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आज 149वें सत्यशोधक दिवस से ForwardPress.in नए कलेवर में

आज सत्यशोधक समाज की स्थापना की 149वीं वर्षगांठ पर फारवर्ड प्रेस, जो स्वयं को फुले और सत्यशोधक समाज की विरासत का भाग मानती है और सत्य की खोज के उनके आदर्श का अनुसरण करने का प्रयास करती है, एक नए स्वरूप में अब आपके सामने है

पत्रकारिता की प्रकृति ही ऐसी है कि उसके केंद्र में हमेशा वर्तमान रहता है। पत्रकार अनवरत यह पता लगाने में जुटे रहते हैं कि इस क्षण, इस घंटे और आज के दिन राजनीति, समाज, संस्कृति, विज्ञान आदि क्षेत्रों में क्या हो रहा है। 

हमारे राष्ट्र के अतीत का दस्तावेजीकरण अपेक्षित रूप से नहीं हुआ है और गुजरे हुए कल के बारे में बहुत सारी चीजें हम अब भी ठीक-ठीक नहीं जानते हैं। ऐसे में क्या हम यह दावा कर सकते हैं कि हम वर्तमान का सही और तथ्यात्मक प्रस्तुतिकरण कर रहे हैं? ऐतिहासिक अभिलेखों के अभाव के चलते, आज के सच को अनावृत करने के लिए यह जरूरी है कि अतीत के बारे में व्याप्त धारणाओं पर प्रश्न उठाए जाएं। आखिकार, अतीत की नींव पर ही वर्तमान खड़ा होता है। 

इसी सच को अनावृत करने का अभियान जोतीराव फुले और सत्यशोधक समाज के उनके बंधुओं ने 24 सितंबर, 1873 को शुरू किया था। फारवर्ड प्रेस, फुले के जीवन और उनके कार्यों से प्रेरित है और फुले का अनुसरण करते हुए हमारे देश के आमजनों, हमारे लोकतंत्र और हमारे राष्ट्र के हित में सच को अपने पाठकों के समक्ष प्रस्तुत करना चाहती है। 

आज से 149 साल पहले जोतीराव फुले और उनके साथियों ने जब सत्यशोधक समाज की स्थापना की थी तब तक वे और उनकी जीवनसंगिनी सावित्रीबाई फुले शिक्षा के क्षेत्र में खासा नाम कमा चुके थे तथा जनसाधारण के लिए विपुल लेखन भी कर चुके थे। सत्यशोधक समाज की स्थापना फुले की सबसे जानी-मानी और प्रभावशाली कृति ‘गुलामगिरी’ के प्रकाशन के कुछ ही दिनों बाद हुई थी (मूलतः मराठी में लिखित इस पुस्तक का एनोटेटिड हिंदी अनुवाद फारवर्ड प्रेस द्वारा पिछले सत्यशोधक दिवस पर लोकार्पित किया गया था)। 

एक शिक्षक और सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में निरक्षर जनता को शिक्षा हासिल करने के लिए प्रेरित करने के उनके दशकों लंबे प्रयास फलीभूत हो चले थे। शूद्रों और अतिशूद्रों में अब इतना बड़ा शिक्षित वर्ग था कि वह अपने अशिक्षित भाई-बहनों में भी सत्य की खोज करने का जोश भर सकता था। 

सत्यशोधक समाज का एक नियम था कि उसके सदस्य सभी को जन्म से एक-दूसरे के बराबर मानेंगे। यह ब्राह्मणवादी ग्रंथों की शिक्षाओं के विपरीत था और उस समाज से भी मेल नहीं खाता था, जिसे इन ग्रंथों की शिक्षाओं ने आकार दिया था। शूद्रों और अतिशूद्रों को ब्राह्मणवाद की मानसिक गुलामी से मुक्त करना ही सत्यशोधक समाज के गठन का उद्देश्य था। 

