h n

मध्य प्रदेश : केन-बेतवा लिंक परियोजना में कम मुआवजे का दर्द झेल रहे दलित-आदिवासी

पलकोंहा गांव के पूर्व सरपंच चूरा अहिरवार बताते हैं कि “परियोजना में मुख्य समस्या कम मुआवजे की ही है। गांव में किसी को घर का 30 हजार, किसी को 50 हजार तो किसी को घर का 1 लाख रुपए दिया जा रहा है। इतने कम मुआवजे में लोगों के घर के पत्थर भी नहीं खरीदे जा सकते हैं।” पढ़ें, यह रपट

मध्य प्रदेश में केन-बेतवा लिंक परियोजना एक नदी जोड़ो परियोजना है‌। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में इस परियोजना के कार्यान्वयन को मंजूरी दी गई है‌। परियोजना में केन नदी का पानी बेतवा में स्थानांतरित किया जाना है। परियोजना की लागत 44,605 करोड़ रुपए आंकी गई है। जबकि, परियोजना से कुल 10.62 लाख हेक्टेयर वार्षिक सिंचाई का अनुमान है। वहीं, परियोजना के लिए 23 लाख पेड़ काटे जाने हैं। इस परियोजना से करीब 1,913 परिवार प्रभावित होंगे और लगभग 9,000 हेक्टेयर भूमि डूब क्षेत्र में शामिल हो जाएगी।

ऐसे में मुख्य तौर पर इस परियोजना में प्रभावित होने वाले दलित-आदिवासी हैं। इनके ऊपर विस्थापन का भी संकट है। परियोजना में सबसे बड़ी परेशानी उचित मुआवजे की है। प्रभावित लोग वर्षों से उचित मुआवजा पाने के लिए ज्ञापन देने, विरोध प्रदर्शन करने जैसे कदम उठा रहे हैं। बीते अप्रैल माह में भी प्रभावितों के मुआवजे की मांग ने एक व्यापक पंचतत्व सत्याग्रह आंदोलन का रूप धारण कर लिया।

यह आंदोलन 5 अप्रैल, 2026 से शुरू हुआ और करीब 12 दिनों तक चला। इसमें प्रभावितों ने शरीर पर मिट्टी लगाकर, चिता पर लेटकर, सांकेतिक फांसी लगाकर, जल सत्याग्रह, अनशन कर, चूल्हा बूझाकर पंचतत्व सत्याग्रह किया। इस दौरान ‘गांव हमारा-मनमानी तुम्हारी नहीं चलेगी’ जैसे कई नारे भी लगाए गए। आखिर में, प्रभावितों ने महाआंदोलन की चेतावनी देकर प्रशासन को मुआवजा पर पुन: विचार करने का वक्त दिया।

हम इस परियोजना से प्रभावित लोगों का दर्द जानने-समझने पन्ना जिले के ग्रामीण इलाके में पहुंचे। इनमें जिले की बिजावर तहसील के पलकोंहा, कदवारा, नैगुवां आदि शामिल हैं। पहले हम पलकोंहा पहुंचे। इस गांव में मुख्य सड़क के पास कुछ ग्रामीणों से मुआवजे पर बात होती है। गांव में अनुसूचित जाति से आने वाले मदनलाल अहिरवार (50) हमें बताते हैं कि “मेरे दो-मंजिले मकान का 30 हजार रुपए मुआवजा दिया गया है। हमने कम मुआवजा की शिकायत आवेदन के माध्यम से की है। मगर, कोई उत्तर नहीं मिला है। क्या 30 हजार रुपए में आज घर की नींव भी रखी जा सकती है?”

नन्नी बाई अहिरवार (70) तो अपर्याप्त मुआवजे से भी वंचित ही रह गई हैं। वे कहती हैं कि “मेरे घर में दो कमरे बने हुए हैं, जिसका कोई मुआवजा नहीं मिला है। ऐसे ही मेरे बड़े बेटे के घर का मुआवजा नहीं मिला है। इस परियोजना में हमारा सब कुछ दांव पर लगा है। उचित मुआवजा नहीं मिला तब हम अपनी ज़िंदगी कैसे संभालेंगे?”

सशंकित हैं पलकोंहा गांव के पीड़ित लोग

गांव में आगे एक चबूतरे के पास हमें रम्मू अहिरवार (65) और चूरा अहिरवार (48) मिलते हैं। बातचीत में रम्मू कहते हैं कि “मेरे मकान में करीब 10 लाख रुपए लागत लगी थी। पर, मुआवजा केवल 4 लाख 50 हजार रुपए ही मिले हैं। इससे हम पहले जैसा तो मकान नहीं बना सकते।”

आगे वे कहते हैं कि “मुआवजा न मिलने से ग्रामीण रोजी-रोटी के लिए इंदौर, भोपाल, दिल्ली, मुंबई जैसे शहरों में भी नहीं जा पा रहे हैं। जिनको, कम या बिल्कुल मुआवजा नहीं मिला वे अपना घर भी नहीं बनवा पा रहे है और न ही अपने बेटे-बेटियों की शादी कर पा रहे हैं।”

