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मुसलमानों में जाति को नकारना हिंदुत्व को मदद करना है

मुस्लिम धर्मगुरुओं, जिनमें ज़्यादातर अशराफ (सवर्ण) जातियों से हैं, में इस प्रवृत्ति की एक बड़ी वजह उनके द्वारा हिंदुत्व को हिंदू धर्म का पर्याय मानते हुए उसके समानांतर इस्लाम को रखने की चेष्टा है। उन्हें लगता है कि वे वर्णों में विभाजित हिंदू धर्म के सामने ग्रंथ प्रेरित समानता पर आधारित इस्लाम को रखकर हिंदुत्व से नैतिक मुक़ाबला कर सकते हैं। बता रहे हैं शाहनवाज आलम

भारतीय मुसलमानों के राजनीतिक और आर्थिक विकास में एक बड़ी बाधा यह धारणा भी साबित हुई है कि इस्लाम में जातिगत ऊंच-नीच जैसा वर्गीकरण नहीं है। यह सैद्धांतिक तौर पर सही भी है, क्योंकि जिस तरह हिंदू धर्म में वर्णों की वैधता उसके धार्मिक ग्रंथों से निकलती है, वैसी ग्रंथ-आधारित वैधता मुसलमानों के बीच ऊंच-नीच को लेकर नहीं है। लेकिन इस धारणा, जो भारतीय उपमहाद्वीप की व्यवहारिक सच्चाई के ख़िलाफ़ है, ने आरएसएस द्वारा मुसलमानों को नागरिक के स्तर पर अदृश्य कर देने की योजनाओं को काफ़ी मदद पहुंचाई है और अगर इस धारणा को प्रचारित करने वाले जिनमें अधिकांश अशराफ (सवर्ण मुस्लिम) हैं, ने सबक नहीं सीखा तो स्थितियां और भी भयावह होंगी।

अतीत की ग़लती

10 अगस्त, 1950 को जब राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद ने संविधान के अनुच्छेद 341 के तहत अनुसूचित जाति के दायरे से ग़ैर-हिंदुओं को बाहर करने का आदेश जारी किया तो उसका विरोध मुस्लिम समाज नहीं कर पाया। जबकि दलित सिख समाज ने विरोध किया और 1956 में अपना छीना हुआ अधिकार वापस पा लिया। लेकिन मुस्लिम समाज के उस वक़्त अपनी ‘देशभक्ति’ साबित करने के संघर्ष में उलझे रहने और उसके नेतृत्व के पूर्णतः अशराफ या सवर्णवादी होने के कारण यह सवाल प्रमुखता नहीं पा सका। सबसे अहम कि डॉ. आंबेडकर का भी इस मुद्दे पर कोई विरोध नहीं दिखा। जबकि दलितों के लिए अलग निर्वाचन व्यवस्था, जिससे अनुसूचित वर्गों के लिए सरकारी नौकरियों में आरक्षण व्यवस्था का तर्क जुड़ा हुआ था, लेकिन वे यह तर्क देते रहे थे कि “अलग निर्वाचन क्षेत्र वास्तव में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा का एक साधन है, और इसका धर्म से कोई संबंध नहीं है। अगर इसका कोई सबूत चाहिए, तो यूरोपीय, एंग्लो-इंडियन और भारतीय ईसाइयों का उदाहरण दिया जा सकता है – ये सभी धर्म के आधार पर एक हैं, फिर भी इन सबके अलग-अलग निर्वाचन क्षेत्र हैं।” (भारत के गवर्नर जनरल लॉर्ड वेवेल को डॉ. आंबेडकर का पत्र, डॉ. आंबेडकर : लेखन और भाषण, खंड 10, पृष्ठ 484-6)

मुस्लिम नेतृत्व के इस सवर्णवादी नजरिए के कारण, जो यह मानता था कि मुसलमानों में जाति नहीं होती, अनुसूचित वर्गों को मिलने वाले अधिकारों से मुस्लिम समुदाय का बड़ा हिस्सा वंचित हो गया। जबकि उसके समकक्ष सामाजिक हैसियत वाली हिंदू दलित जातियों में सरकारी नौकरियों के कारण एक मध्यवर्ग विकसित हो गया। मसलन, मुस्लिम धोबी जो ओबीसी वर्ग में आते हैं और हिंदू धोबी जो अनुसूचित जाति वर्ग में आते हैं, के सामाजिक हैसियत में यह अंतर आपको दिख जाएगा। यानी जो मुसलमान एससी कोटे की सरकारी नौकरियों में दिख सकते थे, वे अदृश्य रह गए।

भविष्य भी दांव पर

लखनऊ के प्रभावशाली सुन्नी मौलाना ख़ालिद रशीद फ़िरंगी महली ने जनगणना की घोषणा के तुरंत बाद जारी एक अपील में कहा कि मुसलमान जनगणना में अपनी पहचान सिर्फ़ मुसलमान लिखें। इसका पुरजोर विरोध उत्तर प्रदेश के पसमांदा संगठनों ने किया।

