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दिल्ली विधानसभा चुनाव : बसपा के पास न जीतने की रणनीति और न नीयत

बसपा की आदत अपने उम्मीदवारों को टिकट देकर भूल जाने की है। उम्मीदवारों को अपने दम पर चुनाव लड़ना पड़ता है। पार्टी न तो उम्मीदवारों की मदद करती है और न प्रचार में कोई सक्रिय सहयोग करती है। इसका ख़ामियाज़ा उसे भुगतना पड़ता है। बता रहे हैं सैयद ज़ैग़म मुर्तज़ा

बहुजन समाज पार्टी (बसपा) दिल्ली में 69 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ रही है। पार्टी ने चुनाव के लिए 40 स्टार प्रचारकों की सूची जारी की है। बसपा प्रमुख कुमारी मायावती का दावा है कि पार्टी पूरे दमख़म से चुनाव लड़ रही है और इस बार पहले से बेहतर प्रदर्शन करेगी। सुनने में ये बातें अच्छी लगती हैं लेकिन ज़मीन पर वास्तविक स्थिति क्या बसपा के लिए इतनी अच्छी है?

विधानसभा चुनाव के लिए बसपा ने दिल्ली को पांच ज़ोन में बांटा है। हर ज़ोन के लिए पार्टी ने एक प्रभारी की नियुक्ति की है। इस बार पार्टी की नीति दलित बस्तियों और कॉलोनियों में घर-घर जाकर वोट मांगने की है। उसकी योजना है कि पार्टी की नीतियों के बारे में लोगों को बताया जाए और चुनाव पूरी ताकत से लड़ा जाए। पार्टी नेता दावा कर रहे हैं कि इस बार दलितों का रूझान बसपा की तरफ है। मतदाताओं को आकर्षित करने के लिए बसपा कार्यकर्ता नुक्कड़ नाटक आयोजित कर रहे हैं। नेता बच्चों के साथ क्रिकेट मैच खेल रहे हैं। दीवारों पर पेंटिंग और पोस्टर के ज़रिए मतदाताओं तक पहुंच बनाने की कोशिश हो रही है। लेकिन क्या चुनाव जीतने के लिए इतना काफी है?

दिल्ली में बसपा के प्रदर्शन में लगातार गिरावट आई है। पिछले तीन विधानसभा चुनाव में तो पार्टी अपना खाता भी नहीं खोल पाई। हालांकि एक समय था जब दिल्ली में बसपा की हालत काफी बेहतर थी। वर्ष 1989 के चुनाव में पार्टी ने राष्ट्रीय राजधानी में पहली बार अपनी उपस्थिति दर्ज कराई थी। तब बसपा के संस्थापक कांशीराम ने उत्तरी दिल्ली लोकसभा सीट से चुनाव लड़कर 11.2 फीसदी वोट हासिल किए थे। कांशीराम एक बार और दिल्ली से चुनाव लड़े। हालांकि दोनों ही बार उनके हाथ निराशा लगी थी, लेकिन बसपा का प्रदर्शन सम्मानजनक रहा।

बीते वर्ष हरियाणा में हुए विधानसभा चुनाव के दौरान बसपा की रैली में मौजूद लोग

वर्ष 1993 के विधानसभा चुनाव में बसपा ने 55 उम्मीदवारों को टिकट दिया। पार्टी को कुल 3.90 प्रतिशत वोट हासिल हुए और एक उम्मीदवार को जीत हासिल हुई। फिर 1998 में बसपा को 3.15 प्रतिशत वोट मिले, लेकिन उसका कोई उम्मीदवार विजयी नहीं हुआ। वर्ष 2003 में भी किसी उम्मीदवार को सफलता नहीं मिली, लेकिन इस बार बसपा का कुल वोट शेयर बढ़कर 5.76 प्रतिशत हो गया। वर्ष 2008 में बसपा ने दिल्ली में अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया। इस बार पार्टी के दो विधायक चुनकर आए, छह उम्मीदवार दूसरे स्थान पर रहे और वोट हिस्सेदारी बढ़कर 14.05 प्रतिशत हो गई। लेकिन 2013 में बसपा उम्मीदवारों को निराशा हाथ लगी। साथ ही इस बार पार्टी का वोट प्रतिशत गिरकर 5.33 प्रतिशत रह गया। इसी चुनाव में आम आदमी पार्टी भी पहली बार चुनाव लड़ रही थी। हालांकि बहुमत उसको भी नहीं मिली थी। वर्ष 2015 में बीएसपी को सिर्फ 1.31 प्रतिशत वोट मिले। इस चुनाव में आम आदमी पार्टी ने 70 में से 67 विधानसभा सीटों पर जीत हासिल की। वर्ष 2020 में हुए विधानसभा चुनाव में बसपा की हिस्सेदारी महज़ 0.7 प्रतिशत वोटों पर सिमट गई। पार्टी के तमाम उम्मीदवार मिलकर केवल 62,315 वोट ही जुटा पाए।

