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भागवत का वाक्-विलास या रणनीति?

आरएसएस प्रमुख भागवत संविधान समीक्षा, जाति की उत्पत्ति, आरक्षण, मुस्लिम तथा गौमांस भक्षण को लेकर विरोधाभासी वक्तव्य देते रहते हैं। संघ प्रमुख कभी संविधान पर चलने की बात कहते हैं तो कभी उसमें भारतीयता के तत्व नहीं होने का आरोप लगाते हुए उसकी समीक्षा करने को उतावले दिखते हैं। बता रहे हैं भंवर मेघवंशी

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत के बयान अक्सर विवाद का कारण बनते रहते हैं। वे अलग-अलग मंचों से भिन्न-भिन्न विचार प्रकट करते रहते हैं, जिनके कारण उनके विरोधी और समर्थक दोनों में भ्रम की स्थिति बनती रहती है। सवाल है कि क्या भागवत बिना कुछ सोचे-समझे बोलते हैं या उनके विचार सुचिंतित होते हैं और वे जानबुझकर ऐसा करते हैं? 

आरएसएस पर नियमित निगरानी रखने वाले विश्लेषक मोहन भागवत अथवा अन्य संघ विचारकों की विरोधाभासी बातों में कुछ भी नया नहीं पाते हैं। वे इसे युगानुकूल और परिस्थिति के अनुसार उचित बयान बताते हैं। संघ के स्वयंसेवक इसे रणनीति कहते हैं, तो दूसरी ओर कट्टर हिंदुत्व के पैरोकार इसे विचलन कहते हैं और आलोचना करते रहते हैं। वहीं भाजपाई राजनीतिज्ञ इसमें प्रगतिशीलता और उदारतावाद के तत्व खोजने लगते हैं। वहीं आरएसएस के आलोचक इसे भ्रम पैदा करने का प्रयास करार देते हैं। 

आरएसएस प्रमुख भागवत संविधान समीक्षा, जाति की उत्पत्ति, आरक्षण, मुस्लिम तथा गौमांस भक्षण को लेकर विरोधाभासी वक्तव्य देते रहते हैं। संघ प्रमुख कभी संविधान पर चलने की बात कहते हैं तो कभी उसमें भारतीयता के तत्व नहीं होने का आरोप लगाते हुए उसकी समीक्षा करने को उतावले दिखते हैं। उनकी नवीनतम किताबों और संघ के नीति पत्रकों का अध्ययन करने से ज़ाहिर होता है कि वे प्रकट रूप में और लिखित में अपने आपको बहुत ही सहिष्णु, शांत, समावेशी और प्रगतिशील साबित करने की क़वायद में जुटे हैं। आरक्षण को लेकर 2015 में बिहार विधानसभा का चुनाव हारने के बाद उन्होंने अपना स्टैंड आरक्षण के पक्ष में कर लिया है। अपने हालिया बयान में भी उन्होंने दो हज़ार साल के भेदभाव का ज़िक्र करते हुए आरक्षण को विषमता बने रहने तक बनाए रखने पर ज़ोर दिया है।

मोहन भागवत, आरएसएस प्रमुख

भागवत का यह बयान लोकसभा के आसन्न चुनावों के मद्देनज़र दिया हुआ माना जा रहा है। यह हो सकता है कि भाजपा की निरंतर घटती जा रही साख को बचाने के लिए संघ प्रमुख यह पैंतरा खेल रहे हों अथवा वे देश में दलित, आदिवासी और अगड़े समुदाय का कोई नया सामाजिक समीकरण बनाने की रूप-रेखा रच रहे हों, क्योंकि जाति जनगणना का प्रश्न हो अथवा किसान आंदोलन, पिछड़े वर्ग की संपन्न जातियों ने भाजपा और संघ के मंसूबों को पलीता लगाया है। ये समुदाय निरंतर संघ और भाजपा से दूर जा रहे हैं। हाल में नूंह में ब्रजमंडल यात्रा के दौरान हुई सांप्रदायिक हिंसा में किसान व मेव जातियों की महापंचायतों का होना तथा इसी तरह से किसानों, दलितों, आदिवासियों और अल्पसंख्यकों का एक साथ आना संघ को भावी ख़तरों की आहट दे रहा है। इसलिए बहुत ही सधे हुए शब्दों में भागवत दलित-बहुजन आंदोलन की भाषा में बात कह कर अपनी स्वीकार्यता दलितों व आदिवासियों के बीच बढ़ाने की कोशिश करते नज़र आ रहे हैं।

आरक्षण का बयान और उसमें हज़ारों वर्षों के भेदभाव की बात हो अथवा यह कि जाति व्यवस्था पंडितों ने अपने स्वार्थ के लिए बनाई है, जैसे बयान दलित आंदोलन की शब्दावली रही है। राजस्थान के विधानसभा चुनाव में पहली बार यह भी देखा जा रहा है कि भाजपा दलित अत्याचार को प्रमुख मुद्दा बनाए हुए हैं, जिसकी विचारधारा दलित शब्द के ही ख़िलाफ़ रही है और वंचित जैसा शब्द उसकी जगह इस्तेमाल करती रही है। अचानक उसने न केवल दलित शब्द को स्वीकार लिया है, बल्कि दलित अत्याचारों के बैनर-पोस्टर से दीवारें भर दी है।

