[बिहार के शाहाबाद (वर्तमान में रोहतास जिला) के करगहर में त्रिवेणी संघ की स्थापना चौधरी जे.एन.पी. मेहता, सरदार जगदेव सिंह यादव और डॉ. शिवपूजन सिंह ने की थी। इसका उद्देश्य शोषित, पिछड़े, दलित, किसान और मजदूर वर्ग को संगठित कर सामाजिक न्याय, समानता और आत्मसम्मान की लड़ाई को आगे बढ़ाना था। इसी ऐतिहासिक विरासत को स्मरण करते हुए आगामी 14 जून, 2026 को बिहार की राजधानी पटना स्थित बाबू जगजीवन राम संसदीय अध्ययन एवं राजनीतिक शोध संस्थान में त्रिवेणी संघ स्थापना दिवस मनाया जाएगा। यह आयोजन सामाजिक न्याय आंदोलन, बिहार के द्वारा किया जा रहा है। इस संबंध में बीते 3 जून, 2026 को फॉरवर्ड प्रेस के द्वारा एक ऑनलाइन बातचीत का आयोजन किया गया। इसका शीर्षक था– ‘बहुजन आंदोलन की चुनौतियां और त्रिवेणी संघ की विरासत’। इसमें डॉ. सिद्धार्थ रामू ने सामाजिक न्याय आंदोलन, बिहार के संयोजक रिंकु यादव से विशेष बातचीत की। इस बातचीत को लिपिबद्ध कर आलेख के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं फैयाज आलम]
अतीत से साक्षात्कार और वर्तमान का संकट
इतिहास महज़ बीते हुए समय की दास्तान भर नहीं होता, बल्कि वह वर्तमान के अंधेरों में रास्ता दिखाने वाला मशाल भी होता है। आज जब हम सन् 2026 में भारत और विशेषकर बिहार के सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य को देखते हैं, तो एक अजीब सी बेचैनी और वैचारिक शून्यता का अहसास होता है। बिहार, जिसे आधुनिक भारत में सामाजिक न्याय, समता और लोकतांत्रिक चेतना की ‘अग्रिम चौकी’ माना जाता रहा है, आज वह वैचारिक रूप से एक पीछे की यात्रा पर निकल चुका है। 1990 के दशक में जिस सामंती और वर्चस्ववादी व्यवस्था को यहां की उत्पीड़ित जनता ने अपनी सांगठनिक ताकत से सत्ता से बेदखल किया था, आज वे शक्तियां ही नए मुखौटों के साथ सत्ता के शीर्ष पर काबिज़ हो चुकी हैं।
ऐसे संक्रमण काल में यह बेहद ज़रूरी हो जाता है कि हम अपनी जड़ों की ओर लौटें। हम उस ऐतिहासिक मोड़ को याद करें जहां से आधुनिक बिहार में सामाजिक न्याय और लोकतंत्र के संघर्ष की बुनियाद पड़ी थी। आज से ठीक 93 वर्ष पहले, यानी 30 मई, 1933 को बिहार के करगहर में त्रिवेणी संघ की स्थापना हुई थी। आगामी 14 जून को जब हम पटना के बाबू जगजीवन राम संसदीय अध्ययन एवं राजनीतिक शोध संस्थान में ‘त्रिवेणी संघ स्थापना दिवस’ मनाने जा रहे हैं, तो हमारा उद्देश्य महज़ एक ऐतिहासिक घटना का उत्सव मनाना नहीं है। हमारा उद्देश्य इस महान विरासत को समकालीन संदर्भों में पुनः खोजना, उसे परिभाषित करना और आज के फासीवादी व कॉर्पोरेट हमले के खिलाफ एक नया वैचारिक हथियार तैयार करना है।
त्रिवेणी संघ का उदय : जातिगत संकीर्णता से वर्गीय चेतना की ओर
