पिछड़ों के उत्पीड़न का मुद्दा उठा रहे हैं। सपा के राष्ट्रीय महासचिव इंद्रजीत सरोज का दावा है कि बीजेपी शासन में ओबीसी और दलित न सिर्फ उत्पीड़न का शिकार हुए हैं बल्कि उनको जानबूझकर किनारे लगाया गया है। वहीं राष्ट्रीय लोकदल के नेता और गूर्जर महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. यशवीर सिंह का दावा है राज्य की राजनीति में एक जाति के अलावा तक़रीबन सभी की अनदेखी हुई है। वे यह भी कहते हैं कि राज्य में जाट, गूजर, कुर्मी, सैनी, लोध, यादव, जैसी जातियां खेती, काश्तकारी, पशुपालन जैसे कामों से जुड़ी हैं। खेती के बिगड़ते हालात, खेतों को नष्ट करते गाय, सांड और धर्म की सियासत के चलते गाय, बैल की बिक्री पर लगी रोक से इन वर्गों को सबसे ज़्यादा आर्थिक नुक़सान हुआ है। वहीं इंद्रजीत सरोज मानते हैं है कि राज्य के पिछड़े और दलितों में शुमार होने वाली जातियों में से किसी एक के लिए यह दावा नहीं किया जा सकता कि बीजेपी शासनकाल में उसे फायदा हुआ है। उल्टा उत्पीड़न, पुलिसिया ज़्यादती और जातीय हिंसा के मामले उठाकर देखिए तो मुसलमानों के अलावा सबसे ज़्यादा शिकार इन्ही वर्गों से मिलेंगे। 

तो क्या यूपी की राजनीति में दलित और पिछड़ों की गोलबंदी सच में हो रही है और अगर हां तो इसका राज्य के चुनावी नतीजों पर क्या असर पड़ने वाला है? स्वामी प्रसाद मौर्य ने उत्तर प्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री पद से इस्तीफा दिया तो सूबे की सियासत में भूचाल आ गया। उनके पीछे-पीछे बीजेपी से जिन विधायकों ने इस्तीफा दिया वह भी दलित या ओबीसी वर्ग से हैं। इससे नॅरेटिव बन रहा है कि पिछड़े और दलित समाजवादी पार्टी के साथ लामबंद हो रहे हैं। इससे पहले लखनऊ में बहुजन रैली में अखिलेश यादव की शिरकत और अपनी चुनावी रथयात्रा में समाजवादियों के अलावा अंबेडकरवादियों को संबोधित उनके भाषणों से इस तरह के संकेत गए। 

इतना ज़रूर है कि बहुजन समाज पार्टी का आधे-अधूरे मन से चुनाव में उतरना, मायावती की सक्रिय राजनीति से दूरी और पार्टी की कमाम सतीश चंद्र मिश्रा के हाथों में होने से दलितों में बेचैनी है। राज्य के पिछड़े भी यादव, जाट और गूर्जर विरोध छोड़कर अपने हित तलाश रहे हैं। ऐसे में समाजवादी पार्टी उनके लिए एक विकल्प तो है मगर जितना यह दिखने में आसान है, ज़मीन पर उतना ही मुश्किल। दलित और ओबीसी जातियों के बीच टकराव का लंबा इतिहास रहा है। अगर वाक़ई में राज्य के साठ फीसद वोटरों को अपराजेय होना है तो पहले निजी स्वार्थ और झूठे जातीय दंभ से बाहर निकलना होगा और यह यक़ीनन आसान नहीं है। दूसरे, मज़हब, मंदिर, और गंगा की सियासत अभी इतना कमज़ोर भी नहीं है कि कुछ नेताओं के पाला बदलने से ठंडी पड़ जाए। 

लेकिन हां, इतना तो हुआ है कि चुनाव में दलित-ओबीसी को लेकर एक नॅरेटिव तो बना ही है। यह भले ही स्थायी न दिख रहा हो या बहुत लंबा चलने वाला न भी हो तब भी प्रयोग के तौर पर कुछ तो हो रहा है। जब इस तरह के प्रयोग होते हैं तो चुनाव की दिशा और दशा भी बदलते हैं। इसे ऐसे ही दल-बदल कहकर टाल देना भी ठीक नहीं है। अगर ओबीसी-दलित नेताओं का ऐसा ही एकतरफा बहाव होता रहा तो यह उत्तर प्रदेश में न सिर्फ सत्ता परिवर्तन बल्कि लंबे अरसे के लिए राजनीति की दिशा परिवर्तन करने वाला भी साबित हो सकता है।

(संपादन : नवल/अनिल)


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