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महिला आरक्षण नहीं, 2024 में ओबीसी के लिए सामाजिक न्याय रहेगा निर्णायक मुद्दा : प्रो. संजय कुमार

निश्चित रूप से ऐसा लगता है कि इस दौर में 2024 में ओबीसी के ईर्द-गिर्द राजनीति होगी। ओबीसी की गूंज सुनाई पड़ेगी। 2024 के चुनाव में भी और हो सकता है 2029 के चुनाव में भी हो, लेकिन 2024 के चुनाव में तो मुझे लग रहा है कि तमाम मुद्दों के बीच में ओबीसी के लिए सामाजिक न्याय की गूंज काफी सुनाई पड़ेगी। पढ़ें, प्रो. संजय कुमार का यह साक्षात्कार

साक्षात्कार

[गत 20 सितंबर और 21 सितंबर को क्रमश: लोक सभा और राज्य सभा में महिला आरक्षण विधेयक पारित हो गया। इस विधेयक में ओबीसी व अल्पसंख्यक महिलाओं के लिए कोई प्रावधान नहीं किया गया। इसे विपक्ष ने मुद्दा बनाया। दूसरी ओर सत्ता पक्ष के द्वारा इसका श्रेय लेने की कोशिश की जा रही है। इस पूरे संदर्भ में और अन्य संबंधित विषयों पर नवल किशोर कुमार ने दूरभाष पर सीएसडीएस के निदेशक प्रो. संजय कुमार का साक्षात्कार किया। पढ़ें, इस साक्षात्कार का संपादित अंश]

चुनावी वर्ष में महिला आरक्षण बिल अब जबकि पारित हो गया है, आपको लगता है कि इसका असर चुनाव परिणामों पर पड़ेगा? विशेषकर यदि हम भाजपा के लिहाज से बात करें तो।

देखिए, दो बातें हैं। पहला, क्या इससे भाजपा के वोट पर कोई प्रतिकूल असर पड़ेगा या भाजपा को कोई नुकसान होगा? ऐसे तो बिल्कुल ही संकेत नहीं मिलते हैं कि भाजपा को कोई नुकसान होगा। अगर हम 2024 की बात करें या 2029 की बात करें तो दोनों चुनावों में मुझे लगता है कि भाजपा को कोई नुकसान नहीं होगा। किसी भी संदर्भ में देखें तो भाजपा को कोई नुकसान होता हुआ दिखाई नहीं पड़ता। अब सवाल यह है कि भाजपा को कितना फायदा होगा? भाजपा इस बिल को पारित कराने का पूरा श्रेय ले रही है, इससे क्या भाजपा के वोट में या समर्थन में बड़ा इजाफा होगा, यह देखने की बात है। मुझे तो 2024 के चुनाव में कोई बड़ा इजाफा होते हुए दिखाई नहीं पड़ता, क्योंकि हम सबको पता है कि बिल तो पास हो गया है, लेकिन अमल में सात से आठ साल बाद आएगा। अगर 2029 चुनाव के पहले अमल में आ गया तब उस वक्त भाजपा को कुछ सम्मानजनक फायदा होता हुआ दिखाई पड़ता है, लेकिन 2024 के चुनाव में कुछ मामूली, इसे आप कह सकते हैं कि एक धारणा बनी है कि भाजपा एक पार्टी है, जो महिलाओं के हितों का ध्यान रखती है। तो इससे भाजपा को कुछ मामूली फायदा हो सकता है। लेकिन कोई बड़ी बढ़त मुझे दिखाई नहीं पड़ती। कम-से-कम इस महिला आरक्षण बिल के पास होने की वजह से। 

जदयू की ओर से कहा गया कि विपक्षी दलाें के गठबंधन की वजह से सत्ता पक्ष ने पैनिक रिएक्शन में इस विधेयक को लोक सभा में पारित कराया। आप क्या मानते हैं?

