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तुलसीदास ने राम से मुगलों को दंडित करने की मांग क्यों नहीं की?

तुलसीदास ने जिन लोगों को नीचा दिखाया है, वे देश की समृद्धि के निर्माता है और उनका अपमान देश का अपमान है। संघ और भाजपा से जुड़ा कोई भी शूद्र, दलित या आदिवासी नेता इस तरह की भाषा का बचाव नहीं कर सकता। आखिर उनका भी तो कोई आत्मसम्मान है। बता रहे हैं प्रो. कांचा आयलैया शेपर्ड

‘रामचरितमानस’ में तुलसीदास द्वारा दलितों, शूद्रों और महिलाओं के बारे में अपमानजनक भाषा के प्रयोग ने उत्तर भारत में एक बड़ा विवाद छेड़ दिया है। इसका कुछ असर दक्षिण में भी देखा जा रहा है, जहां शूद्रों की मज़बूत गोलबंदी का पुराना इतिहास है। 

तुलसीदास ने इन वर्गों की तुलना ढोल और पशुओं से की, जिन्हें अनवरत पीटना होता है। चूंकि शूद्र, दलित और महिलाएं अब जागृत हो रहे हैं और वे इस तरह के लेखन को स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं। वे नहीं चाहते कि उनकी संतानें स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में उन्हें अपमानित करने वाली इस तरह की पुस्तकें पढ़ें। हम सबको यह पता है कि आरएसएस-भाजपा ऐसी ही कृतियों को हमारे शैक्षणिक संस्थानों पर थोपना चाहते हैं। 

नवचेतना से लैस शूद्र ऐसे किताबों की खिलाफत कर रहे हैं। दक्षिण भारत में क्षेत्रीय भाषाओं में इस विषय पर लेख और टिप्पणियां प्रकाशित हो रही हैं। यह विवाद जल्द थमने वाला नहीं हैं क्योंकि तुलसीदास के भक्तगण यह कहने तक को तैयार नहीं हैं कि ये हिस्से अंतर्वेशन हैं और मूल लेखक के कथ्य नहीं है, जैसा कि वे प्राचीन संस्कृत ग्रंथों में जातियों और संस्कृतियों के प्रति अपमानजनक अंशों के बारे में कहते रहे हैं। वे पहले से ही यह कहते आ रहे हैं कि हमारे मुस्लिम और औपनिवेशिक शासकों और लेखकों ने राजनैतिक सत्ता पर अपनी पकड़ बनाने के लिए और देश का शोषण करने के लिए हिंदुओं को जाति के आधार पर बांटा। 

इस तरह की बातें आरएसएस-समर्थक द्विज लेखकों और वक्ताओं ने तब की थीं जब शूद्र और दलित लेखकों की संख्या न के बराबर थी। तुलसीदास का बचाव करने वाले और उनकी पुस्तक को आध्यात्मिक ग्रंथ बताने वाले या तो आरएसएस-भाजपा के द्विज नेता हैं या ब्राह्मण साधु-संन्यासी। संघ-भाजपा का कोई शूद्र या दलित नेता भी अन्न उत्पादकों, चरवाहों, कुम्हारों, चमड़े का काम करने वालों, नाईयों, जुलाहों इत्यादि के ऐसे तिरस्कार का बचाव नहीं कर सकता। तुलसीदास ने जिन लोगों को नीचा दिखाया है, वे देश की समृद्धि के निर्माता है और उनका अपमान देश का अपमान है। संघ और भाजपा से जुड़ा कोई भी शूद्र, दलित या आदिवासी नेता इस तरह की भाषा का बचाव नहीं कर सकता। आखिर उनका भी तो कोई आत्मसम्मान है।

