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सनातन धर्म उत्पादन, शूद्रों और महिलाओं के खिलाफ है 

सनातन धर्म, मौजूदा केंद्र सरकार के हाथों में एक हथियार है, जिसके ज़रिए वह 21वीं सदी में शूद्रों, दलितों और आदिवासियों को उनकी जगह दिखाना चाहती है। पढ़ें, कांचा आइलैय्या शेपर्ड का यह आलेख

प्राचीन और मध्यकालीन भारत में सनातन धर्म तीन जातियों का धर्म था – ब्राह्मण, क्षत्रिय और बनिया। अब यह पांच जातियों का धर्म है। उपरोक्त तीन जातियों में दो और जुड़ गईं हैं – कायस्थ और खत्री। सनातन धर्म मानता है कि उत्पादन प्रदूषणकारी होता है और इसलिए उसमें द्विज जातियों (ऐसे जातियां, जिनके पुरुष जनेऊ पहनते हैं) को उत्पादन से जुड़े कामों से मुक्त रखा गया है। सनातन धर्म शूद्र-दलितों और आदिवासियों को गुलाम मानता है और उन्हें क्रमशः म्लेच्छ और वनवासी कहता है। दूसरे शब्दों में, सनातन धर्म उत्पादन, शूद्रों और महिलाओं के खिलाफ था और है। इस धर्म की कोई अन्य परिभाषा स्वीकार्य ही नहीं हो सकती। 

भाजपा सरकार में वरिष्ठ मंत्रियों– अमित शाह, राजनाथ सिंह और निर्मला सीतारमण के अलावा पार्टी के अध्यक्ष जे.पी. नड्डा और असम के मुख्यमंत्री हेमंत बिस्वा शर्मा ने यह साफ़ कर दिया है कि वे सनातन धर्म का बचाव करने के प्रति प्रतिबद्ध हैं। सनातन धर्म, ब्राह्मणवाद का प्राचीन दर्शन है, जिसके जड़ें ऋग्वेद में हैं और जो अन्य संस्कृत धर्मग्रंथों के ज़रिए विकसित हुआ। 

‘मनुस्मृति’ के संकलन के काल तक आचरण और आध्यात्म से जुड़े ब्राह्मण लेखकों के सिद्धांत सनातन धर्म का स्वरूप ग्रहण कर चुके थे। सनातन धर्म, उत्पादक श्रम और उत्पादक जनता – जिसमें शूद्र, चांडाल और वनवासी शामिल थे – के खिलाफ था। भाजपा के शीर्ष मंत्री और नेता यह स्वीकार कर रहे हैं कि उनका भी यही दर्शन है। 

पार्टी के वरिष्ठ प्रवक्ता रविशंकर प्रसाद ने एक प्रेस कांफ्रेंस कर बताया कि सनातन धर्म सभी पर लागू होने वाले शाश्वत नियमों का संकलन है। उनके अनुसार, सनातन धर्म का विरोध करने वालों को इसका नतीजा भुगतना पड़ेगा। पर सवाल यह है कि शूद्र, दलित और आदिवासी सनातन धर्म को कैसे स्वीकार कर सकते हैं? 

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा, “इसका उचित जवाब दिया जाएगा”। मतलब साफ़ है कि भाजपा, उसके नेता और मोदी भी सनातन धर्म, जो दरअसल मनुधर्म ही है, के समर्थक हैं। और मनुधर्म क्या है? वह प्राचीन ब्राह्मणवाद की उपज है। उत्पादक और उत्पादन के प्रदूषणकारी होने के सिद्धांत की जड़ें सनातन धर्म में हैं। ऐसा लग रहा है मानो केंद्र सरकार ने 45 वर्षीय युवा नेता उदयनिधि स्टालिन के खिलाफ युद्ध छेड़ दिया हो। मगर यह युद्ध असल में तमाम शूद्रों, दलितों और आदिवासियों के खिलाफ है। 

