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शिक्षा में पीछे छूट गए लोगों को पढ़ने का एक और मौका दे रहा पैकपेट

कोल्लुरी सथैया की दृष्टि और दृढ़ निश्चय से पैकपेट का जन्म हुआ। इस पहल का लक्ष्य है हाशियाकृत समुदायों के युवाओं को ज्ञान, कौशल और समालोचनात्मक दृष्टि से लैस करना, ताकि वे समाज में मौजूद असमानताओं को चुनौती दे सकें और अपने भविष्य को स्वयं आकार देने में सक्षम बनें। बता रही हैं तरन्नुम निशां

कोल्लुरी सथैया, एक दलित, जिसे कभी स्कूल जाने का मौका ही नहीं मिला, ने हाशियाकृत समुदायों के युवाओं को शिक्षित कर उन्हें सामाजिक असमानताओं को चुनौती देने में सक्षम बनाने का बीड़ा उठाया है। उन्होंने इसी उद्देश्य से 26 जनवरी, 2022 को ‘फुले-आंबेडकर सेंटर फॉर फिलोसॉफिकल एंड इंग्लिश ट्रेनिंग’ (पैकपेट) की स्थापना की थी। इस संस्था की स्थापना अमृता सथैया कोल्लुरी एजुकेशनल सोसाइटी (आसकेस) के अंतर्गत की गई थी। आसकेस और पैकपेट की बौद्धिक नींव राजनीतिक विचारक प्रोफेसर कांचा आइलैय्या शेपर्ड ने रखी है। वे दोनों संस्थाओं के सह-संस्थापक भी हैं। प्रोफेसर आइलैय्या इस मत के हैं कि संस्कृत और ब्राह्मणवाद के सदियों पुराने वर्चस्व को चुनौती देने के लिए अंग्रेजी भाषा मज़बूत हथियार हो सकती है। डॉ. बी.आर. आंबेडकर और जोतीराव फुले व सावित्रीबाई फुले तथा प्रो. आइलैय्या की इस सोच को पैकपेट चरितार्थ करता है कि शिक्षा परिवर्तन की सबसे बड़ी वाहक है। पैकपेट द्वारा अंग्रेजी भाषा में कौशल विकसित करने के लिए बहुआयामी प्रशिक्षण दिया जाता है और साथ ही हाशियाकृत समुदायों के विद्यार्थियों को जाति-विरोधी दर्शन, सामाजिक-राजनीतिक अवधारणाओं, लैंगिक मुद्दों एवं सांख्यिकी विज्ञान से भी परिचित करवाया जाता है। पिछले कुछ समय से वहां विद्यार्थियों को खेलों में भी प्रशिक्षित किया जा रहा है।

पैकपेट एक माह की अवधि का एक प्रशिक्षण कार्यक्रम संचालित करता है जिसका नाम है– फ्री रेजिडेंशियल इंटेंसिव प्रोग्राम ऑन इंग्लिश लैंग्वेज स्किल्स, सोशियो-पॉलिटिकल कॉन्सेप्ट्स एंड एंटी-कास्ट फिलोसफी। इसके अलावा, देश भर के विद्यार्थियों को उनकी सीखने की उम्र में खेल प्रशिक्षण भी दिया जाता है। रहने-खाने और प्रशिक्षण की व्यवस्था पूरी तरह निशुल्क होती है। पिछले कुछ सालों में भारत के अलग-अलग हिस्सों में रहने वाले 1,200 से अधिक युवाओं ने इस कार्यक्रम में हिस्सा लिया है।

पैकपेट के संस्थापक कोल्लुरी सथैया का जन्म एक गरीब दलित परिवार में हुआ था। अपने जीवन की शुरुआत उन्होंने रोजाना कमाने-खाने वाले मजदूर के रूप में की। उन्होंने वंचना, जाति-आधारित भेदभाव और सामाजिक बहिष्करण का सामना किया। इसमें वे अकेले नहीं थे। उनका पूरा परिवार, बल्कि उनका संपूर्ण समुदाय इनसे मुकाबिल था। इस अनुभव ने उनमें वंचित समुदायों को सामाजिक न्याय दिलवाने के प्रति प्रतिबद्धता जगाई। कई सालों तक उन्होंने श्रमिक अधिकारों, सामुदायिक सेवाकार्यों, आदिवासी परिवारों की मदद एवं गरीब व वंचित युवाओं के शैक्षणिक सशक्तिकरण आदि के लिए काम किया। उनकी दृष्टि में शिक्षा केवल रोज़गार पाने का साधन नहीं वरन् गरिमा और समानता हासिल करने और सामाजिक बदलाव का हथियार भी है।

पैकपेट, हैदराबाद में कक्षा

सथैया की दृष्टि और दृढ़ निश्चय से पैकपेट का जन्म हुआ। इस पहल का लक्ष्य है हाशियाकृत समुदायों के युवाओं को ज्ञान, कौशल और समालोचनात्मक दृष्टि से लैस करना, ताकि वे समाज में मौजूद असमानताओं को चुनौती दे सकें और अपने भविष्य को स्वयं आकार देने में सक्षम बनें।