त्रिवेणी संघ के ऐतिहासिक महत्व को समझने के लिए हमें बीसवीं सदी के शुरुआती तीन दशकों के बिहार को समझना होगा। उस दौर में संपूर्ण हिंदी पट्टी में भयंकर सामंती उत्पीड़न, जातिवाद और औपनिवेशिक शोषण का बोलबाला था। सामाजिक स्तर पर पिछड़ी और अछूत समझी जाने वाली जातियों के लोगों का जीवन मानवीय गरिमा से महरूम था। लेकिन इसी दौर में इस सामंतवादी दमन-शोषण के खिलाफ चेतना जागृत होने लगी थी। हालांकि वह चेतना शुरुआत में ‘जातीय सभाओं’ के रूप में प्रकट हुई। यादव, कुर्मी और कोइरी जैसी जातियों के लोगों ने अपनी-अपनी अलग सभाएं बनाईं। ये जातीय सभाएं मुख्य रूप से अपनी जाति के भीतर सुधार करने या सामाजिक प्रतिष्ठा प्राप्त करने तक सीमित थीं।
लेकिन 1933 का साल एक युगांतकारी मोड़ साबित हुआ। सरदार जगदेव सिंह यादव, डॉ. शिवपूजन सिंह और जे.एन.पी. मेहता आदि नेताओं ने यह शिद्दत से महसूस किया कि अलग-अलग टुकड़ों में रहकर सामंतवाद और ब्राह्मणवाद का मुकाबला नहीं किया जा सकता। उन्होंने इन जातीय सीमाओं को लांघकर ‘त्रिवेणी संघ’ के रूप में एक साझा मोर्चा बनाया।
मेरी दृष्टि में त्रिवेणी संघ महज़ तीन बड़ी पिछड़ी जातियों का राजनीतिक गठबंधन नहीं था। यह उत्तर भारत के इतिहास में उत्पीड़ित जातियों के एक वर्ग के रूप में संगठित होने की दिशा में पहला और सबसे साहसिक कदम था। यह शोषितों का पहला वर्गीय संगठन था। इसने यह साबित किया कि सामाजिक और आर्थिक रूप से प्रताड़ित लोग जब तक अपनी संकीर्ण पहचानों को भूलकर एक वर्ग के रूप में खड़े नहीं होंगे, तब तक मुट्ठी भर विशेषाधिकार प्राप्त शक्तियों को चुनौती नहीं दी जा सकती।

त्रिवेणी संघ का बिगुल : एक क्रांतिकारी दस्तावेज
त्रिवेणी संघ ने अपने विचारों और उद्देश्यों को प्रचारित करने के लिए सन् 1939 में एक घोषणा-पत्र जारी किया था। ‘त्रिवेणी संघ का बिगुल’ महज़ एक पुस्तिका नहीं, बल्कि भारतीय समाज की संरचना का पहला मुकम्मल बहुजन दस्तावेज़ था। इसमें देश की आज़ादी और शोषितों की मुक्ति को लेकर जो दर्शन पेश किया गया था, वह आज के दौर में भी उतना ही प्रासंगिक है।
‘बिगुल’ में साफ़ तौर पर रेखांकित किया गया था कि भारत की वंचित और शोषित जनता केवल एक दुश्मन ब्रिटिश साम्राज्यवाद से नहीं लड़ रही है। इसमें देश के भीतर सक्रिय चार तरह के साम्राज्यवादों को चिह्नित किया गया और उनके समूल नाश का आह्वान किया गया।
- धार्मिक एवं सामाजिक साम्राज्यवाद : इसके तहत ब्राह्मणवादी व्यवस्था और जातिगत ऊंच-नीच को रखा गया, जिसने बहुसंख्यक आबादी को मानसिक और सामाजिक गुलामी में जकड़ रखा था।
- आर्थिक साम्राज्यवाद : इसमें जमींदारों, सामंतों और सूदखोरों द्वारा किसानों और मजदूरों के खून-पसीने की होने वाली बेरहम लूट को शामिल किया गया।
- राजनीतिक साम्राज्यवाद : इसमें ब्रिटिश औपनिवेशिक हुकूमत और उनके प्रति वफादार देसी राजा-रजवाड़ों के गठजोड़ को निशाना बनाया गया।