‘गुलामगिरी’ सहित फुले की सभी रचनाएं जनभाषा में लिखी गईं हैं। सत्यशोधकों ने ब्रिटिश सरकार के शिक्षा विभाग और अंग्रेजों द्वारा संचालित एक इंजीनियरिंग कालेज को ऐतिहासिक दृष्टि से वंचित वर्गों की संतानों को आरक्षण और वजीफे दिए जाने का अनुरोध किया। इस अनुरोध को स्वीकार करते हुए इन बच्चों के लिए कुछ सीटें सुरक्षित कर दी गईं। सत्यशोधकों से कहा गया कि वे बांबे यूनिवर्सिटी में पढ़ने के इच्छुक युवाओं की मदद करें। कृष्णराव भालेकर द्वारा पुणे से शुरू किया गया ‘दीनबंधु’ देश का पहला ऐसा अख़बार था, जिसका मालिक और संचालक कोई शूद्र था। यह अखबार भी सत्यशोधक समाज की विरासत था। इसी संस्था के प्रभाव से बंबई में नारायण मेघाजी लोखंडे ने देश की पहली मजदूर यूनियन की स्थापना की। कोल्हापुर के शासक शाहूजी महाराज, जिन्होंने 1902 में राज्य के अंतर्गत सेवाओं में पिछड़ी जातियों और अछूतों को आरक्षण दिया था, भी सत्यशोधकों के संपर्क में थे। सयाजीराव गायकवाड़, जिन्होंने कोलंबिया विश्वविद्यालय में आंबेडकर की पढ़ाई का खर्च उठाया था, भी सत्यशोधकों से प्रभावित थे। फुले स्वयं गायकवाड़ से मिले थे और अनुरोध किया था कि सदियों से दमन का शिकार रहे समुदायों की उन्हें मदद करनी चाहिए। फुले एवं गायकवाड़ दोनों ऐसे ही समुदायों से थे।

आज सत्यशोधक समाज की स्थापना की 149वीं वर्षगांठ पर फारवर्ड प्रेस, जो स्वयं को फुले और सत्यशोधक समाज की विरासत का भाग मानती है और सत्य की खोज के उनके आदर्श का अनुसरण करने का प्रयास करती है, एक नए स्वरूप में अब आपके सामने है। सात साल पहले, 2015 में ForwardPress.in के अस्तित्व में आने के बाद से इंटरनेट की दुनिया में क्रांतिकारी तकनीकी परिवर्तन हुए हैं। पिछले कुछ समय से हमारे लिए इन तकनीकी परिवर्तनों से सामंजस्य बिठाना कठिन होता जा रहा था। कहने का आशय यह कि नई वेबसाईट केवल नई दिखती ही नहीं है, वह तकनीकी दृष्टि से भी नई है। हमें यह उम्मीद है कि इससे सर्च इंजनों के और अनुकूल होगी तथा ऑनलाइन दुनिया में हमारी पहुंच बेहतर होगी। 

ForwardPress.in अब अंग्रेजी और हिंदी के दो बराबर-बराबर खंडों में विभाजित है। दोनों खंडों में मूल आलेखों साथ ही दूसरी भाषा में लिखे आलेखों का अनुवाद भी प्रकाशित होगा। हमारा यह प्रयास रहेगा कि अंग्रेजी और हिंदी में प्रकाशित सामग्रियां एक-दूसरे को प्रतिबिंबित करें। परंतु संसाधनों की कमी के कारण यह हमेशा संभव नहीं हो पाएगा। परंतु यदि आप किसी विशेष आलेख का अनुवाद पढ़ना चाहते हैं और वेबसाईट पर वह उपलब्ध नहीं है तो आप हमें सूचित करें और हमारा प्रयास होगा कि हम आपको वह अनुवाद उपलब्ध कराएं। 

वेबसाईट के इस स्वरूप में हमने फारवर्ड प्रेस बुक्स को अधिक महत्व देने का प्रयास किया है। हम अपने इस प्रयास में कुछ हद तक सफल रहे हैं, परंतु भविष्य में आप इस संदर्भ में कुछ नए प्रयोगों और सुधारों की अपेक्षा कर सकते हैं। अंत में हमारी आप सबको कामना है कि आप खूब पढ़ें, सच को खोजें और उसका प्रसार करें, क्योंकि केवल सच ही हमें सच्चे अर्थों में स्वतंत्र कर सकता है।


फारवर्ड प्रेस वेब पोर्टल के अतिरिक्‍त बहुजन मुद्दों की पुस्‍तकों का प्रकाशक भी है। एफपी बुक्‍स के नाम से जारी होने वाली ये किताबें बहुजन (दलित, ओबीसी, आदिवासी, घुमंतु, पसमांदा समुदाय) तबकों के साहित्‍य, सस्‍क‍ृति व सामाजिक-राजनीति की व्‍यापक समस्‍याओं के साथ-साथ इसके सूक्ष्म पहलुओं को भी गहराई से उजागर करती हैं। एफपी बुक्‍स की सूची जानने अथवा किताबें मंगवाने के लिए संपर्क करें। मोबाइल : +917827427311, ईमेल : info@forwardmagazine.in

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लेखक के बारे में

अनिल वर्गीज

अनिल वर्गीज फारवर्ड प्रेस के प्रधान संपादक हैं

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