सनातन धर्म, मौजूदा केंद्र सरकार के हाथों में एक हथियार है, जिसके ज़रिए वह 21वीं सदी में शूद्रों, दलितों और आदिवासियों को उनकी जगह दिखाना चाहती है। प्राचीन काल में सनातन धर्म केवल शूद्र कृषि उत्पादकों के खिलाफ प्रयुक्त होने वाला आध्यात्मिक हथियार था। मगर अब वह शूद्रों के अलावा दलितों और आदिवासियों के खिलाफ भी प्रयुक्त हो रहा है। अब वह दिल्ली के ब्राह्मण, बनिया, कायस्थ, खत्री और क्षत्रिय शासकों का हथियार है, जिसका प्रयोग वे भारत की बहुसंख्यक जनता के खिलाफ करेंगे। 

किसान आंदोलन के दौरान लठीचार्ज करती पुलिस (फाइल फोटो)

हिंदू धर्म से सनातन की ओर 

पूर्व में ये लोग हिंदू धर्म का बचाव कर रहे थे, जिसका अर्थ कुछ और है। हिंदू धर्म को जीवन पद्धति बताया जाता है, जो अपने अनुयायियों को अनेक आध्यात्मिक मार्ग उपलब्ध करवाता है। हिंदू धर्म पर भी मंदिरों और मंत्र साधना की परंपराओं के ज़रिए ब्राह्मणवाद का नियंत्रण है। इस धर्म को ‘हिंदू’ का नाम हमारे औपनिवेशिक शासकों ने दिया था, जिस तरह उन्होंने इस देश को ‘इंडिया’ का नाम दिया था। शायद ‘इंडिया’ के साथ-साथ वे ‘हिंदू’ शब्द को भी त्यागने के लिए तैयार हैं। बहुत अच्छी बात है। ये दोनों परिवर्तन शायद ‘प्राचीन परंपरा’ का पालन करने के उनके सिद्धांत के अनुरूप है।

अभी-अभी पुनर्जीवित की गई सनातन विचारधारा, स्टालिन और इंडिया गठबंधन पर भाजपा के हमलों का आधार बन गई है। उदयनिधि, द्रमुक नेता करुणानिधि के पोते और तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन के पुत्र हैं। सनातन धर्म के खिलाफ मजबूती से अपनी बात रखने के कारण वे पूरे देश के द्रविड़ों के विचारधारात्मक नायक बन गए हैं।

उदयनिधि का सिर कलम करने वाले के लिए एक मंदिर के पुजारी ने इनाम घोषित किया है। भाजपा इस पर चुप है। हत्या को पुरस्कार पाने की पात्रता घोषित करने वाले इस तरह के फ़तवे अब तक इस्लामिक दुनिया तक सीमित थे। अब ये भारत में भी जारी होने लगे हैं और ऐसा लगता है कि भाजपा को सनातन सांस्कृतिक फतवों से कोई परेशानी नहीं है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि सनातन धर्म राजाओं को यह आदेश देता है कि वे संस्कृत बोलने वाले शूद्रों की जीभ काट लें और संस्कृत श्लोक सुनने वाले शूद्रों के कानों में पिघला हुआ सीसा भर दें। 

उदयनिधि ने क्या कहा था

तमिलनाडु प्रगतिशील लेखक व कलाकार संघ द्वारा गत 2 सितंबर, 2023 को चेन्नई में “सनातन का उन्मूलन” विषय पर आयोजित एक सम्मलेन को संबोधित करते हुए उदयनिधि ने कहा था, “कुछ चीज़ों का केवल विरोध काफी नहीं है। उनका उन्मूलन होना चाहिए। हम डेंगू, मच्छरों, मलेरिया या कोरोना वायरस का विरोध नहीं कर सकते। हमें उनका उन्मूलन करना होगा। यही बात सनातन के बारे में सही है। उसका विरोध करने की बजाय हमें उसका उन्मूलन करना होगा।” 

उदयनिधि ने सनातन धर्म को जातिगत ऊंच-नीच के समर्थक और सामाजिक न्याय की विरोधी विचारधारा के रूप में परिभाषित किया। भाजपा के विरोधी, सनातन धर्म को शाश्वत विधि बता रहे हैं। यह भी तब जबकि यह जगजाहिर है कि सनातन धर्म, वर्ण धर्म (अर्थात जातिगत पदक्रम जिसमें ब्राह्मण सबसे ऊपर और शूद्र सबसे नीचे होते हैं और क्षत्रिय और वैश्य उनके बीच में) को मान्यता देता है और शूद्रों (दलितों सहित) को दास मानता है। भाजपा के मंत्री यह कह रहे हैं कि मुसलमानों और ईसाईयों के अलावा सनातन धर्म सभी भारतीयों का धर्म है। यह बहुत अजीब है।

