उत्तर प्रदेश के प्रयागराज जनपद के फूलपुर तहसील के एक गांव पाली में काले-सफ़ेद बादल बारिश का छलावा रचते हुए आसमान में अठखेलियां कर रहे हैं। नीचे लेवा लगे खेतों में महिलाएं झुककर धान की रोपनी कर रही हैं। लेकिन यह क्या, रोपनी गीत गाने और हंसी-ठिठोली करने बजाय महिलाएं राजनीतिक और सांस्कृतिक सवालों पर आपस में कुछ कह-सुन रही हैं।
एक महिला कह रही है– “ग़जब कलजुग अहै बहिनी, अजोध्धा में रामै के खज़ाना, गहना गुरिया सब लूट लिहेन हो।” (भावार्थ– ग़ज़ब, कलयुग आ गया है बहन। अयोध्या में राम का खज़ाना, आभूषण और नकदी आदि लूट लिया गया है।)
दूसरी महिला कर रही है- “तोहका के बताएस हो?” (भावार्थ– तुम्हें किसने बताया?)
उत्तर में महिला कहती है– “के बताई हो, मोबइले में सब आवत हय।” (भावार्थ– कौन बताएग,] मोबाइल में सब आता है।)
एक अन्य महिला कहती है– “सेन्हि काटि के लै गए कि, डाका डालि के?” (भावार्थ– रात में सेंध काटकर ले गए, या दिनदहाड़े डाका डालकर लूट लिए।)
महिला जवाब देती है– “बहिरे के चोर नाही लूटेन बहिनी। जिनके ज़िम्मे रखवाली रही, ओनही सब लूटि लिहे राम के।” (भावार्थ– बाहर के चोरों ने नहीं लूटा। जिनके ज़िम्मे रखवाली का दायित्व था उन्हीं सबने लूट लिया राम को।)
महिला ने पूछा– “तो मोदी-योगी कुछ नाही करेन?” (भावार्थ– मोदी-योगी ने कुछ नहीं किया इस मामले में?)
जवाब आया– “का करिहें बहिनी, जब सब ओनही के पार्टी के मनई अहें सब।” (भावार्थ– क्या करेंगे, जब चोर उन्हीं के पार्टी के लोग हैं।)
आख़िर में एक अधेड़ महिला राम के जीवन का सार सुनाती है– “राम बेचारू के सुख बदै नाही बा। न जियबे, न मरबे। राजगद्दी मिलै के रहा ता वनवास मिलि गवा। न लरिका के सुख पाएन, न मेहरारू के। अपने लरिकन के लरिकइयौ तौ नाही देखि पाएन बेचारू। कबहूं महजिद में रहेन, ता कबहूं टेंट में। और अब उनके मंदिर नसीब भवा तौ खजाना चोरी होइ गवा। (भावार्थ– बेचारे राम के जीवन में सुख लिखा ही नहीं था। न जीते जी, न मरने के बाद। न उन्हें पत्नी का सुख मिला न बच्चों का। पिता के लिए सबसे सुखकर होता है अपने बच्चे का बचपन देखना, लेकिन वो भी नहीं देख पाए वो। कभी उनकी मूर्ति मस्जिद में रखी रही तो कभी टेंट में। अब मंदिर नसीब भी हुआ तो खज़ाना ही चोरी हो गया।)
ग्रामीण समाज की दलित-बहुजन महिलाओं की उपर्युक्त चर्चा से स्पष्ट है कि अयोध्या, राम मंदिर एक बार फिर से चर्चा के केंद्र में है। चर्चा का विषय इस बार मंदिर के चढ़ावे चोरी का है। राम मंदिर बनाने के लिए कारसेवा करने से लेकर बाबरी मस्जिद ढहाने तक और मंदिर निर्माण के बाद घर-घर दीए जलाने तक तमाम प्रक्रियाओं में दलित-बहुजनों की भागीदारी बढ़-चढ़कर रही है। लेकिन आज मंदिर के सोने-चांदी के चढ़ावे से लेकर नगदी की लूट तक तमाम तरह से लूट मची है। लगता है कि ‘राम नाम की लूट मची है लूट सके तो लूट’ को चंदा प्रबंधन करने वालों ने अभिधात्मक अर्थों में ले लिया।
