बिहार : क्या वाकई राजद की जीत के सारथी हैं सवर्ण?

बिहार में सवर्णों को लेकर नये तरह के नॅरेटिव गढ़े जा रहे हैं। उनके वैचारिक बदलाव की बात कही जा रही है। सवर्णों में राजद के प्रति प्रेम बढ़ने का स्‍लोगन भी गढ़ा जा रहा है। जबकि हकीकत में इन बातों का कोई आधार नहीं है। बता रहे हैं वीरेंद्र यादव

बिहार में स्‍थानीय निकाय कोटे के विधान परिषद चुनाव और बोचहां विधान सभा उपचुनाव के बाद राजनीति का स्‍वर बदल रहा है। इस स्‍वर को स्थानीय मीडिया कुछ ज्‍यादा ही मुखरता से उठा रहा है। यह बात जोर-शोर से कही जा रही है कि सवर्ण खासकर भूमिहार वोट राजद की ओर शिफ्ट कर रहे हैं। 

बताते चलें कि बिहार विधान परिषद के स्‍थानीय निकाय कोटे की 24 सीटों में से राजद ने 10 सीटें सवर्णों को दिये। इनमें 5 भूमिहार उम्‍मीदवार में से 3 और 4 राजपूत उम्‍मीदवार में से 1 चुनाव जीतने में सफल रहे। मतलब 3 भूमिहार और 1 राजपूत राजद के टिकट पर एमएलसी निर्वाचित हुए हैं। इस प्रकार राजद के 6 में 4 सवर्ण जाति के ही उम्‍मीदवार जीते हैं। राजनीति का स्‍वर बदलने की मुख्‍य वजह यही है। 

इसके बाद अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित बोचहां विधानसभा क्षेत्र उपचुनाव में राजद के उम्‍मीदवार अमर पासवान ने भाजपा उम्‍मीदवार बेबी कुमारी को 35 हजार से अधिक वोटों से पराजित किया। राजद उम्मीदवार की इस जीत के पीछे सवर्ण वोटरों के राजद से जुड़ने के रूप में बताया जा रहा है।

पहली नजर यही दिख रहा है कि सवर्ण वोटरों का भाजपा से मोहभंग हो रहा है और वह नये विकल्‍प के रूप में तेजस्‍वी यादव के नेतृत्‍व वाले राजद की ओर बढ़ रहे हैं। राजद ने भी अपने आधार वोट के विस्‍तार को लेकर नये-नये प्रयोग किये हैं। एमएलसी चुनाव में 5 भूमिहार और 4 राजपूत को टिकट देना उसी रूप में देखा जा रहा है। लेकिन इस दूसरा पक्ष भी है कि राजद अपने यादव आधार वोट की कीमत पर सवर्णों को टिकट नहीं दे रहा है। एमएलसी चुनाव में राजद ने 24 में से 10 टिकट यादवों को दिया था। चूंकि स्थानीय निकाय के चुनाव काफी महंगे होते हैं। इस कारण चुनाव में पिछड़ी या अन्‍य गैरसवर्ण जातियों से उम्‍मीदवार नहीं मिलते हैं। इस कारण 10 सवर्णों को टिकट दिया था और उसमें 4 जीत भी गये। इस चुनाव में पार्टी के आधार वोट से ज्‍यादा उम्‍मीदवार की आर्थिक क्षमता की बड़ी भूमिका थी। इस मामले में यादव उम्‍मीदवारों की तुलना में सवर्ण उम्‍मीदवार भारी पड़े और जीत भी दर्ज की। यह सवर्ण वोटरों का हृदय परिवर्तन नहीं था, बल्कि अपनी जाति के उम्‍मीदवार के पक्ष में माहौल बनाकर चुनाव जीत लेना था।

राजद नेता तेजस्वी यादव

यदि बोचहां विधान सभा चुनाव का विश्‍लेषण करें तो स्‍पष्‍ट होता है कि राजद की जीत में बड़ी भूमिका उनके आधार वोटों के मजबूती से एकजुट रहने के साथ ही उम्‍मीदवार अमर पासवान के पासवान जाति के वोटों का एकमुश्‍त वोट राजद को मिलना है। भाजपा से नाराज कुछ सवर्ण वोटर जरूर राजद के पक्ष में गये होंगे, लेकिन सवर्णों का बड़ा हिस्‍सा भाजपा के साथ ही था। दलितों की दो बड़ी जाति रविदास और पासवान का वोट भाजपा को नहीं मिलने के बावजूद यदि भाजपा को 45 हजार वोटर मिलता है तो वह वोट कहां से आया? भाजपा का दावा रहा था कि निषाद वोट उसके साथ हैं। इसके बावजूद मुकेश सहनी की पार्टी वीआईपी की उम्‍मीदवार गीता कुमारी को लगभग 30 हजार वोट मिलता है तो यह वोट मल्‍लाह और रविदास जाति के एकमुश्‍त वोट के साथ कुछ नयी जातियों का वोट मिलना बताता है।

