बहस-तलब : शोषक संस्कृति का विरोध आवश्यक

अपने साप्ताहिक स्तंभ में हिमांशु कुमार उठा रहे हैं दलित-बहुजनों के सांस्कृतिक अधिकारों के हनन का सवाल। उनके मुताबिक, इस धार्मिक, आर्थिक, सांस्कृतिक दादागिरी का मुकाबला करने के लिए हमें आदिवासियों, दलितों और पिछड़ों के गांवों में फ़ैली हुई सांस्कृतिक धरोहरों, भाषाओं, पहनावे व खानपान आदि को सामने लाना होगा

किसी भी देश और समाज में किसी सभ्यता या संस्कृति का बचना उस देश की राजनीति और अर्थनीति पर निर्भर करता है। मुख्य बात यह है कि अगर राजनीति और अर्थव्यवस्था चाहेगी तभी कोई भाषा चलेगी और अगर बाज़ार तथा उसकी अनुगामी राजनीति नहीं चाहेगी तो वह भाषा ख़त्म हो जाएगी। भारत में हिंदी को संविधान में राजभाषा का दर्जा दिया गया। इसे कई लोग राष्ट्रभाषा कह देते हैं। लेकिन आज भी भारत में लगभग हर माता-पिता अपने बच्चों को अंग्रेज़ी माध्यम से पढ़ाना चाहते हैं। सिर्फ गरीब मजबूरी में अपने बच्चों को हिंदी माध्यम के सरकारी स्कूलों में पढने भेजते हैं।

ऐसा इसलिए है क्योंकि अंग्रेज़ी व्यापार उद्योग और नौकरी की भाषा है। हिंदी पढ़े हुए को कम तनख्वाह वाली और अंग्रेज़ी जानने वाले को ज्यादा तनख्वाह वाली नौकरी मिलने की संभावना होती है। इसलिए हिन्दी भाषी लोग भी यहां तक कि हिंदी का प्रचार-प्रसार का काम करने वाले लोगों के बच्चे भी अंग्रेज़ी माध्यम से पढ़ते हैं। प्रसिद्ध गांधीवादी सामाजिक कार्यकर्ता और विनोबा भावे की सहयोगी रह चुकी निर्मला देशपांडे मुझे बता रही थीं कि “हिमांशु, बड़ा डर लगता है कि अब हमारे अधिकांश साहित्यकारों के बच्चे अपने माता-पिता का साहित्य पढ़ते ही नहीं हैं, क्योंकि उनकी स्कूल कालेज की पूरी पढ़ाई अंग्रेज़ी माध्यम से हुई है।”

दरअसल, भारत में हिंदी राजभाषा होते हुए भी इस दुर्दशा में है कि हमें आज भी हिंदी दिवस मनाना पड़ता है। अंग्रेज़ी दिवस मनाने की कोई ज़रुरत नहीं पड़ती क्योंकि अंग्रेज़ी को किसी सहारे की ज़रूरत ही नहीं है। आज भी राजनैतिक समर्थन से अंग्रेज़ी स्कूल चमचमाते हुए और हिंदी स्कूल अपनी बदहाली की हालत खुद बयान करते हुए दीखते हैं।

मूल बात है कि कहानियां सभी के पास हैं। सभी अपनी-अपनी कहानियों के साथ इस लोकतांत्रिक देश में रह सकते हैं। लेकिन अगर आप यह दादागिरी करें कि नहीं हमारी कहानी के अलावा कोई अपनी कहानी लिखेगा या बोलेगा तो हम उस पर एफआईआर करेंगे, उसे जेल में डाल देंगे, तो इसे सत्ता द्वारा ब्राह्मणवाद का समर्थन ही कहा जाएगा।

लेकिन बात महज़ भाषा पर ही खत्म नहीं हो जाती। आपकी धार्मिक कहानियां, आपकी संस्कृति, आपका पहनावा, आपका धर्म – सब कुछ राजनैतिक सत्ता के समर्थन से बचता है या फिर खत्म हो जाता है। आज सडक पर चलते हुए एक धर्म वाले को दूसरे धर्म वाले की मॉबलिंचिंग कर सकते हैं। वे घरों में घुसकर फ्रिज चेक कर सकते हैं कि उसमें रखा गया मांस किस जानवर का है और इसके आधार पर हत्या तक करने की उन्हें खुली छूट है। हत्यारों को केन्द्रीय सरकार का कोई मंत्री सम्मानित कर सकता है। उसके गले में विजयी माला पहना सकता है। यह सब इसलिए हो सकता है क्योंकि देश में धर्म के आधार पर सियासती तिकड़मों को अंजाम दिया जा रहा है। सियासतदान भी इसे धार्मिक आस्था कहकर अपनी स्वीकृति दे देते हैं। राजनेताओं के ऐसा मानते ही अदालतें, व अन्य सरकारी तंत्र भी वैसा ही आचरण करने लग जाते हैं। 

