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त्रिवेणी संघ स्थापना दिवस : वर्तमान की चुनौतियां और विरासत पर मंथन

श्रीकांत ने कहा कि 1967 के बाद बिहार की राजनीति में हाशिए के समाज की निर्णायक भागीदारी त्रिवेणी संघ की वैचारिक विरासत का परिणाम थी। पढ़ें, अरुण आनंद की यह रपट

विपरीत परिस्थितियां ही किसी विरासत का वास्तविक मूल्यांकन करती हैं। आज जब संगठित प्रतिरोध की धाराएं कमजोर पड़ रही हैं, तब त्रिवेणी संघ को याद करना केवल अतीत का स्मरण नहीं, बल्कि भविष्य के निर्माण का कार्य है। आज भी उसकी विरासत को याद करना सत्ता और सामाजिक वर्चस्व के लिए चुनौती बन सकता है। ये बातें चर्चित बहुजन आंदोलनकारी डॉ. लक्ष्मण यादव ने बीते 14 जून, 2026 को पटना स्थित जगजीवन राम संसदीय अध्ययन एवं राजनीतिक शोध संस्थान में त्रिवेणी संघ पर केंद्रित ‘वर्तमान की चुनौतियां और त्रिवेणी संघ की विरासत’ संगोष्ठी में कहीं। इस अवसर पर विभिन्न सामाजिक, राजनीतिक, शैक्षणिक और पत्रकारिता जगत से जुड़े वक्ताओं ने त्रिवेणी संघ के ऐतिहासिक योगदान, सामाजिक न्याय की राजनीति और वर्तमान समय की चुनौतियों पर विस्तार से विचार रखे।

ध्यातव्य है कि त्रिवेणी संघ का गठन 30 मई, 1933 को शाहाबाद (वर्तमान में भोजपुर) के करगहर में किया गया था। इसके संस्थापक सरदार जगदेव सिंह यादव, शिवपूजन सिंह और यदुनंदन प्रसाद मेहता थे।

सामाजिक न्याय आंदोलन, बिहार द्वारा आयोजित संगोष्ठी में मुख्य वक्ता डॉ. लक्ष्मण यादव ने लगभग डेढ़ घंटे के अपने व्याख्यान में कहा कि इतिहास का मूल्यांकन हमेशा संकट की घड़ी में होता है। आज लोकतांत्रिक संस्थाओं, सामाजिक न्याय और विचार की स्वतंत्रता पर अभूतपूर्व दबाव है। ऐसे समय में त्रिवेणी संघ की विरासत केवल ऐतिहासिक स्मृति नहीं बल्कि भविष्य के निर्माण की आधारशिला है। उन्होंने केंद्रीय चुनाव आयोग की विश्वसनीयता पर सवाल उठाते हुए स्पेशल एसआईआर के नाम पर मतदाता सूची में हो रही कथित गड़बड़ियों की आलोचना की और कहा कि चुनावी प्रक्रिया को कमजोर किया जा रहा है। उनका आरोप था कि लोकतंत्र को चुनावी प्रबंधन में बदल दिया गया है। उन्होंने कहा कि आज समाज के सामने सबसे बड़ा प्रश्न मित्र और शत्रु की सही पहचान का है।

जाति और सामाजिक वर्चस्व की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि त्रिवेणी संघ अपने समय का सबसे क्रांतिकारी संगठन था जिसने 1930 के दशक में शोषित समाज को संगठित करने और साम्राज्यवादी तथा सामाजिक वर्चस्व के विरुद्ध वैचारिक आधार तैयार किया। उन्होंने कहा कि सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक साम्राज्यवाद आज भी कायम है और किसान, मजदूर तथा छोटे व्यवसायियों की वास्तविक मुक्ति के बिना सामाजिक परिवर्तन संभव नहीं है। उनके अनुसार आज त्रिवेणी संघ को याद करना नई पीढ़ी को दिशा देने का कार्य है।

