“पहले जब मिट्टी के घर होते थे तब घरों पर मिट्टी के रंगों से भित्ति चित्र बनाए जाते थे। अब हम गोंड आदिवासी भी पहले की तरह मिट्टी के घर नहीं बनाते हैं तो यह कला भी खत्म होती जा रही है। इसलिए मैं अब गोंड समुदाय की इस कला को कैनवास पर बनाती हूं। इसके लिए मैं पारंपरिक गेरूआ मिट्टी, पीली मिट्टी और काली मिट्टी आदि का ही प्रयोग करती हूं। मेरी कोशिश है कि हम गोंड समुदाय के लोगों की यह कला न केवल जीवित रहे बल्कि विस्तार पाये।”
यह कहना है माधवी उईके मेरावी का जो उभरती हुईं गोंडी चित्रकार हैं। मध्य प्रदेश के बालाघाट जिले के बईहर तहसील के भीमजोड़ी गांव में जन्मीं माधवी ने कंप्यूटर साइंस में मास्टर (इन इंफार्मेशन टेक्नोलॉजी) डिग्री हासिल किया है। अब वह समाजशास्त्र की एक शाखा नृवंशविज्ञान की अध्येता हैं।
माधवी बताती हैं कि पेंटिंग बनाने का शौक बचपन से रहा। लेकिन इसे लेकर उनकी मां मंजू उईके और पिता अरुण कुमार उईके उन्हें डांटते तथा पढ़ाई पर ध्यान देने की बात समझाते। लेकिन वर्ष 2008-09 में जब वह स्नातक की शिक्षा के लिए जबलपुर गईं, तब उन्होंने पेंटिंग करना शुरू किया। माधवी के अनुसार, जब वह अपनी पेंटिंग्स लेकर घर गईं तब उन्हें देखकर उनके माता-पिता बहुत प्रसन्न हुए और इस कला के क्षेत्र में आगे बढ़ने को प्रेरित किया।
माधवी के बनाए चित्रों में गोंडी संस्कृति की विशिष्ट पहचान निहित है। गोंडी भाषा की प्रसिद्ध साहित्यकार उषाकिरण आत्राम कहती हैं कि माधवी ने उनकी तीन किताबों के लिए चित्र बनाए हैं। अपने द्वारा संपादित पुस्तक ‘गोंडवाना की जमापूंजी’ के आवरण चित्र के बारे में वह बताती हैं कि इसके हर रंग और रेखाचित्र में गोंड समुदाय के सभी 750 गोत्रों के अलग-अलग टोटेम, मिथक और कहानियां हैं। इसे एक पेड़ के रूप में दिखाया गया है जिसकी टहनियों में गोंड समुदाय है। यह समुदाय चूंकि श्रमजीवी है और प्रकृति पर आश्रित है तो इसकी अभिव्यक्ति भी माधवी उईके मेरावी ने इसी रूप में की है। इसमें समस्त गोत्रों के उद्गम के रूप में स्त्री शक्ति को दिखाया गया है, जिसके पल्लू में सात रंग हैं। ये सात रंग कोयतुरों (प्राचीन मूलनिवासियों) का सप्तरंगी झंडा है।

स्वयं माधवी बताती हैं कि एक समय तक गोंड आदिवासी लोककला को लेकर या फिर उनकी परंपराओं को लेकर गैर-गोंड समुदायों में उदासीनता का भाव रहा। लेकिन अब देश भर के लोग इस समुदाय के बारे में जानना-समझना चाहते हैं। इसके अलावा तकनीक ने भी चित्रकला को बहुत हदतक बदल दिया है। इसका उदाहरण देते हुए वह कहती हैं कि पहले गोंडी चित्रकार अपनी पेंटिंग बनाने के लिए प्रकृति में सहज उपलब्ध पत्ताें, जड़ी-बुटियों और मिट्टी आदि का प्रयोग करते थे, लेकिन अब वे भी एक्रेलिक रंगों का उपयोग करने लगे हैं। इससे चित्रों में नये तरह के रंगों का उपयोग भी किया जाने लगा है और इन रंगों की उम्र भी लंबी होती है।
क्या आपने यह कला सिर्फ शौक के लिए अपनाया है? यह पूछे जाने पर माधवी कहती हैं कि यह केवल शौक के लिए नहीं है, बल्कि यह इसलिए भी है क्योंकि गोंड समुदाय को लेकर लाेगों में दिलचस्पी बढ़ी है। गोंड समुदाय के लोगों के अलावा गैर-गोंडी समुदाय के लोग भी इस दिशा में आकर्षित होने लगे हैं। इसलिए बदल रही तकनीक और विमर्श के सवालों व चित्रकला की आधुनिक अवधारणा के मुताबिक गोंडी चित्रकार भी बदल रहे हैं। वे अब अपनी पेंटिंग्स बेचने भी लगे हैं।
भविष्य की योजनाओं के बारे में माधवी बताती हैं कि फिलहाल वह बच्चों के लिए गोंड आदिवासियों की लोक कहानियों को सचित्र रूप में संग्रहित करना चाहती हैं ताकि बच्चे आसानी से गोंड सभ्यता, संस्कृति और परंपराओं को आसानी से समझ सकें।
(संपादन : नवल/अनिल)
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