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‘इंडिया’ गठबंधन को अब खुद भाजपाई मान रहे गंभीर चुनौती

दक्षिण भारत में तो फिर भी लोगों को यक़ीन था कि विपक्षी दल, ख़ासकर कांग्रेस अच्छा प्रदर्शन करेगी। लेकिन उत्तर, पूर्व, मध्य और पश्चिम में भाजपा की हार की दूर-दूर तक कोई बात नहीं कर रहा था। लेकिन पहले दो चरण का चुनाव होने के बाद ख़ुद भाजपा नेता इंडिया गठबंधन की चुनौती को गंभीर मान रहे हैं। पढ़ें, चार चरणों के मतदान के बाद सैयद जै़ग़म मुर्तज़ा का यह विश्लेषण

क़रीब दो महीने पहले की बात है जब कहा जा रहा था कि इस बार उत्तर प्रदेश में भाजपा को कोई भी चुनाव नहीं हरा सकता। इस बीच चार चरण के चुनाव संपन्न हो चुके हैं। यह दो महीने गुज़र जाने के बाद ख़ुद भाजपा नेता दावे के साथ नहीं कह पा रहे हैं कि भाजपा एक बार फिर से 2019 की सफलता दोहरा पाएगी।

इन दो महीनों में बहुत कुछ ऐसा हो गया है कि ख़ुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत भाजपा का कोई भी बड़ा नेता 400 पार के नारे को नहीं दोहरा रहा है। उल्टा अब भाजपा के नेता दबी ज़बान में मानने लगे हैं कि 2024 का लोकसभा चुनाव 2014 या 2019 से अलग है। भाजपा के लिए अपनी तमाम सांगठनिक क्षमता झोंक देने वाले आरएसएस के नेता अपनी पहचान न बताने की शर्त पर स्वीकार कर रहे हैं कि 400 पार तो छोड़िए, भाजपा के लिए 303 की संख्या दोबारा हासिल कर पाना अब इतना आसान नहीं है। भाजपा के समर्थन का आधार मानी जाने वाली हिंदी पट्टी में लोग अब इस बात पर चर्चा कर रहे हैं कि विपक्षी उम्मीदवार किन-किन सीटों पर जीत दर्ज कर सकते हैं। जिन सीटों पर दो महीने पहले चुनाव एकतरफा माना जा रहा था, अब वहां हार-जीत को लेकर शर्तें लगाई जा रही हैं। 

दक्षिण भारत में तो फिर भी लोगों को यक़ीन था कि विपक्षी दल, ख़ासकर कांग्रेस अच्छा प्रदर्शन करेगी। लेकिन उत्तर, पूर्व, मध्य और पश्चिम में भाजपा की हार की दूर-दूर तक कोई बात नहीं कर रहा था। लेकिन पहले दो चरण का चुनाव होने के बाद ख़ुद भाजपा नेता इंडिया गठबंधन की चुनौती को गंभीर मान रहे हैं। 

प्रधानमंत्री की बिगड़ती ज़बान, गृह मंत्री अमित शाह का तक़रीबन आपदा प्रबंधन मोड में आना, और दूसरी पंक्ति के नेताओं की उम्मीदों पूरी तरह धार्मिक ध्रुवीकरण पर टिक जाना बता रहा है कि सबकुछ सही नहीं है। प्रधानमंत्री अब भाजपा के संकल्प पत्र पर बात नहीं कर रहे हैं। एनडीए के नेता जनता को यह नहीं बता पा रहे हैं कि तीसरी बार सत्ता में आने के बाद उनके पास लोगों को देने के लिए क्या है। ये सब बातें बता रही हैं कि मई का महीना ज़रूर है, लेकिन उत्तर भारत की हवाओं में पहले जैसी सियासी गर्मी नहीं है।

क्या उत्तर में भाजपा हाफ हो रही है?

2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने गुजरात, राजस्थान, दिल्ली, हरियाणा, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, और त्रिपुरा में भाजपा ने क्लीन स्वीप किया था। मध्य प्रदेश, बिहार, और झारखंड जैसे राज्यों में विपक्ष को महज़ चार सीटों से संतोष करना पड़ा था। जम्मू और कश्मीर की छह में से तीन सीट भाजपा को मिली थीं। इसके उलट कर्नाटक में कांग्रेस के हिस्से में महज़ दो ही सीट आई थीं। इस बार भाजपा को इन राज्यों में अपनी संख्या बनाए रखना बेहद मुश्किल हो रहा है। गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश, बिहार, और झारखंड में भाजपा उम्मीदवार कड़े मुक़ाबले में फंसे हैं। सड़क पर चलता आदमी भी कह रहा है कि इन राज्यों में भाजपा को ठीकठाक नुक़सान उठाना पड़ रहा है।