नहीं, मुझे नहीं लगता। यह जरूर है कि विपक्षी एकता बनी है तो भाजपा में थोड़ी हलचल है, थोड़ी संवेदनशीलता है। आप कह सकते हैं कि [भाजपा के लोग] थोड़े बेचैन दिख रहे हैं। जब इंडिया गठबंधन बना तब नाम को लेकर के तमाम तरह की अतिश्योक्ति की गई, तमाम तरह से उसका हंसी-मजाक उड़ाया गया, लेकिन मेरा यह नहीं मानना है कि सिर्फ एक प्रतिक्रिया के तौर पर महिला आरक्षण बिल पेश किया गया। मुझे लगता है कि यह सोच-समझकर दूरगामी राजनीति की गई है, क्योंकि इससे कई फायदे हैं। इससे प्रधानमंत्री का कद बड़ा होता है, क्योंकि एक तरह से ऐसा बिल, जो पिछले तीन दशकों से पास नहीं हो पा रहा था, इसे पास कराने का श्रेय उनको जाता है। ऐसे मुद्दे पर जिसकी बड़ी चर्चा हो रही है और जिसका कोई विरोध नहीं कर रहा है संसद में। आप समझ सकते हैं ऐसे मुद्दे का विरोध कोई नहीं कर सकता। फिर संसद में कोई भी पार्टी हो। सभी लोक सभा और राज्य सभा दोनों में समर्थन करते हैं। जाहिर है कि यह एक ऐसा मुद्दा था, जिसका किसी भी पार्टी के लिए विरोध कर पाना मुश्किल था। ऐसी स्थिति में ऐसे बिल को पास करने का श्रेय प्रधानमंत्री मोदी को जाएगा। लेकिन ऐसा नहीं है कि सिर्फ विपक्षी एकता के डर से या भय से प्रधानमंत्री मोदी व भाजपा ने इस बिल को लेकर आए। बड़ी सोची समझी राजनीति है। इससे प्रधानमंत्री का कद बड़ा होता है, एक धारणा बनती है कि भाजपा एक ऐसी पार्टी है जो महिलाओं के हितों का ध्यान रखती है और एक ऐतिहासिक बिल पास कराने का श्रेय प्रधानमंत्री मोदी को जाता है। इन सब कारणों से मुझे लगता है कि बिल चुनाव के पहले लाया गया, जिससे अनुमान लगाया जा रहा है या ऐसी अपेक्षा है कि इसका कुछ चुनावी फायदा भी हो। लेकिन मुझे नहीं लगता कि जेडीयू का कथन सही है कि विपक्षी एकता से घबराकर या उसको कांउटर करने के लिए यह बिल लाया गया। 

इस विधेयक पर हुए बहस में विपक्ष ने जातिगत जनगणना और ओबीसी की विधायिका में हिस्सेदारी को लेकर सवाल उठाया। जबकि सत्तापक्ष इससे दूर भागता रहा। क्या इसे हम ओबीसी राजनीति के नए दौर का आगाज मान सकते हैं?

बिल्कुल। यह तो है कि ओबीसी की चर्चा हो रही है। आप कहें कि मंडल 2.0 या 3.0 का दौर है क्योंकि इसकी चर्चा तो बहुत हो रही है और चर्चा दोनों पक्षों के द्वारा किया जा रहा है। अगर आप सत्तारूढ़ दल भाजपा की बात करें तो उसमें भी ओबीसी की गूंज बार-बार उठती है और विपक्षी पार्टियां तो इस बात पर चुनाव लड़ने की पूरी तैयारी कर रही हैं। इसको मुद्दा बनाने की पूरी तैयारी की जा रही है। पहले ओबीसी जनगणना की बात हुई तो इस पर सरकार पीछे जाते हुई दिखाई पड़ती है। जब यह महिला आरक्षण बिल पेश हुआ तो विपक्षी पार्टियों के पास कोई और हथियार नहीं था। क्योंकि वे बिल का विरोध तो नहीं ही कर सकते थे, क्योंकि बिल के विरोध करने का मतलब यह धारणा बना देना होता कि आप महिला विरोधी हैं। यह भय तो सारी पार्टियों को था, इसीलिए उन्होंने बिल का विरोध नहीं किया। लेकिन कोटा के तहत कोटा की बात की। इससे दो चीजें हो गईं। विपक्ष को दो हथियार मिले। पहला, वे अपने आपको, अगर आप बिल का समर्थन कर रहे हैं तो स्वाभाविक तौर पर लगता है कि आप भाजपा के साथ खड़े हैं, सरकार के साथ खड़े हैं। और बिल्कुल साथ खड़े दिखने से एक डर था कि अपना ही मूल आधार गंवाना शुरू कर दे। बिल का विरोध न करते हुए भी सरकार के खिलाफ खड़ा दिखाने के लिए उन्होंने किस हथियार को इस्तेमाल किया। एक ऐसे हथियार का इस्तेमाल किया, जिसका मैं जिक्र कर रहा हूं– ‘कोटे के अंदर कोटा’। इससे दो चीजें हुईं। वे भाजपा के साथ खड़े दिखाई नहीं पड़े, बिल का समर्थन करते हुए उस बिल का नहीं, जो भाजपा लेकर आई है, प्रधानमंत्री का एक तरह से विरोध करते हुए दिखाई पड़े। बल्कि इससे भी बड़ी बात, जो असली प्लान है उनका कि ओबीसी की सत्ता में हिस्सेदारी हो, ओबीसी के लिए सामाजिक न्याय की पॉलिसी लाए, उस दिशा में ले जाता हुआ दिखाई पड़ता है और इसी के लिए इनको एक बहुत अच्छा हथियार मिल गया और उन्होंने इस बात को बुलंद किया। अगर मैं सत्ता पक्ष की बात करूं तो जब-जब विपक्षी पार्टियों ने भाजपा पर आरोप लगाया कि आप ओबीसी विरोधी हो तो भाजपा को भी इन आकड़ों का सहारा लेना पड़ा कि कितने एमपी भाजपा के ओबीसी से हैं, कितने कैबिनेट मंत्री ओबीसी हैं और कितने मंत्री ओबीसी जाति से हैं। निश्चित रूप से ऐसा लगता है कि इस दौर में 2024 में ओबीसी के ईर्द-गिर्द राजनीति होगी। ओबीसी की गूंज सुनाई पड़ेगी। 2024 के चुनाव में भी और हो सकता है 2029 के चुनाव में भी हो, लेकिन 2024 के चुनाव में तो मुझे लग रहा है कि तमाम मुद्दों के बीच में ओबीसी के लिए सामाजिक न्याय की गूंज काफी सुनाई पड़ेगी। 