त्रिवेणी संघ ने बाकायदा व्याख्या की कि ये साम्राज्यवादी शक्तियां किस तरह एक-दूसरे से नालबद्ध हैं और जनता पर अपना शिकंजा कसे हुए हैं। उस दौर में जहां मुख्यधारा का राष्ट्रीय आंदोलन (जिसका नेतृत्व बड़े पैमाने पर उच्च वर्गीय और उच्च जातीय कुलीनों के हाथ में था) केवल राजनीतिक स्वतंत्रता (ब्रिटिश शासन से मुक्ति) की बात कर रहा था, वहीं त्रिवेणी संघ ने सामाजिक और आर्थिक आज़ादी को राष्ट्रीय आंदोलन के केंद्र में ला खड़ा किया। उनका स्पष्ट नारा था कि जब तक सामाजिक और आर्थिक साम्राज्यवाद का खात्मा नहीं होता, तब तक राजनीतिक आज़ादी का कोई अर्थ नहीं है।
भारत में ‘वर्ग’ की विशिष्ट पहचान : सामाजिक और आर्थिक का अंतर्संबंध
भारत में वर्ग के यथार्थ को समझना बहुत अधिक जटिल है। भारत में वर्ग की पहचान केवल आर्थिक पेशे से नहीं की जा सकती और न ही केवल सामाजिक या जातीय पहचान से की जा सकती है। त्रिवेणी संघ की सबसे बड़ी वैचारिक देन यही है कि उसने भारत के विशिष्ट संदर्भ में सामाजिक (जाति) और आर्थिक (पेशा) पहचान के अंतर्संबंध को पहचाना। यदि हम जोतीराव फुले की विरासत को याद करें, तो वे भी इसी अंतर्संबंध को रेखांकित कर रहे थे। फुले जब शूद्रों और अति-शूद्रों की सामाजिक पहचान की बात करते हैं, तो वे समानांतर रूप से ‘किसान का कोड़ा’ लिख रहे होते हैं और मजदूरों का यूनियन बना रहे होते हैं। यही बात हमें प्रेमचंद के उपन्यास ‘गोदान’ और फणीश्वरनाथ रेणु के ‘मैला आंचल’ में दिखाई देती है, जहां सामाजिक रूप से पिछड़ी जाति का व्यक्ति ही आर्थिक रूप से सबसे प्रताड़ित किसान या मजदूर है।
त्रिवेणी संघ ने इसी यथार्थ को अपना आधार बनाया। उसने उत्पीड़ित जातियों की बात की, जिन पर जीवन के हर क्षेत्र में बंदिशें थोप दी गई थीं, लेकिन साथ ही उसने भूमिहीन मजदूरों, गरीब किसानों और छोटे व्यापारियों – अर्थात संपूर्ण ‘मेहनतकश’ आवाम को अपने साथ जोड़ा।
आज के दौर में जब हम ‘बहुजन’ शब्द का इस्तेमाल करते हैं, तो कई लोग इसे केवल कुछ जातियों का समूह समझ लेते हैं। यह एक संकीर्ण दृष्टिकोण है। वास्तव में बहुजन शब्द का पर्याय ‘श्रमजीवी’ है। बहुजन वही है जो श्रम करता है, जो उत्पादन करता है, लेकिन जिसके श्रम का फल व्यवस्था के शीर्ष पर बैठे परजीवी लोग लूट लेते हैं। त्रिवेणी संघ ने इसी श्रमजीवी वर्ग को एकजुट करने का ऐतिहासिक प्रयास किया था।

समकालीन राजनीति और 1990 के बाद का वैचारिक विचलन
बिहार के आधुनिक इतिहास में 1990 का दशक एक ऐतिहासिक मील का पत्थर था। सामाजिक न्याय के आंदोलनों के दबाव में सत्ता का संतुलन बदला और पिछड़ों-शोषितों ने राजनीतिक सत्ता की बागडोर संभाली। इसे ‘मंडल दौर’ या सामाजिक न्याय की पहली बड़ी जीत के रूप में देखा गया। लेकिन आज जब हम 2026 में खड़े होकर पिछले साढ़े तीन दशकों का मूल्यांकन करते हैं, तो हमें एक कड़वी हकीकत का सामना करना पड़ता है।
