मध्य प्रदेश : गौरवशाली गोंड इतिहास को खत्म करने की संघी कवायद

गोंड समाज से जुड़े लोगों का मानना है कि भोपाल का नाम गोंड राजा जिन्हें भूपाल सिंह सल्लाम के नाम पर पड़ा है। वे आरोप लगाते हैं कि गोंड राज की यादें मिटाकर प्रदेश की भाजपा सरकार समाज के लोगों को उनके गौरवशाली इतिहास से वंचित रखना चाहती है। बता रहे हैं मनीष भट्ट मनु

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की विचारधारा पर अमल करते हुए मध्य प्रदेश की शिवराज सरकार ने भी उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ सरकार की तर्ज पर स्थानों के नाम बदलने की कवायद शुरुआत कर दी है। इस क्रम में पहले तो मोहल्लों और गलियों पर ही सरकार का सारा जोर था, फिर रेल्वे स्टेशनों की बारी आई और अब शहरों और जिलों के नाम भी बदले जा रहे हैं। इसकी शुरुआत होशंगाबाद का नाम बदल कर नर्मदापुरम् किए जाने से हुई और अब राजधानी भोपाल का नाम भोजपाल करने का लेकर भाजपा के नेतागण अधिक उत्साहित हैं। मगर, इन सबसे प्रदेश की राजनीति में खासा दखल रखने वाला गोंड समाज बेहद नाराज हो चला है। 

गोंड समाज से जुड़े लोगों का मानना है कि भोपाल का नाम गोंड राजा जिन्हें भूपाल सिंह सल्लाम के नाम पर पड़ा है। इसी तरह होशंगाबाद को बसाने वाले गिन्नौरगढ़ रियासत, जहां की रानी कमलापति भी थीं, के होशंग शाह के नाम पर पड़ा है। वे आरोप लगाते हैं कि गोंड राज की यादें मिटाकर प्रदेश की भाजपा सरकार समाज के लोगों को उनके गौरवशाली इतिहास से वंचित रखना चाहती है।

उल्लेखनीय है कि गत वर्ष 15 नवंबर, 2021 को बिरसा मुंडा की जयंती पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की उपस्थिति में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भोपाल में जनजातीय गौरव दिवस मनाने की घोषणा की थी। इसके बाद 4 दिसंबर, 2021 को चौहान ने इंदौर में तंत्या भील उर्फ टंट्या मामा के बलिदान दिवस पर भी घोषणाओं की बारिश की थी। लेकिन अब इन सब कवायदों के विपरीत गोंड राज से जुड़े शहरों के नाम बदलने की कोशिशों से प्रदेश सरकार की दशा और दिशा पर सवाल उठने लगे हैं। आदिवासी इतिहास, साहित्य और संस्कृति पर काम करने वाले संगठनों और व्यक्तियों का आरोप है कि ऐसा करके भाजपा आदिवासियों को उनकी गौरवशाली विरासत से दूर करने का प्रयास कर रही है। वे कहते हैं कि आरएसएस को कभी भी आदिवासियों की अस्मिता पसंद नहीं रही है और नागपुर में अपने अंक बढ़वाने के लिए शिवराज सिंह चौहान यह सारी कवायद कर रहे हैं। अपने आरोपों के समर्थन में वे राज्य में आयोजित करवाई जा रही वनवासी रामायण का उदाहरण देते हुए कहते हैं कि शहरों का नाम बदलकर जहां आदिवासी इतिहास को खत्म किया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर रामायण आदि के मंचन से इनकी संस्कृति को जड़ से खत्म करने की साजिश रची जा रही है।

जनजातीय गौरव सम्मेलन के दौरान मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान

