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पटना की सड़कों पर लगाए जा रहे जातिवादी नारे का निहितार्थ

पिछले साल 23 जून को पटना में जब विपक्षी दलों की पहली बैठक होने वाली थी, ठीक उसके पहले आईटी और इडी की टीमों ने नीतीश कुमार के चहेते तत्कालीन वित्त मंत्री विजय कुमार चौधरी के साले अजय सिंह उर्फ कारू सिंह के अलग-अलग ठिकानों पर दबिश दी थी। पढ़ें, हेमंत कुमार का यह आलेख

बिहार में राजनीतिक आबोहवा बदल चुकी है। ‘इंडिया’ गठबंधन के सूत्रधार समझे जा रहे नीतीश कुमार ने गत 28 जनवरी, 2024 को पाला बदलते हुए भाजपा के साथ मिलकर नौवीं बार मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ग्रहण किया। नतीजा यह है कि अब बिहार की राजधानी पटना की सड़कों पर बैनर लगाकर यह बताया जा रहा है कि “लव-कुश और परशुराम की सरकार है, बिहार में अब बहार है”।

बताते चलें कि लव-कुश और परशुराम हिंदू धर्मग्रंथ के मिथकीय पात्र हैं। रामायण में लव और कुश को राम का पुत्र बताया गया है। जबकि परशुराम को विष्णु का वह अवतार बताया जाता है, जिसने 21 बार क्षत्रियों का नरसंहार किया। मौजूदा दौर में लव-कुश और परशुराम राजनीतिक प्रतीक बन चुके हैं। एक तरफ लव और कुश क्रमश: कुर्मी और कोइरी जाति के प्रतीक तो दूसरी तरफ परशुराम भूमिहार-ब्राह्मण जाति के प्रतीक माने जाते हैं।

जाहिर तौर पर जिस तरह का नरेटिव गढ़ने की कोशिश की जा रही है, उससे स्पष्ट है कि इस बार लोकसभा चुनाव में सत्तासीन भाजपा गठबंधन की रणनीति क्या है। उसके निशाने पर ओबीसी जातियों की एकता को तोड़ना है, जो जातिगत सर्वेक्षण व राज्य में एससी, एसटी और ओबीसी का दायरा 50 फीसदी से बढ़ाकर 65 फीसदी किए जाने के बाद एकजुट हो रही थीं। लेकिन मूल सवाल यह है कि क्या यह सब अचानक से हुआ?

इसकी पृष्ठभूमि में एक घटना का उल्लेख महत्वपूर्ण है। नीतीश कुमार के 2022 में पाला बदलने के साथ कमोबेश सभी सियासी चेहरे बदल गये थे। अगर कोई नहीं बदला तो वह थे, पत्रकार से नेता बने राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश नारायण सिंह। जदयू सांसद हरिवंश उपसभापति की कुर्सी पर बने रहे। उनसे भाजपा या जदयू ने कुर्सी छोड़ने को नहीं कहा! यह वही हरिवंश हैं जिन्होंने संवैधानिक मर्यादाओं को ताक पर रख कर तीन काले कृषि कानूनों से संबंधित बिल राज्यसभा से पास कराया था। लेकिन ऐसे हरिवंश तब भी नीतीश और नरेंद्र मोदी के प्रिय बने रहे, जब दोनों नेता एक-दूसरे को लानत पर लानत भेज रहे थे। इसकी वजह साफ है कि नीतीश भाजपा में वापसी का ‘रोशनदान’ खोलकर रखना चाहते थे और नरेंद्र मोदी भी ‘नीतीश मोह’ बनाये रखना चाहते थे। दोनों को बिहार में एक-दूसरे की राजनीतिक अहमियत का ख्याल है। बिहार में नीतीश जैसे बड़े पार्टनर के बिना कोई बड़ी चुनावी जीत हासिल करना कितना मुश्किल है, यह नरेंद्र मोदी जानते हैं। ऐसे में नीतीश की सवर्ण सलाहकार मंडली के एक अहम किरदार हरिवंश की अहमियत को समझा जा सकता है। यह सवर्ण सलाहकार मंडली सामाजिक न्याय की राजनीतिक लाइन और जातिगत गणना के सख्त खिलाफ रही है। इस मंडली के आर्थिक-सामाजिक हित भाजपा के साथ रहने से आसानी से सधते रहे हैं। 

दो उपमुख्यमंत्रियों सम्राट चौधरी व विजय कुमार सिन्हा के साथ नीतीश कुमार

पिछले साल 23 जून को पटना में जब विपक्षी दलों की पहली बैठक होने वाली थी, ठीक उसके पहले आईटी और इडी की टीमों ने नीतीश कुमार के चहेते तत्कालीन वित्त मंत्री विजय कुमार चौधरी के साले अजय सिंह उर्फ कारू सिंह के अलग-अलग ठिकानों पर दबिश दी थी। कारू सिंह बिहार-झारखंड-ओडिशा के बड़े ठेकेदार बताए जाते हैं। इनको सरकार का राजदार भी माना जाता है। तब कहा गया था कि केंद्र सरकार आईटी और इडी के सहारे विपक्षी एकता की नीतीश कुमार की मुहिम को रोकना चाहती है। लेकिन नीतीश डरने वाले नहीं हैं। 

