इस कोण से समझें दलित-पसमांदा विमर्श

तुर्क-ए-फ़िरोज़शाही से लेकर आइने-अकबरी तक जैसे ग्रंथ हमें बताते है कि मुस्लिम समुदायों में जाति और कबीलाई पहचान के दो प्रमुख पैमाने हैं। ऐसे में समुदाय का पेशा और वर्चस्व के आधार पर उनका सामाजिक मूल्य तय हो सकते थे। यही वजह है कि अट्ठारहवीं और उन्नीसवीं सदी में कुछ समुदायों के लिए ‘अशराफ़’ (जो शरीफ़ हों) कुछ के लिए ‘अजलाफ़’ (ज़लील से संबद्ध) और कुछ के लिए ‘अरज़ाल’ शब्द प्रयुक्त होता है। बता रहे हैं हिलाल अहमद

बाबरी मस्जिद के ध्वंस के बाद मुसलमान राजनीति का चरित्र तय करने मे दलित-पसमंदा मुसलमान विमर्श का योगदान बेहद महत्वपूर्ण रहा है। मुसलमानों में मौजूद जाति प्रथा और अंदरूनी विरोधाभासों को आधार बनाकर आंतरिक लोकतंत्र की मांग करने वाला यह विमर्श मुसलमानों की पिछड़ी जातियों को हिंदू और सिक्ख पिछड़ों और दलितों की तर्ज़ पर ही संविधानसम्मत सुविधाएं दिये जाने का पक्षधर है। 

वर्ष 2006 में सच्चर आयोग की रपट के प्रकाशन के बाद से मुसलमानों के भीतर का पिछड़ा-दलित समाज एक आधिकारिक श्रेणी भी बन गया है। रंगनाथ मिश्र कमीशन (2007) और अल्पसंख्यक आयोग की विभिन्न रपटें इस तथ्य को उजागर करती हैं कि आरक्षण के सवाल और मुस्लिम पिछड़ेपन की समस्याओं को दलित-पिछड़े मुसलमान के प्रश्न से अलग करके नहीं देखा जा सकता है। दलित-पिछड़े मुस्लिम शब्द का चलन कोई ख़ास पुराना नहीं है, लेकिन मुसलमानों के भीतर होने वाली जाति-राजनीति, विशेषकर पिछड़ी जातियों के लामबंद होने की प्रक्रिया, आज़ादी से बहुत पहले औपनिवेशिक भारत में शुरू हो गयी थी। वास्तव में भारत में मुसलमान समाज भी जाति-प्रथा से संचालित होता रहा है। 

भारत में इस्लाम के प्रसार की दो प्रवृत्तियां रही हैं, जिनके आपसी रिश्तों से एक जटिल जाति-व्यवस्था का जन्म हुआ। पहली प्रवृत्ति मुस्लिम समुदायों का मध्य-एशिया से आकर भारत में बसने से संबंधित है। ऐतिहासिक खोजें, विशेषकर हाल में हुए विश्लेषणों से यह स्पष्ट हुआ है कि अनेक मुस्लिम समुदाय एक सतत चलने वाली अत्यंत धीमी प्रक्रिया के तहत कई शताब्दियों तक भारत में आकर बसते रहे। यह प्रक्रिया इतनी धीमी थी कि इसके कारण तत्कालीन समाज में कोई आमूल सामाजिक-सांस्कृतिक परिवर्तन नहीं हुआ। इस्लाम के सिद्धांतों का आत्मसातीकरण होता चला गया। रिचर्ड ईटन का मध्यकालीन बंगाल पर किया गया शोध बताता है कि हिंदुओं द्वारा इस्लाम अपनाने के पीछे न तो सामाजिक न्याय के विमर्श जैसा कुछ था, और ना ही कोई ख़ास राजनीतिक ललक। धार्मिक विविधताओं से भरे इस भौगोलिक-सांस्कृतिक क्षेत्र में मौजूद बहुत से अन्य धार्मिक विकल्पों में से एक विकल्प इस्लाम भी था। इस्लाम का चयन न तो पुराने धार्मिक संदर्भों को छोड़कर किया जा सकता था और ना ही इस्लाम के भीतर मौजूद एकेश्वरवाद जैसी आध्यात्मिक संरचनाओं को ख़ारिज करके। ऐसे में जिन हिंदुओं ने इस्लाम स्वीकार किया, उन्होंने न तो अपनी स्थानीय रीतियों को छोड़ा और ना ही एकेश्वरवाद को नकारा। दिलचस्प बात यह है कि इस्लाम का प्रसार निम्न और मध्य जातियों में ज़्यादा हुआ। इसका सीधा कारण यह था कि इन जातियों में उच्च कही जाने वाली जातियों की तुलना में रीति-रिवाज़ों और आस्थाओं में अपेक्षित खुलापन था। इन जातियों के लिए इस्लामी सिद्धांतों का जातीकरण संभव था। इस तरह हरेक जाति ने, जो बाद में मुस्लिम बिरादरियां (विशेषकर उत्तर भारत में) कही जाने लगीं, अपने-अपने ढंग से इस्लामीआस्थाओं को परिभाषित किया।