इसके आगे चूरा अहिरवार अपनी बात कहते हैं। वे गांव के पूर्व सरपंच हैं। वे बताते हैं कि “परियोजना में मुख्य समस्या कम मुआवजे की ही है। गांव में किसी को घर का 30 हजार, किसी को 50 हजार तो किसी को घर का 1 लाख रुपए दिया जा रहा है। इतने कम मुआवजे में लोगों के घर के पत्थर भी नहीं खरीदे जा सकते हैं।”

पलकोंहा के ग्रामवासियों से हुए संवाद के बाद हम रास्ता पकड़ते हैं नैगुवां गांव का। करीब 30 मिनट में बाइक से हम नैगुवां पहुंचते हैं। इस गांव में बरगद के पेड़ के पास हमें कुछ ग्रामीण मिलते हैं।

आदिवासी समुदाय से आने वाली शकुंतला सौर (40 वर्ष) मजदूरी करके जीवन-यापन करती हैं। दुखी मन से वे बतलाती हैं कि “सरकार आवास योजना की राशि 1 लाख रुपए से अधिक देती है। मगर, हमारे घर का मुआवजा केवल 60 हजार रुपए दिया है। सोचिए क्या हमारे साथ यह न्याय हुआ? इतने में किसका घर बन सकता है? इतने में तो ढंग का शौचालय और बाथरूम भी नहीं बन सकता।”

शकुंतला के वाक्य खत्म होते ही अंदु सौर (52 वर्ष) कहते हैं कि “परियोजना में हमारा दो मंजिला मकान डूब क्षेत्र में आया है, जिसका कोई मुआवजा हमें अभी तक नहीं दिया गया। मुआवजे की शिकायत जब हम अधिकारियों से करते हैं तब वहां से जवाब आता है कि आ जाएगा…आ जाएगा। मगर, कब आएगा पता नहीं।”

फिर, परियोजना की परेशानियों को लेकर हम बिहारी सौर (55 वर्ष) से बात करते हैं। वे कहते हैं कि “इस परियोजना में उचित मुआवजा न मिलने का कारण उचित सर्वे नहीं होना है। गांव में मुआवजा का सर्वे अधिकारियों ने घर-घर जाकर नहीं किया, बल्कि एक जगह ग्रामीणों को बुलाकर किया है। ऐसें में मुआवजे में गड़बड़ियां हुई हैं।”

पलकोंहा गांव में मुआवजे की समस्या जानने के बाद हम कदवारा गांव की ओर बढ़ते हैं। करीब 40 मिनट में बाइक से हम कदवारा पहुंचे। इस गांव में एक सार्वजनिक पानी के नल के पास कुछ ग्रामीणों से हमारी बातचीत होती है।

इस दौरान अनुसूचित जाति में आने वाले हक्का अहिरवार (40 वर्ष) कहते हैं कि “हमारे परिवार में बबलू, चंदू और मैं तीन भाई की रोजी-रोटी का सहारा 11 एकड़ कृषि भूमि थी। जो परियोजना में अधिग्रहित की गई है। इस भूमि का मुआवजा 5 लाख रुपए प्रति एकड़ मिला है। जबकि, हम जमीन खरीदने जाते हैं, तब 10-12 लाख रुपए प्रति एकड़ रेट मिलता है। ऐसे में हम जमीन नहीं खरीद पा रहे हैं। यह समस्या जिन किसानों की जमीन परियोजना में डूबी हैं, वे भोग रहे है।”

आगे वे कहते हैं कि “हमारे पास पीढ़ियों से खेती करने का ही हुनर है। अन्य तरह के हुनर हमें सरकार ने नहीं दी है। न कोई रोजगार दिया है। वहीं, सरकार जमीन का मुआवजा 5 लाख रुपए प्रति एकड़ दे रही है। जबकि, साथ ही हमें दी जा रही आवासीय प्लॉट का 5 लाख रुपए काट रही है। यह क्या न्यायसंगत है?”

दिविया अहिरवार (60 वर्ष) बताते हैं कि “हमारे दो मंजिले घर का मुआवजा 2 लाख मिला है। मैंने 7 वर्ष पहले घर में 40 हजार रुपए खर्च करके बोरवेल करवाया था। यह 300 फ़ीट गहरा है। मैं यह बोरवेल अधिकारियों को दिखाया भी, लेकिन इसका कोई मुआवजा नहीं आया।”

गांव में हम आगे बढ़ते हैं तब कविता अहिरवार (32 वर्ष) के घर पहुंचते हैं। वह कहती हैं कि “मुझे घर के मुआवजे के नाम पर केवल अब तक 34 हजार का नोटिस मिला है। ऐसे ही हमारे परिवार में 5 एकड़ सरकारी पट्टे की जमीन थी, जो डूब क्षेत्र में गई है। इसमें से केवल करीब 2 एकड़ जमीन का मुआवजा मिला है। बाकी का मुआवजा नहीं मिला। इसके साथ इस भूमि पर पेड़-पौधे भी लगे हुए हैं, उनका भी कोई मुआवजा नहीं मिला।”