परंतु हुआ बिल्कुल उल्टा! नीतीश ने साबित किया है कि वह नरेंद्र मोदी से डरते ही नहीं है बल्कि उनके आगे पूरी तरह झुक भी जाते हैं। अबकी बार तो वह उनकी चरणों में लेट ही गये! ‘लालू विरोध और भाजपा से गठजोड़’ की लाइन पर अपने राजनीतिक कैरियर में ऊंचे मुकाम हासिल करने वाले नीतीश कुमार भाजपा से हटते हैं, तब भी सटे ही रहते हैं। भाजपा से मोहभंग का उनके दिखावे का कभी भी कोई सैद्धांतिक आधार नहीं रहा है। यह कहना भी अतिशयोक्ति नहीं कि वह सामाजिक न्याय के लिए नहीं बल्कि “सोशल इंजीनियरिंग” के लिए जाने जाते हैं। नीतीश की सोशल इंजीनियरिंग नरेंद्र मोदी की सोशल इंजीनियरिंग की पूरक है। इसलिए नीतीश का स्वाभाविक घर भाजपा है, जहां उन्हें मिट जाना भी मंजूर है। 

दरअसल, नीतीश कुमार भारतीय राजनीति के संभवतः इकलौते शख्स हैं, जिन्होंने एक बार नहीं बल्कि कई बार खुद को ग़लत साबित किया है! वह डरते ही नहीं, बल्कि झुकते भी हैं। लेकिन इस बार तो वह पूरी तरह दंडवत हो गये! बहुत अधिक दिन नहीं हुए जब नीतीश कुमार ने कहा था कि “मेरी कोई व्यक्तिगत इच्छा नहीं है। मुझे किसी पद की लालसा नहीं है।” वह यह भी कहते रहे हैं कि “मिट्टी में मिल जाऊंगा, लेकिन भाजपा के साथ नहीं जाउंगा। मर जाना कबूल है, भाजपा के साथ जाना मंजूर नहीं है।”

लेकिन उन्होंने न सिर्फ फिर से भाजपा के साथ जाना कबूल किया बल्कि मुख्यमंत्री की कुर्सी भी मंजूर कर ली। इससे यह बात और मजबूती से स्थापित हुई कि राजनीति में अब वह किसी के विश्वासपात्र नहीं रहे। इस बार भी शपथ ग्रहण समारोह के बाद उन्होंने पत्रकारों से बातचीत में जब कहा कि – हम पहले भी भाजपा के साथ थे, बीच में कहीं चले गये, अब पहले जहां थे, वहीं आ गये हैं। और अब हम कहीं नहीं जाएंगे – तब किसी ने उनके इस बयान को गंभीरता से नहीं लिया। इसके अलावा राजद के साथ गठबंधन तोड़ने का जो कारण उन्होंने बताया कि – चीजें ठीक नहीं चल रही थीं – तार्किक रूप से आधारहीन साबित हुआ। 

पटना की सड़कों पर लगाया गया बैनर

दरअसल, नीतीश कुमार को आंकने में राजद ने बड़ी भूल की, जिसका खामियाजा उसे भुगतना पड़ रहा है। अभी बहुत दिन नहीं हुए जब बिहार सरकार में शिक्षा मंत्री रहे प्रो. चंद्रशेखर ने रामचरितमानस पर सवाल खड़ा किया। तब भी यह देखा गया कि नीतीश कुमार और उनकी पार्टी ने इस मामले में अपना विरोध व्यक्त किया। इसके बाद राजद के ही विधायक फत्ते बहादुर सिंह ने हिंदू धर्म के मिथकों को खारिज करते हुए जोतीराव फुले व सावित्रीबाई फुले की राहों पर चलने का आह्वान किया तब नीतीश कुमार ने अपनी आंखें तरेरी थीं। यह नीतीश कुमार का विरोध ही था कि पाला बदलने के ठीक पहले उन्होंने प्रो. चंद्रशेखर का विभाग बदलने का निर्णय लिया। वस्तुत: इसके जरिए नीतीश कुमार यह आंकना चाह रहे थे कि राजद उनकी आपत्तियों को किस संवेदनशीलता से लेता है। लेकिन यह तो तय ही था कि वे केवल इससे संतुष्ट नहीं थे।

राजद के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष शिवानंद तिवारी कहते हैं कि “महागठबंधन के संपूर्ण कार्यकाल में तेजस्वी यादव ने जिस प्रकार का आचरण किया, उसे पूरे देश ने देखा है। ज़रूरत से ज़्यादा दब कर तेजस्वी रहे। ताकि नीतीश कुमार को शिकायत का तनिक भी मौक़ा नहीं मिले।” 

