यूपी : क्या छठे दौर की वोटिंग के बाद खत्म हो गई हैं भाजपा की उम्मीदें?

पहले दो दौर में बुरे प्रदर्शन की ख़बरों के बावजूद भाजपा नेता दावा कर रहे थे कि पूर्वांचल की 111 सीटों पर उनकी पार्टी क्लीन स्वीप कर सकती है। राज्य की सत्ता दोबारा पाने के लिए यह ज़रूरी भी था। लेकिन वोटिंग रूझान बता रहे हैं कि अवध के बाद अब पूर्वांचल में भी भाजपा को नुक़सान उठाना पड़ सकता है। सैयद जैगम मुर्तजा का विश्लेषण

उत्तर प्रदेश में छह दौर की वोटिंग हो चुकी है और अब चुनावी तस्वीर बहुत हद तक साफ हो चली है। मतदान की सुस्त रफ्तार, कम वोटिंग, भाजपा समर्थकों में उत्साह की कमी सत्ताधारी भाजपा के लिए चिंता की बात हो सकती है। भाजपा के छठे दौर में सबसे परेशान करने वाला पहलू यह है कि गोरखपुर में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ख़ुद विधान सभा चुनाव लड़ रहे हैं और इसके बावजूद वहां वोटरों में कोई ख़ास उत्साह नहीं दिखा। 

ध्यातव्य है कि छठे चरण के दौरान जिन 57 विधानसभा क्षेत्रों में कल 55.79 फीसदी मतदान दर्ज किया गया, पिछली बार यानी 2017 में 56.47 फीसदी मतदान हुआ था। सामान्य तौर पर यह माना जाता है कि मतदान प्रतिशत में वृद्धि सत्ताधारी दल के पक्ष में माहौल का परिचायक होता है। कल हुए मतदान की बात करें तो आंबेडकरनगर में 62.66 फीसदी, बलिया में 52.01 प्रतिशत, बलरामपुर में 48.90 प्रतिशत, बस्ती में 57.20, देवरिया में 56 प्रतिशत और गोरखपुर में 56.82 प्रतिशत मतदान हुआ।

पहले ही दौर की वोटिंग के बाद ख़बरे आने लगी थीं कि भाजपा चुनाव में अच्छा प्रदर्शन नहीं कर रही है। दूसरे दौर में भी तक़रीबन यही हुआ। इस सबके बावजूद भाजपा को उम्मीद थी कि अवघ और पूर्वांचल में 200 से ज़्यादा सीटें जीतकर पार्टी एक बार फिर से राज्य की सत्ता पा जाएगी। इस दावे में कुछ किंतु परंतु थे। लेकिन दो महीने पहले समर्थक और पार्टी नेता यह मानने को तैयार नहीं थे कि भाजपा उत्तर प्रदेश में चुनाव हार भी सकती है। अब जबकि महज़ एक दौर की वोटिंग बची है तब भाजपा कार्यकर्ताओं में पहले जैसा विश्वास नज़र नहीं आ रहा है।

पहले दो दौर में बुरे प्रदर्शन की ख़बरों के बावजूद भाजपा नेता दावा कर रहे थे कि पूर्वांचल की 111 सीटों पर भाजपा क्लीन स्वीप कर सकती है। राज्य की सत्ता दोबारा पाने के लिए यह ज़रूरी भी था। लेकिन वोटिंग रूझान बता रहे हैं कि अवध के बाद अब पूर्वांचल में भी भाजपा को नुक़सान उठाना पड़ सकता है। अगर ऐसा हुआ तो फिर सत्ता में वापसी का भाजपा का सपना शायद ही पूरा हो पाए। यह बात गोरखपुर से चुनाव मैदान में उतरे और पहली बार विधानसभा चुनाव लड़ रहे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के सियासी करियर के लिए बुरी ख़बर होगी। इसके अलावा यह पूर्वांचल की ही वाराणसी लोकसभा सीट से सांसद, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की छवि के लिए भी नुक़सानदेह होगा। 

एक चुनावी कार्यक्रम के दौरान योगी आदित्यनाथ व केशव प्रसाद मौर्य

हालांकि यूपी में भाजपा की विदाई की बात अभी जल्दबाज़ी ही कही जाएगी, लेकिन दीवार पर लिखी इबारत सत्ताधारी दल के नेता भी समझ रहे हैं। चुनाव आयोग ने वोटिंग प्रतिशत को लेकर जो आंकड़े जारी किए हैं वो यक़ीनन भाजपा के लिए चिंता बढ़ाने वाले हैं। जिन ज़िलों में 3 मार्च को वोट डाले गए उनमें सबसे ज़्यादा वोटिंग अंबेडकरनगर ज़िले में दर्ज की गई। 

