एक मजहब के रूप में इस्लाम हिंदू धर्म से अलग इस मायने में है कि इसके मूल ग्रंथ कुरान में जाति के स्तर पर कोई भेदभाव नहीं है। यहां तक कि अमीरी-गरीबी के बीच भी इस्लाम में कोई अलगाव नहीं है। लेकिन व्यवहार के स्तर पर ऐसा नहीं है। भारतीय मुसलमान स्वयं को तीन समूहों में बांटते हैं। ये समूह हैं– अशराफ, अजलाफ और अरजाल। भारतीय हिंदू समाज के सापेक्ष कहें तो ऊंची जातियों के लोग अशराफ, सेवा करनेवाली लेकिन सछूत जातियां अजलाफ और अछूत जातियां अरजाल कही जाती हैं।
बिहार में सरकार के स्तर पर किए गए वर्गीकरण के हिसाब से अजलाफ और अरजाल जातियों को पिछड़ा वर्ग में रखा गया है। इसके अलावा बिहार में अति पिछड़ा वर्ग की अवधारणा 1978 में मुंगेरी लाल आयोग की रिपोर्ट से अस्तित्व में आई। तत्कालीन मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर ने इस आयोग की रिपोर्ट को लागू कर पिछड़ा वर्ग को दो भागों में उपवर्गीकृत कर दिया। ये दो उपवर्ग पिछड़ा वर्ग (अनुसूची – 2) और अति पिछड़ा वर्ग (अनुसूची – 1) के रूप में क्रियान्वित हुए।
नब्बे के दशक के उत्तरार्द्ध में ‘पसमांदा’ शब्द सुर्खियों में आया। इसके प्रतिपादक अली अनवर रहे, जो पूर्व में पत्रकार थे तथा बाद में जनता दल यूनाईटेड की ओर से दो बार राज्यसभा के सदस्य रहे। उनके मुताबिक पसमांदा का मतलब ‘पीछे छोड़ दिए गए लोग’ है। दरअसल, यह पिछड़ा वर्ग और अति पिछड़ा वर्ग में शामिल मुस्लिम जातियों को एक छतरी के नीचे लाने की मुहिम रही।
अब यदि आबादी की बात करें तो बिहार में मुसलमानों की कुल आबादी 2 करोड़ 31 लाख 49 हजार 925 में अति पिछड़ा वर्ग में शामिल पसमांदा मुसलमानों की आबादी करीब 1 करोड़ 41 लाख 8 हजार 37 है। इनमें सबसे बड़ी आबादी मोमिनों की है, जो बुनकर समुदाय से आते हैं और उन्हें जुलाहा तथा अंसारी भी कहा जाता है। ये कबीर को अपना प्रतीक पुरुष मानते हैं। इनकी आबादी 46 लाख 34 हजार 245 है। वहीं बिहार की कुल आबादी में इनकी हिस्सेदारी की बात करें तो यह 3.5450 प्रतिशत है। यह हिस्सेदारी बिहार में ब्राह्मणों की कुल आबादी 47 लाख 81 हजार 280 और शेख (अशराफ) की कुल आबादी 49 लाख 95 हजार 897 के समकक्ष है। वे गरीब हैं, जिनकी मासिक आय छह हजार रुपए प्रति परिवार है। इस आधार पर बिहार सरकार की रपट में 26.77 प्रतिशत जुलाहा परिवार गरीब बताए गए हैं।

एक दिलचस्प आंकड़ा यह कि बिहार में पचास हजार रुपए से अधिक की आमदनी वाले ब्राह्मण परिवारों की संख्या 1 लाख 13 हजार 805 (10.57 प्रतिशत) है। इसकी तुलना में मोमिनों की स्थिति देखें तो हम पाते हैं कि केवल 2.94 प्रतिशत मोमिन परिवारों की आय ही प्रतिमाह पचास हजार रुपए से अधिक है। बीस हजार रुपए से पचास हजार रुपए की प्रतिमाह आय वाले मोमिन परिवारों की संख्या 11.29 प्रतिशत बताई गई है।
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बताते चलें कि बिहार में जुलाहों की सघन आबादी बक्सर, भोजपुर, गया, नवादा, पटना, मुंगेर व भागलपुर आदि जिलों में है। पहले हथकरघा उद्योग के लिए गया, नवादा और भागलपुर महत्वपूर्ण केंद्र था। लेकिन समय के साथ यह उद्योग दम तोड़ रहा है। इसका असर जुलाहों के जनजीवन पर भी पड़ा है।
