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आखिर क्यों है दलित-मुसलमानों को बसपा से अधिक ‘इंडिया’ गठबंधन पर भरोसा?

सवाल यह है कि मुसलमान मतदाता बसपा का समर्थन क्यों नहीं कर रहे? अगर सवर्ण उम्मीदवारों के प्रति उनके मन में शंका है कि वो भाजपा के साथ चले जाएं तो सधर्मीय उम्मीदवारों का समर्थन तो फिर भी किया ही जा सकता था। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। बता रहे हैं सैयद जै़गम मुर्तजा

लोकसभा चुनाव-2024 के दो चरण पूरे होने के बाद दो बातें पूरे यक़ीन के साथ कही जा सकती हैं। एक– बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के मुसलमान उम्मीदवारों को अपने समुदाय के बीच अपेक्षित समर्थन नहीं मिल रहा है। दूसरा– जहां-जहां बसपा का उम्मीदवार कमज़ोर है, वहां-वहां गैर-जाटव दलित व अति पिछड़ी जातियों के वोटर दूसरा विकल्प तलाश रहे हैं। ये दोनों ही बातें मायावती और उनकी पार्टी के लिए चिंताजनक हालात पैदा कर रही हैं।

उत्तर प्रदेश में अभी तक जिन सोलह सीटों पर मतदान हो चुका है। इनमें कम-से-कम सात सीटें ऐसी हैं, जहां संख्या के लिहाज़ से मुसलमान और दलित गठजोड़ तक़रीबन अपराजेय माना जाता है। इनमें सहारनपुर, मेरठ, बिजनौर, नगीना, अमरोहा, मुरादाबाद, और रामपुर आदि सीटें ऐसी हैं, जहां मुसलमान और बहुजन वोटर एक तरफ हो जाएं तो बिना किसी ख़ास मशक़्क़त के बड़े अंतर से जीत हासिल कर सकते हैं। पीलीभीत, बुलंदशहर, ग़ाज़ियाबाद, अलीगढ़ और गौतमबुद्ध नगर में वोटरों के यह दो बड़े समूह जिन उम्मीदवार की तरफ हो जाएं, समीकरण उनके पक्ष में झुक जाते हैं।

शायद यही वजह है कि बसपा प्रमुख मायावती ने सहारनपुर, अमरोहा, मुरादाबाद, रामपुर और पीलीभीत से मुसलमान उम्मीदवारों को मैदान में उतारा। हालांकि अलीगढ़ से भी बसपा ने पहले मुसलमान प्रत्याशी को टिकट दिया था लेकिन नामांकन से ऐन पहले उम्मीदवार को दिल का दौरा पड़ गया। बीमारी की वजह से वहां प्रत्याशी बदलना पड़ा। बुलंदशहर और नगीना सुरक्षित सीट हैं। यहां बसपा को उम्मीद थी कि मुसलमान मतदाता पार्टी का समर्थन करेंगे। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। मतदान के दौरान जिस तरह के रूझान देखने को मिले उनके मद्देनज़र कहा जा सकता है कि मुसलमानों का झुकाव बुलंदशहर में इंडिया गठबंधन के प्रत्याशी और नगीना में चंद्रशेखर आजाद के पक्ष में ज़्यादा रहा।

इसी तरह बसपा ने बिजनौर से जाट, ग़ाज़ियाबाद और गौतमबुद्ध नगर से राजपूत, मेरठ से त्यागी, अलीगढ़ से ब्राह्मण, तथा बाग़पत से गुर्जर उम्मीदवार को टिकट दिया। अगर इन उम्मीदवारों के पक्ष में मुसलमान और गैर-जाटव दलित व अति पिछड़ी जातियों के मतदाता लामबंद हो जाते तो शायद बसपा अपने खोए गौरव को वापस पाने में कामयाब हो जाती।

मायावती व उत्तर प्रदेश के नगीना लोकसभा क्षेत्र में मतदान केंद्र का एक दृश्य

लेकिन हालात बता रहे हैं कि पार्टी तमाम समीकरण अपने पक्ष में होने के बावजूद परिस्थितियों को भुना नहीं पाई है। इसके कई कारण हैं। एक तो अल्पसंख्यक मतदाता बसपा पर भरोसा नहीं कर पा रहे हैं, दूसरा, अल्पसंख्यकों के अलावा दलित-ओबीसी मतदाताओं का भी एक समूह मान रहा है कि केंद्र में भाजपा को सत्ता से हटाने के लिए इंडिया गठबंधन बेहतर विकल्प है।