कविता के घर के पास ही प्रसादी अहिरवार (65 वर्ष) का दो-मंजिला घर बना हुआ है। प्रसादी कहते हैं कि “मुझे दो मंजिला घर का 60 हजार रुपए मुआवजा दिया गया है। जब किसी का घर परियोजना में चला जाता है तब उसके पास कुछ बचता नहीं है। हमें उचित मुआवजा नहीं मिला तब कहां जाएंगे, समझ नहीं आ रहा है।”

आखिर में हम कदवारा गांव में मिलते हैं विनोद अहिरवार (36 वर्ष) से। वे हमें बताते हैं कि “मेरे घर में 8 कमरे बने हुए हैं। इन कमरों का मुआवजा करीब 3 लाख 50 हजार रुपए मिला है। मुझ जैसे ही परियोजना में प्रभावित लोग सरकार और प्रशासन के विरोधी नहीं है। बस वे इतना चाहते हैं कि उन्हें उचित मुआवजा दिया जाए। साथ में, इस परियोजना में जल, जंगल, जमीन, जीव-जंतु सहित सार्वजनिक जनजीवन का ख्याल रखा जाए।”

पन्ना के सामाजिक कार्यकर्ता अमित भटनागर इस परियोजना से प्रभावितों के हक-अधिकार की लड़ाई लड़ते आ रहे हैं। उनसे भी हमने इस मामले में बातचीत की। इस दौरान वे व्यक्त करते हैं कि “यह परियोजना एक व्यापक सार्वजनिक जनजीवन की क्षति पैदा करेगी। लोग जिंदगी लगा देते हैं अपना घर बसाने में मगर, परियोजना एक झटके लोगों का सब कुछ छीन लेगी। परियोजना में कम मुआवजे की समस्या से लोग जूझ रहे हैं। विस्थापन नीति को उचित ढंग से पालन नहीं किया जा रहा है। परियोजना में नियम-कानून प्रशासन मनमाने ढंग से चला रहा है। इन सबसे प्रभावितों के हक-अधिकारों का हनन हो रहा है।”

इस परियोजना के संबंध में हमने प्रशासन का भी पक्ष जानना चाहा। तब हमने पन्ना जिला कलेक्टर से भी फोन पर बातचीत की। इस दौरान मामले पर उन्होंने शाम को बात करने को कहा। मगर, शाम को और दिन में कई बार फोन करने बाद भी जिला कलेक्टर से हमारा संपर्क नहीं हो पाया।

(संपादन : नवल/अनिल)


फारवर्ड प्रेस वेब पोर्टल के अतिरिक्‍त बहुजन मुद्दों की पुस्‍तकों का प्रकाशक भी है। एफपी बुक्‍स के नाम से जारी होने वाली ये किताबें बहुजन (दलित, ओबीसी, आदिवासी, घुमंतु, पसमांदा समुदाय) तबकों के साहित्‍य, संस्‍क‍ृति व सामाजिक-राजनीति की व्‍यापक समस्‍याओं के साथ-साथ इसके सूक्ष्म पहलुओं को भी गहराई से उजागर करती हैं। एफपी बुक्‍स की सूची जानने अथवा किताबें मंगवाने के लिए संपर्क करें। मोबाइल : +917827427311, ईमेल : info@forwardmagazine.in

लेखक के बारे में

सतीश भारतीय

मध्य प्रदेश के सागर जिला के निवासी सतीश भारतीय स्वतंत्र युवा पत्रकार हैं

संबंधित आलेख

जाति का सवाल वर्ग संघर्ष का ही एजेंडा है
वस्तुतः मंडल ने अंतर्विरोधों को पैदा नहीं किया, बल्कि उन्हें उजागर कर दिया। यदि गरीबों के आर्थिक अधिकारों को लेकर सहमति थी, तो आरक्षण...
बिहार में भरत भूषण तिवारी की ‘हत्या’, समाज, तंत्र और मीडिया
भरत भूषण तिवारी को मारने के आरोप के खिलाफ जो लोग बोल रहे हैं, वे कब किस मुठभेड़ के बाद नाचने-गाने व ताली बजाने...
राजस्थान : मतदाता से दावेदार बने बावरी समाज के राजनीतिक आत्मविश्वास की कहानी
बावरी (दलित) समुदाय की चार महिला विधायकों के विधानसभा पहुंचने का प्रभाव केवल चुनावी राजनीति तक सीमित नहीं रहा। दोनों जिलों में पंचायत चुनावों...
बिहार : भरत तिवारी एनकाउंटर पर चढ़ा जाति का रंग
हालिया एनकाउंटर में मारे गए व्यक्ति का नाम भरत तिवारी है, जो ब्राह्मण जाति का है। एक ब्राह्मण की हत्या के बाद ब्राह्मण नेताओं...
किस ‘प्रशासनिक’ कारण से नहीं दिए जा रहे डॉ. आंबेडकर के नाम पर पुरस्कार?
पुरस्कार से प्रोत्साहन का संचार होता है। शायद दलितों के बीच काम करने वालों को प्रोत्साहन की राजनीतिक जरूरत नहीं रह गई है। उनके...