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दो कार्यकाल से ज्यादा न हो किसी एक व्यक्ति का प्रधानमंत्रित्व काल

इंदिरा गांधी ने अपनी दूसरी पारी में इमरजेंसी लगाई, मगर 1977 के चुनाव ने देश को बचा लिया। अपनी तीसरी पारी में वे हत्यारों की गोलियों की शिकार हो गईं। मगर मोदी के मामले में आरएसएस की फैक्ट्री से निकली भाजपा ने यह सुनिश्चित किया कि प्रधानमंत्री रहते हुए उन्हें कोई चुनौती न दे सके। बता रहे हैं प्रो. कांचा आइलैय्या शेपर्ड

भारतीय लोकतंत्र 75 साल से अधिक उम्र का हो गया है। डॉ. बी.आर. आंबेडकर, जवाहरलाल नेहरू और सरदार वल्लभभाई पटेल – ने इस लोकतंत्र की नींव एक लिखित और दूरदृष्टा संविधान पर रखी थी। बीच-बीच में संकट के कुछ दौर आए, मगर कुल मिलाकर भारत में पिछले सात दशकों के लंबे समय से लोकतंत्र कायम है।

कांग्रेस को छोड़ सभी पार्टियों ने एकजुट होकर आपातकाल के खिलाफ संघर्ष किया और यह सुनिश्चित किया कि देश सन् 1977 में संकट से बाहर आ जाए। सन् 2024 में 18वीं लोकसभा के चुनाव के पहले भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के अतिरिक्त, अधिकांश दलों की यह मान्यता थी कि देश का संविधान खतरे में है। कांग्रेस की पहल पर और उसके नेतृत्व में भाजपा/आरएसएस से इतर राजनैतिक ताकतों को एक मंच पर लाने का प्रयास हुआ और यह तय हुआ कि संविधान की रक्षा को एक चुनावी मुद्दा बनाया जाए। इंडिया गठबंधन ने यही किया। भाजपा ने नरेंद्र मोदी पर केंद्रित घोषणापत्र बनाया। इसका शीर्षक ही व्यक्ति केंद्रित था – ‘मोदी की गारंटी’। यह साफ़ था कि तीसरी बार जीतने के बाद मोदी सारे स्वांग त्यागकर विशुद्ध तानाशाह बन जाएंगे।

घोषणापत्र के शीर्षक से यह भी साफ़ था कि एक व्यक्ति की हिटलरशाही के सामने पूरी भाजपा नतमस्तक है। कोई भी स्वाभिमानी पार्टी कभी अपने किसी एक नेता को केवल उसके नाम पर घोषणापत्र बनाने की इज़ाज़त नहीं देगी। इससे न केवल यह जाहिर हुआ कि इतनी बड़ी पार्टी के नेतृत्व की संयुक्त ताकत एक व्यक्ति के सामने बौनी है, बल्कि यह भी कि पार्टी पर आरएसएस का ‘नैतिक’ प्रभाव भी समाप्त हो गया है। आरएसएस का हमेशा से यह दावा रहा है कि वह राजनीति से दूर रहता है और अपने कार्यकर्ताओं को सदाचारी और निस्वार्थ राष्ट्रवादी बनने की प्रशिक्षण देता है। जबकि भाजपा के घोषणापत्र का शीर्षक पार्टी में आतंरिक एकाधिकारवाद की अभिव्यक्ति है, यह किसी से छिपा नहीं था।

सन् 2019 में फिर से चुने जाने के समय तक, मोदी का भाजपा और आरएसएस पर इतना अधिक नियंत्रण नहीं था। मोदी की दूसरी पारी ख़त्म होते-होते, आरएसएस का पार्टी पर नियंत्रण समाप्त हो गया। यह ‘मोदी की गारंटी’ शीर्षक वाले घोषणापत्र से साफ़ था। इसे और स्पष्ट करते हुए मोदी ने कहा कि वे जैविक रूप से पैदा नहीं हुए हैं, बल्कि उन्हें परमात्मा ने एक विशिष्ट उद्देश्य के लिए भेजा है!

