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बहुजन साप्ताहिकी : 22 नवंबर से रणवीर सेना के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई शुरू

बहुजन साप्ताहिकी के तहत इस बार पढ़ें बिहार से जुड़ी इस खबर के अलावा यह भी कि कैसे बिहार में निकाय चुनाव में ओबीसी आरक्षण पर रोक संबंधी पटना हाई कोर्ट के फैसले के बाद वहां के विभिन्न दल एक-दूसरे पर घात-प्रतिघात कर रहे हैं। साथ ही एक खबर डीयू में एडहॉक शिक्षकों की नियुक्ति से उत्पन्न हुए विवाद के संबंध में

करीब 9 वर्षों के बाद सुप्रीम कोर्ट में रणवीर सेना के खिलाफ नगरी नरसंहार के मामले की सुनवाई शुरू होगी। इसके लिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा 22 नवंबर, 2022 की तिथि निर्धारित है। इसके साथ ही करीब एक दशक से सुप्रीम कोर्ट में लंबित बथानी टोला और लक्ष्मणपुर-बाथे नरसंहार मामले की सुनवाई जल्द प्रारंभ होने की संभावना तेज हो गई है।

बताते चलें कि बिहार के भोजपुर जिले के चरपोखरी प्रखंड के नगरी गांव में 5 नवंबर, 1998 को रणवीर सेना के गुंडों ने दलित और पिछड़े वर्ग के लोगों के उपर अंधाधुंध गोलियां चलाकर नरसंहार को अंजाम दिया था। इसमें दस लोगों की मौत हो गई थी। वहीं डेढ़ दर्जन लोग घायल हुए थे। 

इस मामले में भोजपुर की निचली अदालत ने 16 अभियुक्तों के खिलाफ ट्रायल शुरू किया था। इनमें से एक अभियुक्त की ट्रायल के दौरान ही मौत हो गई थी। वर्ष 2009 में निचली अदालत ने 15 में से 11 आरोपियों को दोषी करार दिया था। इनमें 8 को आजीवन कारावास तथा 3 को फांसी की सजा सुनाई गई थी। निचली अदालत के इस फैसले को चंद्रभूषण सिंह, सुदर्शन पांडेय, रविंद्र सिंह ने पटना हाईकोर्ट में याचिका दायर कर चुनौती दी थी। ये वे तीन आरोपी रहे जिन्हें निचली अदालत ने फांसी की सजा देने का आदेश दिया था।

सुप्रीम कोर्ट, नई दिल्ली

पटना हाई कोर्ट के तत्कालीन न्यायाधीशद्वय जस्टिस वी. एन. सिन्हा और जस्टिस अमरेश कुमार लाल की बेंच ने 1 मार्च, 2013 को अपने फैसले में निचली अदालत के आदेश को खारिज कर दिया तथा सभी आरोपियों को बरी करने का आदेश दिया। इसे उमाशंकर सिंह ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। इस मामले में अब जाकर सुनवाई शुरू होगी। 

इस संबंध में भाकपा माले के केंद्रीय कार्यालय सचिव प्रभात कुमार चौधरी ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट में नगरी मामले की सुनवाई शुरू होने के साथ ही अब यह प्रतीत होता है कि बाथे और बथानी नरसंहार के मामले में भी सुनवाई जल्द शुरू होगी। 

राजेश वर्मा की अध्यक्षता में ओबीसी कल्याण संसदीय समिति का पुनर्गठन

लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला ने ओबीसी कल्याण संसदीय समिति का पुनर्गठन कर दिया है। लोकसभा के सदस्य राजेश वर्मा के अध्यक्ष बनाए गए हैं। वे सीतापुर, उत्तरप्रदेश लोकसभा क्षेत्र से भाजपा के सांसद हैं। इस समिति का कार्यकाल एक साल होगा। इस समिति में लोकसभा के 20 और राज्यसभा के 9 सदस्य शामिल हैं। एक सदस्य का स्थान रिक्त है। लोकसभा सदस्यों में राजेश वर्मा के अलावा टी. आर. बालू, संजय कुमर बंदी, चंद्रशेखर बेल्लाना, रमेश बिधुड़ी, एस. जोतिमणि, दिलेश्वर कामत, रक्षा निखिल खाडसे, पी.सी. मोहन, डॉ. प्रीतम गोपीनाथ मुंडे, रोडमल नागर,बालक नाथ, अजय निषाद, पी. एस. पटेल, चंद्रशेखर साहू, चुन्नीलाल साहू, के. सुधाकरण, स्वामी साक्षी महाराज, श्याम सिंह यादव और अशोक कुमार यादव शामिल हैं। वहीं राज्यसभा सदस्यों में दिनेशचंद्र जेमलभाई अनावाडिया, चंद्रप्रभा, राजेंद्र गहलोत, नारायणा कोरागप्पा, जुगल सिंह लोखंडवाला, सुभाषचंद्र बोस पिल्लै, सकलदीप राजभर, रामनाथ ठाकुर और हरिनाथ सिंह यादव शामिल हैं।