गोंडवाना साहित्य और संस्कृति के अध्येताओं का मानना है कि भोपाल का नाम गोंड राजा भूपाल सिंह सल्लाम के नाम पर पड़ा है। वे कहते हैं कि हिंदू-मुस्लिम के मध्य दूरियां पैदाकर राज करने की आरएसएस की नीति के चलते रेल्वे स्टेशन का नामकरण रानी कमलापति (हालांकि कई गोंड इतिहासकार इन्हें कमलावति मानते हैं) के नाम पर कर दिया जाता है, मगर भोपाल का नामकरण जिसके नाम पर किया गया, उसे इतिहास से गायब करने के प्रयास किए जा रहे हैं। वे आगे जोड़ते हैं कि भूपाल शाह के भाई भेलू शाह के नाम पर ही वर्तमान विदिशा को कभी भेलसा के नाम से जाना जाता था। होशंगाबाद के इतिहास के संबंध में लोग बताते हैं कि होशंग शाह का संबंध गिन्नौरगढ़ रियासत से भी था। और यह दोनों की रियासत गोंडवाना के रैयासिघौना (वर्तमान में जिसे रायसेन कहा जाता है) से संबंद्ध थे। रैयासिघौना के नामी गोंड राजा तपेश्री शाह हुए हैं।

छत्तीसगढ़ के युवा आदिवासी पत्रकार आकाश पोयाम के अनुसार, औपनिवेशिकवादी ताकतों की मानसिकता हमेशा से ही नाम परिवर्तन की रही है। आस्ट्र्रेलिया के आदिवासियों को भी औपनिवेशिककाल में इन्हीं हालातों से दो-चार होना पड़ा था। सत्ता यह मानती है कि नाम बदलने से आने वाली पीढ़ी अपने इतिहास से कट जाती है। उनके अनुसार, आज जो मध्य प्रदेश में हो रहा है, इससे पहले भारत के अलग-अलग राज्यों में हो चुका है। गोंड राजा बुलंद बख्त शाह द्वारा बसाया गया नागपुर हो अथवा रायपुर या जबलपुर, इन सभी शहरों की वह पहचान मिटाने के सारे जतन किए जा चुके हैं, जो इन्हें आदिवासियों से जोड़ते हैं। सरकारें आदिवासियों को कभी भी उनके वह अधिकार नहीं देना चाहती, जो कि संविधान प्रदत्त हैं। उन्हें यह बेहतर विकल्प लगता है कि आदिवासियों को उनकी सभ्यता और संस्कृति से बेदखल कर दिया जाए। नाम बदलने की शुरुआत भी इसका ही एक हिस्सा है। वे जोड़ते हैं कि अपने प्राकृतिक आवास में रहने वाले आदिवासी इसी बात को लेकर सत्ता से संघर्ष करते दिखते हैं कि उनको पुरखों ने संसाधनों पर समुदाय का अधिकार माना था, किसी एक का नहीं। ऐसे मे सत्ता को यही उचित लगता है कि किसी न किसी तरह से आदिवासी समाज को अपनी जड़ों से काट दिया जाय। ऐसा ग्रामीण क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर विस्थापन के माध्यम से भी हुआ और अब शहरी क्षेत्रों में पहचान मिटाकर भी यही सब किया जा रहा है।

रायपुर के आदिवासी साहित्यकार और ‘गोंडवाना स्वदेश’ पत्रिका के रमेश ठाकुर के मुताबिक, यह सारे प्रयास आदिवासियों के गौरवशाली इतिहास को मिटाकर उनकी पहचान खत्म करने की साजिश हैं। आरएसएस और भाजपा हमेशा से ही आदिवासियों की पहचान मिटाना चाहते रहे हैं। इसीलिए वे आज तक उन्हें वनवासी कहते आए हैं। उनके मुताबिक गोंड समाज हो या कोई अन्य आदिवासी समाज, इनके पुरखों की पहचान, स्वाभिमान प्राकृतिक संसाधनों पर समाज के नियंत्रण को मान्यता देने वालों की रही है। मगर, भाजपा इन सब पहचान को गायब कर आदिवासियों की मूल पहचान ही मिटा देना चाहती है। वे आगे जोड़ते हैं कि किसी भी समाज के लिए उसका इतिहास और महापुरुष न केवल प्रेरणास्त्रोत होते हैं, वरन् उन मूल्यों को भी बतलाते हैं, जिसके लिए वह समाज जीया और लड़ा है। अब भाजपा सरकार जिसने सरकारी अभिलेखों में आदिम जाति को जनजाति में पहले ही बदल दिया है, आदिवासियों से जुड़े सभी स्मृतियों को मिटा देना चाहती है।