चुनाव शुरू होने से पहले चर्चाएं थीं कि मायावती आचार संहिता लगने के बाद इंडिया गठबंधन का हिस्सा बन जाएंगीं। हालांकि यह चर्चाएं बाद में अफवाह साबित हुईं लेकिन यह भी सच है कि कांग्रेस ने आख़िरी समय तक बसपा प्रमुख को मनाने की कोशिशें कीं। कांग्रेस नेता दबी ज़बान में स्वीकार करते हैं कि गठबंधन के लिए सोनिया गांधी समेत तमाम कांग्रेसी नेताओं की प्राथमिकता समाजवादी पार्टी नहीं, बल्कि बसपा थी। कांग्रेसजनों का मानना था कि उनका वोटर बसपा के लिए वोट कर सकता है लेकिन समाजवादी पार्टी के पक्ष में कांग्रेस के कोर वोटर माने जाने वाले सवर्ण और शहरी मध्यम वर्गीय मतदाता को मना पाना तक़रीबन नामुमकिन है।

लेकिन मायावाती ने अंत में अकेले चुनाव लड़ने का फैसला किया। इसकी वजह राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि एक तो लोकसभा चुनाव मायावती की प्राथमिकता नहीं हैं। उनकी नज़र उत्तर प्रदेश में 2027 में होने वाले विधानसभा चुनावों पर है। उसी के मद्देनज़र उन्होंने टिकट बांटे हैं और अकेले चुनाव लड़ने का फैसला किया है। दूसरे, बसपा नहीं चाहती थी कि कम सीटों पर चुनाव लड़कर वो अपनी वोट हिस्सेदारी कम करे और उसका बुरा असर पार्टी के राष्ट्रीय दर्जे पर पड़े। ज़ाहिर है जितनी ज़्यादा सीटों पर बसपा चुनाव लड़ेगी, कुल वोटों में उसकी हिस्सेदारी उतनी ज़्यादा होगी।  

लेकिन मायावती का मुसलमान-दलित गठजोड़ एक बार फिर से सफल होता नहीं दिख रहा है। हालांकि मुसलमान बहुल सीटों पर ग़ैर-मुसलमान उम्मीदवार उतारने की वजह से अल्पसंख्यक मतदाताओं में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के प्रति नाराज़गी भी है। बावजूद इसके अभी तक जिन सीटों पर चुनाव हुआ है वहां मुसलमानों ने बसपा के मुसलमान उम्मीदवार के बदले कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के ग़ैर-मुसलमान उम्मीदवार को तरजीह दी है।

सहारनपुर, मुज़फ्फरनगर, कैराना, मेरठ, बाग़पत, बिजनौर, अमरोहा, रामपुर, मुरादाबाद, बुलंदशहर, ग़ाज़ियाबाद, गौतमबुद्ध नगर, अलीगढ़, मथुरा और पीलीभीत में मुसलमान मतदाता गठबंधन उम्मीदवारों को पक्ष में लामबंद होते नज़र आए हैं। नगीना में मुसलमानों का रूझान आज़ाद समाज पार्टी के नेता चंद्रशेखर आज़ाद ‘रावण’ के पक्ष में दिखा। ज़ाहिर है, यह रूझान नतीजों में भी नज़र आना तय है तो मायावती के लिए न सिर्फ परेशानी का सबब है, बल्कि बसपा के भविष्य के लिए भी अच्छा नहीं है।

सवाल यह है कि मुसलमान मतदाता बसपा का समर्थन क्यों नहीं कर रहे? अगर सवर्ण उम्मीदवारों के प्रति उनके मन में शंका है कि वो भाजपा के साथ चले जाएं तो सधर्मीय उम्मीदवारों का समर्थन तो फिर भी किया ही जा सकता था। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। बिजनौर निवासी असद अली के मुताबिक़ “मुसलमान मान कर चल रहे हैं कि लोकसभा चुनाव में भाजपा के सामने सिर्फ राहुल गांधी ही चुनौती हैं। उनका वोट न तो समाजवादी पार्टी को जा रहा है, न कांग्रेस को, और न उम्मीदवार को, बल्कि यह समर्थन राहुल गांधी का है जो लंबे अरसे से भाजपा के सामने डटे खड़े हैं।”

इसी तरह मेरठ निवासी शाहिद का मानना है कि “सिर्फ टिकट देने भर से लोग बसपा के पक्ष में वोट नहीं करेंगे। जब मुसलमान या दलित किसी परेशानी में होते हैं तो मायावती दूर-दूर तक नज़र नहीं आतीं हैं। चुनाव में भी वो वोट काटने के लिए उम्मीदवार उतारती हैं, जीतने के लिए नहीं।” 