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भाजपा को संभावित नुक़सान के दावे बेवजह नहीं हैं। पहले चार चरण में भाजपा का कोर वोटर माने जाने वाले समूह जातीय प्रतिबद्धताएं दिखाते नज़र आए हैं। दलित वोटरों का एक बड़ा हिस्सा भाजपा से छिटक कर या तो बसपा में वापस गया है फिर विपक्षी दलों को वोट कर रहा है। ज़मीन पर साफ दिख रहा है कि यादव वोटर भी दोबारा अपने पारंपरिक दलों, यानी समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय जनता दल की तरफ आ रहे हैं। राजपूत, जाट, गूजर, सैनी, खड़गवंशी, कुर्मी, कोयरी और लोध मतदाता धर्म या दल के प्रति प्रतिबद्धता दिखाने के बजाए अपनी-अपनी जातियों के उम्मीदवारों के साथ दिख रहे हैं। ज़ाहिर है, यह सब भाजपा के लिए परेशान करने वाली बातें हैं।

कोई नारा ज़मीन पर पकड़ नहीं बना पा रहा

भाजपा की दूसरी सबसे बड़ी परेशानी है कि उसके पास कोई ऐसा मुद्दा या नारा नहीं है जिसकी प्रासंगिकता कश्मीर से कन्याकुमारी तक हो। 2024 के लोकसभा चुनाव में पार्टी ने अपनी सारी उम्मीदें राम मंदिर पर लगा रखी थीं। फरवरी में एक बार को ऐसा माहौल बना भी जिससे लगा कि राम मंदिर का निर्माण इस चुनाव का ‘पुलवामा’ मोमेंट’ है। लेकिन भाजपा ने अपने तमाम संसाधन और उर्जा शायद समय से पहले ख़र्च कर ली है। चौथे चरण में चुनाव जबकि अवध प्रांत की चौखट लांघ चुका है, लोगों में इस मुद्दे पर न तो कोई भावनात्मक ज्वार नज़र आता है और न ही कोई ख़ास उत्साह। इसके अलावा भाजपा के पास मतदाताओं को देने के लिए अब हिंदू-मुसलमान, पाकिस्तान, और डर ही बचा है। लेकिन बेरोज़गार, महंगाई के मारे, परेशान हाल लोग इन मुद्दों को भाव देने के लिए तैयार नहीं हैं।

भाजपा और प्रधानमंत्री की हताशा का अंदाज़ा उनके अडानी, अंबानी वाले बयान से लगाया जा सकता है। अपने सहयोगियों पर काला धन बांटने, या टेम्पो से कांग्रेस के पास धन पहुंचाने जैसी बातों पर भाजपा के घनघोर समर्थक भी हैरानी में हैं। लोग समझ नहीं पा रहे हैं आख़िर ऐसा क्यों हो रहा है कि तमाम बयानबाज़ी और भावनात्मक मुद्दे वोटरों को बूथ पर खींच कर लाने में नाकाम हो रहे हैं।

क्या भाजपा संगठन में हताशा है?

दूसरे दौर के चुनाव के दौरान एक मज़ेदार वाक़या गुज़रा। अमरोहा लोकसभा क्षेत्र में भाजपा का एक बूथ कार्यकर्ता अपने किसी साथी से फोन पर वोटरों को घर से निकालने की गुहार लगा रहा था। शाम के चार बज चुके थे और उस बूथ पर महज़ सत्ताइस फीसदी वोटिंग हुई थी। 2019 में इसी बूथ पर वोट प्रतिशत 73 फीसद था। ऐसे में जब पोलिंग एजेंट कह रहा हो कि “ये तमाम वोटर कहां मर गए हैं? इनको ढूंढ कर भेजो”, तो फिर संगठन से जुड़े लोगों की हताशा समझी जा सकती है। इस बार कम से कम उत्तर प्रदेश में हालात ऐसे हैं कि भाजपा के समर्थक माने जाने वाले मतदाता समूहों में कोई ख़ास उत्साह नहीं दिखा है। ख़ासकर शहरी सीटों पर मतदान न सिर्फ कम है, बल्कि पहले जैसे जोश नज़र नहीं आ रहा।