1990 के दशक में जो लड़ाई एक व्यापक सामाजिक-सांस्कृतिक बदलाव और वर्गीय एकजुटता के रूप में शुरू हुई थी, वह धीरे-धीरे ‘राज-पाट में हिस्सेदारी’ और प्रतीकात्मक प्रतिनिधित्व तक सीमित होकर रह गई। बहुजन राजनीति ने व्यवस्था को बदलने के बजाय खुद को उसी व्यवस्था के अनुकूल ढाल लिया। अलग-अलग जातियों के नाम पर पार्टियां बनीं। किसी जाति का एक बड़ा चेहरा सत्ता के गलियारे में पहुंच गया और उस जाति के समाज ने मान लिया कि सामाजिक न्याय का लक्ष्य पूरा हो गया।
इस प्रतीकात्मक राजनीति का परिणाम यह हुआ कि बहुजन आंदोलन गहरे वैचारिक संकट में घिर गया। सबसे दुखद बात यह रही कि हिंदी पट्टी की सामाजिक न्याय की पार्टियों ने कभी अपनी वैचारिक जड़ों की तलाश नहीं की। बिहार में दशकों तक सामाजिक न्याय के नाम पर सरकारें चलीं, लेकिन इन दलों के बड़े नेताओं की जुबान पर कभी त्रिवेणी संघ का नाम नहीं आया।
इसी वैचारिक शून्यता का फायदा उठाकर दक्षिणपंथी और ब्राह्मणवादी शक्तियों (भाजपा-आरएसएस) ने बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में सत्ता पर दोबारा निर्णायक कब्ज़ा कर लिया। उन्होंने बहुजनों की उस वर्गीय एकता को खंडित कर दिया जो सामंतवाद के खिलाफ बनी थी। उन्होंने ‘हिंदू पहचान’ का एक कृत्रिम उभार पैदा किया। जब ब्राह्मणवादी शक्तियां हिंदू पहचान को उभारती हैं, तो उसकी अंतर्वस्तु दरअसल स्थापित जाति व्यवस्था को ही पुनर्जीवित करना होती है। वे बहुजनों को नागरिक या वर्ग बनने से रोकती हैं और उन्हें वापस उनकी संकीर्ण जातियों के दायरे में कैद कर देती हैं। आज भाजपा ने पिछड़ों, अति-पिछड़ों और दलितों के कुछ चेहरों को आगे करके उन्हें ‘मुखौटा’ बना रखा है, जबकि पर्दे के पीछे से वास्तविक सत्ता और संसाधनों पर उन्हीं शक्तियों का नियंत्रण है, जिन्हें 1990 में राजनीतिक सत्ता बेदखल किया गया था।
नव-साम्राज्यवाद : कॉर्पोरेट लूट और बहुजन एजेंडा
आज हमारे सामने जो सबसे बड़ी चुनौती है, वह केवल सामाजिक और राजनीतिक नहीं, बल्कि आर्थिक भी है। त्रिवेणी संघ ने 1933 में ब्रिटिश साम्राज्यवाद और देसी जमींदारी के खिलाफ मोर्चा खोला था। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में शहीद होने वाले देशभक्तों की जो सूची प्रसन्न कुमार चौधरी और श्रीकांत जैसे इतिहासकारों ने उपलब्ध कराई है, उससे साफ़ है कि उनमें से 75 प्रतिशत से अधिक लोग इसी शोषित-बहुजन पृष्ठभूमि से थे। त्रिवेणी संघ की यह साझी विरासत देश की आज़ादी और संप्रभुता की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध थी।