प्रो. संजय कुमार, निदेशक, सीएसडीएस

क्या होता यदि सरकार ने संसद का विशेष सत्र आहूत करने के बजाय सामान्य तरीके से विधेयक पेश किया होता और इसकी अग्रिम सूचना सभी दलों को दी जाती?

कुछ भी नहीं होता। पहले सूचना दे दी भी जाती तब भी कुछ नहीं होता। मुझे नहीं लगता है कि किसी भी पार्टी के पास इस बिल का विरोध करने के लिए तर्क होता। यह दस दिन पहले उन्हें पता होता कि महिला बिल आरक्षण आ रहा है तो कोई भी पार्टी ऐसा तर्क नहीं ढूंढ पाती और उसका विरोध कर पाती और ऐसा विरोध, जिससे जनता को लगता कि यह विरोध सही है। ऐसा करने की क्षमता किसी भी पार्टी में नहीं थी। तो मुझे नहीं लगता कि बिल के बारे में बताया गया या नहीं बताया गया, इससे कोई खास फर्क पड़ा। पहले बता भी दिया जाता तो भी बिल को इसी तरह का समर्थन प्राप्त होता। जैसे समर्थन अब मिला जब बिल अचानक ही लोक सभा और राज्य सभा में पेश किया गया। 

मेरा आशय था कि ओबीसी का सवाल जैसा अब विपक्ष के द्वारा उठाया गया, वह अचानक से हुआ। कुछ समय होता इन पार्टियों के पास कि इस पर वह राष्ट्रीय स्तर पर कोई पहल कर पाते और डिमांड को और पुख्ता तरीके से रख पाते, और सरकार भी इस पर विचार करने के लिए मजबूर होती। 

देखिए, संसद राष्ट्रीय स्तरीय फोरम ही है। यदि एक महीने पहले भी मिल गया होता तो पार्टियों से क्या अपेक्षा की जाती कि अलग-अलग कोने में इस पर विचार विमर्श करते? ऐसी तो अपेक्षा थी नहीं। मुझे नहीं लगता कि इस पर कोई फर्क पड़ने वाला था। फिर आप चर्चा कितनी भी कर लेते, पार्लियामेंट में तो संख्या का महत्व है और संख्या सरकार के पास है। लोक सभा में भी और राज्य सभा में भी। अगर चार-छह महीने पहले बता दिया गया होता और विपक्षी पार्टियां इस पर कितना भी मंथन कर लेतीं, लेकिन उस मंथन से कुछ निकलता या नहीं निकलता, इस बात पर बड़ा प्रश्नचिह्न है। सरकार ने मन बना लिया था कि उसे पास करना है। आपने देखा कि इस पर समर्थन कितना था दोनों सदनों में। तो मंथन से क्या निकल कर आता। छह महीने की चर्चा में भी यही बात निकलकर आती जो दो घंटे की चर्चा में निकलकर आई। मुझे नहीं लगता कि उसके अंतर्वस्तु में कोई बहुत बड़ा अंतर होता। 

एक और सवाल है कि मोदी सरकार ‘एक देश – एक चुनाव’ की बात कर रही है। इसके लिए समिति का गठन कर दिया है। क्या यह आज की दौर में संभव है और यदि संभव है तो देश के संघीय ढांचे को बिना नुकसान पहुंचाए कैसे संभव है? 

