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‘भारत जोड़ो न्याय यात्रा में मेरी भागीदारी की वजह’

यद्यपि कांग्रेस और आंबेडकर के बीच कई मुद्दों पर असहमतियां थीं, मगर इसके बावजूद कांग्रेस ने आंबेडकर को यह मौका दिया कि देश के इतिहास के एक कठिन दौर में एक सकारात्मक संविधान का मसविदा तैयार करें। बता रहे हैं प्रो. कांचा आइलैय्या शेपर्ड

मैंने 1970 के दशक में सामाजिक-राजनीतिक जीवन में प्रवेश किया। उस समय मैं मार्क्सवादी था। फिर 1980 के दशक में मेरा रुझान आंबेडकरवाद की ओर हो गया। मार्क्सवादी और आंबेडकरवादी दोनों के रूप में हम वर्णवादी और वर्गवादी होने के लिए महात्मा गांधी की आलोचना करते थे। गत 17 मार्च, 2024 को मैं अपने जीवन में पहली बार मुंबई स्थित मणि भवन गया। वहां से मुझे राहुल गांधी की न्याय संकल्प पदयात्रा में शामिल होना था। इस भवन में महात्मा गांधी ने कई वर्ष बिताये थे और इसे उनकी पोती मनुबेन के नाम पर मणि भवन कहा जाता है। 

बीते 16 मार्च की शाम न्याय यात्रा चैत्य भूमि पहुंची, जहां सैकड़ों सामाजिक कार्यकर्ताओं ने राहुल के साथ संविधान की प्रस्तावना का पाठ कर शपथ ली। यह पहला मौका था जब मैंने मुंबई की चैत्य भूमि में किसी ऐसे कार्यक्रम में भाग लिया जो संविधान की रक्षा पर केंद्रित था। इस संविधान ने भारत के शूद्रों, दलितों और आदिवासियों को एक नया जीवन दिया है।  

भारतीय संविधान की विश्वदृष्टि उसकी प्रस्तावना में उल्लेखित है। इसी विश्वदृष्टि ने भारत के सबसे शोषित और दमित समुदायों को एक नया जीवन दिया। इस संविधान ने देश के 20 करोड़ मुसलमानों को सिखाया कि एक स्थिर लोकतंत्र में कैसे रहा जाता है और किसी नागरिक समाज में धर्मनिरपेक्ष जीवन कैसा होता है। भारत के बाहर के मुसलमानों को कभी नियमित चुनावों वाले लोकतांत्रिक देश में रहने का अवसर ही नहीं मिला। मुसलमानों के लिए भी संविधान की रक्षा करना महत्वपूर्ण है। उच्च जातियों के वे हिंदू, जो हिंदुत्व की सांप्रदायिक धारा से बाहर थे, उन्हें भी इस संविधान ने आधुनिक लोकतांत्रिक जीवन का स्वाद चखाया। वर्ण व धर्म पर आधारित हमारे देश के अतीत में उन्होंने इसका अनुभव कभी नहीं किया था। इसलिए कुल मिलकर इन सभी श्रेणियों के लोग, चाहे वे किसी भी जाति या धर्म के रहे हों, चैत्य भूमि से लेकर मणि भवन तक राहुल गांधी की यात्रा में शामिल हुए। और इन सबका उद्देश्य, देश में न्याय और सामाजिक न्याय को बढ़ावा देना था।  

यह यात्रा आंबेडकर और गांधी द्वारा हिंदुत्व की वर्चस्व की खिलाफत और लोकतंत्र तथा संविधान की रक्षा से संबंधित सोच और विचारों को संश्लेषित करने का पहला प्रयास था। मुझे लगा कि विचारधारा और दर्शन के स्तर पर भारतीय संविधान की रक्षा का यह एक ऐसा प्रयास है, जो आवश्यक और सामयिक है तथा इस ऐतिहासिक संघर्ष में मुझे उस पार्टी का साथ देना चाहिए, जिसने भारत की आज़ादी के लिए संघर्ष किया। इसमें कोई शक नहीं कि संविधान की रक्षा का संघर्ष लंबा और कठिन होगा। आमजनों के एक बड़े तबके को यह डर है कि अगर हिंदूवादी देश की सत्ता में बने रहे तो वे हमारे संविधान को नष्ट कर देंगे।  