प्रयागराज के बाबूगंज बाज़ार में बर्तन की दुकान लगाने वाले घनश्याम ठठेरी नब्बे के दशक में एक साईकिल-ट्रॉली में खड़ाऊं रखकर मंदिर निर्माण के लिए चंदा वसूलने वाले व्यक्ति हैं। वे याद करते हैं कि “किस तरह लोग-बाग़ भावुक होकर रोने लगते थे। राम की आस्था में स्त्रियां अपने गहने तक उतार कर दे देती थीं। कुछ विधवा स्त्रियों ने अपने मंगलसूत्र तक दे दिए थे। गांव में जिनके पास कुछ नहीं था, वे पीतल के बर्तन दे देते थे। वे बताते हैं कि यह सब कितना छुपकर और गुप्त रूप से किया जाता था। सरकार और पुलिस की नज़र में यह अपराध था, लेकिन हम इसे राम का काज मानकर कर रहे थे। लेकिन अब चंदाचोरी, ज़मीन की ख़रीद में गड़बड़ी आदि सुनकर लग रहा है कि जैसे किसी ने सरे बाज़ार गाल पर चांटा मार दिया हो। बहुत छला हुआ महसूस कर रहा हूं। राम मंदिर के लिए हर चंदा मांगने वाले को इन्होंने चोर साबित कर दिया है। लोग भले ही कुछ न बोलें, लेकिन लगता है कि उनकी नज़रों में हम भी चोर हैं।”

मंदिरों का चढ़ावा खाने की परंपरा रही है
कटका झूंसी निवासी अमित निषाद अपना पुश्तैनी पेशा छोड़कर टाइल्स लगाने का काम करते हैं। मुहल्ले के दो लड़कों को साथ लेकर उन्होंने अपनी एक छोटी-सी वर्कटीम बना ली है। जेन-जी पीढ़ी के अमित ने बाबरी मस्जिद का विध्वंस और नब्बे के दशक का मंदिर आंदोलन तो नहीं देखा है। लेकिन मंदिर बनते देखा है। चुनावी उद्घाटन का उन्माद देखा है। तब 22 जनवरी, 2024 को अपने घर में उन्होंने भी पांच दीये जलाए थे। राम से अपने समुदाय का एक पौराणिक जुड़ाव उन्हें गौरवबोध से भर देता है। अमित कहते हैं कि किसी भी मंदिर में जो चढ़ावा चढ़ता है, वह क्या होता है? उसे कौन लेता है? कोई छोटा मंदिर है तो उसमें पूजा-पाठ और मंदिर की देख-रेख पुजारी करता है। सारा पैसा वह रखता है। उसी पैसे से उसका गुज़ारा होता है। बाक़ी मंदिर के रखरखाव और सालाना कार्यक्रम के लिए अलग से चंदा जुटाया जाता है। इसी तरह जो अयोध्या के मंदिर में चढ़ावा चढ़ता है, क्या उसे राम लेते हैं? नहीं ना? यहां भी यदि एक पुजारी होता तो एक पुजारी अकेले सब खाता-पीता। लेकिन यहां तो पूरा 15 (अऩौपचारिक रूप से 17) सदस्यीय ट्रस्ट है, सैंकड़ों सहायक हैं, तो पूरा ट्रस्ट मिलकर खा रहा है।
अमित कहते हैं कि अगर चढ़ावा कम आता तो कोई दिक्कत ही नहीं होती। सब आराम से खाते-पीते मौज से रहते। समस्या इसलिए है क्योंकि चढ़ावा बहुत ज़्यादा आ रहा था। हद से ज़्यादा आ रहा था तो ये लोग हद से ज़्यादा खा रहे हैं। हद से ज़्यादा खाओगे तो अपच तो होगा ही, फिर वो खाना हो या पैसा। तो इन लोगों ने अथाह पैसा वहां से लिया और आपस में बांट लिया। एक नज़ीर लवकुश मिश्रा का ही देख लीजिए। एक नज़ीर अविनाश शुक्ला का देख लीजिए। टिन्नू यादव तो ख़ैर बहुत समय से काम कर रहा था। मंदिर