पहला संभव है कि नहीं है, कुछ तकनीकी पहलू हैं, जिसके कारण लगता है कि अब बहुत मुश्किल है, लगभग असंभव है, बिना संविधान में बदलाव किये। लेकिन यह भी संभव है कि संविधान में तमाम तरह के संशोधन किए जा सकते हैं। लेकिन सबसे पहली दिक्कत यह आएगी कि सभी राज्यों के चुनावों को कैसे एक साथ करें। इसके लिए कई राज्यों की सरकारों को भंग करना होगा, यह किस कानून के तहत किया जाएगा? मान लीजिए कोई ऐसा प्रावधान कानून में संशोधन करके कर लेते हैं और सभी राज्यों में एक बार आपने चुनाव भी करा लिए तो बीच में अगर किसी राज्य की सरकार गिर जाती है, तो उसका क्या करेंगे? तमाम तकनीकी पहलू हैं, जिनको सोचते हुए, उसको ध्यान में रखते हुए, लगता है कि ऐसा कर पाना बहुत मुश्किल है। यह लगभग असंभव है, क्योंकि संविधान में कई संशोधनों की जरूरत पड़ेगी। उन संशोधनों को किया जा सकता है, लेकिन वे ऐसे संशोधन होंगे जो चुनावी प्रक्रिया की संवैधानिक अवधारणाओं को खत्म करेगी। हो सकता है कि ऐसा संशोधन कर दिया जाय कि लोक सभा और विधान सभा कार्यकाल फिक्स कर दिया जाए कि किसी भी हालत में इसको पांच साल रहना ही रहना है। मैं कहना चाह रहा हूं कि इस तरह के संशोधनों से इस बात का अंदाज नहीं लगाया जा सकता है कि किस तरह की संशोधनों की जरूरत होगी, लेकिन यह जरूर है कि इस तरह के संशोधनों से राज्यों के अधिकारों में कमी आएगी। यदि राज्यों की अधिकार में कमी आएगी तो निश्चित रूप से जो संघीय ढांचा है, जिसमें राज्यों की अपनी स्वायत्तता है, उसमें कहीं न कहीं तो कमी आएंगी। यह ढांचा बिल्कुल चरमरा जाएगा, ऐसा मैं नहीं कहता, लेकिन आपको यूनिफॉम बनाने के लिए राज्यों के अधिकार क्षेत्र व उनकी शक्ति को कुछ-न-कुछ तो कम तो करना ही होगा। और उसको अगर आप कम करेंगे तो कहीं-न-कहीं जो संघीय प्रणाली है, उस पर कुछ-न-कुछ तो चोट जरूर पहुंचेगी। 

यदि ‘एक देश – एक चुनाव’ लागू होता है तो उससे क्षेत्रीय दलों के अस्तित्व पर क्या असर पड़ेगा? क्या वे खत्म हो जाएंगे?

