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मध्य प्रदेश : भाजपा को ‘जाति’ का आसरा

कर्नाटक चुनाव के नतीजों ने राज्य के भाजपा नेतृत्व में घबराहट पैदा कर दी है, क्योंकि इस दक्षिणी राज्य और मध्य प्रदेश में कई समानताएं हैं। दोनों राज्यों में पिछले चुनाव के बाद बनी कांग्रेस सरकारों को दल-बदल करवाकर गिरवाया गया था और उनकी जगह भाजपा सरकारें स्थापित की गईं थीं। बता रहे हैं अमरीश हरदेनिया

 मध्य प्रदेश में सरकारी कार्यालयों और शैक्षणिक संस्थाओं के लिए सार्वजनिक अवकाशों की पहले से ही अत्यंत लंबी सूची में एक और तारीख – 22 मई – जोड़ दी गई है। इस दिन राजपूत सरदार महाराणा प्रताप की जयंती होती है, जिन्होंने मुगल सम्राट अकबर के विरूद्ध एक लंबी व संघर्षपूर्ण लड़ाई लड़ी थी, जिसमें अंततः उनकी हार हुई। 

यह घोषणा मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने राजपूत समाज द्वारा गत 22 मई, 2023 को भोपाल में आयोजित एक भव्य समारोह में की थी। मुख्यमंत्री ने महाराणा प्रताप की प्रशंसा करते हुए उन्हें भारत का ऐसा रत्न बताया, जिसने विदेशी आक्रांताओं को मार भगाया था। 

इसके पहले उन्होंने 23 अप्रैल, 2023 को ब्राह्मणों के श्रद्धेय परशुराम की जयंती पर आयोजित एक ब्राह्मण सम्मेलन में परशुराम जयंती पर सार्वजनिक अवकाश की घोषणा की थी। तब उन्होंने यह भी कहा था कि मंदिरों के पुजारी अब मंदिरों की जमीनें नीलाम कर सकेंगे और यह भी कि सरकार मंदिरों के कामकाज में दखल नहीं देगी। सनद रहे कि अभी तक मंदिरों की जमीन जिला कलेक्टरों की निगरानी में नीलाम की जाती थी। 

खैर, मुख्यमंत्री ने कहा कि परशुराम ने आतंकवादियों के सफाए के लिए फरसा उठाया था!  

पिछले वर्ष सितंबर से लेकर अब तक राज्य में कम-से-कम 6 नए सार्वजनिक अवकाशों की घोषणा हो चुकी है। इसी वर्ष 18 मार्च को मुख्यमंत्री ने अकबर के नवरत्नों में से एक राजा टोडरमल की जयंती पर ऐच्छिक अवकाश की घोषणा की थी, जिन्हें कायस्थ जाति का बताया जाता है। इसके अलावा 15 मार्च को विश्वकर्मा जयंती पर ऐच्छिक अवकाश घोषित किया गया था। विश्वकर्मा उन जातियों के आराध्य हैं जो परंपरागत रूप से बढ़ईगिरी, लोहारी, कांसे और सोने की कारीगरी और राजमिस्त्री का कार्य करते हैं। ये सभी अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) की श्रेणी में आते हैं। 

पिछले वर्ष 28 दिसंबर को शिवराज सिंह चौहान ने घोषणा की थी कि खंगार जाति के कर्मचारी राजा खेत सिंह की जयंती पर अवकाश ले सकते हैं। खंगार भी ओबीसी में आते हैं। चित्रगुप्त के प्रकटोत्सव (21 अप्रैल) पर भी अवकाश घोषित किया गया है। चित्रगुप्त कायस्थों के पूज्य हैं। पिछले वर्ष फरवरी में मुख्यमंत्री ने रविदास जयंती के अवसर पर आयोजित एक कार्यक्रम में अनुसूचित जातियों के लिए कई कल्याणकारी योजनाओं की घोषणा की थी।  

मध्य प्रदेश के इंदौर जिले के जनापाव में 23 अप्रैल, 2023 को परशुराम जयंती पर आयोजित ब्राह्मण सम्मलेन को संबोधित करते राज्य के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान

पिछले एक वर्ष से भी अधिक समय से मुख्यमंत्री लगातार इस या उस जाति के सम्मेलनों में भाग लेते आ रहे हैं। यह साफ है कि सत्ताधारी भाजपा ने ब्राह्मणों से लेकर दलितों तक सभी समुदायों के तुष्टिकरण की यह तरकीब निकाली है। हर समुदाय के किसी जाने-माने या कम प्रसिद्ध या एकदम अनजान नायक को ढूंढ़ा जाता है। फिर संबंधित समुदाय को इन व्यक्तियों की जयंती या पुण्यतिथि के अवसर पर कार्यक्रम करने के लिए तैयार किया जाता है। कार्यक्रम की शोभा बढ़ाने मुख्यमंत्री पधारते हैं, संबंधित नायक की तारीफों के पुल बांधते हैं और उस समुदाय के कल्याण संबंधी घोषणाएं करते हैं। अन्य समुदायों के अतिरिक्त, मुख्यमंत्री जाट और मांझी (मछुआरा) समुदायों द्वारा आयोजित ऐसे ही कार्यक्रमों में शामिल हो चुके हैं।  