प्रासंगिक होता पसमांदा विमर्श

मध्य एशिया से आये विविध मुसलमान समुदायों और भारतीय मुस्लिम बिरादरियों के आपसी रिश्तों ने मुस्लिम जाति-प्रथा को जन्म दिया। दोनों तरह की सामाजिक संरचनाओं के भीतर भी अनेक विविधताएँ थीं। उदाहरण के लिए मध्य एशियाई और अरब से संबंध रखने वाले समुदायों के बीच भी उतनी ही दूरियाँ थीं, जितनी कि मुस्लिम बिरादरियों में। हालांकि मध्य एशियाई समुदाय शेख़, मुग़ल और पठान शासक वर्ग में बदल गये, परंतु यह कहना ठीक नहीं होगा कि उनके राजनीतिक वर्चस्व से ही जाति व्यवस्था में ऊंच-नीच तय हुई। मुस्लिम जाति व्यवस्था में ऊंच-नीच की शुरुआत पर अभी तक कोई ऐतिहासिक विश्लेषण नहीं किया गया है। ऐसे में मध्ययुगीन साहित्य, विशेषकर मुस्लिम शासकों द्वारा लिखवाया गया साहित्य ही एक संभव स्रोत है। 

तुर्क-ए-फ़िरोज़शाही से लेकर आइने-अकबरी तक जैसे ग्रंथ हमें बताते है कि मुस्लिम समुदायों में जाति और कबीलाई पहचान के दो प्रमुख पैमाने हैं। ऐसे में समुदाय का पेशा और वर्चस्व के आधार पर उनका सामाजिक मूल्य तय हो सकते थे। यही वजह है कि अट्ठारहवीं और उन्नीसवीं सदी में कुछ समुदायों के लिए ‘अशराफ़’ (जो शरीफ़ हों) कुछ के लिए ‘अजलाफ़’ (ज़लील से संबद्ध) और कुछ के लिए ‘अरज़ाल’ शब्द प्रयुक्त होता है। 

यहां दो स्पष्टीकरण ज़रूरी हैं। पहला, इन श्रेणियों का इस्तेमाल औपनिवेशिक युग के शुरुआती दौर मे ख़ूूब होता होता दिखता है। इसलिए मुस्लिम जाति-विमर्श और औपनिवेशिक आधुनिकता का संबंध जातियों केऊंच-नीच के विश्लेषण में एक अहम कड़ी है। इसका स्पष्टीकरण मुस्लिम समाजों में परंपरागत पेशों से ताल्लुक रखता है। पेशों की ऊंच-नीच अशराफ़ और अरज़ाल श्रेणियों का अवधारणात्मक क्षेत्र तय करती है। मसलन नाई, जुलाहे और बढ़ई का काम करने वाले मुसलमान, अजलाफ़ श्रेणी में माने गये, जबकि मध्य-एशियाई समुदाय जो कि मूलतः व्यापार से संबंध रखते थे, अशराफ़ बन गये। हिंदू जाति-व्यवस्था की तरह यहां भी पेशा जाति बनता चला गया।

अशराफ़ व अज़लाफ़ की दूरियों का सबसे सटीक चित्रण उन्नीसवीं सदी की रचनाओं से मिलता है। सैयद अहमद ख़ाँसे लेकर शीर्ष के कई उलेमा प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष तौर पर मुस्लिम जाति-व्यवस्था के समर्थक बन गये। सैयद अहमद ने तो जुलाहों को बदज़ात तक कहा और 1857 के सिपाही विद्रोह का ज़िम्मेदार ठहराया। इस तरह इस्लाम की जाति-व्यवस्था का आधुनिक राजनीति से सीधा रिश्ता जुड़ गया। बीसवीं सदी के शुरुआती दशकों में पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार में जातिगत संगठन विशेषकर पिछड़े मुसलमानों के संगठन बनने शुरू हुए। 1930 के दशक में बनी मोमिन कांफ्रेंस इसका एक अहम उदाहरण है। कांफ्रेंस मूलतः जुलाहा समुदाय से संबंधित थी और इसका रुझान कांग्रेस की समन्वयकारी राजनीति की तरफ़ था। यही कारण था कि आज़ादी के बाद मोमिन कांफ्रेंस कांग्रेस के प्रसार में पूरी तरह छिप गई।

