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छत्तीसगढ़ : बढ़े आरक्षण पर अदालत से पहले राज्यपाल ने खड़े किये सवाल, गतिरोध जारी

मुख्यमंत्री ने राज्यपाल को याद दिलाया कि विधानसभा से कोई विधेयक पारित होने के बाद विभागों से जानकारी नहीं ली जाती है। उन्होंने कहा कि जो सवाल राजभवन द्वारा विभागों से किए जा रहे हैं, वे राज्यपाल के अधिकार क्षेत्र से बाहर हैं। बता रहे हैं मनीष भट्ट मनु

छत्तीसगढ़ में आरक्षण को लेकर राज्यपाल अनुसुईया उईके और मुख्यमंत्री भूपेश बघेल आमने-सामने हा गए हैं। दोनों के बीच आरोप-प्रत्यारोप अब लोकतांत्रिक परंपराओं को पार कर गया है। इसका खामियाजा छत्तीसगढ़ के उन युवाओं को उठाना पड़ रहा है, जो सरकारी नौकरी की राह ताक रहे हें। इसके चलते अब तक छत्तीसगढ़ राज्य सेवा आयोग में 171 पदों में भर्ती साक्षात्कार के बाद अटकी पड़ी है। साथ ही वर्ष 2022 के प्रस्तावित 189 पदों सहित पुलिस विभाग की भर्तियों पर भी असमंजस बना हुआ है। महाविद्यालयों में 595 विभिन्न पदों पर भर्ती को रोक दिया गया है।

राज्यपाल और मुख्यमंत्री के बीच विवाद के केंद्र में है बीते 1 दिसंबर, 2002 को छत्तीसगढ़ विधानसभा द्वारा पारित वह विधेयक जिसके जरिए राज्य में आरक्षण 76 प्रतिशत किया जाना है। अब इसके क्रियान्वयन में राज्यपाल बाधक बन गई हैं। उन्होंने विधेयक पर हस्ताक्षर करने से इंकार कर दिया है। 

गौर तलब है कि इस नए विधेयक में अनुसूचित जनजाति के लिए 32 फीसदी, अनुसूचित जाति के लिए 13 फीसदी, ओबीसी के लिए 27 फीसदी और ईडब्ल्यूएस के लिए चार फीसदी आरक्षण का प्रावधान किया गया है। 

राज्यपाल उइके ने सवाल किया है कि मामला यदि न्यायालय में जाएगा तो सरकार 76 प्रतिशत आरक्षण को सही कैसे ठहराएगी? उनके इस सवाल की जड़ में है उच्च न्यायालय द्वारा 2012 के विधेयक को खारिज किये जाने का वह फैसला, जिसके तहत राज्य में 58 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान किया जाना था। 

छत्तीसगढ़ की राज्यपाल अनुसूईया उइके व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल

बताते चलें कि वर्ष 2012 से पहले राज्य में अनुसूचित जाति को 16 प्रतिशत, अनुसूचित जनजाति को 20 प्रतिशत और पिछड़ा वर्ग को 14 प्रतिशत आरक्षण दिए जाने का प्रावधान था। मगर इसके बाद रमन सिंह सरकार ने इन तीनों वर्गों को क्रमश: 12 प्रतिशत, 32 प्रतिशत और 14 प्रतिशत आरक्षण यानी कुल 58 प्रतिशत आरक्षण करने का प्रावधान किया। इस निर्णय का तब जमकर विरोध किया गया और इसे 2012 में ही छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय में चुनौती दे दी गई। करीब दस साल तक प्रकरण चलने के बाद 19 सितंबर, 2022 को अदालत ने इस आरक्षण को असंवैधानिक बता दिया। इसके बाद बढ़े हुए आरक्षण के तहत जिन उम्‍मीदवारों को नियुक्तियां मिलीं, वे वैसी ही रहीं, लेकिन आगे की भर्तियों में कोर्ट के बताए नियमों का पालन किया गया।

अब बघेल सरकार द्वारा 76 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान करने वाले विधेयक को लेकर अदालत से पहले राज्यपाल ने ही सवाल खड़े कर दिए हैं। उन्होंने राज्य सरकार से कुछ सवालों के जवाब मांगे हैं। इनमें कुछ सवाल ऐसे हैं, जिनके जवाब सरकार के पास नहीं हैं। दरअसल, सरकार ने अब तक ओबीसी और ईडब्ल्यूएस की गणना के लिए गठित मात्रात्मक आयोग की रिपोर्ट राजभवन को नहीं सौंपी है। राजभवन की ओर से राज्य सरकार से पूछा गया है कि विधेयक पारित होने से पहले क्या एससी, एसटी के संबंध में मात्रात्मक विवरण (डाटा) संग्रहित किया गया। राजभवन ने 50 प्रतिशत से अधिक आरक्षण करने के लिए विशेष और बाध्यकारी परिस्थितियों से संबंधित विवरण उपलब्ध कराने का निर्देश राज्य सरकार को दिया है। 