आज उसी साम्राज्यवाद ने कॉर्पोरेट लूट का नया चोला ओढ़ लिया है। वर्तमान शासकों ने पूरे बिहार और देश को अडानी और अन्य बड़े पूंजीपतियों की लूट का अड्डा बना दिया है। इस भयावह परिस्थिति में सबसे दुखद पहलू यह है कि समकालीन बहुजन आंदोलनों के एजेंडे से पूंजीवाद और कॉर्पोरेट लूट के खिलाफ लड़ाई पूरी तरह गायब हो चुकी है। ऐसा लगता है कि बहुजन राजनीति ने मान लिया है कि आर्थिक नीतियां उनका विषय ही नहीं हैं। वे केवल टिकटों के बंटवारे और मंत्रालयों में हिस्सेदारी तक सिमट गए हैं।
जबकि अमर शहीद जगदेव प्रसाद ने नारा दिया था–
“सौ में नब्बे शोषित हैं, शोषितों ने ललकारा है।
धन, धरती और राज-पाट में, नब्बे भाग हमारा है।”
इस नारे में ‘धन और धरती’ यानी आर्थिक संसाधनों पर अधिकार की बात राज-पाट से पहले थी। लेकिन आज की बहुजन राजनीति ने धन और धरती के सवाल को पूरी तरह छोड़ दिया है। इसलिए, जब सामाजिक न्याय आंदोलन, बिहार और हमारे साथी 14 जून के कार्यक्रम में कॉर्पोरेट लूट को एक केंद्रीय मुद्दा बना रहे हैं, तो हम असल में त्रिवेणी संघ की उसी ‘बिगुल’ वाली विरासत को आज की चुनौतियों से जोड़ रहे हैं। हमारा मानना है कि जब तक हम पूंजीवादी लूट के खिलाफ मेहनतकशों को एकजुट नहीं करेंगे, तब तक सामाजिक न्याय की हर लड़ाई अधूरी रहेगी।
प्रतिरोध की नई जमीन : स्वतःस्फूर्त आंदोलन और युवा चेतना
भले ही राजनीतिक दल वैचारिक रूप से पंगु हो चुके हों, लेकिन समाज की अंतर्धारा में प्रतिरोध की एक नई ज़मीन तैयार हो रही है। 2014 के बाद से यदि हम देश और विशेषकर युवाओं की सक्रियता को देखें, तो एक नई बहुजन चेतना का जन्म हुआ है। हमने रोहित वेमुला की सांस्थानिक हत्या के खिलाफ विश्वविद्यालयों में सुलगता हुआ गुस्सा देखा है। हमने 2 अप्रैल, 2018 देखा। हमने 5 मार्च, 2019 देखा। हाल ही में यूजीसी रेगूलेशंस-2026 को लागू कराने के लिए बिहार और उत्तर प्रदेश की सड़कों पर छात्रों का अभूतपूर्व संघर्ष देखा है।
इन आंदोलनों की सबसे खास और उम्मीद जगाने वाली विशेषता यह है कि इनमें किसी राजनीतिक दल का झंडा नहीं था। ‘नीला रंग’ आंदोलन का रंग बना और ‘बहुजन नायकों’ – बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर, जोतीराव फुले, पेरियार, जगदेव प्रसाद आदि – के पोस्टर युवाओं के हाथ में थे। नीला रंग आज देश में फासीवाद और ब्राह्मणवाद के खिलाफ सबसे मजबूत प्रतिरोध का प्रतीक बन चुका है।
यह युवा पीढ़ी स्थापित नेतृत्व के भरोसे बैठने के बजाय अपने इतिहास, अपनी जड़ों और अपनी विरासत से सीधे ऊर्जा ले रही है। जब युवा अपनी जड़ों की तलाश में निकलेंगे, तो बहुत स्वाभाविक है कि बिहार की धरती पर उन्हें त्रिवेणी संघ का वह गौरवशाली अध्याय मिलेगा जिसने पहली बार इस लड़ाई को संस्थागत रूप दिया था। हम भी इसी युवा चेतना को एक सुसंगत वैचारिक दिशा देने के लिए त्रिवेणी संघ के इतिहास की ओर लौटे हैं।
सांप्रदायिकता के खिलाफ धर्मनिरपेक्षता का परचम