असल में राजद से चूक तभी हो गई थी जब 17 महीना पहले नीतीश कुमार भाजपा का साथ छोड़कर उसके खेमे में आए थे। जबकि यह सभी जानते थे कि नीतीश कुमार सत्ता का श्रेय किसी के साथ बांटने से परहेज करते रहे हैं। यहां तक कि उन्हें अपने सबसे करीबी सुशील कुमार मोदी के साथ भी यह समस्या रही थी।

खैर, नीतीश जो भाजपा के खिलाफ विपक्ष की एकता का प्रमुख चेहरा दिख रहे थे। उन्होंने ऐसे समय में पाला बदला, जब ‘सोया-सोया सा’ दिख रहा विपक्षी मोर्चा अंगड़ाई लेने जा रहा था! मणिपुर से न्याय यात्रा पर निकले कांग्रेस नेता राहुल गांधी बिहार पहुंचने वाले थे। पूर्णिया में राहुल की रैली होने वाली थी। नीतीश के इस झटके से न सिर्फ विपक्षी नेता बल्कि राजनीतिक विश्लेषक भी भौंचक रह गये। राहुल गांधी ने पूर्णिया की रैली में कहा, “थोड़ा-सा दबाव पड़ते ही नीतीश ‘यू टर्न’ ले लेते हैं। बिहार में हमारे गठबंधन के दलों ने नीतीश कुमार से जाति गणना करवाया। हमने उनको साफ कह रखा था कि आपको जाति गणना करवाना होगा। नीतीश जी पर भाजपा का भारी दबाव था। वह उनके आगे झुक गये। लेकिन सामाजिक न्याय की लड़ाई रूकने वाली नहीं है। हमलोग मिलकर लड़ेंगे। हमें नीतीश की जरूरत नहीं है। समय आ गया है, हिंदुस्तान का एक एक्स-रे हो जाये। पता चल जाएगा किसकी कितनी आबादी है और किसकी कितनी भागीदारी है। भाजपा नहीं चाहती है कि देश का एक्स-रे हो। वह नहीं चाहती कि देश को पता चले यहां कितने आदिवासी, दलित, ओबीसी हैं। वह सामाजिक न्याय करना नहीं चाहती है।” 

बहरहाल यह सच है कि राहुल गांधी ने पूर्णिया की रैली में सामाजिक न्याय के जिस एजेंडा को धार दिया और उसे मजबूती से रेखांकित किया, वह भाजपा और नरेंद्र मोदी को बिल्कुल नहीं सुहाता है। तभी तो मोदी ने बिहार में जाति सर्वेक्षण की रिपोर्ट जारी होने पर कहा था, विपक्ष जाति के नाम पर देश को विभाजित करने का प्रयास कर रहा है। मेरे लिए तो सबसे बड़ी जाति है– गरीब!

उधर नरेंद्र मोदी ने नीतीश को फिर से अपने पाले में लेकर एक तीर से दो शिकार किये हैं। वह साबित करना चाहते हैं कि उनके खिलाफ एकजुट हो रहा विपक्ष एक बेकार और लाचार समूह है, जो सत्ता में उनकी तीसरी पारी को रोक नहीं सकता है। दूसरा, बिहार में मुश्किल दिखती भाजपा की विजय अब आसान हो गई है। 

लेकिन क्या नीतीश के छिटक जाने से विपक्षी गठबंधन बिखर गया है और बिहार में भाजपा की राह आसान हो गई है? ऐसा दिख नहीं रहा है, क्योंकि नीतीश की एनडीए में वापसी को लेकर उसके भीतर भी घमासान है। चिराग पासवान और उपेंद्र कुशवाहा अपनी नाराज़गी सार्वजनिक कर चुके हैं। चिराग और उपेंद्र को तो जबरिया शपथ ग्रहण समारोह में शामिल करवाया गया। चिराग दिल्ली से पटना आने को तैयार नहीं थे। और उपेंद्र पटना छोड़कर निकल गये थे। तो क्या यह नाराजगी आगे भी जारी रहेगी? इसका जवाब यह है कि इस बार भाजपा नीतीश की कीमत पर अपने सहयोगियों को नाराज़ नहीं करेगी, बल्कि नीतीश के पर कतरेगी। जिस तरह बिहार विधानसभा के पिछले चुनाव में चिराग के सहारे नीतीश की हार सुनिश्चित की गई। कुछ-कुछ वैसा ही फार्मूला इस बार भी आजमाया जा सकता है। ताकि नीतीश पूरी तरह निरर्थक हो जाएं।

(संपादन : राजन/नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

हेमंत कुमार

लेखक बिहार के वरिष्ठ पत्रकार हैं

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