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‘उन्मेष’ में हम आदिवासियों को केवल नाचने के लिए बुलाया गया : ऊषाकिरण आत्राम

जिस आयोजन का उद्घाटन आदिवासी समुदाय से आने वाली महिला राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने किया हो, उस पूरे आयोजन में मणिपुर की हिंसा, बड़े पैमाने पर आदिवासी समुदायों के विस्थापन, देश भर में इस समुदाय पर बढ़ रहे अत्याचार के साथ ही पहाड़ी क्षेत्रों में मानवजनित हादसों पर साहित्यकार चुप क्यों रहे? बता रहे हैं मनीष भट्ट मनु

मध्य प्रदेश में विधानसभा चुनाव की गहमा-गहमी के मध्य राजधानी भोपाल में आयोजित ‘उन्मेष’ नामक अंतर्राष्ट्रीय साहित्य उत्सव अपने पीछे कई सवाल छोड़ गया है। यह सवाल भी उठाया जा रहा है कि गत 3 अगस्त से लेकर 6 अगस्त तक सौ से अधिक भाषाओं, पांच सौ से अधिक साहित्यकारों और आठ सौ से अधिक कलाकारों को भोपाल के रवींद्र भवन के कुछ कक्षों, खुले स्थलों सहित बेहद सीमित दायरे में बांध कर क्यों रख दिया गया? साथ ही यह भी कि आदिवासी भाषाओं और बोलियों को मिले मौकों में राज्य की आदिवासी भाषाएं और बोलियों के साथ ही स्थानीय आदिवासी साहित्यकारों को क्यों उपेक्षित रखा गया? एक बड़ा सवाल यह भी कि जिस आयोजन का उद्घाटन आदिवासी समुदाय से आने वाली महिला राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने किया हो, उस पूरे आयोजन में मणिपुर की हिंसा, बड़े पैमाने पर आदिवासी समुदायों के विस्थापन, देश भर में इस समुदाय पर बढ़ रहे अत्याचार के साथ ही पहाड़ी क्षेत्रों में मानवजनित हादसों पर साहित्यकार चुप क्यों रहे?

एक सीमित दायरे में आयोजित उन्मेष में चार दिन में अस्सी से अधिक छोटे-बड़े सत्र आयोजित किए गए। इनमें से नौ – सात कवि सम्मेलन और दो लेखक सम्मेलन – आदिवासी भाषाओं और बोलियों पर केंद्रित थे। इनमें मध्य प्रदेश की निमाड़ी, यदि इसे निमाड़ के भील समुदाय की बोली मान लिया जाए, के अतिरिक्त गोंडी ने ही मध्य प्रदेश के आदिवासी समुदायों का प्रतिनिधित्व किया। एक खास बात यह भी रही कि आदिवासी भाषाओं और बोलियों पर आधारित इन नौ आयोजनों में संथाली को सर्वाधिक मौका मिला। यह सवाल भी उठता है कि क्या ऐसा राष्ट्रपति को खुश करने के लिए किया गया? वजह यह कि राष्ट्रपति भी संथाल समुदाय की हैं। यह अलग बात है कि इनमें से अधिकांश का आयोजन उन कक्षों में किया गया, जहां श्रोताओं के बैठने तक की जगह नहीं थी। इसकी तुलना में गैर-आदिवासी केंद्रित आयोजनों को अपेक्षाकृत ज्यादा क्षमता वाले हॉल मिले और श्रोता भी।

गत 3-6 अगस्त, 2023 को भोपाल में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय साहित्य उत्सव ‘उन्मेष’ काे संबाेधित करतीं राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू

राजनीतिक दृष्टि से देखा जाए तो करोड़ों रुपए व्यय होने के अनुमान के साथ आयोजित अंतर्राष्ट्रीय साहित्य उत्सव में आदिवासी भाषाओं और बोलियों को समर्पित कई सत्र आदिवासी समुदाय को प्रभावित करने का पर्याप्त कारण रखता है। अगर हम इस तथ्य को ध्यान में रखें कि साहित्य अक्सर ही समाज का दर्पण होता है, तो यह आयोजन आदिवासी समुदाय के नजरिए से भी निराश ही करता है। ऐसे दौर में जब न केवल मध्य प्रदेश में आदिवासियों पर अत्याचार के प्रकरण रोज-ब-रोज सुर्खियां बन रहे हैं, बड़े पैमाने पर आदिवासियों के समक्ष विस्थापन का खतरा मंडरा रहा हो, मणिपुर के बहाने पूर्वोत्तर के आदिवासियों को ईसाई होने के कारण राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) और उसके अनुषंगी संगठनों द्वारा निशाने पर लिया जा रहा हो, लद्दाख से लेकर मिजोरम तक के हिमालयी/पहाड़ी राज्य मानवजनित प्राकृतिक आपदा का दंश झेल रहे हों, उन्मेष में आदिवासी समुदायों को सीधे तौर पर प्रभावित करने वाले विषयों की बात न हो पाना साहित्य के उस राजनीतिकरण की ओर इशारा कर जाता है, जहां आदिवासी महज एक मोहरा हैं।