राजभवन ने पूछा है कि क्या हाई कोर्ट के 19 सितंबर 2022 के निर्णय के ढाई महीने बाद क्या ऐसी विशेष परिस्थितियों के संबंध में कोई डाटा संकलित किया गया है? एक सवाल यह भी कि क्या एससी, एसटी का पिछड़ापन जानने के लिए राज्य सरकार ने कोई कमेटी बनाई है? इसके अलावा आरक्षण संशोधन पर विधि एवं विधायी कार्यविभाग का अभिमत पेश करने की बात कही गई है।

विधेयक में ईडब्ल्यूएस का उल्लेख नहीं है। राजभवन ने इस संबंध में भी राज्य सरकार से पूछा है कि क्या शासन को ईडब्ल्यूएस के लिए संविधान के अनुच्छेद 16 (6) के तहत पृथक विधेयक लाना चाहिए था? राजभवन से सवालों की सूची में यह भी शामिल है कि क्या यह 76 फीसदी आरक्षण लागू करने के निर्णय से पहले प्रशासन की दक्षता का ध्यान रखा गया है? क्या इस संबंध में कोई सर्वेक्षण किया गया है?

उधर 76 प्रतिशत आरक्षण का बचाव करते हुए मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने राज्यपाल पर हमला किया। उन्होंने विधेयक को मंजूरी में देरी पर सवाल उठाते हुए कहा कि राजभवन के अधिकारी भाजपा के हाथों की कठपुतली बन गए हैं। उन्होंने छत्तीसगढ़ लोक सेवा (अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और अन्य पिछड़ा वर्गों के लिए आरक्षण) संशोधन विधेयक- 2022 और छत्तीसगढ़ शैक्षणिक संस्थान (प्रवेश में आरक्षण) संशोधन विधेयक- 2022 को राज्य विधान सभा से पारित किए जाने का उल्लेख करते हुए कहा कि विधेयकों के संबंध में राज्यपाल विभागों से राय ले रही हैं। बड़ा सवाल यह है कि क्या कोई विभाग विधानसभा से भी बड़ा हो गया है? उन्होंने आरोप लगाते हुए कहा कि राज्यपाल के विधिक सलाहकार उन्हें गलत सलाह दे रहे हैं। राज्यपाल शायद यह भूल गई हैं कि आरक्षण कोई एक वर्ग का नहीं होता है। 

मुख्यमंत्री ने राज्यपाल को याद दिलाया कि विधानसभा से कोई विधेयक पारित होने के बाद विभागों से जानकारी नहीं ली जाती है। उन्होंने कहा कि जो सवाल राजभवन द्वारा विभागों से किए जा रहे हैं, वे राज्यपाल के अधिकार क्षेत्र से बाहर हैं। लेकिन, अगर राज्यपाल जिद पर अड़ी हैं तो हम उसका जवाब भी भेज देंगे। मुख्यमंत्री ने कहा कि प्रदेश के युवाओं के हित में इस विधेयक का लागू होना जरूरी है।

उधर इस विधेयक का अनुसूचित जाति के कई संगठनों ने भी विरोध करना प्रारंभ कर दिया है। उनका आरोप है कि अन्य पिछड़ा वर्ग से आने वाले भूपेश बघेल ने अपने समुदाय को लाभ पहुंचाने के लिए अनुसूचित जनजाति का आरक्षण 16 से घटाकर 13 कर दिया है। वहीं कई अन्य संगठनों ने ईडब्ल्यूएस आरक्षण को चार प्रतिशत तक सीमित रखे जाने में यह कहकर आपत्ति जतलाई है कि केन्द्र ने इसके लिए दस प्रतिशत आरक्षण तय किया है। उधर ओबीसी महासभा समेत कई अन्य संगठन ओबीसी के लिए 42 प्रतिशत आरक्षण की मांग को लेकर अड़े हुए हैं। इनमें से कई ने अपनी बात सीधे राजभवन तक आवेदनों के माध्यम से पहुंचाई हैं तो कई ने राज्य सरकार को अपनी मांगों के बाबत पत्र लिखे हैं। 

(संपादन : नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

मनीष भट्ट मनु

घुमक्कड़ पत्रकार के रूप में भोपाल निवासी मनीष भट्ट मनु हिंदी दैनिक ‘देशबंधु’ से लंबे समय तक संबद्ध रहे हैं। आदिवासी विषयों पर इनके आलेख व रपटें विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से प्रकाशित होते रहे हैं।

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