तीसरी बार प्रधानमंत्री बने नरेंद्र मोदी

इंडिया गठबंधन के लिए चुनाव लड़ना आसान नहीं था। कांग्रेस के बैंक खाते फ्रीज कर दिए गए थे और गठबंधन के दो मुख्यमंत्रियों, जो अपने-अपने क्षेत्रों में प्रभावी ढंग से प्रचार कर सकते थे, को जेल में डाल दिया था। इसके बाद भी इंडिया गठबंधन ने व्यक्ति-केंद्रित चुनाव प्रचार और गारंटियों को मात देने में सफल रही। मोदी (भाजपा नहीं) को 240 पर रोक दिया गया। इस चुनाव के नतीजों से आरक्षण के लिए पात्र सामाजिक समूहों में नई आशा जगी है। कांग्रेस ने अपने चुनाव अभियान के दौरान यह घोषणा की कि इंडिया गठबंधन न केवल आरक्षण के प्रावधानों की रक्षा करेगा, बल्कि मोदी द्वारा चलाए जा रहे निजीकरण अभियान को भी रोकेगा। उसने अपने घोषणापत्र में जातिगत जनगणना करवाने का वादा भी किया था।

अगर मोदी को 400 सीटें मिल जातीं तो हमारे देश, हमारे लोकतंत्र और हमारे संविधान का क्या हश्र होता, यह कहना मुश्किल है।

दो से ज्यादा कार्यकाल में क्या समस्या है?

पूर्ण बहुमत के साथ प्रधानमंत्री के रूप में तीसरा कार्यकाल किसी भी व्यक्ति को तानाशाह बना सकता है। नेहरू युग में ही कांग्रेस को संविधान में यह प्रावधान कर देना चाहिए था कि दो कार्यकालों के बाद संबंधित व्यक्ति प्रधानमंत्री बनने के लिए अपात्र हो जाएगा। सन् 1962 तक आते-आते नेहरू तानाशाह बन चुके थे। मगर फिर 1962 के भारत-चीन युद्ध ने उन्हें विनम्र बनने पर मजबूर कर दिया। और फिर अपनी तीसरी पारी के बीच ही वे इस दुनिया से चले गए। वैसे भी, उन्हें अपनी पार्टी के भीतर गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा था।

इंदिरा गांधी ने अपनी दूसरी पारी में इमरजेंसी लगाई, मगर 1977 के चुनाव ने देश को बचा लिया। अपनी तीसरी पारी में वे हत्यारों की गोलियों की शिकार हो गईं। मगर मोदी के मामले में आरएसएस की फैक्ट्री से निकली भाजपा ने यह सुनिश्चित किया कि प्रधानमंत्री रहते हुए उन्हें कोई चुनौती न दे सके। वे एक ऐसे राजा के रूप में प्रतिष्ठापित कर दिए गए, जो कभी कोई गलती करता ही नहीं है या कर ही नहीं सकता। 

पिछले दस वर्षों में पूरे देश ने देखा कि आरएसएस/भाजपा ने मोदी की हर कथनी और करनी को सही ठहराया। रोमन सम्राट जूलियस सीजर की तरह की शक्तियों से लैस होने के कारण मोदी संविधान के लिए एक खतरा बन गए।

सन् 1962 के नेहरू की तरह, मोदी भी अपनी तीसरी पारी की शुरुआत एक तानाशाह की तरह कर रहे हैं। अगर संघ द्वारा दिखाए गई राह पर चलने वाली भाजपा, कांग्रेस से ज्यादा नैतिक पार्टी होती तो वह निश्चय ही यह सुझाव देती कि संविधान में संशोधन के ज़रिए प्रधानमंत्रियों का कुल कार्यकाल दो बार तक सीमित कर दिया जाना चाहिए। अगर इस तरह का संशोधन प्रस्तावित किया जाता तो विपक्ष के पास उसका समर्थन करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता। मगर संघ ने मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद इस तरह के नैतिकता पर आधारित सिद्धांत का कोई प्रस्ताव नहीं किया।

अगर इसी तरह का नियम मुख्यमंत्रियों के मामले में लागू कर दिया जाए तो नवीन पटनायक और नीतीश कुमार जैसे लोगों के लिए दशकों तक शासन करना संभव नहीं रह जाएगा। ऐसी स्थिति में क्षेत्रीय पार्टियों में भी अलग-अलग परिवारों और समुदायों से नेतृत्व उभरेगा। पार्टी के अध्यक्ष पद का मामला अलग है। कोई भी व्यक्ति जीवन पर्यंत अपनी पार्टी का अध्यक्ष बना रह सकता है, मगर प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री के पद एक अलग श्रेणी में हैं। संपूर्ण शासकीय तंत्र उनके नियंत्रण में रहता है। ऐसे में एकाधिकारवादी प्रवृत्ति पैदा हो सकती है। अंततः यह तानाशाही में बदल सकती है और फिर कोई यह तय कर सकता है कि वह संविधान को नए सिरे से लिखना चाहता है।

