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यूपी चुनाव : द्विज मीडिया, मुफ्त राशन और दलित-बहुजनों का वोट

मुफ्त राशन सरकार का अहसान क्यों नहीं है, के जवाब में ग़ाज़ियाबाद के नरेश जाटव कहते हैं, “जितना राशन सरकार मुफ्त दे रही है, ज़रूरी चीज़ों पर जीएसटी लगाकर उससे कई गुना ज़्यादा हर महीने वसूल रही है।” वह आगे कहते हैं कि देश में कफन तक टैक्स फ्री नहीं है। पढ़ें, सैयद जैग़म मुर्तजा की जमीनी पड़ताल

दिल्ली में बैठे पत्रकारों का एक बड़ा वर्ग दावा कर रहा है कि उत्तर प्रदेश में चुनावी वर्ष में राज्य सरकार द्वारा शुरु की गयी मुफ्त राशन योजना खेल बदलनेवाली योजना है और इसके सहारे राज्य में योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली सरकार फिर से लौट आएगी। क्या सचमुच पांच किलो मुफ्त राशन भाजपा को पांच साल के लिए राज्य की सत्ता दोबारा दिला देगा या राज्य की जनता कुछ और ही मन बनाए बैठी है?

दिल्ली से थोड़ा से बाहर निकल कर देखिए तो सच नज़र आने लगता है। हो सकता है मुफ्त राशन प्रदेश में बहुत से लोगों की ज़रुरत हो, लेकिन पश्चिम उत्तर प्रदेश में दलितों की लड़ाई राशन से ज़्यादा आत्मसम्मान, समुचित रोज़गार और आगे बढ़ने के साधन पाने की है। जो लोग राशन पा भी रहे हैं, उनमें अधिकतर के परिवार में कोई न कोई इतना शिक्षित तो है, जो इसे सरकार का करम मानने की बजाए इसे सरकार की ज़िम्मेदारी मानता है। ग़ाज़ियाबाद, मेरठ, मुज़फ्फरनगर जैसे ज़िलों में किसी दलित को रोक कर पूछ लीजिए कि सरकार मुफ्त राशन दे रही है तो क्या आप भाजपा को वोट देंगे, के जवाब में आधे से ज़्यादा पलट कर कहेंगे, “कौन सा अहसान कर रही है?”

मुफ्त राशन सरकार का अहसान क्यों नहीं है, के जवाब में ग़ाज़ियाबाद के नरेश जाटव कहते हैं, “जितना राशन सरकार मुफ्त दे रही है, ज़रूरी चीज़ों पर जीएसटी लगाकर उससे कई गुना ज़्यादा हर महीने वसूल रही है।” वह आगे कहते हैं कि देश में कफन तक टैक्स फ्री नहीं है। पहले नोटबंदी, फिर जीएसटी और फिर कोरोना काल में अवांछित लॉकडाउन लगाकर सरकार ने लोगों को बेरोज़गारी और भुखमरी के मुंह में ख़ुद धकेला है, ऐसे में सरकार का कर्तव्य है कि अब लोगों को भूख से मरने न दे।” नरेश इस तरह की बात करने वाले अकेले शख़्स नहीं है।

चुनावी वर्ष में राज्य सरकार द्वारा पांच किलो राशन की योजना की शुरुआत की गयी

मेरठ के सूरजकुंड इलाक़े में रहने वाले नीरज का दावा है मुफ्त राशन लोग इसलिए ले लेते हैं क्यों कि मुफ्त है। “मुफ्त में कुछ भी बांट दीजिए लाइन लग जाएगी। सवाल यह है कि मुफ्त कितने दिन है? जैसे ही चुनाव ख़त्म होगा सरकार मुफ्त राशन तो ख़त्म करेगी ही, किसी न किसी तरीक़े से इससे दोगुना पैसे जनता से वसूल लेगी, चाहे बिजली के दाम बढ़ाकर, चाहे पेट्रोल की क़ीमतों में बढोत्तरी करके।” लेकिन लोग तो दावा कर रहे हैं कि ग़रीब ख़ासतौर पर दलित और ओबीसी का लाभांवित वर्ग इस योजना से इतना ख़ुश है कि जमकर वोट करेगा? इस सवाल के जवाब में नीरज कहते हैं कि “ऐसा कहने वालों को भी ख़ुश हो लेने दीजिए। दलित इतने भी मानसिक दरिद्र नहीं हैं कि इतने सस्ते में अपना वोट बेच देंगे।”

दरअसल पश्चिम उत्तर प्रदेश, जहां पहले दो चरण में चुनाव है, वहां राशन के थैले बहुत बड़ा मुद्दा शायद नहीं हैं। इसकी एक वजह है, पश्चिम उत्तर प्रदेश में दलित और पिछड़े कारोबार, और रोज़गार के मामले में दूसरे वर्गों से कमज़ोर ज़रुर हैं, लेकिन आर्थिक तौर पर पूर्वी उत्तर प्रदेश और देश के बाक़ी हिस्सों मे बसने वाले दलित या पिछड़ों से बेहतर हालात में हैं। इसके कई कारण हैं। एक तो इस क्षेत्र में खेती की ज़मीन उपजाऊ है, सिंचाई के बेहतर साधन हैं, और खेती पर लोगों की अति-निर्भरता नहीं है। दिल्ली से पास होने का फायदा कहें या फिर पश्चिम में हुआ व्यापक औद्योगीकरण, इस इलाक़े में ग़रीबी के मायने बहुत हद तक अलग हैं।

