h n

दलित-बहुजनों में बौद्ध धर्म के प्रति बढ़ रहे आकर्षण की वजह

हाल के वर्षों में बौद्ध धर्म के प्रति दलित-बहुजनों का आकर्षण बढ़ा है। यह तब है जबकि देश में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में आरएसएस की सरकार राज कर रही है। बता रहे हैं बापू राउत

बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर ने पिछड़े वर्ग को संबोधित करते हुए कहा था कि धर्म आपका प्रिय विषय है, इसलिए आप हिंदू धर्मावलंबियों से धार्मिक और सामाजिक अधिकार मांगते हैं। लेकिन वे आपको वह अधिकार देने के लिए तैयार नहीं हैं। इसका मतलब यह है कि आप धर्म से हिंदू नहीं हैं। आप जिस हिंदू धर्म के हैं, उसी के लोग आपसे नफरत करते हैं। वे आपको शत्रु मानते हैं। ऐसे में आपको अपने लिए कोई नया रास्ता तलाशना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा था कि हिंदुओं के पैर पकड़कर और बिना कारण भीख मांगकर अपनी मानवता की प्रतिष्ठा को कम मत करो। उन धर्मों पर विचार करो, जो आपके सामाजिक सुधार और उत्थान पर ध्यान केंद्रित करते हैं। 

डॉ. आंबेडकर के धर्मांतरण के 66 साल बाद भी हिंदू धर्म, उसकी संस्कृति और धार्मिक लोगों के स्वभाव में कोई बदलाव नहीं आया है। आए दिन कहीं न कहीं दिल दहला देनेवाली घटनाएं हो रही हैं। इससे पिछड़े वर्ग के समाज में बेचैनी के कारण हिंदू धर्म छोड़कर अन्य धर्मों में जानेवालों की संख्या में लगातार वृद्धि हो रही है। मानवता में रुचि रखनेवाले कई प्रसिद्ध लोगों ने भी बौद्ध धर्म की दीक्षा ली है।

बौद्ध धर्मांतरण की अहम घटनाएं

भारत का पहला बड़ा बौद्ध धर्मांतरण 14 अक्टूबर, 1956 को नागपुर में हुआ। लगभग 5 लाख लोगों ने डॉ. आंबेडकर के साथ हिंदू धर्म का परित्याग कर बौद्ध धर्म स्वीकार किया था। हिंदू धर्म में अपने बुरे अनुभव के कारण डॉ. आंबेडकर ने 1935 में ही घोषणा कर दी थी कि “मैं एक हिंदू के रूप में पैदा हुआ हूं, लेकिन मैं एक हिंदू के रूप में नहीं मरूंगा।” 

आज पूरे देश में कई जगहों पर बौद्ध धर्म अपनाने वालों की संख्या बढ़ी है। ये धर्मांतरण बिना छुपाये, सरकारी दफ्तरों में दर्ज कराकर किये जा रहे हैं। इसमें पैसे की लालच और जबरदस्ती नहीं दिखती, बल्कि इस धर्मांतरण में सहजता और मानसिक गुलामी से मुक्ति का आनंद देखा जा सकता है। 

बढ़ने लगा है बौद्ध धर्म के प्रति दलित-बहुजनों का आकर्षण

पूर्व सांसद उदित राज ने वर्ष 2001 में 10 हजार लोगों के साथ दिल्ली में बौद्ध धर्म अपना लिया था। गुजरात के उना में 2016 में 300 दलितों ने बौद्ध धर्म की दीक्षा ली थी। गोरक्षकों द्वारा की गई हत्याओं के विरोध में यह धर्म परिवर्तन किया गया था। वर्ष 2017 में उत्तर प्रदेश के सहारनपुर में 180 दलित-बहुजनों व और 2018 में बहराइच की पूर्व सांसद सावित्रीबाई फुले ने कानपुर में दस हजार लोगों के साथ बौद्ध धर्म अपनाया। 

