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किनका भला कर रही हैं जाति महापंचायतें?

जाति महापंचायत के मंचों से जो भाषण होते हैं, उनमें अपना ‘वर्चस्व’ कायम करने की उद्घोषणाओं के अतिरिक्त सामाजिक न्याय, जाति में व्याप्त कुरीतियों और समकालीन जन-समस्याओं पर न के बराबर चर्चा की जाती है। बता रहे हैं संदीप मील

राजस्थान में ‘जाति महापंचायतों’ का सिलसिला राजपूत जाति की महापंचायत से शुरू हुआ था, जो अब जाटों, ब्राह्मणों से होते हुए अधिकांश जातियों की महापंचायतों तक पहुंचती दिख रही है। इनका तात्कालिक लक्ष्य चुनावों में अपनी जाति की राजनीतिक भागीदारी बढ़ाना बताया जा रहा है। फिलहाल यह विधानसभाओं और लोकसभाओं में अपनी जाति के ज्यादा से ज्यादा लोगों को टिकट मिले, इसके लिए गोलबंदी के जरिए दबाव की सियासत है। लेकिन यह तय है कि ये जाति आधारित पंचायतें भविष्य में उत्तर भारत की राजनीति में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन करेंगीं। इनका स्वरूप और प्रक्रिया करीब एक जैसे ही हैं, जो जातियों के पुनरुत्थान का संकेत देती हैं। मसलन, ये अपने प्रचार में ‘जाति’ को ‘समाज’ के नाम से संबोधित करती हैं जैसे कि राजपूत समाज, जाट समाज, ब्राह्मण समाज आदि। 

इसका मतलब हुआ कि जाति के आधुनिकता और लोकतंत्र के संपर्क में आने के कारण लोगों का दायरा जाति के बाहर जाकर सोचने तक विस्तृत हुआ था, उसे फिर से संकीर्ण करना है।

इन महापंचायतों का मॉडल दक्षिणपंथी प्रतिमानों के नज़दीक दिखाई देता है, जिसका संकेत राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) कई बार दे चुका है, क्योंकि जाति की संकीर्णताओं के बिना उसके धार्मिक राष्ट्रवाद का मॉडल सफल नहीं हो सकता। इसका पहला कारण तो यह है कि धार्मिक उन्माद का वे अधिकतम दोहन कर चुके हैं, अब इससे वे सिर्फ मुद्दों को भटकाने या एक क्षेत्र विशेष में धार्मिक भावनाओं के आधार पर राजनीतिक लाभ ले सकते हैं। लेकिन व्यापक स्तर पर यह सूत्र उन्हें सफल होता नहीं दिखाई दे रहा है। इसलिए ‘हिंदुत्व’ की नई व्याख्या में जातियों की जकड़न को मज़बूत करना शामिल हो गया है। इससे एक तरफ जाति उन्मूलन की प्रक्रिया में रुकावट आएगी, वहीं दूसरी तरफ हर जाति के साथ कुछ पहचानों और प्रतीकों को मज़बूत कर दिया जाएगा। जैसे हर जाति के लोक देवताओं का संस्थानीकरण किया जा रहा है। उनके भव्य मंदिर बनाये जा रहे हैं। खूब चंदा एकत्रित किया जा रहा है। इस पैसे से न तो उस जाति के गरीब लोगों को शिक्षा व स्वास्थ्य उपलब्ध कराने में कोई मदद मिल रही है और ना ही समाज सुधार के आंदोलनों को। यह पुरोहितवादी व्यवस्था को नए आयामों में स्थापित करने का प्रयास है, ताकि ‘लोक’ के पूरे ढांचे को दक्षिणा की व्यवस्थित आर्थिक संरचना का हिस्सा बना दिया जाय और जिसके परिणामस्वरूप पुरोहितवाद को किसी वैकल्पिक संरचना से चुनौती न हो। 

राजस्थान में जाति आधारित पंचायतों के आयोजनों में हो रही है वृद्धि

राजस्थान में जब ये महापंचायतें हो रही हैं तो इसके पीछे के सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य को समझना जरूरी है। उत्तरी-पश्चिमी भारत हमेशा से सांप्रदायिक ताकतों के लिए एक चुनौती रहा है, क्योंकि विभाजन की भयावह त्रासदी देखने के बाद इस इलाके ने सांप्रदायिकता से एक दूरी बनाने की कोशिश की, जिसके कारण समाज में साझी जरूरतें विकसित होने लगीं और यह लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा बनना शुरू हुआ। लेकिन अभी तक यह समाज सामंती ढांचे के अंतर्विरोधों से जूझ रहा था, जिसे कुछ आंदोलनों के इलाकों में चुनौती मिली। 