बिहार में स्थानीय निकाय चुनावों पर रोक के मद्देनजर जूतम-पैजार

पटना हाई कोर्ट ने बिहार में त्रि-स्तरीय निकाय चुनावों में ओबीसी आरक्षण पर सवाल उठाते हुए तब रोक लगा दिया, जब इसके लिए मतदान में केवल पांच दिन समय शेष रह गया था। अब इस मामले में राज्य के विभिन्न राजनीतिक दलों के बीच जूतम-पैजार की स्थिति उत्पन्न हो गई है। सबसे अधिक सवाल हाल तक शासन कर रहे जदयू और भाजपा को लेकर उठाए जा रहे हैं।

दरअसल, पटना हाई कोर्ट राज्य सरकार द्वारा ट्रिपल टेस्ट आंकड़ा नहीं पेश किये जाने के आधार पर पिछड़ा वर्ग और अति पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षण को खत्म कर दिया तथा चुनाव पर भी रोक लगा दी। इस मामले में भाजपा द्वारा यह आरोप लगाया जा रहा है कि राज्य सरकार ने समय पर ट्रिपल टेस्ट के आंकड़े नहीं दिए। वहीं राजद और भाकपा माले के नेताओं ने भाजपा को कटघरे में खड़ा किया है। 

भाकपा-माले के राज्य सचिव कुणाल ने कहा है कि नगर निकाय चुनाव में पिछड़ों-अतिपिछड़ों को दिए जा रहे आरक्षण के मसले पर पटना उच्च न्यायालय का जो फैसला आया है, उसके पीछे भाजपा ही है। उन्होंने कहा कि भाजपा अब पिछड़ों और अतिपिछिड़ों के प्रति प्रेम का ढोंग कर रही है। नगर निकाय का यह चुनाव 2007 के प्रावधानों के अनुसार ही हो रहा था। इस आधार पर 2012 व 2017 में चुनाव हो चुके हैं। लंबे अर्से से नगर विकास विभाग की जिम्मेवारी भाजपाई मंत्रियों के ही जिम्मे रही है। इसलिए इसका जवाब भाजपा को ही देना होगा कि उसने अभी तक ट्रिपल टेस्ट के लिए कमीशन का गठन क्यों नहीं किया था? 

डीयू में ‘डिस्प्लेसमेंट थ्रू इंटरव्यू’

दिल्ली विश्वविद्यालय में एडहॉक के रूप में कार्यरत अध्यापकों की नौकरी खतरे में पड़ गई है। दरअसल, यूजीसी के निर्देश पर विश्वविद्यलय में नियमित नियोजन की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। इसके तहत यूजीसी ने सभी एडहॉक शिक्षकों को भी चयन प्रक्रिया में शामिल होने का निर्देश दिया है। इस कारण शिक्षकों को मौजूदा संदर्भ में आवश्यक अहर्ताएं पूरी करने के अलावा साक्षात्कार में सफल होने की चुनौती का सामना करना पड़ा है। इस कड़ी में बीते दिनों विश्वविद्यालय के हंसराज कॉलेज में 6 नये शिक्षकों की नियुक्ति हुई, जिनमें केवल एक ही एडहॉक शिक्षक थे। इसी तर्ज पर विश्वविद्यालय कैंपस और सोशल मीडिया पर ‘डिस्प्लेसमेंट थ्रू इंटरव्यू’ की च चर्चा जोरों पर है। यह इसलिए भी कि अब जो नयी नियुक्तियां हो रही हैं, उनमें आरक्षण के नियमों का अनुपालन किया जा रहा है। जबकि एडहॉक शिक्षकों के बारे में विश्वविद्यालय से जुड़े लोगों का कहना है कि अधिकांश की नियुक्ति पॉलिटिक्स के कारण हुई थी। ऐसे अधिकांश शिक्षक 10-15 वर्षों से पढ़ा रहे हैं। 

(संपादन : अनिल)


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लेखक के बारे में

नवल किशोर कुमार

नवल किशोर कुमार फॉरवर्ड प्रेस के संपादक (हिन्दी) हैं।

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