राजनीतिक संदेश दे गया केजरीवाल का ‘बाबासाहेब म्यूजिकल’

नाटक में संविधान निर्माण को बेहद आकर्षक ढंग से प्रस्तुत किया गया। इस प्रसंग में डॉ. आंबेडकर द्वारा संविधान के प्रस्तावना के पाठ ने दर्शकों को उत्साहित कर दिया। हालांकि हिंदू कोड बिल प्रकरण को नाटक के स्टोरी लाइन में नहीं रखा जाना इस बात की ओर संकेत करता है कि जो आपत्तियां 1949 में पितृसत्ता और जाति के विनाश को लेकर थीं, वही आपत्तियां आज भी कायम हैं। बता रहे हैं नवल किशोर कुमार

सियासत की खासियत यही होती है कि इसमें कभी कोई सीधी राह नहीं होती। यह साफ तौर पर नजर आया बीते 25 फरवरी से लेकर 24 मार्च तक दिल्ली सरकार के तत्वावधान में मंचित ‘बाबासाहेब म्यूजिकल’ नाटक में जब नाटक के एक हिस्से में सूत्रधार कहता है– “यह देश जितना राम का है उतना ही शबरी और उसके बच्चों का भी”। जाहिर तौर पर यह आम आदमी पार्टी की राजनीतिक विचारधारा के माफिक ही है। वैसे रोहित राय जैसे प्रसिद्ध सिने कलाकारों की टीम द्वारा महुआ चौहान के निर्देशन में हुए इस मंचन के गहरे राजनीतिक निहितार्थ रहे। हालांकि इस मंचन ने बेहतरीन प्रस्तुति, जिसमें विनीत पंछी और कौसर मुनीर के गीतों को इंडियन ओशियन म्यूजिक बैंड की बेहतरीन संगीत और बासू शर्मा के निर्देशन में पश्चिमी और भारतीय शैली के नृत्य भी शामिल रहे, ने लोगों को बहुत आकर्षित किया।

उपरोक्त आयोजन नई दिल्ली के जवाहरलाल नेहरु स्टेडियम के भारोत्तोलन ऑडिटोरियम में किया गया। गीत-संगीत से परिपूर्ण इस नाटक के लिए सौ वर्ग फुट का विशाल स्टेज बनाया गया था। इसमें कला निर्देशक उमंग कुमार की मेहनत ने सभी को प्रभावित किया। साथ ही मल्टीमीडिया के इफेक्ट्स ने लोगों का खूब मनोरंजन भी किया।

डॉ. मयूरी खत्री और सुषमा चौहान द्वारा लिखित नाटक में वैसे तो डॉ. आंबेडकर के पूरे जीवन को दिखाया गया। उनके जन्म से लेकर महापरिनिर्वाण तक। लेकिन आज की राजनीति स्टोरी लाइन में साफ तौर पर नजर आयी। मसलन, नाटक की शुरुआत में ही आम आदमी की हैसियत को बताया गया। दरअसल, पूरे नाटक में “आम आदमी” एक पंच लाइन के जैसा रहा। इसके अलावा जो दूसरा वाक्य बार-बार दुहराया गया, वह “मन की बात” रहा। नाटक के आरंभ में एक गीत की प्रस्तुत किया गया, जिसके बोलों का सार यही है कि अब हर आम आदमी सवाल पूछेगा। नाटक एक सूत्रधार के सहारे आगे बढ़ती है। इस सूत्रधार की भूमिका टीकम जोशी ने निभायी है जो बीच-बीच में “आम आदमी” और “मन की बात” को लेकर व्यंग्य करते हैं। दूसरे सूत्रधार के रूप में टिस्का चोपड़ा भी प्रभावशाली लगीं।

नाटक का एक दृश्य

रंगारंग सेट और खूबसूरत दूश्यों के जरिए डॉ. आंबेडकर के प्रारंभिक जीवन की विषमताओं को दिखाया गया कि कैसे उन्हें स्कूल में जातिगत दंश झेलना पड़ा और इसी तरह के दंश का शिकार उन्हें कॉलेज में होना पड़ा। वहीं डॉ. आंबेडकर के अमरीका के कोलंबिया विश्वविद्यालय में अध्ययन को सजीव रूप में प्रस्तुत करने की पूरी कोशिश की गयी। इसके लिए कोलंबिया विश्वविद्यालय का सेट वाकई देखने योग्य था। जीवंतता को बनाए रखने की बेहतरीन कोशिश ही कहिए कि कोलंबिया विश्वविद्यालय की विशाल लाइब्रेरी और लाइब्रेरी में अध्ययरत डॉ. आंबेडकर एकदम रू-ब-रू नजर आए। 