करीब तीन साल पहले तीन कृषि कानूनों के विरोध में हुए ऐतिहासिक किसान आंदोलन ने प्रत्यक्ष रूप से जाति को एक जमात या वर्ग के रूप में बदलने की सफल कोशिश की। उत्तर भारत के खेतिहर समाज के लोगों को कोई एक पहचान व्यापक रूप से संगठित नहीं कर पा रही थी। इस आंदोलन ने ‘किसान’ पहचान को इतना व्यापक बनाया कि आसानी से मध्यम वर्ग भी उसका समर्थन करने लगा। 

दूसरी तरफ ऐसे दौर में जाति महापंचायतें हो रही हैं तो इससे किसान आंदोलन की व्यापक जन-गोलबंदी को तोड़कर फिर से जातियों की चेतना स्थापित करना है। वर्गीय रूपांतरण की प्रक्रिया को जड़ संरचना अधिक तेजी से बिखेरती है।  

संघ द्वारा जाति महापंचायतों के इस मॉडल को फैलाने के पीछे दूसरा कारण है कि इसके जरिए सामाजिक न्याय की प्रक्रिया को भटकाने की कोशिश करना। जाति की संरचना, जो कि पूरी तरह से अन्याय पर आधारित है, वह न्याय की प्रक्रिया को, सिद्धांत और व्यवहार दोनों स्तरों पर, भटकाती है। ये महापंचायतें उन इलाकों में हो रही हैं, जहां खाप पंचायतें पहले से सक्रिय हैं और उनकी भूमिका अंतरजातीय प्रेम संबंधों और विवाहों की प्रति हिंसक घटनाओं को अंजाम देने के लिए कुख्यात रही हैं। वे खाप पंचायतें किसान आंदोलन जैसे कुछ मौकों पर अपनी ‘प्रगतिशील’ भूमिका निभाने की जरूर कोशिश करती हैं, लेकिन उनकी ऐतिहासिक भूमिका अंततः जाति की जकड़नों को सुदृढ़ करने वाली ही होती हैं। इनका सामाजिक न्याय के सवाल पर कोई स्टैंड नहीं है, सिवाय जातियों के ‘सहअस्तित्वपूर्ण जीवन’ के नारे के, जो कि संघ के ‘हिंदू राष्ट्र’ का आधार है। लेकिन समाज-वैज्ञानिक सत्य यह है कि सामाजिक उत्पीड़न की वर्णवादी व्यवस्था में उत्पीड़ित और उत्पीड़क वर्ण, दोनों कभी भी साथ नहीं रह सकते हैं। इसलिए इस तरह का नारा सिर्फ सांप्रदायिकता को पोषित करता है और सामाजिक यथार्थ को भ्रामक तरीके से पेश किया जाता है।

इस समय आरएसएस न केवल जातियों की राजनीति को अपने दायरे के अंदर लेकर खुद को कुछ जातियों के वर्चस्व से बाहर दिखाने की कोशिश कर रहा है, बल्कि वह एक ऐसा विमर्श शुरू कर चुका है, जिसमें जाति आधारित शोषण जन-विमर्श के दायरे से बाहर हो जाय और जाति-मुक्त समाज का आदर्श कमजोर हो जाय। इस मुहिम में वह एक तरफ जातिगत जनगणना का विरोध करेगा क्योंकि इससे सामाजिक संख्या स्पष्ट हो जाएगी और फिर उस आधार पर ‘भागीदारी’ और संसाधनों के वितरण के प्रश्न मज़बूत होंगे। जबकि जाति महापंचायतों में जातीय गौरव उफान पर होने के बावजूद ये वैचारिक स्तर पर अपनी जातियों को ‘अन्य’ से ‘श्रेष्ठ’ मानते रहेंगे, यही श्रेष्ठता बोध उन्हें ‘सामाजिक अन्यों’ से एकाकार नहीं होने देगा।

इन जाति महापंचायतों के नेतृत्व का विश्लेषण करें तो स्पष्ट है कि नेतृत्व न तो किसी सामाजिक नैसर्गिक प्रक्रिया के द्वारा उभरा है और ना ही लोकतांत्रिक रूप से जाति के लोगों द्वारा चुना हुआ। एक ऐसे विशेष समूह ने स्वयं को जातियों के नेता के रूप में घोषित किया है, जो आर्थिक रूप से बहुत मजबूत हैं और ‘पहचान’ की लालसा में हैं। 