आंकड़े बताते हैं कि अगर लोक सभा और विधान सभाओं के चुनाव एक साथ हुए तो जो बड़े क्षेत्रीय दल हैं, जो मजबूत क्षेत्रीय दल हैं, उनके ऊपर तो बहुत प्रभाव नहीं पड़ेगा। कुछ अपवाद हो सकता है, जैसे दिल्ली अपवाद है। कुछ और राज्य अपवाद हैं। लेकिन अमूमन ऐसे चुनावों में देखा जाता है जब लोक सभा और विधान सभा का चुनाव एक साथ हुए तो उस राज्य में जिस बड़ी पार्टी का वर्चस्व है, उनके वोट में बहुत फर्क नहीं आता है। लोक सभा और विधान सभा चुनावों में लगभग एक जैसा लोग वोट देते हैं। लगभग 70 प्रतिशत चुनाव हैं, जिसमें 3 प्रतिशत के अंतर से भी कम उतार-चढ़ाव होता है। लेकिन जो छोटे राजनीतिक दल हैं, उनके अस्तित्व पर खतरा मंडराने लगेगा। जैसे यदि मैं बिहार का उदाहरण दूं तो वहां जो बहुत सारे छोटे-छोटे राजनीतिक दल हैं (यह बात मैं उदाहरण के तौर पर कर रहा हूं ऐसा नहीं कि सिर्फ उसी पार्टी का अस्तित्व खतरे में आएगा) जैसे लोक जनशक्ति पार्टी है, अब तो वह भी दो भाग में बंट चुकी है, हिंदुस्तान आवाम मोर्चा है, उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी है, उसके बाद जो मुकेश साहनी की पार्टी है, ऐसी जो छोटी क्षेत्रीय पार्टियां हैं, उनका अस्तित्व खतरे में आएगा। क्योंकि जब बड़ा इवेंट होगा, लोक सभा का इवेंट होगा तो उसमें लोगों की जो वोट देने के लिए मानसिक झुकाव होता है, वह वर्चस्वशाली पार्टी की तरफ होता है। और वही मानसिक झुकाव फिर विधान सभा चुनाव में भी दिखाई पड़ेगा। अगर आपने विधान सभा के चुनाव अलग-अलग कराते हैं तो छोटे क्षेत्रीय पार्टियों की भी कुछ-न-कुछ हैसियत होती है। वे अपने इलाके में अच्छा प्रदर्शन कर पाती हैं। लेकिन बड़ी क्षेत्रीय पार्टियां, जैसे अगर मैं बिहार का जिक्र कर रहा हूं तो मुझे लगता है वहां राजद और जदयू के अस्तित्व पर कोई ज्यादा फर्क नहीं पड़ेगा, चाहे आप साथ चुनाव कराएं या अलग चुनाव कराएं। यदि हम यूपी की बात करें तो वहां भी तमाम छोटी-छोटी क्षेत्रीय पार्टियां हैं, जिनके अस्तित्व पर खतरा दिखाई पड़ेगा और मेरे बोलने की वजह यही है कि हमने तमाम ऐसे चुनावों को देखा जब विधान सभा और लोक सभा के चुनाव एक साथ हुए। और जब ऐसा होता है तो छोटे क्षेत्रीय पार्टियों के वोट कम हो जाते हैं। लेकिन उन्हीं राज्यों में जब कभी विधान सभा के चुनाव, लोक सभा के चुनाव से अलग हुए तब उन क्षेत्रीय पार्टियों को एक सम्मानजनक वोट मिला। हमारे पास इसका एक सबूत है जो बताता है कि छोटी क्षेत्रीय पार्टियों की जो पहचान है, वह खत्म होने लगेगी। 

आपने पहले भी फारवर्ड प्रेस के साथ एक बार इंटरव्यू के दौरान कहा था कि इस देश पर वही राज्य करेगा जो ओबीसी की बात करेगा। क्या आपको लगता है कि यह देश अभी भी उसी ढर्रे पर चल रहा है? 

मुझे लगता है कि हम 2019 और अबकी चुनाव की तुलना करें तो 2019 से ज्यादा 2024 में ओबीसी की गूंज सुनाई पड़ रही है। ऐसा मैंने पहले भी जिक्र किया है। देखिए भाजपा भी बार-बार खुलकर अलग-अलग प्लेटफार्म पर यही कहती है कि भाजपा सरकार के प्रधानमंत्री ओबीसी जाति से हैं। सरकार में तमाम मंत्री ओबीसी जाति से हैं। चार कैबिनेट मंत्री ओबीसी जाति से हैं। इस पार्टी के जितने एमपी हैं, उनमें से एक बड़ी संख्या ओबीसी जाति से है। और विपक्षी पार्टियों की अगर हम बात करें उनमें तो वे तो कोटे के अंदर कोटे की बात कर रहे हैं। तो ओबीसी की चर्चा तो आज सभी कर रहे हैं और सभी चाहते हैं कि इसका फायदा उठाया जाय, क्योंकि उन्हें लगता है कि इसके ईर्द-गिर्द राजनीति करना अभी सरल होगा, क्योंकि यह एक ऐसा मुद्दा है, जिसकी बदौलत आप वोटरों को एकजुट कर सकते हैं। तो निश्चित रूप से मुझे लगता है कि आज भी ओबीसी की आज की स्थिति में या 2024 की स्थिति में मुझे तो कोई परिवर्तन दिखाई नहीं पड़ रहा है। मुझे लगता है कि सामाजिक न्याय का मुद्दा ओबीसी के इर्द-गिर्द ही घूमता रहेगा। उसमें दलितों और आदिवासियों की बात नहीं होगी, सामाजिक न्याय की चर्चा होगी और सामाजिक न्याय का अर्थ है ओबीसी को जो सामाजिक न्याय दिलाने की, उसके इर्द-गिर्द राजनीति 2024 में प्रबल होगी और राजनीति इस बात की ओर इशारा करेगा कि आज भी ओबीसी की राजनीति किए बिना पार्टियों के लिए संभव ही नहीं है कि देश में एक बड़ी पार्टी के रूप में उभर पाएं। 

एक आखिरी सवाल है रोहिणी कमीशन ने अपनी रिपोर्ट राष्ट्रपति को दे दिया है। अब भाजपा की रणनीति क्या होगी?