में 15 हज़ार रुपए की नौकरी करने वाला व्यक्ति महज दो साल में इतना अमीर हो जाता है कि प्राइम लोकेशन पर 25 लाख से लेकर करोड़ रुपए तक की हज़ार वर्गफीट की ज़मीन ख़रीद लेता है, लाखों रुपए रजिस्ट्री फ़ीस जमा करता है। उस प्लॉट पर आलीशान दुमंजिला घर बना देता है, महंगी गाड़िया ख़रीद लेता है। महंगे कपड़े, महंगे मोबाइल, महंगे जूते इस्तेमाल करने लगता है। ये चीज़ें लोगों को दिखती हैं। और सबसे बड़ी बात आपकी बोली-भाषा बदल जाती है। आपका व्यवहार बदल जाता है। फिर आप खटकने लगते हो। यह जो पोल खुली है, यह नए लोगों की वजह से खुली है, जो पुरान घाघ हैं वो तो पता नहीं कब से बिना डकारे हजम किए जा रहे थे। अमित की बात सुनते समय रैदास का यह पद याद आ रहा है, जिसे रैदास ने सदियों पहले ऐसे ही तो लिखा था–
मंदिर भीतर मूरति बैठी, पूजति बाहर चेला रे
लड्डू भोग चढ़ावति जनता, मूरति के ढिंग केला रे।
पत्थर मूरति कछु न खाती, खाते बांभन चेला रे
जनता लूटति बांभन सारे, प्रभु जी देति न ढेला रे
पुण्य पाप पुनर्जन्म का, बांभन दीन्हा खेला रे
स्वर्ग, नर्क बैकुंठ पधारो, गुरु शिष्य या चेला रे
जितना दान देवगे जैसा, वैसा निकरै तेला रे
ज़मीन लूट मामले में कोई कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
चंदा चोरी के संदर्भ में स्नातक की छात्रा दीप्ति पटेल अयोध्या ज़मीन घोटाले के मामले में कोई कार्रवाई न होने को लेकर सवाल उठाती हैं। वह कहती हैं कि “यदि उस समय ज़मीन ख़रीद घोटाले की गंभीरता से जांच हुई होती और आरोपी चंपत राय और अनिल मिश्रा के ख़िलाफ़ कार्रवाई हुई होती तो वे लोग ट्रस्ट के सर्वोच्च पदों पर क़ाबिज़ होकर यूं सालों तक चढ़ावा चोरी को अंजाम न दे रहे होते।”
गौरतलब है कि साल 2021 में अयोध्या में ज़मीन ख़रीद घोटाले की चर्चा पूरे देश में गूंजी थी। तब अयोध्या में तैनात बड़े प्रशासनिक अधिकारियों, सत्ताधारी सफेदपोश नेताओं और स्थानीय बिल्डरों की गठजोड़ पर अयोध्या में बेनामी संपत्ति ख़रीदने और सस्ते दर पर ज़मीन ख़रीदकर ट्रस्ट को कई गुना ऊंचे दामों में बेचने के आरोप लगे थे। आम आदमी पार्टी ने इस मामले को जोर-शोर से उठाया था, तब भी इस मामले में एसआईटी बनाकर मामला दबा दिया गया था।
चढ़ावा चोरी मामले में गठित एसआईटी की जांच में भी यह बात सामने आयी है कि बेहद कम वेतन पाने वाले कर्मचारियों के नाम पर करोड़ों रुपए की ज़मीनों की रजिस्ट्री हुई है। आरोप है कि ये संपत्तियां वास्तव में नेताओं, बड़े रसूखदार अधिकारियों और भू-माफियाओं की हैं, जिन्होंने टैक्स और क़ानूनी शिकंजे से बचने के लिए बेनामी संपत्ति के रूप में इन्हें ख़रीदा है। एसआईटी इऩ संदिग्ध ज़मीन बैनामों की भी जांच कर रही है। इसमें राजस्व विभाग के अधिकारियों और स्थानीय प्रॉपर्टी डीलर की मिलीभगत हो सकती है।
राम मंदिर के नाम पर धन और ज़मीन की लूट का इतिहास है?