सनातन धर्म और वर्ण धर्म

सनातन धर्म प्राचीन संस्कृत ग्रंथों में परिभाषित वर्ण धर्म और वर्णाश्रम धर्म का संयोजन है। वर्ण धर्म केवल द्विजों – अर्थात ब्राह्मणों, क्षत्रियों और वैश्यों – को सारे अधिकार देता है। अब द्विजों में कायस्थों और खत्रियों को भी शामिल कर लिया गया है। आज भी इन पांचों जातियों के सदस्य कोई उत्पादक कार्य नहीं करते। प्राचीन काल में शूद्रों, चांडालों और वनवासियों को बिना किसी फल की आशा के श्रम करने के लिए मजबूर किया जाता था। यही उनका कर्त्तव्य था। अब उन्हें उनके श्रम का कुछ मूल्य मिलता है, लेकिन अब भी उनके श्रम का अधिकांश फल द्विजों के हिस्से में आता है। 

वर्णाश्रम धर्म के अनुसार, द्विजों को बचपन में स्कूल में शिक्षा हासिल करनी चाहिए, युवा अवस्था में गृहस्थ के रूप में जीवन व्यतीत करना चाहिए और वृद्धावस्था में तपस्या करनी चाहिए। 

आज भी शूद्रों, दलितों और आदिवासियों को धर्मशास्त्र की शिक्षा देने वाले संस्कृत स्कूलों में पढ़ने की अनुमति नहीं है और वे हिंदू मंदिरों में पुजारी भी नहीं बन सकते है। यह स्थिति अपरिवर्तित है। मगर फिर भी भाजपा चाहती है कि सनातन धर्म अनंत काल तक इस कर्मभूमि का शाश्वत नियम बना रहे। 

शूद्रों/दलितों और आदिवासियों के विरुद्ध युद्ध का उद्घोष

ऐसा लगता है कि संघ और भाजपा का फोकस मुसलमानों और ईसाईयों से हटकर शूद्रों, दलितों और आदिवासियों पर खिसक गया है। स्वतंत्रता के बाद से – चाहे वह कांग्रेस का शासनकाल रहा हो या भाजपा का – सनातन धर्म को शूद्रों, दलितों और आदिवासियों का विरोधी माना और समझा जाता रहा है। सनातन धर्म अछूत प्रथा को मान्यता देता है, महिलाओं को समान अधिकार नहीं देता और श्रम की गरिमा उसके लिए महत्वहीन है। वैदिक ग्रंथों के बाद, सनातन धर्म के वैचारिकी मनुस्मृति में संश्लेषित है। आंबेडकर और पेरियार ने इस विषय का गहराई से अध्ययन किया। यही कारण था कि पेरियार मनुस्मृति पर हमलावर थे और आंबेडकर ने इस पुस्तक की प्रति जलाई थी। दोनों यह मानते थे कि यह पुस्तक सनातन धर्म का प्रतिनिधित्व करती है।

कांग्रेस लंबे समय से धर्मनिरपेक्षता के नाम पर सनातन वैचारिकी की रक्षा करती आई है। आरएसएस द्वारा नियंत्रित भाजपा भी सनातन धर्म की संरक्षक है और उसके संरक्षण के लिए उसने जाति और अछूत प्रथा के उन्मूलन और श्रम को गरिमापूर्ण मानने के विचार के विरुद्ध युद्ध की उद्घोषणा कर दी है। भाजपा ने कृषि कानूनों के ज़रिए शूद्र किसानों के साथ मनमानी करने का प्रयास किया, लेकिन अन्नदाताओं के पलटवार के आगे उसे झुकना पड़ा। अब वह द्रविड़ों की सनातन-विरोधी संस्कृति पर हमलावर है। यही कारण है कि एक युवा राजनीतिज्ञ द्वारा सनातन धर्म की समालोचना को तिल का ताड़ बना दिया गया और उसे कत्लेआम के आह्वान के रूप में प्रस्तुत किया गया। इस मसले में पूरी केंद्र सरकार सक्रिय है।