छठे दौर में कुल 676 उम्मीदवार चुनाव मैदान में हैं। इनमें मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के अलावा आज़ाद समाज पार्टी के मुखिया चंद्रशेखर आज़ाद (गोरखपुर नगर), स्वामी प्रसाद मौर्य (फाज़िल नगर, कुशीनगर), कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष अजय कुमार लल्लू (तमकुही राज, कुशीनगर) और मुख्यमंत्री रहे वीर बहादुर सिंह के सुपुत्र फतेह बहादुर सिंह (कैंपियरगंज, गोरखपुर) शामिल हैं। विपक्षी वोटों में बंटवारे के चलते मुख्यमंत्री अपनी सीट से चुनाव भले जीत जाएं, लेकिन गोरखपुर की कई सीटों पर उनकी पार्टी अगड़े-बनाम पिछड़े की लड़ाई में फंस गई है। पूर्व मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्य के क़ाफिले पर हमले ने और आग में घी डालने का काम किया है। इसके चलते मौर्य को सहानुभूति वोट मिलने की संभावना जताई जा रही है।

भाजपा की दिक़्क़त इस पूरे चुनाव में यह रही है कि पार्टी न तो कोई दिल को छूने वाला नारा दे पाई और न जनता के मन की बात समझ पाई है। पार्टी पूरे चुनाव में हिंदू-मुसलमान, मुफ्त राशन, साइकिल बम, लोगों में डर और विपक्ष के ख़िलाफ नकारात्मक प्रचार से आगे नहीं बढ़ पाई। यह सब बातें प्रदेश की जनता बार-बार सुनती रही है। राज्य में बेरोज़गारी, आवारा पशु, खेती की बढ़ती लागत, महंगी बिजली, अपराध और कमज़ोर वर्गों का उत्पीड़न पिछले पांच साल में बड़े मुद्दे रहे हैं लेकिन भाजपा इन समस्याओं का हल सुझा पाने में नाकाम रही है।

अभी तक का चुनाव तक़रीबन दो-ध्रुवीय रहा है। समाजवादी पार्टी न सिर्फ विकास, शिक्षा, ग़रीबों के राशन को जारी रखने, लैपटाप वितरण जैसे वादे करके लोगों को जोड़ने मे कामयाब दिख रही है वहीं पुरानी पेंशन की बहाली का मुद्दा उसके पक्ष में जाता दिख रहा है। ख़ैर, अभी तक की वोटिंग के बाद बड़ी बात यह है कि भाजपा के नेता अब गठबंधन और सत्ता वापसी के लिए जोड़तोड़ की बात करने लगे हैं। यानी साफ है कि अब उनमें वह विश्वास नहीं है जो दो महीने पहले था। 

छठे दौर में जहां वोट डाले गए उनमें गोरखपुर, देवरिया, बस्ती, महाराजगंज में भाजपा अभी भी मज़बूत नज़र आ रही है, लेकिन अंबेडकर नगर, बलरामपुर, संत कबीर नगर, और सिद्धार्थ नगर में वोटरों का रवैया बता रहा है कि नतीजे भाजपा के लिए बहुत बेहतर रहने वाले नहीं हैं। हालांकि भाजपा अभी हार मानने के मूड में नहीं है। आख़िरी दौर में बनारस समेत जिन इलाक़ों में वोट डाले जाने हैं, वहां भाजपा नेताओं ने पूरी ताक़त झोंक दी है। फिर भी विश्वास की कमी तो भाजपा नेताओं में दिख ही रही है।

तो क्या कुछ भी भाजपा के पक्ष में नहीं है? है न! राज्य में इस बार चार लाख 56 हज़ार से ज़्यादा पोस्टल बैलट गिने जाने हैं। अगर पचास से साठ सीटों पर इस बार हार-जीत का फासला दो से तीन हज़ार वोट के बीच है तो पोस्टल बैलट अहम हो जाते हैं। हालांकि अभी विश्वास से नहीं कहा जा सकता कि इनमें भाजपा की तरफ कितने वोट जाएंगे, क्योंकि समाजवादी पार्टी दावा कर रही है कि पुरानी पेंशन बहाली के मुद्दे पर इस बार बड़ी तादाद में राज्य कर्मचारियों और वरिष्ठ नागरिकों ने उसके समर्थन में वोटिंग की है।

(संपादन : नवल/अनिल)


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