राम मंदिर आंदोलन पर 1980-90 के दशक से ही क़रीबी नज़र रखने वाले सामाजिक कार्यकर्ता राम कृपाल यादव बताते हैं कि अयोध्या, राम मंदिर मामले में चोरी कोई नई बात नहीं है। 1990 के दशक से ही राम मंदिर के नाम पर चंदा जुटाने और मिल-बांटकर खाने का चलन रहा है। इसमें कई हत्याएं भी हुई हैं। ऐसा नहीं है कि पहले इसके ख़िलाफ़ आवाज़ नहीं उठी थी, उठ रही थी लेकिन दबा दी जा रही थी। विवादित ढांचे के पहले पुजारी थे महंत लाल दास। उन्होंने राम मंदिर के नाम पर चंदा उगाही का विरोध करते हुए आरोप लगाया था कि विश्व हिंदू परिषद (विहिप) ने जनभावनाओं का दोहन करके अरबों रुपए खाते में डाले और बड़ी-बड़ी इमारतें खड़ी कर लीं। सिर्फ़ इतना ही नहीं, महंत राम दास ने राम मंदिर आंदोलन से जुड़े कई पुजारियों की हत्या करवाने का आरोप विहिप पर लगाया था। बाद में उनके ऊपर 10 रुपए के चढ़ावा की चोरी का आरोप लगाकर मुख्य पुजारी को हटाकर उनकी जगह सत्येंद्र दास को बिठा दिया और फिर 1993 में उनकी गोली मारकर हत्या कर दी गई। उनके हत्यारे आज तक नहीं पकड़े गए।
गौर तलब है कि राम मंदिर मामले में भ्रष्टाचार और गबन के आधा दर्ज़न से अधिक संगीन आरोप पिछले तीन-चार दशकों में लगे हैं। सबसे पहले निर्मोही अखाड़ा ने विहिप और उसके सहयोगियों के ख़िलाफ़ 1400 करोड़ रुपए से अधिक राशि में हेर-फेर का आरोप लगाया था। इसके अलावा रामशिलाओं के साथ आई नकदी का दुरुपयोग करने और हिसाब नहीं देने का आरोप लगाया गया था। इसके अलावा स्थानीय चंदा वसूली और पारंपरिक चढ़ावे को विहिप के लोगों द्वारा हड़पने का आरोप लगा था। साल 2021 में भूमि सौदों में घोटालों का आरोप लगा था। इसके अलावा जाली मंदिर भूमि ख़रीद का आरोप भी लगाया गया था। करोड़ों रुपए के प्रसाद घोटाला का मामला भी सामने आया था।
यह चढ़ावे के संकेंद्रण और दलित-बहुजन लोगों को धर्मस्थलों से वंचित करने की साजिश है
नौकरी पर आंच आने की डर से इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के एक दलित-बहुजन प्रोफ़ेसर अपनी प्रतिक्रिया में कहते हैं कि आपको आर्थिक हेराफेरी के मामले को एक किनारे करके इसे ठीक से समझना होगा। वे कहते हैं कि वाराणसी, अयोध्या से लेकर गुजरात तक आप देखिए कि कितनी प्राचीन मंदिरों को ध्वस्त किया गया है। यहीं अयोध्या में फकीरे राम मंदिर, सीता रसोई मंदिर आदि दर्ज़नों ऐतिहासिक महत्व के मंदिर थे, उन्हें बुलडोज़र से ध्वस्त कर दिया। इस तरह प्राचीन शहरों में जो मंदिरों का पूरा विकेंद्रीकृत संरचना होती थी, उन्हें एक योजना के तहत खत्म कर दिया गया। और उनकी जगह एक बड़ा ढांचा खड़ा कर दिया। फिर इन एकीकृत ढांचों का सारा ज़िम्मा ट्रस्ट के हवाले कर दिया गया। ट्रस्ट में अपने लोग बैठा दिए गए। बद्रीनाथ, काशी, अयोध्या, द्वारिका आदि तमाम जगहों पर यह व्यवस्था लागू है। इस तरह मंदिरों के क्लस्टर को खत्म करके एकीकृत मंदिर व्यवस्था बना दी गई है। छोटे मंदिरों के समूह खत्म होने से चढ़ावे और चंदे के रूप में धन एक जगह आने लगा। सिर्फ़ राम मंदिर की बात नहीं है, तमाम केंद्रीकृत मंदिरों के चढ़ावे में पिछले कुछ सालों में बेतहाशा वृद्धि हुई है। वजह यह है कि जो चढ़ावा तमाम मंदिरों में बंट जाता था, वह अब एकीकृत हो जाता है।
वीआईपी दर्शन की संस्कृति के नाम पर वसूली का ढांचा हर मंदिर में