आरएसएस-भाजपा गांधी और आंबेडकर दोनों को अपने प्रतीक के रूप में इस्तेमाल करते आए हैं। वे इन दोनों व्यक्तित्वों का उपयोग राष्ट्रवाद के अपने संस्करण को वैध सिद्ध करने के लिए करते रहे हैं। तथ्य यह है कि न तो आंबेडकर ने और ना ही गांधी ने कभी भारत के संवैधानिक लोकतंत्र के बारे में संघ-भाजपा की सोच का अनुमोदन किया। ये ताकतें भारत में वर्ण-धर्म की तानाशाही स्थापित करना चाहतीं थीं। दूसरी ओर, भारतीय कम्युनिस्ट चाहते थे कि देश में सर्वहारा की तानाशाही स्थापित हो।

मुंबई में ‘भारत जोड़ो न्याय यात्रा’ के मौके पर आनंद पटवर्द्धन, प्रियंका गांधी, स्वरा भास्कर, व कांग्रेस के नेता राहुल गांधी के साथ प्रो. कांचा आइलैय्या शेपर्ड तथा अन्य

यद्यपि कांग्रेस और आंबेडकर के बीच कई मुद्दों पर असहमतियां थीं, मगर इसके बावजूद कांग्रेस ने आंबेडकर को यह मौका दिया कि देश के इतिहास के एक कठिन दौर में एक सकारात्मक संविधान का मसविदा तैयार करें। कई लोगों को लग रहा था कि ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन की समाप्ति के बाद भारत में अराजकता फैल जाएगी।    

यद्यपि कांग्रेस और महात्मा गांधी की विचारधाराओं से मेरी अनेक असहमतियां हैं, मगर फिर भी मैंने सर्वस्पर्शी न्याय और सामाजिक न्याय के लिए राहुल गांधी के संघर्ष में भागीदारी करने का निर्णय लिया। अस्त्तिव की लड़ाई में हमें अपनी आपसी असहमतियों को भुलाना ही पड़ता है। भारत में सामाजिक न्याय की अवधारणा के जन्मदाता आंबेडकर थे और आगे चल कर वी.पी. सिंह के शासनकाल में इस अवधारणा ने ठोस स्वरुप अख्तियार किया। सामाजिक न्याय के संघर्ष के मंडल दौर का आधार थी यह सोच कि सभी जातियों की सत्ता में भागीदारी उनकी जनसंख्या के अनुपात में होनी चाहिए। वर्ण-धर्म पर आधारित व्यवस्था ने दलितों, आदिवासियों और शूद्रों के साथ घोर अन्याय किया है। वर्ण-धर्म को ही हिंदुत्व की ताकतें सनातन धर्म कहतीं हैं। जातिगत दमन के पुरातन दौर की वापसी की आशंका शूद्रों, दलितों और आदिवासियों को सता रही है।   

आरएसएस को वर्ण-धर्म विचारधारा का मुख्य पैरोकार माना जाता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कहते हैं कि वे ‘सबसे बड़े ओबीसी’ हैं, मगर उन्होंने कभी उस वर्ण-धर्म की समालोचना नहीं की, जो जाति आधारित सामाजिक व्यवस्था का जन्मदाता है। उन्होंने कभी यह नहीं कहा कि दलितों / शूद्रों और आदिवासियों को एकाधिकारी पूंजी में हिस्सा मिलना चाहिए। बल्कि उन्होंने द्विज एकाधिकारी पूंजीपतियों की अकूत धन कमाने में मदद की। राहुल गांधी कह रहे हैं कि कुछ द्विज सेठों की संपदा दिन-दूनी-रात-चौगुनी बढ़ रही है। भारत में केवल डिजिटल विभाजन ही नहीं है, यहां जातिगत विभाजन भी है। न्याय यात्रा के दौरान राहुल ने 6,000 किलोमीटर से ज्यादा की यात्रा की और विभिन्न उत्पादक समुदायों के प्रतिनिधियों से मिलकर उनकी वर्गीय / जातिगत समस्याओं पर चर्चाएं की।   

