धार्मिक स्थलों में कौन किस तरह से लूटपाट करता है और उसका धर्म से कितना संबंध है, इसके कई संदर्भ अयोध्या में भव्य राममंदिर में चंदा चोरी की घटना के बाद भी सामने आए हैं।
राज्यसभा के सदस्य और उड़ीसा के राज्यपाल रहे इतिहासकार विशंरनाथ पांडे ने बहुत प्रामाणिक तौर पर यह बताया है कि धर्म का राजनीतिक इस्तेमाल करने वाले शासकों ने धार्मिक स्थलों को लूटा है। धर्म को राजनीति से जोड़ने के मकसद को समझने के लिए ऐसे ऐतिहासिक तथ्यों पर गौर करना मौजूदा घटनाओं को समझने के लिए एक दृष्टि देते हैं।
राम पुनियानी लिखते हैं कि कई राजाओं का लक्ष्य अधिक से अधिक संपत्ति और अधिक से अधिक भूमि पर अधिकार स्थापित करना रहता था। लेकिन इतिहास को इस तरह से प्रस्तुत किया जाता है मानो शासक की हर कार्यवाही केवल उनके धर्म से प्रेरित होती थी। जबकि ऐतिहासिक तथ्य है कि औरंगजेब ने वृंदावन के कृष्ण मंदिर, उज्जैन के महाकाल और गुवाहाटी के कामाख्या मंदिर को भारी धनराशि दान की थी, लेकिन उसी औरंगजेब ने गोलकुंडा में एक मस्जिद में छिपाई गई संपत्ति को हासिल करने के लिए मस्जिद को जमींदोज कर दिया था।
सोशल मीडिया पर लोकप्रिय इतिहासकार डॉ. रुचिका शर्मा बताती हैं कि 11वीं सदी में राजा हर्ष ने लूटपाट मचाई, 9वीं सदी में शंकर वर्मन ने मंदिर लुटे, 18वीं सदी में परशुराम भाऊ ने शृंगेरी के शारदा मंदिर में लूट मचाई। यह भी कि गजनी से पहले कई बार हिंदुओं ने सोमनाथ को लूटा।

अयोध्या में चंदा चोरी को एक धर्म से जोड़कर प्रस्तुत करना सांप्रदायिक राजनीति के व्यापक दायरे को समझने में एक बाधा खड़ी करना है। अयोध्या का नवनिर्मित भव्य राम मंदिर राजनीतिक उद्देश्यों के साथ खड़ा हुआ है। भव्यता एक तरह की वर्चस्ववादी राजनीति का औजार है।
अयोध्या में राममंदिर में दान की चोरी के मसले को दो स्तरों पर समझने की जरूरत है। पहला, धार्मिक स्थलों में गबन, लूटपाट से लेकर चोरी तक की घटनाओं के पीछे क्या वजहें होती हैं।
किसी भी धर्म में आस्था के प्रदर्शन के रूप निश्चित किए गए हैं। इसके दो रूप हैं। एक, आध्यात्मिक स्तर पर त्याग और तपस्या। दूसरा रूप तत्कालीन राजनीतिक व्यवस्था के अनुरूप आस्था के प्रदर्शन की संस्कृति की उपज है। धार्मिक आस्था के प्रदर्शन के आर्थिक स्रोत समय-समय पर आर्थिक व्यवस्था के अनुरूप बदलते रहे हैं।
हिंदू धर्म में आस्था के प्रदर्शन के रूपों में आर्थिक संसाधनों का अत्याधिक असर रहा है। इसे ऐतिहासिक संदर्भों से भी समझा जा सकता है। हाल के एक उदाहरण से इसे देखें कि केंद्रीय गृह सचिव जैसे अहम पद पर रहने वाले एक पूर्व आईएएस अधिकारी ने बताया कि उन्होंने तुलसी दास द्वारा रचित रामचरितमानस को सोने से मंढवाकर अयोध्या के भव्य मंदिर में दान किया। वे भारत सरकार के सबसे बड़े पदों पर रहे और फिर सरकारी नौकरी के खत्म होने के बाद बड़ी प्राइवेट कंपनियों के साथ जुड़े रहे। अयोध्या में जो सोना दान दिया वह उनके परिवार की पुश्तैनी संपत्ति थी और उन्होंने इस दान से अपनी आस्था प्रकट की। फिर चंदा चोरी प्रकरण के दौरान उन्होंने उसके गायब होने का भी आरोप लगाया।
अयोध्य़ा के राम मंदिर में चंदा चोरी के आरोपों को इस रूप में देखा जाना चाहिए। राम मंदिर लोगों के लिए आस्था के प्रकटीकरण का स्थल बेशक हो, लेकिन वह एक तरह की राजनीतिक संस्कृति का भी केंद्र है। अयोध्या में भव्य राम मंदिर के निर्माण के लिए आस्था के नाम पर समर्थन हासिल करने का एक राजनीतिक मकसद रहा है। इसीलिए इसे राजनीतिक संस्कृति की बुराईयों से कितना बचाया जा सकता है? यह प्रश्न पूछा जा सकता है।