तुलसीदास और प्रो. कांचा आयलैया शेपर्ड

जिस काल में तुलसीदास ने यह पुस्तक लिखी थी, उस समय देश पर अकबर और उसके बेटे जहांगीर का शासन था। इंटरनेट पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार यह पुस्तक 16वीं सदी के अंत में लिखी गई थी। अतः हम कह सकते हैं कि इसे अकबर के शासनकाल में लिखा गया था। अकबर की मृत्यु गद्दीनशीन रहते हुए 1605 में हुई थी। तुलसीदास की मृत्यु 1623 में हुई। यह वह काल था जब शूद्र और दलित, भूमि के विशाल टुकड़ों को कृषि के अंतर्गत लाने के लिए प्रकृति से संघर्षरत थे। जंगलों को काट कर कृषि का विस्तार करने की ज़िम्मेदारी शूद्रों और दलितों के कंधों पर थी। द्विज, और विशेषकर ब्राह्मण (जिस समुदाय से तुलसीदास थे) तो कृषि कार्य को सम्मान के योग्य मानते ही नहीं थे। वे खेती को क्षुद्र कार्य मानते थे। उसी समय तुलसीदास ने लिखा था– “ढोल, गंवार सूद्र पसु नारी, सकल ताड़ना के अधिकारी

सवाल है कि ताड़ना देने वाले कौन थे? क्या वे तुलसीदास के भगवान राम थे? या वे मुग़ल शासक थे जो शूद्र किसानों पर लगान का बोझ लादते जा रहे थे? कृषक समुदाय भले ही भुखमरी की कगार पर था, लेकिन द्विजों को अकबर के राज में कोई तकलीफ नहीं थी।

तुलसीदास को पता था कि अकबर के शासनकाल में राजकाज बीरबल और टोडरमल चलाते थे। बीरबल सारस्वत ब्राह्मण थे और बादशाह के सलाहकार के अलावा, मुख्य सेनापति भी थे। वे बादशाह के बहुत नज़दीक थे और उन प्रमुख दरबारियों में से एक थे, जिन्हें नवरत्न कहा जाता था। 

टोडरमल कायस्थ थे और अकबर के शासनकाल में मुग़ल साम्राज्य के मुशरिफ-ए-दीवान (वित्त मंत्री) हुआ करते थे। वे वकील-अस-सल्तनत (साम्राज्य के सलाहकार) और संयुक्त वजीर भी थे। वे मुग़ल साम्राज्य के प्रमुख सिपहसालारों में से थे और 4000 के मनसबदार थे। वे भी नवरत्नों में शामिल थे। टोडरमल के अधीन 15 सूबों के दीवान थे। टोडरमल ने निश्चित रूप से ब्राह्मणों, राजपूतों और कायस्थों को वजीर और दीवान के पदों पर नियुक्त किया होगा।  

इस मध्यकालीन मुस्लिम-द्विज राज्य में शूद्रों, दलितों और आदिवासियों का भरपूर दमन होता होगा। शासन द्वारा किसानों से कमरतोड़ लगान और अन्य कर वसूले जाते थे। मुग़ल इतिहास के जाने-माने अध्येता इरफ़ान हबीब भी हमें नहीं बताते कि मुसलमानों और द्विजों के इस संयुक्त उपक्रम, इस ‘डीप स्टेट’ (ऐसा राज्य जहां वैध सत्ताधारियों से इतर ताकतों का बोलबाला होता है), में शूद्रों, दलितों और आदिवासियों की क्या स्थिति थी। जब बात जातिगत सांस्कृतिक अथवा आर्थिक रिश्तों की पड़ताल की हो तो मार्क्सवाद, इरफ़ान हबीब की आंखों पर पट्टी बांध देता है। 

तुलसीदास ने अकबर के साम्राज्य में व्याप्त इसी सामाजिक-राजनैतिक-धार्मिक फिज़ा में अपनी घोर जातिवादी रचना रची थी। 