सुविधा शुल्क लेकर राम मंदिर में वीआईपी दर्शन सुविधा शुरू की गई। एसआईटी की जांच में पता चला है कि वीआईपी दर्शन के नाम पर 25 हज़ार रुपए की वसूली की जाती थी। काशी के विश्वनाथ मंदिर में आरती देखने के पैसे देने पड़ते हैं। टाइम स्लॉट के हिसाब से अलग-अलग दर हैं। बद्रीनाथ मंदिर में महिंद्रा थार गाड़ी सुविधा चालू की गई है। बद्रीनाथ मंदिर में भी 1100 रुपए का सुविधा शुल्क लेकर वीआईपी दर्शन कराने की व्यवस्था है। जो पैसे नहीं देता, उसे दर्शन से वंचित कर दिया जाता है। केदारनाथ मंदिर के सामने से एक महिला का लाइव वीडियो अभी चर्चा में रहा था। महिला का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था। वीडियो में महिला रोते हुए बता रही थी कि एक महीने की तैयारी के बाद वह 23 किलोमीटर पैदल चलकर केदारनाथ पहुंची थी। लेकिन पैदल आने वालों को दर्शन नहीं करने दिया जा रहा था। जो लोग वीआईपी पर्ची कटाकर जा रहे थे वे दर्शन कर रहे थे, या जो हेलीकॉप्टर से मंदिर पहुंच रहे थे, वे दर्शन कर रहे थे। पैदल यात्रा करके आना तो दर्शन की उम्मीद मत करना। इतना दूर आकर भी वो ठीक से दर्शन नहीं कर पाई क्योंकि हेलीकॉप्टर की सुविधा नहीं ली थी, दर्शन के लिए अतिरिक्त भुगतान नहीं किया था।
इलाहाबाद में लगा कुंभ-2024-25 याद कीजिए। तमाम वीडियो वायरल हुए थे। अरैल घाट का जहां टेंट सिटी बसाया गया था। अरैल के वीआईपी घाटों पर वीआईपी लोगों के लिए मौनी अमावस्या वाले दिन भी यज्ञ-पूजा आदि करने की सहूलियतें हासिल थी। जबकि आम लोगों के लिए ठीक से नहाने की भी सुविधा नहीं थी, लोग भेड़-बकरियों की तरह एक-दूसरे पर चढ़कर जा रहे थे, दब-कुचलकर मर रहे थे। इस तरह हर बड़े धार्मिक स्थलों पर एक ख़ास संगठन और एक ख़ास विचारधारा का क़ब्ज़ा हो रहा है। आर्थिक आधार पर ग़रीबों ख़ासकर दलित-बहुजनों को एक बार फिर मंदिरों तक पहुंच से वंचित किया जा रहा है। लोगों को ईश्वर से अलग करने, उनमें हीनबोध भरने के लिए यह एक राजनीतिक साजिश है। एक पंक्ति में कहें तो आरएसएस-भाजपा के लोग आम लोगों से न केवल उनके धार्मिक संस्थान छीन रहे हैं, बल्कि वे यह भी सुनिश्चित कर रहे हैं कि कौन मंदिरों में जा सकता है और कौन नहीं जा सकता।
अब वैष्णो देवी, बद्रीनाथ, गुजरात, राजस्थान में भी चढ़ावा चोरी का खुलासा
राम मंदिर में चढ़ावा चोरी की पोल खुली तो तमाम मंदिरों में चढ़ावा चोरी के खुलासे का सिलसिला शुरू हो गया है। जम्मू के वैष्णो देवी मंदिर में चढ़ावे की 20 टन चांदी नकली बताई जा रही है। 550 करोड़ के नकली चांदी विवाद ने तूल पकड़ लिया है। बता दें कि सालों से एकत्रित चांदी की जांच करने और पिघलाने के लिए सरकारी टकसाल भेजी गई। लेकिन जांच रिपोर्ट में पता चला कि पूरे चढ़ावे में से सिर्फ़ 5-6 प्रतिशत ही चांदी असली थी। यहां दो सवाल उठते हैं कि क्या दुकानदारों ने चांदी चढ़ाने वाले भक्तों को नकली चांदी देकर उन्हें ठग लिया, या उन्होंने असली चांदी चढ़ाई और मंदिर में उसे बदल दिया गया।
ऐसे ही उत्तराखंड के बद्रीनाथ मंदिर धाम में भी चढ़ावा चोरी मामला सामने आया है। इस मामले में एक व्यक्ति की गिरफ्तारी हुई है। बीते 12 जुलाई, 2026 को प्रमोद नौटियाल को गिरफ्तार किया गया। यह कार्रवाई 8 जुलाई को बद्रीनाथ कोतवाली में प्रभारी मंदिर अधिकारी युद्धवीर पुष्पवाण की शिक़ायत पर की गयी। हेराफेरी का आरोपी प्रमोद नौटियाल बद्रीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति के अध्यक्ष हेमंत द्विवेदी का निजी सहायक है। उसे बद्रीनाथ धाम में चढ़ावा गणना के काम में लगाया गया था। गौरतलब है कि बद्रीनाथ धाम का प्रबंधन और संचालन का काम उत्तराखंड सरकार के मातहत बद्रीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति करती आ रही है।
राजस्थान के बुटाटी मंदिर धाम में 22 करोड़ रुपए के गबन का मामला सामने आया है। वहां चढ़ावे के सोने-चांदी के रिकार्ड ग़ायब हैं। इसी तरह गुजरात के अंबाजी मंदिर में चढ़ावा चोरी का सीसीटीवी वीडियो सामने आया है।
(संपादन : नवल/अनिल)
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