उन्मेष का समान्य हिंदी में अनुवाद– आंख का खुलना, प्रकट होना, खिलना अथवा हल्का प्रयास; किया जा सकता है। मगर एक बार फिर सवाल वही कि किसकी आंख खुली और कौन प्रकट हुआ? दूसरी ओर वास्तविकता यह है कि झारखंड, बस्तर, नियामगिरी में भी सत्ता पर आदिवासियों की हत्या अथवा उन्हे झूठे मुकदमों में जेल भेजने के आरोप लगातार लगते रहे हैं। मध्य प्रदेश में ही सत्तासीन भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के विधायकों अथवा उनके करीबियों पर आदिवासियों को प्रताड़ित करने और उनकी जमीन हड़पने के अनेक मामले सामने हैं। ज्यादा समय नहीं बीता है जब आदिम जनजाति समुदाय में शामिल सहरिया की जमीन हड़पने का आरोप पंजाब से ग्वालियर संभाग में आ बसे व्यक्तियों पर लगे थे और जांच के आदेश पारित किए जाने के स्थान पर आंदोलन का नेतृत्व कर रहे सहरिया समुदाय के व्यक्तियों को जेल भेज दिया गया है। 

बेशक यह कहा जा सकता है कि आदिवासियों का वोट हासिल करने के उद्देश्य से पिछले कुछ वर्षों में आदिवासियों के प्रति सत्ता का अनुराग बढ़ा है, लेकिन उनके मुद्दे गायब हैं। देश में सर्वाधिक आदिवासी आबादी वाले राज्य मध्य प्रदेश की बात करें तो यहां के कुल 230 विधानसभा क्षेत्रों में से 47 अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हैं। इसके अतिरिक्त 37 अन्य विधानसभा क्षेत्रों में भी आदिवासी समुदाय निर्णायक भूमिका में है। इस प्रकार कुल 84 विधानसभा क्षेत्रों में से वर्ष 2013 में भाजपा ने 59 में जीत हासिल की थी, जो 2018 में घटकर 34 रह गई। 

यही कारण है कि किसी भी आम चुनाव के समीकरणों को प्रभावित करने की क्षमता रखने वाले इस समुदाय को अपने पाले में करने के लिए ही शायद चार दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय साहित्य उत्सव ‘उन्मेष’ का आयोजन किया गया। मगर सवाल फिर वही है कि इस आयोजन से आदिवासी समुदायों को क्या मिला क्या?

‘उन्मेष’ कार्यक्रम में शिरकत करनेवाली गोंडी भाषा की साहित्यकार उषाकिरण आत्राम ने दूरभाष पर कहा– “इस कार्यक्रम में हम आदिवासियों को देश भर से केवल नाचने के वास्ते बुलाया गया था। जितने भी साहित्यिक चर्चाएं हुईं, उनमें हम आदिवासियों के सवाल गायब थे। यहां तक कि हमारी संस्कृति और हमारी भाषाओं के बारे में कोई बात नहीं हुई। मणिपुर में हम आदिवासियों के ऊपर जुल्म किया जा रहा है, इसके बारे में किसी ने एक शब्द नहीं कहा। हालांकि मैंने अपनी एक कविता के संदर्भ में इसका उल्लेख अवश्य किया। सबसे बड़ी बात यह कि भोपाल, जहां यह कार्यक्रम हुआ, उसे बसानेवाली गोंडी रानी कमलावती की कहीं चर्चा नहीं थी। उनके बदले वहां भोजपाल की प्रतिमा लगाई गई थी, जबकि उनका क्षेत्र निमाड़ की तरफ था। इस तरह इतिहास छिपाने की कोशिशें भी की गईं।”

जाहिर तौर पर सत्ता की चमक ने भले ही राजनीतिक स्वार्थ के लिए आदिवासी साहित्य को रौशन करने का दावा किया हो, मगर जो साहित्य अपने ही समाज का दर्द और दुख सामने नहीं ला सकता, उसे स्वातः सुखाय साहित्य के अतिरिक्त कुछ और नहीं कहा जा सकता। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्म ने भले ही अपने संबोधन में साहित्य और कला को मानवता बचाए रखने का श्रेय दिया हो, मगर इसकी झलक चार दिवसीय कार्यक्रम में कहीं नजर नहीं आई। जो साहित्य आम नागरिकों की परेशानियों को व्यक्त नहीं कर पाता, सरकार से सवाल नहीं पूछ पाता, उसका होना या न होना मानवता के लिए कोई मायने नहीं रखता। 

एक सवाल यह भी उठता है कि करोड़ों के व्यय से हुए इस आयोजन, जिसमें आम नागरिकों की भागीदारी नगण्य रही, से विभिन्न आदिवासी समुदायों को सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक स्तर पर क्या मदद मिलेगी? साहित्य को जिस तरह सत्ता अपने कब्जे में लेती जा रही है इसका उत्तर भील आदिवासी समुदाय का प्रतिनिधित्व करने वाले कवि, लेखक एवं सामाजिक कार्यकर्ता वाहरू सोनवणे की कविता से दिया जा सकता है। वे लिखते हैं–

“हम मंच पर गए ही नहीं,
और हमें बुलाया भी नहीं,
उंगली के इशारे से,
हमें अपनी जगह दिखाई गई,
हम वही बैठे रहे,
हमें शाबासी मिली,
वे मंच पर खड़े होकर,
हमारा दुःख हमसे ही कहते रहे,
हमारा दुख हमारा ही रहा,
कभी उनका नहीं हो पाया,
हमने अपनी शंका फुसफुसाई,
वे कान खड़े कर सुनते रहे,
फिर ठंडी सांस भरी,
और हमारे ही कान पकड़ कर हमें डांटा,
माफी मांगो वरना …”

(कविता का मूल मराठी से हिंदी में अनुवाद : नितिन पाटील, स्रोत : कविताकोश डॉट कॉम)

(संपादन : राजन/नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

मनीष भट्ट मनु

घुमक्कड़ पत्रकार के रूप में भोपाल निवासी मनीष भट्ट मनु हिंदी दैनिक ‘देशबंधु’ से लंबे समय तक संबद्ध रहे हैं। आदिवासी विषयों पर इनके आलेख व रपटें विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से प्रकाशित होते रहे हैं।

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