जनगणना में अपने लिए अलग धार्मिक कोड की मांग करती आदिवासी महिलाएं

आज भारत में धार्मिक कहानियां इतिहास का स्थान ले रही हैं। जबकि किसी कहानी को इतिहास मानने की एक वैज्ञानिक प्रक्रिया होती है। इसके लिए सबूत की आवश्यकता होती है। फिर चाहे वह शिलालेख के रूप में हो, ताम्रपत्र के रूप में हो या फिर बर्तन व पांडुलिपियां आदि। अब कोई ऐसी कहानी, जिसके चार सौ प्रारूप हों, जो दूसरे देश की नकल हो, उसे इस देश का इतिहास घोषित कर देना, उसके आधार पर चुनाव लड़ना, इस कहानी पर सवाल उठने वाले लोगों की हत्या कर देना या उन्हें जेल में डाल देना, इस कहानी के नायक का मन्दिर बनाने के नाम पर लोगों की बस्तियां जला देना और उनका सामूहिक जनसंहार करना आदि बिना राजनीति के समर्थन के नहीं हो सकता। ऐसी राजनीति को जब तक आर्थिक ताकतें मदद नहीं देंगीं, वह अपने दम पर सत्ता हासिल नहीं कर सकतीं। इसलिए आज भारत की राजनीति आर्थिक व धार्मिक आधारों पर खडी की गई है।

भारत में ब्राह्मणी धार्मिक कहानियों को सच्ची साबित करने के लिए पुलिस, जेल, अदालतों और हत्याओं का सहारा लिया जाता है। चाहे वह दुर्गा और महिषासुर वाला प्रकरण हो, जिसमें जब भारत के बहुजनों ने जब यह कहा कि महिषासुर हमारा नायक है और आप हर साल उसे खलनायक के रूप में चित्रित करते हैं, इसलिए अब हम अपनी कहानी लिखेंगे। इसके बाद अनेक लोगों पर एफआईआर की गई और उन्हें तमाम तरह से प्रताड़ित किया गया। 

मूल बात है कि कहानियां सभी के पास हैं। सभी अपनी-अपनी कहानियों के साथ इस लोकतांत्रिक देश में रह सकते हैं। लेकिन अगर आप यह दादागिरी करें कि नहीं हमारी कहानी के अलावा कोई अपनी कहानी लिखेगा या बोलेगा तो हम उस पर एफआईआर करेंगे, उसे जेल में डाल देंगे, तो इसे सत्ता द्वारा ब्राह्मणवाद का समर्थन ही कहा जाएगा। 

कोई आश्चर्य नहीं कि भारत में आज यही चल रहा है। आज भारत में हाशिये पर रह रहे लोगों को निशाना बनाया जा रहा है। उन्हें सरकारी तंत्र भूख और गरीबी में धकेल रहे हैं। उनके इलाज के लिए समुचित व्यवस्था नहीं है। उनकी ज़मीनें छीन कर उन्हें भूमिहीन बनाया जा रहा है। लेकिन इस तरह की कार्यवाही करने से पहले सरकारी तंत्र एक और चालाकी करता है । वह उन्हें अदृश्य कर देता है। वह उनकी संस्कृति, उनके जीवन की शानदार परम्पराओं, उनकी भाषा, उनके पहनावे को गायब कर देता है। फिर वे उस नस्ल को ही गायब कर देता है। ऐसा करने के लिए वे पहले यह साबित करते हैं कि उनकी अपनी भाषा, संस्कृति और धर्म सबसे महान है और इस पर सवाल उठाने वाले की जगह जेलखाने के भीतर है। 

यह तो सभी ने देखा है कि सर्वोच्च न्यायालय तक ने इस तरह गढ़ी गई कहानियों के आधार पर फैसला दिया। लोगों ने यह भी देखा कि किस तरह बड़ी संख्या में आदिवासियों के अधिकारों के लिए लिखने बोलने वाले लोगों को सरकार ने जेल में डाल दिया है। इसके अलावा बड़ी संख्या में मुस्लिम नौजवानों को जेल में डाला गया है ताकि यह साबित किया जा सके कि उनके धार्मिक विश्वास को नहीं मानने वाले लोगों के अधिकारों के लिए आवाज़ उठाने वाले लोगों को भी जेल में डाल दिया जायेगा। महत्वपूर्ण यह कि सुप्रीम कोर्ट यह सब न केवल देख रहा है, बल्कि समर्थन भी दे रहा है। 

अब सवाल उठता है कि इसे रोकने के लिए हमारी योजना क्या होनी चाहिए? आम लोगों के बीच काम करने वाला एक ज़मीनी कार्यकर्ता होने के नाते मुझे लगता है कि पहले तो हमें भाषाओं, संस्कृतियों, और समुदायों को गायब होने से बचाने की कोशिशें करनी चाहिए। हमें बहुलतवाद व बहुजनवाद को स्थापित करना होगा। तभी हम मुट्ठी भर लोगों के सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक वर्चस्व को तोड़ सकते हैं। लेकिन आजकल जो सत्ता है वह इसी बहुलतावाद व बहुजनवाद की हत्या करने में लगी हुई है। और दादागिरी से एक धर्म, एक भाषा, एक संस्कृति को सबके ऊपर थोपने की कोशिश कर रही है तथा इसके सहारे अपनी राजनीति और आर्थिक वर्चस्व को बनाये रखे हुए है। 

इसलिए इस धार्मिक, आर्थिक, सांस्कृतिक दादागिरी का मुकाबला करने के लिए हमें आदिवासियों, दलितों और पिछड़ों के गांवों में फ़ैली हुई सांस्कृतिक धरोहरों, भाषाओं, पहनावे व खानपान आदि को सामने लाना होगा। इसमें लेखक, कवि, पत्रकार, सोशल मीडिया से जुड़े लोग मिलकर बड़ा काम कर सकते हैं। 

(संपादन : नवल/अनिल)


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