अमरोहा के मोहम्मद अली की शिकायत है कि “मायावती अगर गंभीर होतीं तो मज़बूत और स्थानीय उम्मीदवारों को टिकट देतीं। दूसरे ज़िले से पैसे वालों को लाकर मैदान में उतारने के दो ही मतलब हैं। एक तो गठबंधन के मुसलमान उम्मीदवार के वोट काटकर उसकी हार सुनिश्चित करना, दूसरे अपनी पार्टी के लिए फंड जुटाना।”

तो क्या मुसलमानों ने मायावती से पूरी तरह मुंह मोड़ लिया है? शायद अभी पूरी तरह नहीं। बुलंदशहर निवासी हुसैन अली के मुताबिक़ “विधानसभा और लोकसभा चुनाव में वोटर की मनोस्थिति अलग होती है। यहां मुसलमान मतदाताओं का मानना है कि इंडिया गठबंधन ही विकल्प है। इस चुनाव में अगर मायावती अखिलेश यादव से पहले इंडिया गठबंधन में आ जातीं या वो गठबंधन में होतीं और समाजवादी पार्टी अकेले चुनाव लड़ रही होती तो यक़ीन मानिए सपा की हालत बसपा से भी ख़राब होती।”

सिर्फ मुसलमान ही नहीं कुछ जगहों पर गैर-जाटव दलित व अति पिछड़ी जातियों के लोग भी शायद यही मानकर वोट कर रहे हैं। मेरठ लोकसभा सीट पर जहां समाजवादी पार्टी उम्मीदवार सुनीता वर्मा जाटव समुदाय से हैं और बसपा ने देवव्रत कुमार त्यागी को अपना उम्मीदवार बनाया है, वहां कई जगह से दलित मतदाताओं के सपा के पक्ष में वोट करने की ख़बरें आईं। इसी तरह बुलंदशहर, ग़ाज़ियाबाद, और अमरोहा में भी गैर जाटव दलित व अति पिछड़ी जातियों के वोटरों ने कम संख्या में ही सही, लेकिन कांग्रेस उम्मीदवार के पक्ष में वोट किया। नगीना में दलितों के वोट का एक बड़ा हिस्सा चंद्रशेखर आज़ाद की तरफ जाता दिखा। कैराना, बाग़पत, और मुरादाबाद में समाजवादी पार्टी के उम्मीदवारों को गैर जाटव दलित व अति पिछड़ी जातियों के वोटरों में हिस्सेदारी हासिल हुई है। कुछ जगह भाजपा भी दावा कर रही है कि इन वर्गों के वोटर उसके पक्ष में आए हैं।

अगर यह दावे सच हैं तो बसपा को अगले विधानसभा चुनाव से पहले अपनी रणनीति में बदलाव करना पड़ेगा। पार्टी के लिए अच्छी बात है कि आकाश आनंद के रूप में बसपा के पास युवा नेतृत्व है, जो पढ़ा-लिखा है और मुद्दों की समझ रखता है। लेकिन बसपा को अपनी नकारात्मक छवि से पीछा छुड़ाना होगा। इस चुनाव में बसपा कुछ सीटों पर गंभीर चुनौती देती नज़र आ रही है। बसपा को इससे आगे बढ़कर साबित करना होगा कि वह महज़ वोटकटवा या समाजवादी पार्टी को हराने के लिए चुनाव नहीं लड़ती है, बल्कि उसकी ख़ुद की चुनौती सत्ता पाने के लिए है। अगर बसपा ऐसा नहीं कर पाती है तो अल्पसंख्यक ही नहीं, जाटव व गैर-जाटव दलित तथा अति पिछड़ी जातियों के मतदाता भी उसके छिटकते जाएंगे और नए विकल्प सामने आएंगे। 

(संपादन : राजन/नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

सैयद ज़ैग़म मुर्तज़ा

उत्तर प्रदेश के अमरोहा ज़िले में जन्मे सैयद ज़ैग़़म मुर्तज़ा ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से लोक प्रशासन और मॉस कम्यूनिकेशन में परास्नातक किया है। वे फिल्हाल दिल्ली में बतौर स्वतंत्र पत्रकार कार्य कर रहे हैं। उनके लेख विभिन्न समाचार पत्र, पत्रिका और न्यूज़ पोर्टलों पर प्रकाशित होते रहे हैं।

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