बौद्ध धर्म के प्रति आकर्षण 2021-22 में भी देखी गयी। राजस्थान के बांरा में करीब ढाई सौ लोगों ने, भूलोन में एक परिवार के 12 सदस्यों और भरतपुर जिले में सामूहिक विवाह मेले में 11 नवविवाहित जोड़ों ने बौद्ध धर्म अपनाया। वहीं 17 अक्टूबर, 2022 को कर्नाटक के शोरापुर में साढ़े चार सौ लोगों ने यह कहते हुए बौद्ध धर्म अपना लिया कि उन्हें हिंदू धर्म में अपमान और उपहास के अलावा कुछ नहीं मिला। 

ऐसे ही उत्तराखंड के काशीपुर में करीब तीन सौ और उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में हजारों की संख्या में दलित-बहुजनों ने डॉ. आंबेडकर की दी हुई 22 प्रतिज्ञाओं को पढ़कर बौद्ध धम्म की दीक्षा ली। बीते साल ही गुजरात राज्य के अहमदाबाद, दानलीपाड़ा, कलोल और सुरेंद्रनगर में 396 लोगों ने बौद्ध धम्म अपनाया। 

वहीं, पिछले वर्ष दीक्षाभूमि नागपुर में 200 दलित-बहुजनों ने धर्मांतरण किया। इनमें 90 गुजरात और 40 कर्नाटक के निवासी थे। वहीं औरंगाबाद (महाराष्ट्र) में हुए धर्मंदीक्षा में 407 दलित-बहुजनों ने दीक्षा ली। ऐसे ही आयोजन राजनांदगांव जिले, छत्तीसगढ़, में भी किये गये। 

सबसे ज्यादा चर्चा दिल्ली में आम आदमी पार्टी सरकार के मंत्री राजेंद्र पाल की हुई, जिन्हों ने 14 अक्टूबर 2022 को हजारों लोगों के साथ बौद्धधर्म दीक्षा समारोह में डॉ. आंबेडकर द्वारा दी गई 22 प्रतिज्ञाओं को दुहराया। इसपर भाजपा के लोगों ने हंगामा खड़ा किया और अरविंद केजरीवाल द्वारा उन्हें इस्तीफा देने के लिए मजबूर कर दिया।

धर्मांतरण के कारण

सवाल है कि धर्मांतरण की घटनाओं में इतनी तेजी क्यों आयी है? जाहिर तौर पर इसकी एक वजह यही है कि आज भी जबकि देश का शासक वर्ग आजादी का अमृत महोत्सव मना रहा है, दलित और पिछड़े भेदभाव व जाति आधारित हिंसा के शिकार हैं। 

मसलन, बहुत अधिक दिन नहीं हुए जब दलितों को कर्नाटक के शोरापुर (अमलिहला गांव) में एक स्थानीय मंदिर में प्रवेश से वंचित कर दिया गया। वहीं कोलार जिले में एक मंदिर में देवी की प्रतिमा को छूने पर एक व्यक्ति पर 60 हजार रुपए का जुर्माना लगाया गया। वहीं चामराजनगर जिले के हेगगोत्रा ​​गांव में 18 नवंबर, 2022 को एक दलित महिला ने पानी पीने के लिए पानी की टंकी को छुआ, तब उसे गाली देकर टैंक को गोमूत्र से साफ किया गया। 

राजस्थान के एक दलित युवक जितेंद्रपाल मेघवाल की मूंछे रखने और सोशल मीडिया पर पोस्ट करने के कारण हत्या कर दी गई। जालौर के एक स्कूल में मटके का पानी पीने को लेकर टीचर की पिटाई से इंद्र मेघवाल की मौत हो गई। एक आईपीएस पुलिस अधिकारी को शादी में घोड़े की सवारी करने पर इसलिए आपत्ति की गई की, क्योंकि वह दलित था। 

मध्य प्रदेश के भिंड (दबोहा) में दिलीप शर्मा नाम के व्यक्ति के साथ विवाद करने से पंचायत ने डेढ़ लाख रुपए देने का जुर्माना लगाकर दो दलित भाइयों के बाल काट कर उन्हें गांव में घुमाया गया।

उत्तर प्रदेश के बरेली जिले में दसवीं कक्षा में पढ़ने वाली एक ऊंची जाति की छात्रा से बात करने पर एक दलित लड़के के गले में जूतों का हार डालकर गांव में घुमाया गया। 