अगर ब्राह्मण मुसलमानों और उनके शासन के खिलाफ थे तो तुलसीदास को राम से मुस्लिम शासकों या सभी मुसलमानों को दंडित करनी की प्रार्थना करनी चाहिए थी। लेकिन उनके संपूर्ण वांग्मय में मुस्लिम शासकों या अकबर के खिलाफ एक शब्द नहीं है। लेकिन वे अपने भगवान राम से शूद्रों और दलितों के अलावा, सभी जातियों की महिलाओं, जिनमें ब्राह्मण महिलाएं भी शामिल थीं, को ताड़ना देने का अनुरोध अवश्य करते हैं। संघ-भाजपा के नेतृत्व के लिए बहुसंख्यक समाज का अपमान करने वाली यह पुस्तक ‘पवित्र ग्रंथ’ है और इसके लेखक ‘महान संत’ हैं। क्या यह विस्मयकारी नहीं है? क्या उन्हें लगता है कि शूद्र और दलित अब भी पूर्व जन्म के कर्म के सिद्धांत में आस्था रखते हैं? 

शूद्रों और चांडालों को हमारे संविधान में क्रमशः अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) और अनुसचित जातियां (एससी) कहा गया है। तुलसीदास के लेखन में शूद्र आदि जैसे शब्दों का प्रयोग केवल इन वर्गों की पहचान करने या उनके कार्यों का निर्धारण करने के उद्देश्य से नहीं किया गया था, बल्कि अन्य संस्कृत ग्रंथों की तरह, इस वर्गों में दासत्व का स्थायी भाव विकसित करने के लिए किया गया था। और इस तरह की शब्दावली और भाषा का उपयोग करने वाले तुलसीदास न तो पहले व्यक्ति थे और ना ही अंतिम। ब्राह्मणों और क्षत्रियों की मानसिकता आगे भी यही बनी रही। योगी आदित्यनाथ ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के आधिकारिक निवास में प्रवेश करने के पहले गाय के दूध और गौमूत्र से उसका शुद्धिकरण करवाया। क्यों? इसलिए क्योंकि इसके पहले वहां एक शूद्र – अखिलेश यादव – रहता था। यह उसी जातिगत अहंकार की अभिव्यक्ति है, जिसके खिलाफ हमें लड़ना है। 

तुलसीदास का बचाव, संघ-भाजपा की सौ साल पुरानी उस सांस्कृतिक विरासत का भाग है, जो शूद्रों, दलितों और महिलाओं को नीची निगाहों से देखती है। भगवा ब्रिगेड के शीर्ष नेता सार्वजनिक मंचों से कुछ बोलते हैं और नागपुर में अपनों के बीच कुछ और। सार्वजनिक मंचों से शूद्रों और दलितों को बताया जाता है कि हम सब हिंदू हैं और एक हैं तथा हमारे दुश्मन हैं मुसलमान और ईसाई। लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि आज भी भाजपा का मुखिया एक ब्राह्मण है। देश के अधिकांश बुद्धिजीवी भी ब्राह्मण हैं, फिर चाहे वे स्वयं को वामपंथी बताते हों, उदारवादी कहते हैं या कुछ और। वे देश में ‘रामचरितमानस’ पर चल रही बहस का दर्शक दीर्घा से अवलोकन कर रहे हैं। वे चुप हैं। मंडल मुद्दे पर 1990 के दशक में चली बहस के दौरान भी उनके होंठ सिले हुए थे।

यह दिलचस्प है कि ब्राह्मण लेखकों ने मुस्लिम शासकों के शासनकाल में उनके खिलाफ कुछ नहीं लिखा। उन्होंने मुसलमानों को अभारतीय बताना तब शुरू किया जब देश में अंग्रेजों का राज स्थापित हो गया। सावरकर या बंकिमचंद्र का मुस्लिम-विरोधी लेखन ब्रिटिश काल का है – विशेषकर 1857 के सिपाही विद्रोह के बाद के काल का। लेकिन शूद्रों और दलितों के खिलाफ वे लगातार लिखते रहे। 