संघ प्रमुख मोहन भागवत का गौमांस को लेकर कहा गया प्रतीकात्मक भाषण भी उन तमाम जातियों व समूहों को अपने साथ लाने की क़वायद है, जो अपनी परंपराओं और खाद्य व्यवहार के चलते न केवल मांसाहारी हैं, बल्कि वे बीफ़ भी खाते हैं। सुदूर पूर्वोत्तर हो या दक्षिण भारत सहित भारत के कई राज्य जहां पर गौमांस लोगों की सामान्य दिनचर्या का हिस्सा है, उन वर्गों को भी साथ लेकर संघ अपनी ताक़त में इज़ाफ़ा करने का प्रयत्न कर रहा है और इस प्रकार के बयानों के ज़रिए संघ अपनी छवि को बदलने के लिए बेताब दिखाई पड़ता हैं। लेकिन उसकी मुश्किल यह है कि संघ के नेता प्रचारक कुछ भी कहते रहें, उनका प्रतिबद्ध कैडर कभी भी अपने लक्ष्य से विचलित नहीं होता है। उनके लिए ‘सबका डीएनए एक है’ का वक्तव्य हो अथवा ‘हर मस्जिद के नीचे शिवलिंग क्यों खोजना’ का सवाल हो अथवा आरक्षण की वकालत अथवा गौमांस भक्षण तक की तैयारी का वक्तव्य, महज़ एक तात्कालिक रणनीति मात्र है। उनके हिंदू राष्ट्र बनाने के मूल लक्ष्य में कोई बदलाव नहीं है। 

संघ विचारक जितने उदारवादी और सर्वसमावेशी बनने की कोशिश करते हैं उनके स्वयंसेवक और समर्थक व शुभचिंतक उतने ही अपने विपरीत आचरण से उनको ग़लत साबित किए देते हैं। इससे भले ही आरएसएस के नवप्रशंसक बुद्धिजीवी वर्ग को खुराक मिलती हो, लेकिन सामाजिक बदलाव तो कुछ भी नहीं दिखाई देता है। संघ ने विगत चार दशकों से छुआछूत के ख़िलाफ़ बात करना जारी रखा है, लेकिन अस्पृश्यता हो अथवा भेदभाव, वह कम होने के बजाय बढ़ते जाता है। संघ प्रमुख आरक्षण जारी रखने की आवश्यकता जताते है लेकिन उनका कैडर इसकी कोई परवाह नहीं करता। यहां तक कि संघ की राजनीतिक इकाई भाजपा आरक्षण को हर तरीक़े से नेस्तानाबूद कर देती है।

मुसलमानों को अपना ही भाई बताते हुए उनको मोहम्मदी हिंदू साबित करने की भी बातें हुई, फिर सबका डीएनए तक एक कह दिया गया है, लेकिन क्या अल्पसंख्यकों के प्रति संघ भाजपाइयों का नज़रिया बदला है? क्या गाय के नाम पर हो रही मॉब लिंचिंग पर रोकथाम लगी है? इस्लामोफोबिया बढ़ता जा रहा है, नफ़रत का वातावरण कम होने का नाम ही नहीं ले रहा है। दलितों की सरेआम हत्याएं हो रही हैं। सरकार ने आरक्षण को निष्प्रभावी कर दिया है।

संघी मानसिकता के लोग दलित, आदिवासी व अल्पसंख्यक समेत तमाम उत्पीड़ित अस्मिताओं को निरंतर गालियां दे रहे हैं। सोशल मीडिया हो अथवा प्रिंट या टीवी चैनल्स, हर तरफ़ नफ़रत का बाज़ार गर्म है। ऐसे में इस तरह के इक्का-दुक्का कभी कभार दे दिए जानेवाले वक्तव्य से कोई फ़र्क़ नहीं ला सकेंगे। इनसे क्या हो जायेगा, यह महज़ वाक्-विलास है। इस ज़बानी जमा खर्च और इन मीठी-मीठी बातों से अब कौन भ्रमित होने वाला है। सच तो यह है कि सब मोहन भागवत के शब्दों के निहितार्थ तक पहुंच पा रहे हैं और समझ रहे हैं कि उनको इस प्रकार की मौसमी बयानबाज़ी से भ्रमित नहीं होना है।

(संपादन : राजन/नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

भंवर मेघवंशी

भंवर मेघवंशी लेखक, पत्रकार और सामाजिक-सांस्कृतिक कार्यकर्ता हैं। उन्होंने आरएसएस के स्वयंसेवक के रूप में अपना सार्वजनिक जीवन शुरू किया था। आगे चलकर, उनकी आत्मकथा ‘मैं एक कारसेवक था’ सुर्ख़ियों में रही है। इस पुस्तक का अंग्रेजी अनुवाद हाल में ‘आई कुड नॉट बी हिन्दू’ शीर्षक से प्रकाशित हुआ है। संप्रति मेघवंशी ‘शून्यकाल डॉट कॉम’ के संपादक हैं।

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