मध्य प्रदेश के दस जिलों में चाइल्ड राइट ऑब्जर्वेटरी और मध्य प्रदेश दलित अभियान संघ द्वारा किए गए एक सर्वेक्षण के अनुसार, 92 प्रतिशत दलित बच्चों को स्कूल में पानी पीने की अनुमति नहीं है। 80 फीसदी गांवों के लोगों को मंदिर में प्रवेश की इजाजत नहीं है। गांव में बच्चों का अच्छा नाम रखने पर परिवार को पीटा जाता है। बीते साल तमिलनाडु से खबरें आयीं कि दलित सरपंच को झंडा फहराने की इजाजत नहीं मिली।

दलित-बहुजन सोचने लगे हैं अपना नफा-नुकसान

बहरहाल अब दलित-बहुजन यह समझने लगे हैं कि धार्मिक परंपराओं के माध्यम से हमेशा अपमानित करने और मानव अधिकारों हनन करनेवालों की संस्कृति से छुटकारा पाने के लिए, धर्मांतरण ही एकमात्र रास्ता है। ऐसे लोगों को अपनी सोच द्वारा कौन सा धर्म अच्छा एवं बुरा है, इसका मूल्यांकन करने पर नये धर्म को अपनाने की स्वतंत्रता होनी चाहिए। यदि कोई आदमी, अपने वर्तमान धर्म में अपमान की स्थिति में नहीं रहना चाहता, और वह दूसरे धर्म में प्रवेश कर गया है, तो बाहरी हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए। 

(संपादन : नवल/अनिल)


फारवर्ड प्रेस वेब पोर्टल के अतिरिक्‍त बहुजन मुद्दों की पुस्‍तकों का प्रकाशक भी है। एफपी बुक्‍स के नाम से जारी होने वाली ये किताबें बहुजन (दलित, ओबीसी, आदिवासी, घुमंतु, पसमांदा समुदाय) तबकों के साहित्‍य, सस्‍क‍ृति व सामाजिक-राजनीति की व्‍यापक समस्‍याओं के साथ-साथ इसके सूक्ष्म पहलुओं को भी गहराई से उजागर करती हैं। एफपी बुक्‍स की सूची जानने अथवा किताबें मंगवाने के लिए संपर्क करें। मोबाइल : +917827427311, ईमेल : info@forwardmagazine.in

लेखक के बारे में

बापू राउत

ब्लॉगर, लेखक तथा बहुजन विचारक बापू राउत विभिन्न मराठी व हिन्दी पत्र-पत्रिकाओं में नियमित लिखते रहे हैं। बहुजन नायक कांशीराम, बहुजन मारेकरी (बहुजन हन्ता) और परिवर्तनाच्या वाटा (परिवर्तन के रास्ते) आदि उनकी प्रमुख मराठी पुस्तकें हैं।

संबंधित आलेख

दलित-बहुजनों को अपमानित करनेवाली किताबों को जलाने या न जलाने का प्रश्न
सवाल उठता है कि यदि ‘रामचरितमानस’ और ‘मनुस्मृति’ नहीं जलाई जानी चाहिए, तो रावण का पुतला जलाना भी बंद होना चाहिए, होलिका दहन भी...
ताकतवर हाथियों के बीच चीटियों की दास्तान
सुजाता गिडला की यह किताब रेखांकित किये जाने के योग्य है। सत्यम और मंजुला के जीवन-वृत्त को पढ़ कर हम यह पाते हैं कि...
बहस-तलब : बाबाओं को क्यों बचाना चाहती है भारतीय मीडिया?
यह तो अब आम बात है कि बाबाओं की बड़ी फौज देश मे हर प्रदेश में खड़ी हो गई है। अब उनके पास न...
‘रामचरितमानस’ और जातिगत जनगणना के परिप्रेक्ष्य में बौद्धिक और सियासी कूपमंडूकता
जिस तरह की प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं, उससे हिंदी क्षेत्र की राजनीति और विमर्शों की संकीर्ण दुनियाओं का अंदाजा लगाया जा सकता है।...
दलित-बहुजन यायावर की भूटान यात्रा (दूसरा भाग)
लखांग (मठ) की स्थापना सारी वर्जनाओं को तोड़ने वाले दिव्य पागल पुरुष लामा ड्रुकपा किनले को समर्पित है। यहां विदेशी पर्यटकों के अलावा मुख्यतः...