यह युद्ध अब ईसाईयों और मुसलमानों तक सीमित नहीं है। यह आधुनिक ब्राह्मणवाद का शूद्रों/दलितों और आदिवासियों की उभरती राजनीतिक और सामाजिक शक्तियों के विरुद्ध युद्ध भी है। यह साफ़ है कि भाजपा के आईटी सेल के मुखिया अमित मालवीय ने जानबूझकर उदयनिधि के भाषण को तोड़-मरोड़ कर इस रूप में प्रस्तुत किया मानो वे 80 प्रतिशत हिंदुस्तानियों के नरसंहार का आह्वान कर रहे हैं। क्या मालवीय यह मानते हैं कि शूद्र, दलित और आदिवासी, सनातन धर्म का हिस्सा हैं? एक बड़ी हिंदुत्ववादी पार्टी, जो सत्तासीन है, खूब सोच-विचार कर ही इस तरह की बातें कर रही है। 

धर्म न्याय नहीं है

धर्म की अवधारणा को तोड़-मरोड़ कर उसे न्याय का पर्यायवाची बताया जा रहा है। धर्म कभी भी न्याय की उस अवधारणा, जो यूरोप या प्राचीन ग्रीस में थी, के समकक्ष नहीं था। भारत में वैदिक काल में धर्म का अर्थ यही था कि शूद्रों को ब्राह्मणों द्वारा बनाये गए नियमों का पालन करना चाहिए और गुलामों और खेतिहर श्रमिकों के रूप में जीना चाहिए। इसका अर्थ यह भी था कि द्विज जातियों को उत्पादक श्रम नहीं करना चाहिए क्योंकि वह उन्हें प्रदूषित करता है।

शूद्रों, दलितों और आदिवासियों को तो छोड़िये, सनातन धर्म में सभी जातियों की महिलाओं के लिए भी कोई स्थान नहीं था। उन्हें सनातन धर्म द्वारा लादे गए अंधविश्वासों के चलते बर्बर शोषण का शिकार होना पड़ा। अगर हमारे शासक इस तरह की विचारधारा में यकीन करते हैं और आदिम सोच की समालोचना पर इस तरह के भीषण हमले करते हैं तो यह तय है कि एक राष्ट्र के रूप में हम एक अंधकारमय भविष्य की ओर बढ़ रहे हैं। 

जो शूद्र, दलित और आदिवासी भाजपा में हैं, उन्हें इस घटनाक्रम पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। निस्संदेह उनमें से कुछ को सत्ता हासिल है, लेकिन शासक दल की विचारधारा पर उनका कोई नियंत्रण नहीं है और वे सनातन धर्म को स्वीकार करने को मजबूर हैं। लेकिन यह भी सच है कि इससे उत्पादक सामान्य जनों को अंधकार के युग में धकेल दिया जाएगा। भाजपा में वंचित वर्गों के प्रतिनिधियों को शीर्ष मंत्रियों द्वारा सनातन धर्म के खुल्लमखुल्ला समर्थन के खिलाफ खड़ा होना ही होगा। अन्यथा हमारा देश अंधकार के युग में धकेल दिया जाएगा। 

(यह लेख मूलतः अंग्रेजी भाषा में thenewsminute पर पूर्व में प्रकाशित है। यहां इसका हिंदी अनुवाद लेखक की सहमति से प्रकाशित)

(अनुवाद: अमरीश हरदेनिया, संपादन : नवल/अनिल)

लेखक के बारे में

कांचा आइलैय्या शेपर्ड

राजनैतिक सिद्धांतकार, लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता कांचा आइलैया शेपर्ड, हैदराबाद के उस्मानिया विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान के प्राध्यापक और मौलाना आजाद राष्ट्रीय उर्दू विश्वविद्यालय, हैदराबाद के सामाजिक बहिष्कार एवं स्वीकार्य नीतियां अध्ययन केंद्र के निदेशक रहे हैं। वे ‘व्हाई आई एम नॉट ए हिन्दू’, ‘बफैलो नेशनलिज्म’ और ‘पोस्ट-हिन्दू इंडिया’ शीर्षक पुस्तकों के लेखक हैं।

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