1960 और 1970 के दशकों में मुसलमानों की पिछड़ी जातियों का दायरा सामाजिक-सांस्कृतिक क्षेत्रों तक सीमित रहा। इसका एक बड़ा कारण भारतीय संवैधानिक विमर्श द्वारा मुसलमानों को एक राजनीतिक इकाई मानने से भी जुड़ा था। उदाहरण के लिए 29 जनवरी, 1953 को गठित काका कालेलकर समिति ने यह तो माना कि मुसलमानों की कुछ जातियां पिछड़ी हैं, लेकिन समिति ने इन जातियों को हिंदू और सिक्ख पिछड़ों-दलितों के साथ जोड़कर नहीं देखा। यहां तक कि 1959 के एक अध्यादेश से यह भी तय हो गया कि संविधान के अनुच्छेद 341 के तहत केवल हिंदुओं और सिक्खों में मौजूद दलित जातियां ही आरक्षण का लाभ उठा सकती हैं। अन्य भारतीय मज़हब (ख़ासकर इस्लाम और ईसाई मत) इस सूची से बाहर रखे गये। इस प्रकार मुसलमानों में जाति एक संकीर्ण राजनीतिक श्रेणी के तौर पर पुनः स्थापित हो गयी। 1980 के दशक में मंडल आयोग ने एक नयी शुरुआत की। आयोग ने मुसलमानों के पिछड़े तबकों को अन्य पिछड़े वर्ग की श्रेणी में रखकर आरक्षण देने की सिफ़ारिश की। इस पहल ने मुसलमानों के भीतर चल रहे जातिगत अंतर्विरोधों को एक नया उछाल दिया और बाबरी मस्जिद का विध्वंस होने तक ‘दलित-पिछड़े मुस्लिम’ नामक एक नये राजनीतिक विमर्श का उदय हुआ।

यह विमर्श आंदोलन बना और काफ़ी तेज़ी से लोकप्रिय हुआ। शीघ्र ही दलित-पिछड़े मुस्लिम का सवाल उठाने वाले कई संगठन सामने आये। 1998 में अली अनवर की पुस्तक ‘मसावात की जंग’ ने इस विमर्श को पसमांदा नामक नयी अवधारणा के रूप में परिभाषित किया। अनवर ने बिहार की मुस्लिम जाति व्यवस्था का ऐतिहासिक विश्लेषण करके नीची जाति के मुसलमानों को एक राजनीतिक श्रेणी के तौर पर स्थापित किया। अनवर मानते हैं कि पिछड़े मुसलमानों का अलग से आरक्षण पसमांदा-दलित मुसलमानों के संघर्षों को सांप्रदायिक बना देगा। इसलिए अन्य पिछड़े वर्ग की पहचान अगली और पिछड़ी जातियों के आधार पर ही होनी चाहिए ताकि अति-पिछड़ी जातियां, चाहे वे हिंदू हों या मुसलमान, आरक्षण का लाभ उठा सकें। अनवर अनुच्छेद 341 में संशोधन के पक्षधर हैं और उनका मत है कि मुस्लिम दलितों को हिंदू दलितों की तरह ही आरक्षण मिलना चाहिए। अनवर मुसलमानों में अंतर्जातीय विवाह के भी हियायती हैं। दलित-पिछड़े मुस्लिम विमर्श को तथाकथित मुस्लिम रहनुमाओं का भी समर्थन हासिल है, हालाँकि परम्परागत मुस्लिम राजनीति अब भी इस सवाल को मुसलमानों का आंतरिक मुद्दा मानने के ही पक्ष में है। 

संदर्भ : 

  1. अली अनवर (1998), मसावात की जंग, आईएसआई, पटना-दिल्ली.
  2. ख़ालिद अनीस अंसारी (2009), ‘रिथिंकिंग पसमांदा मूवमेंट’, कांउटरकरेंट्स, फरबरी.
  3. हिलाल अहमद (2009), ‘मुस्लिम एज़ पॉलिटिकल कम्युनिटी’, सेमिनार, 602, दिल्ली.
  4. इरफान अहमद (2003), ‘ए डिफ़रेंट जिहाद : दलित मुस्लिम्स चैलेंज टु अशराफ़ हेजेमनी’, इकॉनॉमिक पॉलिटिकल वीकली, खण्ड 38, अंक 46.
  5. प्रफुल्ल बिदवई (2006), ‘कॉम्बेटिंग मुस्लिम एक्सक्लूज़न’, फ्रंटलाइन, खण्ड 23, अंक 23.

(संपादन : नवल/अनिल)


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