देखिए, रोहिणी कमीशन की रिपोर्ट तो सार्वजनिक नहीं हुई है, लेकिन जो मोटी बात सामने निकल कर आ रही है, वह यही है कि जो 27 प्रतिशत आरक्षण ओबीसी को मिला है, चाहे वह सरकारी नौकरियों, केंद्र सरकार की नौकरियों में हो, स्कूल कालेजों में हो, उसमें बंटवारा होगा। इसका बड़ा फायदा तमाम ओबीसी जातियों में से कुछ मजबूत ओबीसी जातियों ने उठाया है। हालांकि क्रीमीलेयर का प्रावधान है ओबीसी के आरक्षण में, लेकिन इसके बावजूद अलग-अलग राज्यों में कुछ हालात ऐसे रहे हैं कि कुछ ओबीसी जातियों ने सारा फायदा उठाया और जो तमाम ओबीसी जातियां हैं – लोवर ओबीसी जो सामाजिक आर्थिक रूप से अन्य ओबीसी जातियों से बहुत पिछड़े हैं – उनको इसका फायदा नहीं मिल पाया। रोहिणी कमीशन की यह अनुशंसा अनुमानित है कि ओबीसी आरक्षण में सब कटेगराइजेशन करने की जरूरत है। आज केंद्रीय स्तर पर अपर और लोवर ओबीसी की कानूनी परिभाषा नहीं है। कुछ राज्यों में यह भले हो। जैसे बिहार में अगर हम बात करें तो वहां परिशिष्ट एक और परिशिष्ट दो है। लेकिन केंद्रीय सूची में इस तरह से वर्गीकरण नहीं है। 

तो यह रोहिणी कमीशन की सिफारिश है और मुझे लगता है कि यदि आप ध्यानपूर्वक देखें तो पिछले 20 साल में भाजपा ने ओबीसी के वोटरों में बड़ी पैठ बनाई है। यदि आंकड़ों का जिक्र करें तो 2009 के चुनाव में ओबीसी वोटरों में से 24 प्रतिशत ने भाजपा वोट किया। 2019 आते-आते यह 44 प्रतिशत हो गया जबकि 2014 में यह 34 प्रतिशत वोट था। लेकिन आप यह देखें कि कौन ओबीसी समुदाय भाजपा की तरफ शिफ्ट हुआ है। अगर अलग-अलग राज्यों की बात करें तो लोवर ओबीसी में उनका वोट ज्यादा भाजपा की तरफ शिफ्ट हुआ है। अपर ओबीसी का वोट भाजपा की तरफ बहुत कम शिफ्ट हुआ। तो यदि ओबीसी का उपवर्गीकरण हुआ तो भाजपा को इसका बड़ा फायदा होगा। क्योंकि अगर रोहिणी कमीशन की रिपोर्ट लागू होती है तो वह लोवर ओबीसी के पक्ष में है, मैं समझता हूं कि इसका श्रेय पूरा भाजपा को जाएगा और लोवर ओबीसी में भाजपा की पैठ और बढ़ सकती है। अपर ओबीसी में उनकी पैठ नहीं बनेगी, क्योंकि अपर ओबीसी में जिनको अभी तक आरक्षण का सारा फायदा मिल रहा था या बड़ा फायदा मिलता रहा है, उनको नाराजगी होगी। और संभवतः मुझे लगता है कि भाजपा की जो पकड़ है ओबीसी वोटरों पर अगर बढ़ेगी नहीं तो कम से कम ये तो निश्चित है कि बरकरार रहेगी। भाजपा को नुकसान होता हुआ तो दिखाई नहीं पड़ता। 

(संपादन : समीक्षा/राजन/अनिल)


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लेखक के बारे में

नवल किशोर कुमार

नवल किशोर कुमार फॉरवर्ड प्रेस के संपादक (हिन्दी) हैं।

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