बुनकर समुदाय की ही एक दूसरी जाति धुनिया है, जो अति पिछड़ा वर्ग में शामिल है। यह समुदाय पारंपरिक रूप से जुलाहों की सहयोगी जाति रही है। इस जाति के लोग कपास से प्राप्त रूई को धुनते हैं और फिर धुनी हुई रूई को करघे के जरिए धागे का रूप जुलाहा जाति के लोग देते हैं। इसके अलावा धुनिया जाति के लोग रजाई वगैरह बनाने का काम पारंपरिक रूप से करते रहे हैं। बिहार में इनकी आबादी 18 लाख 68 हजार 192 है। सरकार की रपट में इस जाति के 31.42 प्रतिशत परिवार गरीबी रेखा के नीचे हैं। वहीं केवल 1.31 प्रतिशत धुनिया परिवारों की आय पचास हजार रुपए से अधिक है। यह धुनिया जाति की बदहाली को दर्शाता है।
अति पिछड़ा वर्ग में शामिल कुछ पसमांदा जातियों की स्थिति
जाति | कुल परिवारों की संख्या | 6000 रुपए तक की मासिक आय वाले परिवार (प्रतिशत में) | 50,000 रुपए से अधिक की मासिक आय वाले परिवार (प्रतिशत में) |
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मोमिन (जुलाहा, अंसारी) | 9,09,910 | 26.77 | 2.94 |
धुनिया | 3,88,091 | 31.42 | 1.31 |
राईन/कुंजरा | 1,13,027 | 29.67 | 1.35 |
धोबी (मुस्लिम) | 82,109 | 31.69 | 1.96 |
साईं/फकीर/मदार | 1,30,767 | 31.11 | 1.44 |
मेहतर, लालबेगिया, हलालखोर, भंगी (मुस्लिम) | 13,944 | 31.90 | 4.60 |
मीरशिकार | 13,330 | 33.16 | 1.46 |
पमरिया | 12,369 | 34.78 | 1.40 |
चीक | 8,698 | 28.57 | 2.67 |
रंगरेज | 8,032 | 29.01 | 3.90 |
गैर-बुनकर समुदाय राईन (कुंजरा) पारंपरिक रूप से छोटे किसान होते हैं और मुख्यत: सब्जियों की खेती करते हैं। बिहार में इनकी आबादी 18 लाख 28 हजार 584 है और 29.67 प्रतिशत कुंजरा परिवार गरीबी रेखा के नीचे हैं तथा केवल 1.35 प्रतिशत परिवार ही ऐसा है जिसकी मासिक आय 50 हजार रुपए से अधिक है।
पसमांदा मुसलमानों में वे जातियां जो अरजाल यानी अछूत की श्रेणी में आती हैं, उनकी आर्थिक स्थिति और भी खराब है। मसलन 31.69 प्रतिशत मुस्लिम धोबी परिवार गरीबी रेखा के नीचे है और केवल 9.42 प्रतिशत परिवारों की मासिक आय 20 हजार रुपए से अधिक है। पचास हजार रुपए से अधिक मासिक आय धोबी मुस्लिम परिवारों की संख्या 1.96 प्रतिशत है। ऐसे ही साईं बिरादरी, जो कि पारंपरिक रूप से फकीरी करते हैं, उनके केवल 1.40 प्रतिशत परिवारों की आय ही पचास हजार रुपए या इससे अधिक है।
बहरहाल, पसमांदा समाज में शामिल रंगरेज, जो कि पेशागत रूप से बुनकर समाज का हिस्सा हैं, और कपड़ों की रंगाई व उनके ऊपर छपाई का काम करते हैं, बिहार में लगभग विलुप्ति की कगार पर हैं। बिहार सरकार की रपट कहती है कि सूबे में अब केवल 8 हजार 32 रंगरेज परिवार हैं और इनमें से 29.01 प्रतिशत परिवार प्रति माह 6000 रुपए से कम आय में जीने को मजबूर हैं। इसके केवल 313 परिवार (3.90 प्रतिशत) ही ऐसे हैं जिनकी आय प्रति माह पचास हजार रुपए से अधिक है। लगभग यही स्थिति चीक समुदाय की है, जो छोटे पशुओं के मांस का कारोबार करती रही है। रिपोर्ट के मुताबिक अब इसके कुल 8 हजार 698 परिवार शेष बचे हैं और इनमें 28.57 प्रतिशत परिवार गरीबी रेखा के नीचे हैं। सरकार की अमीरी के मानदंड यानी पचास हजार रुपए से अधिक की आय वाले चीक परिवारों की संख्या केवल 232 रह गई है।
(संपादन : राजन/अनिल)