हाशियाकृत और अपने परिवारों में शिक्षा हासिल करने वाली पहली पीढ़ी के युवाओं की मूल समस्याओं का समाधान खोजना सथैया की पहल का उद्देश्य है। ये युवा ही आज के भारत के प्रतिनिधि हैं। भारत में लंबे समय से समाज के एक बड़े तबके को शिक्षा से वंचित किया गया और इसी कारण आज भी वे सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक क्षेत्रों में समुचित भागीदारी से वंचित हैं। हालांकि हमारा संविधान देश के सभी नागरिकों को शिक्षा का अधिकार देता है, लेकिन आज भी विशेषाधिकार-प्राप्त छोटे से तबके और विशाल हाशियाकृत आमजनों के बीच एक बड़ी खाई है जो असमानता को बनाए रखने में सहायक है। संसाधनों और अवसरों तक पहुंच में असमानताओं के चलते अपनी सामाजिक स्थिति को बेहतर बनाने के इच्छुक वंचित वर्गों के युवाओं को अनेकानेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। अपने शैक्षणिक कार्यक्रमों के ज़रिए पैकपेट इस खाई को पाटने का प्रयास कर रहा है। वह इन युवाओं की अपने कौशल विकसित करने और समानता, न्याय, जाति व लिंग से जुड़े मुद्दों को आलोचनात्मक दृष्टि से देखने में मदद कर रहा है।

पुरानी सोच को अलविदा, नई का इस्तकबाल

शिक्षा समाजीकरण के सबसे मूल साधनों में से एक है। आधुनिक समाज में, शैक्षणिक संस्थाएं केवल तालीम हासिल करने और अपने व्यक्तित्व को आकार देने की जगह नहीं हैं। वे सामाजिक परिवर्तन की निर्धारक भी हैं।

लेकिन इन सबके बावजूद, हाशियाकृत समुदायों की संसाधनों तक असमान पहुंच, भाषागत बाधाओं और उनके बारे में राय बना लेने के डर के कारण, शैक्षणिक संस्थान अक्सर सामाजिक पदक्रम को बनाए रखने में अहम भूमिका निभाने लगते हैं। ऐसे में, शिक्षा प्रदान करने की अपनी विशिष्ट शैली के ज़रिए पैकपेट एक विकल्प उपलब्ध करवाता है। यहां विद्यार्थियों को न सिर्फ शिक्षित किया जाता है बल्कि जो चीज़ें वे मानते आ रहे हैं, उन्हें भुलाकर नई चीज़ें आत्मसात करना भी सिखाया जाता है। उन्हें यह बताया जाता है कि वे सामाजिक यथार्थ का आलोचनात्मक अध्ययन कर किस प्रकार एक बेहतर समाज की कल्पना कर सकते हैं।

पैकपेट ने कई विद्यार्थियों के लिए शिक्षा का अर्थ ही बदल दिया। तमिलनाडु के एक युवा विद्यार्थी बताते हैं– “पैकपेट ने मुझे सिखाया कि तार्किक प्रश्न उठाना कितना महत्वपूर्ण है। प्रश्न उठाने से सामाजिक धारणाएं बदल सकती हैं। पैकपेट ने मुझे उत्तर नहीं बताए। उसने मुझे ऐसे प्रश्न पूछना सिखाया जिनका तीखापन जाति की अवधारणा पर प्रहार कर सके। लेकिन वे इतने तीखे भी न हों कि सामाजिक परिवर्तन की राह ही बाधित कर दें।” इस विद्यार्थी की टिप्पणियां बताती हैं कि यह केंद्र सामाजिक यथार्थ पर प्रश्न उठाने और समालोचनात्मक दृष्टिकोण विकिसित करने के प्रति प्रतिबद्ध है।

सीखी हुई बात को भुला देने (अनलर्निंग) के बारे में आदिल कहते हैं– “हम सब जीवन भर कुछ-न-कुछ सीखते रहते हैं, लेकिन अहम यह है कि हम सीखते क्या हैं। पैकपेट में मुझे सिखाया गया कि मैं पहले से अपनी दिमाग में बैठी दकियानूसी मान्यताओं को निकाल बाहर कर सकता हूं और ऐसी नई बातें सीख सकता हूं जिनसे मेरी सोच बेड़ियों से मुक्त हो जाए और मुझमें यथार्थ की बेहतर समझ विकसित हो।”