हालांकि बीच-बीच में बसपा वापसी करती भी दिखी है। मसलन, 2007 के नगर निगम चुनाव में बसपा के 17 पार्षद चुने गए। यह नगर निगम चुनाव में पार्टी का अब तक का सबसे बेहतरीन प्रदर्शन है। वर्ष 2012 में भी बसपा के कुल 15 पार्षद चुने गए। वर्ष 2017 में यह संख्या घटकर सिर्फ तीन रह गई। इसके बाद नगर निगम से भी बसपा का सफाया हो गया। वर्ष 2022 में पार्टी के सभी उम्मीदवार चुनाव हार गए। नगर निगम में भी पार्टी के वोटर आम आदमी पार्टी की तरफ चले गए। कुल मिलाकर 2008 के बाद से ही बसपा का प्रदर्शन दिल्ली में ख़राब होता चला गया।

इसकी कई वजहें हैं। पहले शीला दीक्षित के नेतृत्व में कांग्रेस ने पार्टी के वोट बैंक में सेंध लगाई। वर्ष 2013 के बाद से दलित वोटरों की बड़ी तादाद आम आदमी पार्टी के साथ चली गई। तब से अरविंद केजरीवाल की पार्टी दलित वोटरों की पहली पसंद बनी हुई है। यह तब है जब बसपा के संस्थापक कांशीराम के अलावा कुमारी मायावती का भी दिल्ली से गहरा रिश्ता रहा है। एक समय था जब मायावती त्रिलोकपुरी इलाक़े में रहा करती थीं। अभी भी दिल्ली में रहने पर उनका अधिकांश समय गुरुद्वारा रकाबगंज रोड वाले बंगले में ही गुज़रता है। लेकिन इसका फायदा बसपा उम्मीदवारों को नहीं मिल पा रहा।

दिल्ली में बसपा के लगातार गिरते प्रदर्शन के पीछे कई कारण हैं। एक तो दलित वोटरों की बड़ी संख्या ने सत्ता में आने वाली पार्टी का साथ चुना। दूसरा कारण यह कि बसपा दिल्ली के दलित वोटरों की उम्मीदों पर खरी नहीं उतरी। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में दलित वोटरों की संख्या 16 फीसदी से ज़्यादा है। मगर बसपा की आदत अपने उम्मीदवारों को टिकट देकर भूल जाने की है। उम्मीदवारों को अपने दम पर चुनाव लड़ना पड़ता है। पार्टी न तो उम्मीदवारों की मदद करती है और न प्रचार में कोई सक्रिय सहयोग करती है। इसका ख़ामियाज़ा उसे भुगतना पड़ता है।

इस बार भी वोटिंग से ठीक एक महीना पहले यानी 5 जनवरी को बसपा ने कोंडली इलाक़े में पहली चुनावी रैली की। इस रैली को आकाश आनंद ने संबोधित किया। इसके बाद से पार्टी का चुनाव अभियान ख़बरों से ग़ायब है। मायावती दलित मुद्दों पर सक्रिय आंदोलन तो दूर, दिल्ली में चुनावी सभाएं करने से भी बचती रही हैं। इस बार भी आरोप लग रहा है कि बसपा की सारी क़वायद इसे लेकर है कि दलित मतदाता आम आदमी पार्टी या कांग्रेस के साथ न जाएं। संगम विहार निवासी नरेश जाटव का मानना है कि “पार्टी दिल्ली में चुनाव जीतने के लिए लड़ती ही नहीं हैं।” दक्षिण पुरी निवासी राजकुमार का कहना है कि “दिल्ली में बसपा उम्मीदवारों के नाम का ऐलान हर बार होता है, लेकिन पार्टी कभी चुनाव लड़ती हुई नज़र नहीं आती।”

बहुजन समाज पार्टी के नेता बड़े-बड़े दावे भले कर रहे हैं, लेकिन हालात इस बार भी अलग नहीं हैं। इस बार बसपा के सामने दिल्ली में आज़ाद समाज पार्टी की भी चुनौती है। हालांकि चंद्रशेखर की पार्टी के सिर्फ सात उम्मीदवार मैदान में हैं, लेकिन दलित वोटों में बंटवारा तो होगा ही। बसपा की कमान इस बार आकाश आनंद ने संभाल रखी है। लेकिन पार्टी के पास न तो चुनाव लड़ने लायक़ संसाधन हैं और न जीतने लायक़ उम्मीदवार। ऐसे में देश की सबसे प्रमुख दलित पार्टी के सामने चुनौती है कि वह अपना खोया गौरव कैसे हासिल करे। मगर जब मायावती ही मैदान में न उतरें, तो यह चुनौती भला पार्टी स्वीकार कैसे करेगी?

(संपादन : राजन/नवल/अनिल)

लेखक के बारे में

सैयद ज़ैग़म मुर्तज़ा

उत्तर प्रदेश के अमरोहा ज़िले में जन्मे सैयद ज़ैग़़म मुर्तज़ा ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से लोक प्रशासन और मॉस कम्यूनिकेशन में परास्नातक किया है। वे फिल्हाल दिल्ली में बतौर स्वतंत्र पत्रकार कार्य कर रहे हैं। उनके लेख विभिन्न समाचार पत्र, पत्रिका और न्यूज़ पोर्टलों पर प्रकाशित होते रहे हैं।

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