मध्य प्रदेश कांग्रेस के आदिवासी प्रकोष्ठ के अध्यक्ष अजय शाह आरोप लगाते हैं कि भाजपा कभी भी आदिवासियों की हितैषी नहीं रही है। वे सिर्फ दिखावा करने में उस्ताद हैं और आगामी चुनावों में आदिवासी समाज का वोट हासिल करने के लिए वे जनजातीय गौरव दिवस जैसे आयोजन करती जरुर हैं, मगर वास्तविकता में आदिवासी इतिहास को मिटाने में तुली हुई है। अजय शाह कहते हैं कि अब आदिवासी भाजपा की चालों को समझ चुके हैं, वे फूट डालो और राज करो की भाजपाई चाल में नहीं आएंगे। 

शिवराज सरकार पर प्रहार करते हुए वे कहते हैं कि कमलनाथ सरकार ने गोंडवाना के शहीदद्वय शंकर शाह व रघुनाथ शाह जबलपुर की जिस जेल में रहे, उसे स्मारक में बदलने के लिए योजना बनाई थी, जिसे भाजपा के सत्ता में आने के बाद ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 275 के प्रावधानों का हवाला देते हुए वे आरोप लगाते हैं कि आदिवासी कल्याण के लिए केन्द्र से मिलने वाले फंड का दुरुपयोग करते हुए प्रदेश की भाजपा सरकार इसका इस्तेमाल अपने राजनैतिक फायदे के लिए कर रही है। होशंगाबाद गोंड राजा होशंग शाह की रिसायत होने की पुष्टि वे यह कहकर करते हैं कि उनका खुद का परिवार पूर्ववर्ती होशंगाबाद जिले का ही है। वे यह भी जोड़ते हैं कि आज गोंड राजा होशंग शाह जरुर ही तारीख के पन्नों में नहीं हैं, मगर गोंड इतिहास को जानने वाले इनके बारे में जानते हैं। 

जय आदिवासी युवा संगठन (जयस) के संस्थापक और कांग्रेस विधायक हिरालाल अलावा का आरोप है कि भाजपा शुरु से ही आदिवासियों के विरोध में रही है। वे कहते हैं शिवराज सिंह चौहान द्वारा चौथी बार मुख्यमंत्री बनने के बाद से आदिवासी उप योजना का पैसा बिना किसी प्रभावी कार्ययोजना के राज्य सरकार के विभिन्न विभागों को सीधे दिए जा रहा है। इससे भी आदिवासी इलाकों में उनके कल्याण के लिए चलाई जा रहीं योजनाओं पर विपरीत प्रभाव पड़ रहा है। उनके अनुसार यदि भाजपा और शिवराज सिंह चौहान को आदिवासियों की वाकई चिंता है तो अधिसूचित क्षेत्रों में तत्काल स्वायत्तशासी परिषदों का गठन कर पांचवी अनुसूची को लागू क्यों नहीं कर देते। गोंड राजाओं के क्षेत्र में नाम बदलने को भी वे भाजपा का आदिवासी विरोधी चरित्र करार देते हैं। उनका कहना है कि भाजपा चाहे जितना प्रयास कर ले आदिवासी समाज के युवा अपना इतिहास मिटने नहीं देंगे।

बहरहाल, इस पूरे प्रकरण में प्रदेश भाजपा के नेताओं में खामोशी है। इस संबंध में जब भाजपा के प्रदेश प्रवक्ताओं से बात करने की कोशिश की तब उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया। लेकिन इसके बावजूद गोंड समुदाय के लोगों का यह आरोप गैरवाजिब नहीं है कि सियासती लाभ के लिए राज्य सरकार गोंड समुदाय के गौरवशाली अतीत को खत्म किया जा रहा है।

(संपादन : नवल/अनिल)


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