इस संगोष्ठी में सर्वसम्मति से अनेक प्रस्ताव पारित किए गए। इनमें जाति जनगणना को राष्ट्रीय जनगणना का हिस्सा बनाने, बिहार में 65 प्रतिशत आरक्षण को संवैधानिक सुरक्षा प्रदान करने, विश्वविद्यालयों में जातिगत भेदभाव रोकने के लिए प्रभावी रोहित वेमुला एक्ट बनाने, बुलडोजर राजनीति पर रोक लगाते हुए सभी नागरिकों को आवास का अधिकार सुनिश्चित करने, सैटेलाइट टाउनशिप और लैंड पुलिंग के नाम पर भूमि अधिग्रहण बंद करने, पेपर लीक और परीक्षा घोटालों पर कठोर कार्रवाई करने, सांप्रदायिक ध्रुवीकरण और एनकाउंटर राज का विरोध, महिला आरक्षण तत्काल लागू करते हुए ‘कोटा में कोटा’ सुनिश्चित करने, और सामाजिक न्याय की ताकतों की व्यापक एकता का निर्माण करने के प्रस्ताव शामिल थे।

इससे पहले उद्घाटनकर्ता वरिष्ठ पत्रकार श्रीकांत ने त्रिवेणी संघ के ऐतिहासिक विकास को बिहार की सामाजिक राजनीति के व्यापक संदर्भ में रखते हुए कहा कि 1930 का दशक सामाजिक जागरण का दशक था। जिला बोर्ड चुनावों में त्रिवेणी संघ के प्रभाव, किसान सभा, कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी और समाजवादी आंदोलन के विकास ने बिहार की राजनीति को नई दिशा दी। उन्होंने बताया कि जनेऊ आंदोलन केवल धार्मिक प्रतीक नहीं था, बल्कि सामाजिक सम्मान, बेगारी से मुक्ति और सत्ता में हिस्सेदारी की आकांक्षा का आंदोलन भी था और विभिन्न पिछड़ी जातियां अपने ऐतिहासिक गौरव की नई व्याख्या कर रही थीं।

संगोष्ठी को संबोधित करते श्रीकांत

समकालीन बिहार की चर्चा करते हुए श्रीकांत ने कहा कि राज्य आज भी बड़ी संख्या में श्रम निर्यात करने वाला प्रदेश है। प्रवासी मजदूरों की कमाई ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ बनी हुई है। उन्होंने कहा कि मंडल राजनीति ने सामाजिक प्रतिनिधित्व बढ़ाया और विकास की नई बहसें भी सामने आईं। सामाजिक न्याय और सोशल इंजीनियरिंग आज राजनीतिक विमर्श के केंद्रीय विषय बन चुके हैं। उनके अनुसार 1967 के बाद बिहार की राजनीति में हाशिए के समाज की निर्णायक भागीदारी त्रिवेणी संघ की वैचारिक विरासत का परिणाम थी।

पूर्व विधानसभा अध्यक्ष उदय नारायण चौधरी ने कहा कि आर्थिक और सामाजिक मुक्ति की लड़ाई को आगे बढ़ाना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि जाति से वर्गीय चेतना की ओर बढ़े बिना व्यापक परिवर्तन संभव नहीं होगा।

अधिवक्ता व बहुजन विचारक मनीष रंजन ने कहा कि जिस प्रकार तमिलनाडु में पेरियार के नेतृत्व में आत्मसम्मान आंदोलन विकसित हुआ, उसी प्रकार बिहार में त्रिवेणी संघ ने सामाजिक स्वाभिमान की चेतना पैदा की। उन्होंने कहा कि यह आंदोलन केवल चुनावी राजनीति नहीं बल्कि सामाजिक परिवर्तन की व्यापक परियोजना था। दिल्ली से आए पत्रकार डॉ. सिद्धार्थ रामू ने कहा कि त्रिवेणी संघ की विरासत लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा का आधार है। उन्होंने आरोप लगाया कि मतदाता सूचियों में छेड़छाड़ और केंद्रीय एजेंसियों के दुरुपयोग से लोकतंत्र कमजोर किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि देश के अधिकांश संसाधनों पर सीमित वर्ग का कब्जा लोकतांत्रिक असमानता को बढ़ा रहा है।