संकल्प सभा में अपने संक्षिप्त भाषण मैंने कहा कि आंबेडकर और गांधी दोनों के आदर्श खतरे में हैं। आंबेडकर ने एक महान संविधान का मसविदा तैयार किया, जिसका लक्ष्य था– दमित आमजनों की मुक्ति और जाति का विनाश। गांधी ने एक आधुनिक लोकतांत्रिक राष्ट्र की नैतिक बुनियाद रखी। हमें अपने संविधान की भी रक्षा करनी है और हमारी लोकतांत्रिक प्रणाली के नैतिक आधार की भी। मैंने कहा कि हमारी सभा 2024 के आमचुनाव की पूर्वसंध्या पर हो रही हैं और सभी नागरिक और सामाजिक संस्थाओं को सुनिश्चित करना चाहिए कि हमारे नागरिक संविधान और लोकतंत्र की पक्ष में मतदान करें। राहुल गांधी ने न्याय यात्रा निकाली और वे संविधान-विरोधी ताकतों के खिलाफ संघर्ष करते आ रहे हैं। वे संपूर्ण न्याय और सामाजिक न्याय के संघर्ष के प्रतीक हैं। इसलिए पूरे देश की नागरिक और सामाजिक संस्थाओं को राहुल गांधी के पक्ष में वोट डलवाने के लिए प्रयास करने चाहिए।

हालांकि राहुल ने अपने भाषण में कहा कि न्याय के संघर्ष के वे अकेले प्रतीक नहीं हैं और इस लड़ाई में लाखों-लाख लोग शामिल हैं। मगर इतिहास में जब भी कभी अन्याय के खिलाफ संघर्ष हुआ है, उसका नेतृत्वकर्ता ही  उस संघर्ष का प्रतीक बना है। मेरे विचार से हमारा देश आज जिस मुकाम पर है, उसमें राहुल को ही हमें इस लड़ाई का प्रतीक मानना होगा।  

आज संघर्ष श्रम शक्ति और दुष्ट शक्ति के बीच है। राहुल जिस पार्टी से आते हैं, वह गांधी, नेहरु और पटेल की पार्टी है। मगर वे आंबेडकर को भी अपना बनाना चाहते हैं, क्योंकि आंबेडकर ही हमारे वर्तमान संविधान के निर्माता हैं। आंबेडकर की मौत के बाद कांग्रेस ने उनकी भूमिका को कम करके प्रस्तुत किया। ऐसा लगता है कि राहुल को इस बात का अहसास है और यही कारण है कि यात्रा में शामिल लोगों ने चैत्य भूमि पर संविधान की प्रस्तावना का पाठ किया। 

संविधान और लोकतंत्र की रक्षा के लिए लेखन कर्म करने वाले एक कार्यकर्ता के बतौर मुझे लगा कि मुझे राहुल के आंदोलन में शामिल होना चाहिए और उसका समर्थन करना चाहिए। 

(अंग्रेजी से अनुवाद: अमरीश हरदेनिया, संपादन : नवल/अनिल) 

लेखक के बारे में

कांचा आइलैय्या शेपर्ड

राजनैतिक सिद्धांतकार, लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता कांचा आइलैया शेपर्ड, हैदराबाद के उस्मानिया विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान के प्राध्यापक और मौलाना आजाद राष्ट्रीय उर्दू विश्वविद्यालय, हैदराबाद के सामाजिक बहिष्कार एवं स्वीकार्य नीतियां अध्ययन केंद्र के निदेशक रहे हैं। वे ‘व्हाई आई एम नॉट ए हिन्दू’, ‘बफैलो नेशनलिज्म’ और ‘पोस्ट-हिन्दू इंडिया’ शीर्षक पुस्तकों के लेखक हैं।

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