ज़ाहिर तौर पर मौलाना ने ऐसा जान-बूझकर न भी किया हो तो भी इससे सबसे ज़्यादा नुक़सान पिछड़े वर्ग के मुसलमानों का ही होगा, क्योंकि वे सरकारी योजनाओं से वंचित कर दिए जाएंगे।

दरअसल, मौलाना का यह नॅरेटिव आरएसएस को सूट करता है, क्योंकि इस आधार पर कि इस्लाम में जाति नहीं होती, वो पिछड़े और आदिवासी मुसलमानों को आरक्षण के दायरे से बाहर निकालने का माहौल तैयार करेगा और उसके समर्थन में मुस्लिम धर्मगुरु का ही तर्क सामने रखेगा।

इसे तीन उदाहरणों से समझा जाना चाहिए।

24 मई, 2026 को आरएसएस से जुड़े आदिवासी संगठन की दिल्ली में रैली हुई, जिसमें गृहमंत्री अमित शाह भी मौजूद थे। इस रैली में अनुसूचित जनजाति के दायरे से मुसलमानों और ईसाइयों को बाहर करने की मांग की गई।

दूसरे, पिछले दिनों मद्रास हाईकोर्ट ने एक मामले की सुनवाई करते हुए धर्म परिवर्तन कर मुसलमान बने लोगों को ओबीसी वर्ग के तहत मिलने वाले अधिकारों से बाहर करने का निर्देश दे दिया। इसके साथ ही भाजपा शासित राज्यों में इस बहस को राजनीतिक मुद्दा बनाया जाना शुरू हो गया है कि जब मुसलमान आरक्षण के दलित कैटेगरी में नहीं हैं तो उन्हें ओबीसी दायरे से भी बाहर किया जाना चाहिए।

तीसरा, बीते जून माह के अंत में पश्चिम बंगाल सरकार ने सूबे में ओबीसी आरक्षण में अहम बदलाव करते हुए 17 प्रतिशत आरक्षण को घटाकर 7 प्रतिशत कर दिया। इसके साथ ही राज्य सरकार ने 113 ओबीसी जातियों, जिनमें अधिकांश मुस्लिम जातियां थी, को ओबीसी की राज्य सूची से हटा दिया।

आरएसएस के मंसूबे को शह 

मुस्लिम धर्मगुरुओं, जिनमें ज़्यादातर अशराफ (सवर्ण) जातियों से हैं, में इस प्रवृत्ति की एक बड़ी वजह उनके द्वारा हिंदुत्व को हिंदू धर्म का पर्याय मानते हुए उसके समानांतर इस्लाम को रखने की चेष्टा है। उन्हें लगता है कि वे वर्णों में विभाजित हिंदू धर्म के सामने ग्रंथ प्रेरित समानता पर आधारित इस्लाम को रखकर हिंदुत्व से नैतिक मुक़ाबला कर सकते हैं। इस प्रवृत्ति की जड़ में मुस्लिम धार्मिक नेतृत्व में लोकतांत्रिक राजनीति की समझ का अभाव होना है जिसके कारण वे राज्य की कल्याणकारी भूमिकाओं को भी नकारने लगते हैं।

बाएं से – पूर्व राज्यसभा सदस्य व मुस्लिम धार्मिक नेता महमूद मदनी, पूर्व राज्यसभा सदस्य अली अनवर व एआईएमआईएम के नेता असदुद्दीन ओवैसी

उसके इस भावनात्मक नज़रिए से आरएसएस को अपनी यह धारणा भी फैलाने में मदद मिलती है कि जब मुसलमान जाति नहीं मानते तब उनसे मुक़ाबला करने के लिए हिंदुओं को भी जाति को नकार देना चाहिए। इस तरह इस तर्क का वे पिछड़े और दलित हिंदुओं में विकसित हुई राजनीतिक चेतना को भी कुंद करने में इस्तेमाल करता है। मसलन, पिछले लोकसभा चुनाव में फतेहपुर सीकरी सीट पर जब एक अतिपिछड़ों की आबादी वाले गांव में जातिगत जनगणना के मुद्दे पर मैंने बात की तो भाजपा समर्थक लोगों का कहना था कि मुसलमानों में जाति व्यवस्था नहीं होती लेकिन कांग्रेस हिंदुओं को जाति जनगणना के मुद्दे के बहाने बांट रही है। ज़ाहिर है अगर उन्हें यह पता होता कि मुसलमानों में भी जातियां होती हैं तो वे यह बात नहीं करते।

पसमांदा राजनीति की दिशाहीनता

1990 के दशक में बिहार में डॉ. एजाज़ अली ने दलित मुसलमानों के राजनीतिक हिस्सेदारी ख़ासकर अनुच्छेद 341 को मुद्दा बनाना शुरू किया, जिसे अगले दशक में पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता अली अनवर ने अगले चरण में पहुंचाया। उन्हें नीतीश कुमार ने जदयू की तरफ से दो बार राज्यसभा भी भेजा, लेकिन उसके बाद यह तहरीक ठहराव का शिकार हो गई। 