मंडल आंदोलन के दौरान, ‘योग्यता को सम्मान’ के नाम पर शूद्रों के खिलाफ विपुल लेखन हुआ, लेकिन शूद्रों ने कभी इसका संयुक्त विरोध नहीं किया, क्योंकि वे जातियों में बंटे हुए थे। मंडल आंदोलन के बाद भी वे बंटे हुए हैं। एक श्रेणी उन शूद्रों की है, जिन्हें आरक्षण का लाभ मिल रहा है और दूसरी उनकी जिन्हें नहीं मिल रहा है। कुछ शूद्र जातियों को उम्मीद थी की उन्हें क्षत्रिय के रूप में पदोन्नत कर दिया जायेगा। उत्तर प्रदेश में जाटों ने इस दिशा में भरपूर प्रयास भी किया, लेकिन योगी आदित्यनाथ ने उन्हें उनकी जगह दिखा दी। तीन नए कृषि कानूनों को लागू करने के प्रयासों से जाटों को समझ में आ गया कि दिल्ली में उनके खिलाफ एक ‘डीप स्टेट’ काम कर रहा है। 

मुसलमान एक वैश्विक समुदाय है। दुनिया के करीब 56 देशों में मुसलमान रहते हैं और उनकी साझा सांस्कृतिक पहचान और राजनैतिक सत्ता है। आरएसएस भारतीय और पाकिस्तानी मुसलमानों के खिलाफ अभियान भले ही चला रहा हो, लेकिन उसे पता है कि अगर यह लंबे समय तक चलेगा तो हिंदुत्व और संघ-भाजपा के खिलाफ पूरी दुनिया गोलबंद हो जाएगी। बीबीसी द्वारा हाल ही में प्रदर्शित डाक्यूमेंट्री इसका उदाहरण है। लेकिन दलितों, आदिवासियों और शूद्रों के दमन और यहां तक कि उनके खिलाफ हिंसा को भी बाहरी दुनिया हिंदू समुदाय के आतंरिक मसले के रूप में देखेगी।  

वैसे भी, तुलसीदास जैसे लेखकों के द्वारा उनके खिलाफ चलाये गए अभियानों के चलते शूद्र, दलित और आदिवासी अन्यों से पीछे छूट गए हैं और आज भी वे शिक्षा, रोज़गार और संगठन के मामलों में पिछड़े ही हैं। 

ऐसा भी नहीं है कि कांग्रेस और अन्य पार्टियों के द्विजों का शूद्रों, आदिवासियों और दलितों से जुड़े सांस्कृतिक शैक्षणिक मसलों पर कोई अलग दृष्टिकोण है। अगर प्राचीन और मध्यकालीन ब्राह्मणवादी ग्रंथों, जिनमें तुलसीदार का लेखन भी शामिल है, के सम्मान में कमी आती है और जातिगत सांस्कृतिक असमानताएं और दमन समाप्त होता है तो इससे भारतीय समाज और राज्य पर द्विजों की पकड़ कमज़ोर होगी। यही कारण है कि इस मसले पर सभी द्विज बुद्धिजीवी चुप हैं।  

लेकिन शूद्र, दलित और आदिवासी अब इस तरह की किताबों और तर्कों को सहने के लिए तैयार नहीं हैं। वे अपने अपमान और शोषण के विरुद्ध अंतिम सांस तक लड़ने को तत्पर हैं। 

(मूल अंग्रेजी से अनुवाद : अमरीश हरदेनिया, संपादन : नवल/अनिल)  


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लेखक के बारे में

कांचा आइलैय्या शेपर्ड

राजनैतिक सिद्धांतकार, लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता कांचा आइलैया शेपर्ड, हैदराबाद के उस्मानिया विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान के प्राध्यापक और मौलाना आजाद राष्ट्रीय उर्दू विश्वविद्यालय, हैदराबाद के सामाजिक बहिष्कार एवं स्वीकार्य नीतियां अध्ययन केंद्र के निदेशक रहे हैं। वे ‘व्हाई आई एम नॉट ए हिन्दू’, ‘बफैलो नेशनलिज्म’ और ‘पोस्ट-हिन्दू इंडिया’ शीर्षक पुस्तकों के लेखक हैं।

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