वर्तमान फासीवादी दौर का सबसे खतरनाक औजार सांप्रदायिकता और धार्मिक घृणा है। बहुजन समाज को बांटने और उनके वास्तविक मुद्दों (रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य) से ध्यान भटकाने के लिए शासक वर्ग चौबीसों घंटे धार्मिक नफरत का जहर उगल रहा है। ऐसे में कुछ लोग यह भ्रम फैलाते हैं कि धर्मनिरपेक्षता या सांप्रदायिकता का सवाल केवल अल्पसंख्यकों का है, बहुजनों का इससे कोई लेना-देना नहीं है। यह एक आत्मघाती सोच है।
त्रिवेणी संघ इस मामले में बेहद स्पष्ट था। 1933 के उस दौर में भी उन्होंने हिंदू-मुसलमान के सांप्रदायिक झगड़ों के खिलाफ आवाज़ उठाई थी। वे दोनों समुदायों के मेहनतकशों की एकता के पक्षधर थे। उन्होंने समाज को बांटने वाले रूढ़िवादी पंडितों और मुल्लाओं-मौलवियों दोनों की तीखी आलोचना की थी। ‘बिगुल’ में साफ़ तौर पर दर्ज है कि ये धार्मिक दंगे और नफरत असल में शोषितों की वर्गीय एकजुटता को तोड़ने की एक साज़िश है।
इसी विरासत को आगे बढ़ाते हुए जगदेव प्रसाद ने 1972 के मध्यावधि चुनाव में अपने दल के घोषणा-पत्र में यह एजेंडा शामिल किया था कि आरएसएस और जनसंघ जैसे सांप्रदायिक संगठनों पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए। उनका स्पष्ट मानना था कि जब तक धार्मिक नफरत फैलाने वाले इन संगठनों को बंद नहीं किया जाता, तब तक शोषितों का इंकलाब संभव नहीं है।
इसलिए, हमारे लिए सेक्युलरिज्म (धर्मनिरपेक्षता) कोई चुनावी नारा या तुष्टिकरण की नीति नहीं है, बल्कि यह हमारी सामाजिक न्याय की लड़ाई की अनिवार्य शर्त है। जो ‘हिंदू पहचान’ आज थोपी जा रही है, उसकी अंतर्वस्तु ही सांप्रदायिक और मनुवादी है। जब तक हम इस सांप्रदायिक चक्रव्यूह को नहीं तोड़ेंगे और धर्मनिरपेक्षता के परचम को मजबूती से बुलंद नहीं करेंगे, तब तक हम एक समतावादी समाज का निर्माण नहीं कर सकते।
एक नए जन-अभियान की शुरुआत
इसलिए आगामी 14 जून, 2026 को पटना के जगजीवन राम शोध संस्थान में आयोजित होने वाला कार्यक्रम महज़ एक दिवसीय सेमिनार नहीं है, बल्कि यह वर्तमान फासीवादी और कॉर्पोरेट राज के खिलाफ एक व्यापक और दीर्घकालिक जन-अभियान का प्रस्थान बिंदु है। इस कार्यक्रम के माध्यम से हम कुछ ठोस सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक प्रस्ताव पारित करेंगे, जो वर्तमान परिस्थितियों में हमारे प्राथमिक एजेंडे को तय करेंगे। हमारे सामने बहुत गंभीर चुनौती है और बिहार का तो खास संदर्भ है। आज देश में संविधान और सामाजिक न्याय को बचाने की जो लड़ाई चल रही है, उसकी अग्रिम चौकी बिहार ही है। फॉरवर्ड प्रेस के सभी पाठकों और दर्शकों से अपील है कि वे अपनी सहभागिता से इस आयोजन को सफल बनाएं और सामाजिक न्याय, संविधान, लोकतंत्र तथा बहुजन एकता की लड़ाई को नई शक्ति और नई दिशा प्रदान करें।
(संपादन : फैयाज/नवल/अनिल)