पूर्व विद्यार्थी बबिता बताती हैं– “पैकपेट एक ऐसी शैक्षणिक संस्था है जो आपको डराती नहीं है। वहां विद्यार्थियों को प्रश्न पूछना सिखाया जाता है। और बिना झिझक के तथा बिना मजाक उड़ाए जाने, या लेबल चस्पा किए जाने के डर से अपने अनुभव साझा करना और चर्चा में भाग लेना भी। अपने परिवार या समुदाय की शिक्षा हासिल करने वाली पहली पीढ़ी के कई सदस्य शिक्षा में भेदभाव और बहिष्करण के चलते स्वयं को अभिव्यक्त नहीं कर पाते हैं। पैकपेट, पारंपरिक शिक्षणशास्त्र को चुनौती देता है, विचार-विनिमय की संस्कृति विकसित करता है और विद्यार्थियों को समालोचनात्मक दृष्टिकोण से सोचना, स्वयं को पूर्ण आत्मविश्वास से अभिव्यक्त करना, गलतियां करना और एक-दूसरे से सीखना सिखाती है।

अंग्रेजी केवल संवाद का माध्यम नहीं

पैकपेट के शिक्षणशास्त्र के केंद्र में है– अंग्रेजी सीखने पर जोर। आज अंग्रेजी केवल संवाद की भाषा नहीं है। वह अपनी बात को पूरे दम से सामने रखने और तार्किक समालोचना का माध्यम भी है। अंग्रेजी वह माध्यम है जिसके ज़रिए हाशियाकृत समुदायों के युवा उस ज्ञान कोष तक पहुंच सकते हैं जो हमेशा से उनकी पहुंच से बाहर रहा है। पैकपेट, आंबेडकर और फुले से प्रेरित है, जो यह मानते थे कि अंग्रेजी भाषा का ज्ञान समाज में आगे बढ़ने और अपनी जंजीरों से मुक्ति हासिल करने का औजार है।

पैकपेट के अध्यापक और वहां के हालिया विद्यार्थियों का एक समूह

पैकपेट में आने वाले कई विद्यार्थियों को अंग्रेजी में बोलने का शून्य या बहुत कम अनुभव होता है। अंग्रेजी में बात करने में वे सकुचाते हैं, डरते हैं। पैकपेट में क्लासरूम में अंग्रेजी सिखाने की बजाय इस बात पर जोर दिया जाता है कि विद्यार्थी अपनी आपसी बातचीत में अंग्रेजी का प्रयोग करें। शिक्षकगण इस बात पर जोर देते हैं कि एकदम सही-सही अंग्रेजी बोलना ज़रूरी नहीं है। ज़रूरी यह है कि अंग्रेजी में बात की जाए और हम गलतियां करने के डर के बगैर पूर्ण आत्मविश्वास से अपनी बात कह सकें। अंग्रेजी के ज्ञान से अपने परिवार की पहली पीढ़ी के विद्यार्थियों के लिए कई ऐसे संस्थानों, बौद्धिक विमर्शों और सामाजिक जीवन के द्वार खुल जाते हैं जो अब तक उनकी पहुंच से बाहर रहे हैं।

इस संस्थान की परिवर्तनकारी शक्ति, यहां अंग्रेजी सीखने वाले कई विद्यार्थियों के अनुभव में परिलक्षित होती है। तेलंगाना की एक शूद्र समुदाय की लड़की, जिसने क्षेत्रीय भाषा के स्कूल में शिक्षा हासिल की थी, का कहना है कि जब वह पैकपेट पहुंची तब उसे अंग्रेजी बोलने में डर लगता था। वह कहती है– “पैकपेट ने मेरे मन का डर समाप्त कर दिया। मेरी अंग्रेजी अब भी बहुत बढ़िया नहीं है मगर मैं अंग्रेजी में बोलने से घबराती नहीं हूं। इस संस्था ने मुझे आत्मविश्वास दिया, मुझे जागरूक किया और सबसे महत्वपूर्ण यह कि मुझे आत्मसम्मान दिया।” उसके लिए अंग्रेजी मात्र एक भाषा नहीं है। वह सशक्तिकरण का औजार है।

कुल मिलाकर, पैकपेट बहिष्करण का शिकार रहे समुदायों और अन्यों के बीच ज्ञान और कौशल के अंतर को पाटने का एक अभिनव प्रयास है। इससे शैक्षणिक क्षेत्र में हमेशा से व्याप्त असमानताओं पर विजय हासिल करने में मदद मिलेगी। वह एक ऐसा स्थान है जो कि सैकड़ों युवाओं को उनकी खुद की आवाज़ को जानने-पहचानने का मौका दे रहा है। भाषागत कौशल के साथ-साथ वह विद्यार्थियों में आलोचनात्मक विवेक उत्पन्न कर रहा है और उन्हें साथ मिल कर सीखना सिखा रहा है। पैकपेट एक छोटी मगर अत्यंत अर्थपूर्ण शैक्षणिक पहल है जो शिक्षा को सामाजिक परिवर्तन लाने और समानता स्थापित करने का औजार बना रही है।

(मूल अंग्रेजी से अनुवाद: अमरीश हरदेनिया, संपादन : नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

तरन्नुम निशां

तरन्नुम निशां जामिया मिल्लिया इस्लामिया की पीएचडी शोधार्थी हैं। इनके शोध के केंद्र में शिक्षा एवं सामाजिक प्रगतिशीलता शामिल हैं।

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