तो क्या राशन के झोले पर छपे फोटो सत्ताधारी पार्टी को इतने वोट भी नहीं दिला पाएंगे, जितने में जीत का अंतर पट जाए या बढ़ जाए? उत्तर प्रदेश में चुनाव जातिगत गोलबंदी या धार्मिक ध्रुवीकरण के नाम पर ज़्यादा लड़े जाते हैं। दोनों ही मामलों में राशन की अहमियत नहीं है। फिर, दिल्ली में यह योजना खेल बदलनेवाली क्यों बताई जा रही है?

देहात में बात कीजिए, तो इस योजना की तारीफ करने वाले लोग मिलेंगे, लेकिन सिर्फ मुफ्त राशन के बदले वोट दे देंगे, इसे लेकर सही-सही दावा नहीं किया जा सकता। पश्चिम उत्तर प्रदेश में चुनाव वैसे भी मेले की तरह आते हैं। हर उम्मीदवार से वोटर की फरमाइशें होती हैं। चुनाव में पैसों का लेन-देन भी आम है। हालांकि खुलकर कोई इस बात को नहीं मानता। गढ़मुक्तेश्वर निवासी नंद किशोर कहते हैं कि मुफ्त राशन से बेरोज़ागारी के दौर में मदद तो हुई है, लेकिन बढ़ी हुई महंगाई ने इससे होने वाला फायदा बराबर कर दिया है। अल्लाहबख़्शपुर को सोनू वाल्मीकि का कहना है कि “मुफ्त राशन की कुल क़ीमत से उन तमाम टैक्स, वैट, अधिभार, टौल, बिजली बिल, फसलों को नुक़सान, महंगाई से तुलना कीजिए, अंदाज़ा लग जाएगा, जनता को इसकी कितनी भारी क़ीमत चुकानी पड़ रही है।” 

तो क्या राशन के झोले पर छपे फोटो सत्ताधारी पार्टी को इतने वोट भी नहीं दिला पाएंगे, जितने में जीत का अंतर पट जाए या बढ़ जाए? उत्तर प्रदेश में चुनाव जातिगत गोलबंदी या धार्मिक ध्रुवीकरण के नाम पर ज़्यादा लड़े जाते हैं। दोनों ही मामलों में राशन की अहमियत नहीं है। फिर, दिल्ली में यह योजना खेल बदलनेवाली क्यों बताई जा रही है? हिसाब लगाया जाए तो दिल्ली के किसी भी मीडिया संस्थान के साथ तीन बड़ी दिक़्क़त हैं। पहली, न्यूज़रूम और कर्मियों में सवर्णों का बोलबाला, दूसरी अपने गांव के अलावा दूसरे किसी इलाक़े की जानकारी का अभाव और तीसरी, अपनी बनाई धारणा को ही सच मान लेना। 

यक़ीन मानिए किसी भी मीडिया में संस्थान में कुल जमा दो से तीन फीसदी ही लोग होंगे जो उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य के बारे में समुचित जानकारी रखते होंगे। पश्चिम उत्तर प्रदेश में कौन से ज़िले आते हैं, रुहेलखंड, ऊपरी दोआब क्षेत्र और ब्रज की सीमा कहां से शुरु होकर कहां ख़त्म होती है, जैसे सवाल तो जाने ही दीजिए, शायद ही कोई बता पाए कि पश्चिम उत्तर प्रदेश के दलित और पिछड़ों की समस्याएं पूर्वी उत्तर प्रदेश से किस तरह अलग हैं। हो सकता है ग़ैर जाटव एससी या ग़ैर-यादव, ग़ैर-जाट ओबीसी में बीजेपी को वोट मिले, लेकिन पश्चिम उत्तर प्रदेश में दलितों में जाटवों को प्रभुत्व है और ओबीसी में यादवों व जाटों तथा गूजरों का। इनमें किसी वर्ग में राशन की क़िल्लत नज़र नहीं आती। ऐसे में महज़ राशन के थैलों के सहारे भाजपा को अभूतपूर्व समर्थन का दावा करने वाले कहीं न कहीं चूक ज़रूर कर रहे हैं। 

(संपादन : नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

सैयद ज़ैग़म मुर्तज़ा

उत्तर प्रदेश के अमरोहा ज़िले में जन्मे सैयद ज़ैग़़म मुर्तज़ा ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से लोक प्रशासन और मॉस कम्यूनिकेशन में परास्नातक किया है। वे फिल्हाल दिल्ली में बतौर स्वतंत्र पत्रकार कार्य कर रहे हैं। उनके लेख विभिन्न समाचार पत्र, पत्रिका और न्यूज़ पोर्टलों पर प्रकाशित होते रहे हैं।

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