मोटे तौर पर यह समझा जाता है कि किसी एक धर्म के विरुद्ध किसी दूसरे धर्म के चेहरे में छिपा जो एक राजनीतिक उत्पाद होता है, उसे ही सांप्रदायिकता कहा जाता है। लेकिन उत्पाद का मकसद बहुस्तरीय होता है। राम मंदिर में चंदा चोरी के उदाहरण से समझें कि इसे किस तरह से आपस के विवाद के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। मसलन किसी एक घर में चोरी होती है तो क्या उसका प्रभाव उस घर तक या परिवार तक सीमित रहता है? क्या उसे परिवार के धर्म से जुड़ा देखा जा सकता है? चोरी को एक सामाजिक अपराध के रूप में लिया जाता है और उससे पूरा समाज प्रभावित होने की आशंका में डूब जाता है। असुरक्षा बोध गहरा होता है। लेकिन आर्थिक स्रोतों की चोरी से ज्यादा बड़ा अपराध भावों की चोरी होती है। आस्था का भाव सबसे गहरे और जटिल भावों के मिश्रण के रूप में आकार लेता है। सांप्रदायिक राजनीति का यही वास्तविक मकसद साफ होता है जब वह चोरी को लेकर सवालों को खड़े होने से रोकता है। रोकने के लिए वह हर तरीका अपनाता है जो कि समस्त समाज को कई तरह के उन सवालों में विभाजित कर दे, जिससे कि चोरी की वास्तविकता के सवाल गैर-प्राथमिक स्तर पर पहुंचे।
राम मंदिर में चंदा चोरी से बचाव के लिए जिस तरह के तर्क दिए गए, दरअसल वे सांप्रदायिक राजनीति के पूरे मकसद को स्पष्ट करते हैं। उसके खिलाफ राजनीतिक स्तर पर जो रुख दिखाई दिया, वह महज व्यक्तिय़ों के खिलाफ आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित हैं। जबकि यह केवल एक घटना भर नहीं है, बल्कि राजनीतिक संस्कृति से जुड़ी है। राम जन्मभूमि तीर्थ न्यास से जुड़े व्यक्तियों को बदलने के रूप में इसका समाधान जाहिर करने की कोशिश की जा रही है।
यह भी गौर करें कि कैसे राम मंदिर का धार्मिक संचालन और उसे एक आर्थिक स्रोत के रूप में पुनर्गठित करने की कोशिश की जा रही है।
गौर तलब है कि लोकतंत्र और संवैधानिक राजनीति पर धर्म और उससे जुड़े वर्चस्व व अधीनता के आदेशों को किस तरह से बनाए रखने की कोशिश की जा रही है। भारतीय समाज में व्यक्ति, व्यक्ति नहीं होता, बल्कि जाति का प्रतिनिधि होता है और जातियां वर्चस्व व अधीनता की श्रेणियों में बांटी गई हैं। उनके पद और उनका दायरा शास्त्रीय स्तर पर परिभाषित हैं। इसीलिए राजनीति की तरह मंदिरों के लिए व्यवस्था-कुव्यवस्था और जाति का प्रश्न प्रमुख रहता है। राम मंदिर के निर्माण और उसके उद्धाटन तक के कार्यक्रमों में भी स्पष्ट रूप से यह देखा गया। सामाजिक कार्यकर्ता संदीप पांडे ने राम मंदिर में चोरी के प्रकरण पर अपनी तीखी प्रतिक्रिया में लिखा कि “राम मंदिर की जब नींव रखी गई तो दलित राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को कार्यक्रम में शामिल नहीं किया गया, जब उद्घाटन हुआ तो आदिवासी राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को शामिल नहीं किया गया, सभी शंकराचार्यों ने दोनों कार्यक्रमों से दूरी बना कर रखी। सारे कार्यक्रम राजनीतिक फायदा उठाने के लिए मनमाने तरीके से किए गए। श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र न्यास भी मनमाने तरीके से चलाया गया।”
असल में राम मंदिर में चोरी का चेहरा सांप्रदायिक राजनीति में छिपा है। यह बात दर्ज की जानी चाहिए कि अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण के पीछे एक राजनीतिक नारे को अंजाम देना है, जिसमें माना गया है कि राजनीति का हिंदूकरण करना होगा और उसका सैन्यकरण करना होगा।
राम मंदिर में चंदा चोरी के हालात बनने और उसका बचाव करने और उसे एक स्रोत के रूप में बनाए रखने की कोशिश सांप्रदायिक राजनीति के वास्तविक उद्देश्य से जुड़ा मसला है।
(संपादन : नवल/अनिल)
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