अमरीका ने अपने संविधान की सुरक्षा के लिए राष्ट्रपतियों का कार्यकाल 4-4 वर्ष के दो कार्यकालों तक सीमित कर दिया। देश के पहले राष्ट्रपति जॉर्ज वाशिंगटन ने दो बार से अधिक राष्ट्रपति बनने से इंकार कर दिया था। नेहरू के विपरीत, नेल्सन मंडेला ने राष्ट्रपति के रूप में अपने पांच साल के कार्यकाल के बाद फिर से राष्ट्रपति बनने से इंकार कर दिया। मेक्सिको में तो कोई भी व्यक्ति केवल छह साल (एक कार्यकाल की अवधि) तक राष्ट्रपति रह सकता है। इसी कारण वहां के अत्यंत लोकप्रिय राष्ट्रपति अन्द्रेस मेंनुएल लोपेज़ ओब्राडोर की जगह उन्हीं की पार्टी की क्लौडिया शेंबूम को राष्ट्रपति नियुक्त किया गया।

भारत आरएसएस नहीं है

इसके विपरीत मोदी भारत में केवल अपना शासन चाहते हैं। यह 2014 में ही साफ़ हो गया था, जब वे चुनाव जीते थे और कांग्रेस को केवल 44 सीटें मिली थीं। उनके भक्तों ने तभी से यह कहना शुरू कर दिया था कि भारत को राष्ट्रपति प्रणाली अपनानी चाहिए। उनके तीसरे चुनाव के पहले “मोदी की गारंटी” और “अबकी बार चार सौ पार” के नारे बुलंद किए गए। उनकी पार्टी के कुछ सदस्यों ने 400 सीटें हासिल करने के बाद संविधान को बदलने की बात कहनी शुरू कर दी थी। 

ऐसा नहीं है इसके पहले किसी पार्टी को चुनाव में 400 से ज्यादा सीटें हासिल हुई ही न हों। कांग्रेस को 1984 में 404 सीटें मिली थीं। इस विजय के बाद राजीव गांधी जैसे युवा नेता प्रधानमंत्री बने। मगर किसी ने राष्ट्रपति प्रणाली अपनाने या संविधान को बदलने की बात नहीं की। मगर अब हमारे नेता आरएसएस के पालने में पले मोदी हैं, जो अपनी पहली जीत के बाद से ही अमरीकी राष्ट्रपति की तरह का शक्तिशाली शासक बनने के सपने देखने लगे थे। जाहिर है कि इसके लिए संविधान को पूरी तरह बदलना होगा।

मेरे विचार से इस मामले में केवल मोदी दोषी नहीं हैं। दरअसल, आरएसएस इस देश का स्थायी शासक बनना चाहता है। संघ केवल और केवल एक व्यक्ति के नेतृत्व में काम करता है। अगर यही मॉडल हमारे देश पर लागू किया जाता है तो संविधान की धज्जियां उड़ जाएंगीं। संघ द्वारा प्रशिक्षित कोई भी व्यक्ति चुनौती-विहीन नेता बनते ही भाजपा के पितृ संगठन की तानाशाह शासन की चाहत को अभिव्यक्त करने लगता है।

मगर भारत आरएसएस नहीं है। भारत अनुमानित तौर पर 140 करोड़ लोगों का देश है, जिन्हें जीवन और स्वतंत्रता का अधिकार चाहिए और एक भविष्य भी। 

अगर संघ सचमुच एक ज़िम्मेदार संगठन है और यदि राष्ट्रनिर्माण में वह कुछ योगदान देना चाहता है तो उसे प्रधानमंत्रियों के लिए अधिकतम दो कार्यकालों का प्रस्ताव करना चाहिए, फिर चाहे एक ही पार्टी कितनी ही बार अपने बल पर बहुमत क्यों न हासिल कर ले।

अगर संघ-भाजपा यह पहल नहीं करते हैं तो इंडिया गठबंधन को यह प्रस्ताव रखना चाहिए। इससे हम हमारे संविधान की उन नेताओं से रक्षा कर सकेंगे, जो लोकतंत्र का पूरा तंत्र ही ध्वस्त करना चाहते हैं।

(यह आलेख मूल अंग्रेजी में वेब पत्रिका ‘द न्यूज मिनट’ द्वारा पूर्व में प्रकाशित व यहां हिंदी अनुवाद लेखक की सहमति से प्रकाशित, अनुवाद : अमरीश हरदेनिया, संपादन : राजन/नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

कांचा आइलैय्या शेपर्ड

राजनैतिक सिद्धांतकार, लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता कांचा आइलैया शेपर्ड, हैदराबाद के उस्मानिया विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान के प्राध्यापक और मौलाना आजाद राष्ट्रीय उर्दू विश्वविद्यालय, हैदराबाद के सामाजिक बहिष्कार एवं स्वीकार्य नीतियां अध्ययन केंद्र के निदेशक रहे हैं। वे ‘व्हाई आई एम नॉट ए हिन्दू’, ‘बफैलो नेशनलिज्म’ और ‘पोस्ट-हिन्दू इंडिया’ शीर्षक पुस्तकों के लेखक हैं।

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