करीब दो घंटे की इस प्रस्तुति के दौरान मध्यांतर का प्रावधान रहा। मध्यांतर के पहले डॉ. आंबेडकर का जीवन और उनकी शिक्षा-दीक्षा के अलावा बड़ौदा स्टेट में उनकी नौकरी व तत्कालीन परिस्थितियों का चित्रण किया गया। मध्यांतर के बाद डॉ. आंबेडकर का सार्वजनिक जीवन प्रदर्शित किया गया। इसकी शुरुआत महाड़ जल सत्याग्रह से की गयी। गौर तलब है कि यह सत्याग्रह 1927 में डॉ. आंबेडकर ने सार्वजनिक जल स्रोतों पर दलितों के अधिकार के लिए किया था। इस सत्याग्रह के दौरान ब्राह्मण वर्गों के द्वारा यह भ्रम फैलाये जाने कि दलित अब मंदिर पर अधिकार कर लेंगे, हुई हिंसा का चित्रण ऐसे किया गया गोया पूरा का पूरा तालाब खून से लाल हो गया हो।

नाटक का अहम हिस्सा है 1932 का पूना पैक्ट। इस हिस्से में जवाहरलाल नेहरू नजर आते हैं और वे आंबेडकर पर दबाव डालते हैं कि वे यरवदा जेल जाकर आमरण अनशन कर रहे गांधी के कहे अनुसार पूना पैक्ट पर हस्ताक्षर करें। स्टोरी लाइन के हिसाब से इस हिस्से में “आम आदमी पार्टी” के हितों का पूरा ख्याल रखा गया है। मसलन, गांधी आंबेडकर पर हस्ताक्षर करने के लिए दबाव डालते हैं और जब आंबेडकर हस्ताक्षर कर देते हैं तब गांधी आंबेडकर को कहते हैं कि वे अपने मन की बात सुनते हैं और अछूतों के कल्याण के लिए अनेक पहल किये जाने की बात करते हैं। तब जवाब में डॉ. आंबेडकर कहते हैं कि आप केवल अपने मन की बात कहते हैं, कभी दलितों के मन की बात नहीं सुनते। मैं जानता हूं कि एक आदमी (गांधी) की जान की कीमत आनेवाले समय में सभी दलित चुकाएंगे। 

दरअसल, यह पूरा प्रसंग प्रथम गोलमेज सम्मेलन से जुड़ा है, जिसमें तत्कालीन ब्रिटिश हुकूमत ने भारत के दलितों को पृथक निर्वाचन का अधिकार देने का निर्णय लिया था। गांधी व अन्य कांग्रेसी तब इसके खिलाफ थे।

सियासत के लिहाज से देखें तो इसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यक्रम ‘मन की बात’ पर प्रहार करने की कोशिश दिखी। हालांकि नाटक में गांधी की महानता को बनाए रखने का उपक्रम भी किया गया। वह भी तब जब स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद पहली कैबिनेट का गठन किया जाना था। इस दृश्य में नेहरू गांधी के पास अपने कैबिनेट के सदस्यों की एक सूची लेकर जाते हैं। सूची को देख गांधी उनसे पूछते हैं कि इसमें डॉ. आंबेडकर का नाम क्यों शामिल नहीं है।

नाटक में संविधान निर्माण को बेहद आकर्षक ढंग से प्रस्तुत किया गया। इस प्रसंग में डॉ. आंबेडकर द्वारा संविधान के प्रस्तावना के पाठ ने दर्शकों को उत्साहित कर दिया। हालांकि हिंदू कोड बिल प्रकरण को नाटक के स्टोरी लाइन में नहीं रखा जाना इस बात की ओर संकेत करता है कि जो आपत्तियां 1949 में पितृसत्ता और जाति के विनाश को लेकर थीं, वही आपत्तियां आज भी कायम हैं। वर्ना कोई वजह नहीं थी कि वह प्रकरण जिसके कारण डॉ. आंबेडकर को नेहरू के कैबिनेट से इस्तीफा देना पड़ा, नहीं दिखाया जाता। वहीं धर्मांतरण के प्रकरण को प्रदर्शित करते समय नागपुर की दीक्षा भूमि का शानदार सेट सबका मन मोह गया। फिर डॉ. आंबेडकर के महापरिनिर्वाण का दृश्य आश्चर्यजनक रूप से नाट्यपूर्ण और मनमोहक था जब डॉ. आंबेडकर चलते हुए बुद्ध की छवि में विलीन हो जाते हैं।

इन सबके अलावा नाटककारों ने डॉ. आंबेडकर की दोनों पत्नियों रमाबाई आंबेडकर और शारदा कबीर को अत्यंत संक्षेप में अपनी बातों को रखने का मौका दिया।

खैर, जो बात पूरी नाटक में एकदम से गायब कर दी गयी, वह संविधान में आरक्षण के प्रावधान थे। पिछड़ों और आदिवासियों का तो नाम तक नहीं लिया गया। नाटक का अंत भी प्रारंभ के जैसा ही रहा। मतलब यह कि नाटक के जरिए डॉ. आंबेडकर को उत्पीड़ित समाज के प्रतिनिधि से अधिक ‘आम आदमी’ का प्रतिनिधि बताया गया।  

बहरहाल, दिल्ली में सत्तासीन आम आदमी पार्टी दलितों के राजनीतिक महत्व को जानती है और यह मुमकिन है कि उसने अपनी सियासत को ध्यान में रखकर ही डॉ. आंबेडकर की जीवनी को अपने सांचे में ढालने का प्रयास किया है। यदि इस पक्ष को छोड़ दें तो नाटक रंगमंचीय मानदंडों पर उत्कृष्ट रही।

(संपादन : अनिल)


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