जाहिर है कि उनके लिए इस बात का कोई महत्व नहीं है कि धूम-धड़ाके के साथ होने वाले इन आयोजनों में की जाने वाली घोषणाओं पर अमल के लिए सरकार के पास वित्तीय संसाधान है या नहीं।  

इसके अलावा सरकार विभिन्न जातियों के लिए कल्याण मंडलों की स्थापना कर रही है। राज्य में ब्राह्मण कल्याण मंडल, कोरी कल्याण मंडल, रजक कल्याण मंडल, तेलघानी कल्याण मंडल, विश्वकर्मा कल्याण मंडल और सुवर्णकला कल्याण मंडल बनाए जा चुके हैं। मुख्यमंत्री ने घोषणा की है कि सभी (हिंदू) जातियों और उपजातियों के लिए कल्याण बोर्डों की स्थापना की जाएगी। इन मंडलों के अध्यक्षों को मंत्री का दर्जा दिया जाएगा और उन्हें इस दर्जे से जुड़ा वेतन, भत्ते और अन्य सुविधाएं मिलेंगी। आर्थिक संकट से जूझ रही सरकार इन बोर्डों के लिए कार्यालय भवनों, कर्मचारियों, कारों और अन्य साज-सामानों की व्यवस्था कैसे करेगी, यह साफ नहीं है। जहां तक मुख्यमंत्री चौहान की ओबीसी जाति किरार का प्रश्न है, उनकी पत्नी साधना सिंह किरार क्षत्रिय महासभा की अखिल भारतीय अध्यक्ष हैं। इसलिए इस समुदाय को विभिन्न प्रकार के लाभ मिलने में कोई बाधा नहीं आएगी।  

स्पष्टतः भाजपा की नजर आने वाले विधानसभा चुनाव पर है। हालांकि यह अभियान पिछले एक साल से चल रहा है, लेकिन कर्नाटक चुनाव में भाजपा की हार के बाद से इसमें तेजी आई है। यह माना जा सकता है कि जाति सम्मेलनों, कल्याण मंडलों, रेवड़ियों और अवकाशों का यह सिलसिला जारी रहेगा।    

दरअसल, कर्नाटक चुनाव के नतीजों ने राज्य के भाजपा नेतृत्व में घबराहट पैदा कर दी है, क्योकि इस दक्षिणी राज्य और मध्य प्रदेश में कई समानताएं हैं। दोनों राज्यों में पिछले चुनाव के बाद बनी कांग्रेस सरकारों को दल-बदल करवाकर गिरवाया गया था और उनकी जगह भाजपा सरकारें स्थापित की गईं थीं। और दोनों राज्यों में जिन दल-बदलुओं ने विधानसभा से इस्तीफा देने के बाद उपचुनाव लड़े, उनमें से अधिकांश जीत गए, जिसके नतीजे में भाजपा सरकारों को स्थायित्व मिला। 

यद्यपि मुख्यमंत्री ने भोपाल में भाजपा कार्यकर्ताओं के एक सम्मेलन को संबोधित करते हुए इस संभावना को खारिज कर दिया कि मध्य प्रदेश में नवंबर में होने वाले चुनाव कर्नाटक का रीप्ले हो सकते हैं। उन्होंने कहा कि ‘‘कर्नाटक-वर्नाटक से क्या होता है।” लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि कांग्रेस जोश में है और भाजपा दबाव में।  

लेकिन मुसलमानों या ईसाईयों को लुभाना सरकार या सत्ताधारी दल के एजेंडे में नहीं है। मुसलमानों या ईसाईयों का कोई सम्मेलन न तो हुआ है और ना ही प्रस्तावित है। निस्संदेह इसकी वजह यह कि ये समुदाय भाजपा के लिए राजनैतिक अछूत हैं। 

(मूल अंग्रेजी से अनुवाद : अमरीश हरदेनिया, संपादन : राजन/नवल/अनिल)

लेखक के बारे में

अमरीश हरदेनिया

अमरीश हरदेनिया फारवर्ड प्रेस के संपादक (ट्रांसलेशन) हैं। वे 'डेक्कन हेराल्ड', 'डेली ट्रिब्यून', 'डेली न्यूजटाइम' और वीकली 'संडे मेल' के मध्यप्रदेश ब्यूरो चीफ रहे हैं। उन्होंने कई किताबों का अनुवाद किया है जिनमें गुजरात के पूर्व डीजीपी आर बी श्रीकुमार की पुस्तक 'गुजरात बिहाइंड द कर्टेन' भी शामिल है

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