इस बीच ख़बर आई कि राजपूतों की नाराज़गी दूर करने, यूपी में संगठन को सक्रिय करने, और सरकारी मशीनरी के ‘नट-बोल्ट’ टाइट करने की ज़िम्मेदारी ख़ुद गृह मंत्री अमित शाह ने अपने कंधों पर उठा ली है। तीसरे चरण में संभल, बदायूं और मैनपुरी में प्रशासन ने जिस तरह वोटरों के ख़िलाफ सख़्त रवैया अपनाया उसे देखकर महसूस हुआ कि यह चर्चा महज़ अफवाह नहीं है। जिस तरह राजा भैया के साथ गृह मंत्री ने बैठक की और फिर जौनपुर में बाहुबली नेता धनंजय सिंह की पत्नी श्रीकला रेड्डी ने बसपा का टिकट लौटाया, उससे साबित हुआ कि हालात भाजपा के लिए बहुत साज़गार नहीं हैं।

इस चुनाव में आख़िर हो क्या रहा है?

जहां भारतीय जनता पार्टी का चुनावी अभियान लोगों को अपने साथ भावनात्मक तौर पर जोड़ने में नाकाम रहा है, वहीं ज़मीन पर दो बातें बहुत ज़्यादा चर्चा में हैं। जहां अल्पसंख्यक समूह अमित शाह के सीएए और एनआरसी पर दिए जा रहे बयानों से चिंतित हैं। दलित मतदाताओं को पूरा यक़ीन है कि अगर भाजपा फिर से सत्ता में आई तो संविधान बदल देगी। हालांकि एक और मज़ेदार चर्चा ज़मीन पर है। लोग कह रहे हैं सत्ता में आते ही नरेंद्र मोदी और अमित शाह यूपी के मुख्यमंत्री को बदल देंगे। कुल मिलाकर भाजपा के चुनाव अभियान में सकारात्मक भले ही कुछ न हो, लेकिन उसके सत्ता में वापसी से जुड़े डर मतदाताओं को बूथ तक जाने के लिए प्रेरित कर रहे हैं।

कांग्रेस के चुनावी वायदे बनाम भाजपा के नारे

2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के चुनाव अभियान से दो बातें नदारद थीं। एक तो पार्टी मतदाताओं को यह नहीं बता पा रही थी कि सत्ता में वापसी पर वह क्या करेगी। दूसरे, ख़राब अर्थव्यवस्था, बदहाल तंत्र, और भाजपा की प्रशासनिक कमज़ोरियों के बारे में लोग बात तो करते थे, लेकिन कांग्रेस अपने आपको विकल्प के तौर पर पेश कर पाने में नाकाम रही। उसका सारा अभियान प्रधानमंत्री के ख़िलाफ आरोपों पर टिका था। कांग्रेस ने इससे सबक़ लिया है और इस बार उसके पास बताने के लिए बहुत कुछ है। कांग्रेस की न्याय गारंटियों पर भले ही मीडिया में चर्चा नहीं है, लेकिन ज़मीन पर यह मतदाताओं को लुभा रही हैं। 

दूसरी तरफ भाजपा वहीं आ गई है जहां 2019 में कांग्रेस थी। उसके नेता राहुल गांधी, सोनिया गांधी, इंदिरा गांधी, और जवाहर लाल नेहरू को निशाना बना रहे हैं। धर्म की बातें कर रहे हैं, मुसलमानों का डर दिखा रहे हैं, पाकिस्तान, आतंकवाद समेत तमाम मुद्दों पर अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ माहौल बना रहे हैं। लेकिन बरोज़गारी, बढ़ती महंगाई, आर्थिक अव्यवस्था, और संसाधनों के कुप्रबंधन जैसे मुद्दों पर उनके पास कोई ठोस हल नहीं है। जाहिर तौर पर चुनाव के नतीजे भी जल्द ही आ जाएंगे। संख्या हम नहीं बता सकते, लेकिन इतना कह सकते हैं कि अबकी बार, विपक्ष का मज़बूत है प्रचार।

(संपादन : नवल/अनिल)

लेखक के बारे में

सैयद ज़ैग़म मुर्तज़ा

उत्तर प्रदेश के अमरोहा ज़िले में जन्मे सैयद ज़ैग़़म मुर्तज़ा ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से लोक प्रशासन और मॉस कम्यूनिकेशन में परास्नातक किया है। वे फिल्हाल दिल्ली में बतौर स्वतंत्र पत्रकार कार्य कर रहे हैं। उनके लेख विभिन्न समाचार पत्र, पत्रिका और न्यूज़ पोर्टलों पर प्रकाशित होते रहे हैं।

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