दरअसल पटना के मीडिया गलियारे में खास चर्चा रही है कि प्रमुख अखबारों के राजद की रिपोर्टिंग करनेवाले अधिकतर पत्रकार भूमिहार जाति के हैं। वह खबरों में भी भूमिहार पक्ष तलाश लेते हैं। हाल के चुनावों का विश्‍लेषण यही बताता है कि मीडिया का सवर्ण तबका यह बताने का काम कर रहा है कि राजद की जीत के पीछे सवर्णों का हाथ है, उनका योगदान है। यह ट्रेंड तब से चला है, जब से राजद ने अमरेंद्रधारी सिंह को राज्‍यसभा सदस्‍य बनाया था। बिहार के राजनीतिक गलियारे में यह चर्चा खूब रही है कि अमरेंद्रधारी सिंह को किसी विचारधारा या पार्टी के प्रति प्रतिबद्धता की वजह से राज्‍य सभा नहीं भेजा गया था। पार्टी में उनके ‘अन्‍य’ योगदान के कारण सांसद बनाया गया था। इसी अन्‍य को न्‍यायसंगत बताने के लिए ‘ए टू जेड’ (sabke saath) का नारा गढ़ा गया था। इस नारे का विस्‍फोट विधान परिषद चुनाव में दिखा भी। राजद ने 10 सवर्णों को टिकट दिया और 4 जीत गये तथा 10 यादवों को टिकट दिया और 9 हार गये। 9 यादवों के हारने से न यादवों ने साथ छोड़ा है और न 4 सवर्णों के जीतने से सवर्ण राजद से जुड़े हैं।

वहीं बोचहां उपचुनाव में राजद की बड़ी जीत की वजह है यादव और मुसलमानों के साथ पासवान जाति का एकजुट मतदान। इसके साथ स्‍थानीय स्‍तर पर हवा के कारण होने वाली वोटिंग की बड़ी भूमिका रही है। सवर्ण खासकर भूमिहार जरूर भाजपा को लेकर नाराजगी जता रहे थे, लेकिन उसका बहुत छोटा हिस्‍सा ही राजद या वीआईपी को वोट दिया, जबकि 80 फीसदी से अधिक वोटरों ने भाजपा के पक्ष में ही वोट डाला है।

बिहार में सवर्णों को लेकर नये तरह के नॅरेटिव गढ़े जा रहे हैं। उनके वैचारिक बदलाव की बात कही जा रही है। सवर्णों में राजद के प्रति प्रेम बढ़ने का स्‍लोगन भी गढ़ा जा रहा है। जबकि हकीकत में इन बातों का कोई आधार नहीं है। कुछ सीटों के चुनाव परिणाम को देखकर बनायी गयी धारणा सही नहीं हो सकती है। पिछले विधान सभा चुनाव में भी राजद को अप्रत्‍याशित जीत मिली थी। इसका आशय यह नहीं था कि सवर्ण राजद को वोट दे रहे थे। वजह यह थी कि जदयू को हराने के लिए भाजपा ने लोजपा को आगे कर दिया था। राजद की जीत की बड़ी वजह जदयू के खिलाफ भाजपा की साजिश थी। ठीक इसी तरह बोचहां उपचुनाव में जदयू ने भाजपा को पराजित करने की साजिश की और अपने अतिपिछड़े वोटों को शिथिल कर दिया। इन वोटरों ने भाजपा के साथ राजद और वीआईपी को भी वोट दिया। पूर्व मंत्री रमई राम का राजनीतिक जुड़ाव बोचहां से रहा था और उनका आधार भी रहा था। इसका लाभ वीआईपी को मिला।

कुल मिलाकर बिहार में सभी पार्टियां अपने-अपने आधार वोट में विस्‍तार की कोशिश कर रही हैं। राजद और भाजपा में यह होड़ ज्‍यादा तेज है। बोचहां में राजद और भाजपा के आमने-सामने की लड़ाई थी। इस कारण दोनों पक्ष आक्रमक थे। भाजपा यादव वोटों को साधने की रणनीति पर काम कर रही थी तो राजद की नजर सवर्ण वोटरों पर थी। लेकिन अपने-अपने प्रयास में दोनों विफल रहे हैं। चुनाव परिणाम में भाजपा भले चुनाव हार गयी हो, लेकिन सवर्ण जातियों में आधार विस्‍तार के लिहाज से बात करें तो राजद को भी हार ही मिली है। 

(संपादन : नवल/अनिल)


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