देखा जाय तो ये ‘स्वघोषित’ नेतृत्व इन जातियों के अंदर नैसर्गिक रूप से पैदा हो रहे नेतृत्व को रोकता है जो जाति के दंश से मुक्ति चाहता है। प्राकृतिक नेतृत्व को रोकने का सीधा-सा मतलब है कि उस जाति के आधुनिकीकरण की प्रक्रिया को दिशा विमुख कर देना। ये दक्षिण पंथ के अनुकूल नहीं है, क्योंकि ये जातियों के आंतरिक अंतर्द्वंद्व से पैदा हुआ है। जबकि स्वघोषित नेतृत्व जाति को जड़ता से मुक्त नहीं करने का पक्षधर होता है। इसलिए नेतृत्व के स्तर पर जाति पंचायतें न तो लोकतांत्रिक नेतृत्व को अपना रही हैं और ना ही अपने परंपरागत नेतृत्व को, जो ‘पंचों’ के रूप में पुरुषों को कुछ चुनने और कुछ नियुक्त करने की परंपरा का हिस्सा रहा है।

अब अगर इनके निर्णय-निर्धारण के बारे में चर्चा करें तो स्पष्ट है कि कुछ लोगों का समूह मिलकर महापंचायत के सारे निर्णय ले लेता है, क्योंकि वही समूह इसका पूरा खर्चा वहन करता है, जिसे कि वह अपना ‘इन्वेस्टमेंट’ मानता है। जाति के लोगों की भूमिका तो एक भीड़ के रूप में होती है, जिसे दिखाकर ये ‘स्वघोषित नेतृत्व’ विभिन्न राजनीतिक दलों से सौदेबाजी कर सकें। इन जाति महापंचायतों के निर्णय न तो पूरी जाति का प्रतिनिधित्व करते हैं और ना ही उसे प्रभावित करते हैं। इसलिए जाति के अंदर से इनका कोई विरोध नहीं होता, बल्कि ऐसा समर्थन होता है कि इनसे ‘कोई फ़र्क नहीं’ पड़ने वाला हो। हालांकि कोई इसी तरह का नेतृत्व असहमत होता है तो उसे ‘समायोजित’ कर लिया जाता है।

बहरहाल, इन जाति महापंचायतों का प्रचार पूरी तरह ‘खुला’ होता है, जिसका मतलब है कि कोई भी व्यक्ति, किसी भी नारे के साथ, पोस्टरों में कोई भी तस्वीर लगाकर प्रचार कर सकता है। निर्भर इस पर करता है कि वह कितना धन इस पर ‘निवेश’ करना चाहता है। आश्चर्यजनक यह है कि लगभग सभी जातियों की महापंचायतों के नारे और प्रचार संघ की धारा के अनुकूल होते हैं क्योंकि इनमें समानता, तार्किकता और न्याय की बजाय श्रेष्ठता, मनमाफिक इतिहास की व्याख्या, राजतंत्र और सामंतवाद का समर्थन के साथ धनबल और बाहुबल का प्रदर्शन किया जाता है। जिस समय किसी जाति की महापंचायत होती है उस दौर में प्रदेश की राजधानी पूरी तरह से पोस्टरों से रंग दी जाती है और सोशल मीडिया पर जो बहस होती है उतनी सक्रियता से किसी भी मुद्दे पर बहस नहीं होती। ठीक इसी तरह से जाति महापंचायत के मंचों से जो भाषण होते हैं, उनमें अपना ‘वर्चस्व’ कायम करने की उद्घोषणाओं के अतिरिक्त सामाजिक न्याय, जाति में व्याप्त कुरीतियों और समकालीन जन-समस्याओं पर न के बराबर चर्चा की जाती है। सबसे रेखांकित करने वाली बात तो यह है कि ‘लैंगिक न्याय’ पर इनकी सोच असमानतामूलक होती है।

इसलिए ये जाति महापंचायतें उत्तर भारत में सतत रूप से एक ऐसा तनाव बनाए रखना चाहती हैं, जिसमें जातियों के बीच किसी तरह का संवाद न हो, जाति की सामूहिक चेतना की लगाम ‘स्वघोषित’ नेतृत्व के हाथ में हो, जो किसी भी समय इसका बेजा इस्तेमाल कर सके और सामाजिक भागीदारी की प्रक्रिया को कमज़ोर कर न्याय के प्रश्न को धूमिल करते हुए आरएसएस की यथास्थितिवादी सोच को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से पोषित करना। 

(संपादन : राजन/नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

संदीप मील

संदीप मील चर्चित युवा कहानीकार हैं

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