मेरी समझ से इसकी दो वजहें रहीं। जदयू के साथ दिखने के कारण इसकी छवि कहीं और से नियंत्रित एक आंदोलन की बन गई। तब अली अनवर के भाषणों में भी यह रुझान दिखने लगा था। मसलन, राज्यसभा में हरियाणा के मेवात के पिछड़ेपन पर बोलते हुए उन्होंने मेवात के मुसलमानों की देशभक्ति का ज़िक्र करते हुए कहा था कि हसन ख़ान मेवाती ने बाबर के ख़िलाफ़ राणा सांगा का साथ दिया था। ज़ाहिर है यह इतिहास को देखने के आरएसएस के नज़रिए को सूट करता है, जहां बाबर से लड़ने वाले मुस्लिम को देशभक्त माना जाता है। वह भी बिना इस तथ्य पर बात किए कि बाबर मुस्लिम शासक इब्राहिम लोधी से लड़ने राणा सांगा के बुलावे पर ही आया था। इसी तरह इस तहरीक के नेताओं के भाषणों में अब्दुल क़य्यूम अंसारी का ज़िक्र सिर्फ़ उनके जिन्ना के पाकिस्तान एजेंडे के विरोधी के बतौर रहता था। बिहार के बुनकरों के अधिकारों के संघर्ष में उनकी भूमिका पर ज़्यादा चर्चा नहीं होती थी।

दूसरा, इसमें राजनीतिक तत्व कम और भावनात्मकता ज़्यादा थी। मसलन, इसका एक आम नारा था– शेख़, सैयद, मुग़ल, पठान, कुर्सी छोड़ो भाईजान।

दरअसल, यह हिंदू बहुजन के नज़रिए से गढ़ा गया नारा था। हिंदू दलित और पिछड़े यह कह सकते हैं कि बड़ी सरकारी कुर्सियों पर ब्राह्मण, राजपूत या भूमिहार बैठे हैं। लेकिन किन मंत्रालयों की कुर्सियों पर शेख़, सैयद और पठानों का क़ब्ज़ा था या है? या किन पिछड़े मुसलमानों का हिस्सा अशराफ खा गए थे? दरअसल पिछड़े मुसलमानों का हिस्सा आरक्षण के नियमों के हिसाब से तो अशराफ खा ही नहीं सकते थे। यह हिस्सा ओबीसी वर्ग में आने वाली हिंदू जातियां ही खा सकती थीं। लेकिन इस आंदोलन ने कभी इस सवाल को मजबूती से नहीं उठाया या उसे उठाने नहीं दिया गया। पसमांदा आंदोलन के विचारकों ने यह सवाल भी नहीं उठाया कि दलित अधिकारों की बात करने वाले लोग अनुच्छेद 341 को संशोधित कर मुस्लिम दलितों को अपने हिस्से में भागीदार बनाने की पहल क्यों नहीं करते?

वहीं, इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि पिछड़े हिंदुओं के आंदोलन ने जिस तरह सत्ता से अपनी हिस्सेदारी की लड़ाई लड़ी वैसी सत्ता-विरोधी लड़ाई पसमांदा मुस्लिम आंदोलन नहीं लड़ पाया। उनके निशाने पर सरकार से ज़्यादा अशराफ ही रहे। जबकि अधिकार और हिस्सेदारी सरकार से मिलनी थी न कि अशराफों से।

इस वैचारिक और रणनीतिक अस्पष्टता के कारण इस आंदोलन को जड़ता का शिकार होना पड़ा। इसलिए अब यह ज़मीन से ग़ायब है और अकादमिक सर्किल तक सिमट गया है।

पसमांदा तहरीक के खड़े होने की उम्मीद

फिलहाल इस तहरीक के खड़े होने की संभावना इन दो तथ्यों पर निर्भर करती है। पहला, वह ओबीसी आरक्षण के अंदर पसमांदा जातियों के लिए किसी सब-कोटा की मांग के मुद्दे को उठा पाती है या नहीं। दूसरा, ओबीसी आरक्षण के वर्गीकरण का सुझाव देने वाली रोहिणी कमीशन की रिपोर्ट का समर्थन करती है या नहीं?

इन दोनों मुद्दों पर उसे मजबूत हिंदू ओबीसी जातियों से असहयोग ही मिलने की संभावना होगी। इसलिए यह उसकी दृढ़ता और राजनीतिक इच्छाशक्ति की भी परीक्षा होगी। लेकिन यह कहा जा सकता है कि इन दोनों मुद्दों पर उसकी सार्थक पहल, मुस्लिम समाज और बहुजन राजनीति दोनों के लोकतांत्रिकरण के लिए बहुत अहम इस तहरीक को फिर से खड़ा कर सकती है।

(संपादन : नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

शाहनवाज आलम

लेखक भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सचिव हैं

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