वहीं, भाकपा (माले) के पूर्व विधायक अजीत कुशवाहा ने कहा कि उनका अपना विधानसभा क्षेत्र डुमरांव त्रिवेणी संघ के प्रभाव का केंद्र रहा है। उन्होंने 1931 की जाति जनगणना और त्रिवेणी संघ की भूमिका को बिहार की लोकतांत्रिक संरचना में निर्णायक बताया। उन्होंने कहा कि जाति आज भी भारतीय समाज की कठोर वास्तविकता है और सामाजिक न्याय का संघर्ष राजनीतिक ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक संघर्ष भी है।

सामाजिक न्याय मंच के संयोजक रिंकू यादव ने कहा कि त्रिवेणी संघ की लड़ाई केवल औपनिवेशिक सत्ता के विरुद्ध नहीं थी, बल्कि सामाजिक शोषण, पूंजीवादी वर्चस्व और साहूकारी व्यवस्था के विरुद्ध भी थी। उन्होंने कहा कि इसे केवल तीन जातियों का संगठन मानना इसके इतिहास का सरलीकरण है।

सामाजिक कार्यकर्ता वंदना प्रभा ने कहा कि वर्तमान समय में मनुवादी और पितृसत्तात्मक संरचनाओं को पुनः मजबूत करने की कोशिशें हो रही हैं। उन्होंने कहा कि महिलाओं को केवल कल्याणकारी योजनाएं नहीं बल्कि अधिकार आधारित भागीदारी चाहिए। महिला आरक्षण में पिछड़ी और दलित महिलाओं के लिए ‘कोटा में कोटा’ सुनिश्चित किया जाना आवश्यक है।

दुर्गेश कुमार ने कहा कि बिहार में सामाजिक परिवर्तन की जो प्रक्रिया आगे बढ़ी उसका मूल स्रोत त्रिवेणी संघ की चेतना थी। उन्होंने कहा कि आर्थिक असमानता, भूमि सुधार और संसाधनों के पुनर्वितरण का प्रश्न आज भी अधूरा है। जबकि रमेश कुमार ने कहा कि त्रिवेणी संघ समाज के शोषित और वंचित तबकों का संगठन था जिसका मूल संदेश समतामूलक समाज की स्थापना है। छात्र नेता सूरज यादव ने कहा कि पिछड़ों की राजनीतिक भागीदारी बढ़ने के बावजूद अपेक्षित सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन नहीं हो सका। उन्होंने भूमि और संसाधनों पर कॉरपोरेट नियंत्रण का विरोध करते हुए व्यापक जनसंघर्ष की आवश्यकता बताई। वहीं, विकाश कुमार ने कहा कि त्रिवेणी संघ ने जिस आर्थिक और राजनीतिक साम्राज्यवाद के विरुद्ध संघर्ष शुरू किया था, वह आज भी अधूरा है। सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक प्रश्नों पर गंभीर विमर्श के बिना विकास संभव नहीं है।

कार्यक्रम का संचालन सुबोध यादव ने किया। इस अवसर पर रामेश्वर प्रसाद चौधरी, विश्वा यादव, देवशंकर आर्या, सबा आफरीन सहित अनेक वक्ताओं ने भी अपने विचार रखे और त्रिवेणी संघ की विरासत को वर्तमान सामाजिक-राजनीतिक संघर्षों से जोड़ने की आवश्यकता पर बल दिया।

(संपादन : नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

अरुण आनंद

लेखक पटना में स्वतंत्र पत्रकार हैं

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