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बंगाली अध्येताओं की नजर में रामराज्य

रवींद्रनाथ टैगोर से लेकर राजशेखर बसु और दिनेश चंद्र सेन आदि बंगाली अध्येताओं ने रामायण का विश्लेषण अलग-अलग नजरिए से किया है, जिनमें तर्क के आधार पर सवाल उठाए गए हैं। ऐसे ही विश्लेषणों के बारे में बता रहे हैं अभिजीत गुहा

“‘रामायण’ और ‘महाभारत’ सिर्फ महाकाव्य नहीं हैं, वे इतिहास हैं। यह इतिहास कुछ घटनाओं का विवरण मात्र नहीं है…ये भारत के विचारों और संकल्पों को दिखाते हैं…राम का चरित्र उच्च था या नहीं, मैं लक्ष्मण को पसंद करता हूं या नहीं, केवल यह पर्याप्त नहीं है। हमें शांति से बैठकर इस बात का फैसला करना चाहिए कि संपूर्ण भारत ने किस प्रकार इन दो महान पुस्तकों को आत्मसात किया।”रवींद्रनाथ टैगोर, दिनेश चंद्र सेन की पुस्तक ‘रामायणी कथा’ की प्रस्तावना में 

धर्मनिष्ठ हिंदू मानते हैं कि राम एक आदर्श राजा थे जिन्होंने अपने राज्य में सभी के साथ न्याय किया, अपनी प्रजा को खुशहाल रखा और उससे अत्यंत निष्ठापूर्ण स्नेह किया।

राम की न्यायप्रियता और ईमानदारी का बखान इस दृष्टांत के जरिए किया जाता है कि उन्होंने लंका के राजा रावण पर विजय पाने के बाद सीता की पवित्रता की पुष्टि अग्निपरीक्षा के माध्यम से की। सीता इस कसौटी पर खरी उतरीं। लेकिन राम इससे संतुष्ट नहीं हुए – उन्होंने जनसुनवाई की, जिससे सीता को इतनी पीड़ा हुई कि वे धरती में समा गईं। यह क्या दिखाता है? (1) राम का सीता के प्रति अविश्वास और (2) उनका लोकलुभावन दृष्टिकोण। वे राजा बने रहने के लिए किसी भी हद तक जाने के लिए तैयार थे। राजशेखर बसु अपनी शानदार प्रस्तावना में यह सवाल काफी सारगर्भित ढंग से उठाते हैं। वे लिखते हैं, “लाखों लोग राम के चरित्र में असंगति की ओर ध्यान नहीं देते और किस्सागो ने जो भी बताया, उसे भक्तिपूर्वक स्वीकार कर लेते हैं … लेकिन ‘वाल्मिकी रामायण’ मुख्यतः कविताओं का संकलन है। वह न तो कोई प्राचीन कहानी है और न ही भक्तिपूर्ण इबारत और इस वजह से हम अपनी तार्किकता से किनारा नहीं कर सकते। इस कारण हमारे मन में एक प्रश्न उठता है। यह तो अच्छी बात है कि वाल्मिकी, राम को अत्यंत कर्तव्यपरायण व्यक्ति के रूप में प्रस्तुत करना चाहते थे लेकिन क्या सीता को दो बार प्रताड़ित करना उचित था?” [(बसु, 1946: 3.4) बांग्ला से मेरे द्वारा अनुदित]

हालांकि बसु वाल्मिकी का बचाव करते हुए कहते हैं कि ‘रामायण’ का उत्तरकांड बाद में अन्य अज्ञात कवियों द्वारा उसमें जोड़ा गया था, इसलिए युद्ध के बाद राम द्वारा सीता को दिए गए दंड के लिए वाल्मिकी को दोषी नहीं ठहराया जाना चाहिए।

बसु जोर देकर कहते हैं कि वाल्मिकी के लिए ‘रामायण’ में वर्णित विभिन्न विसंगतियों को एक आधुनिक एवं ‘निष्पक्ष’ नजरिए से देखना कितना मुश्किल रहा होगा। बसु इस सिलसिले में जिन घटनाओं का हवाला देते हैं, वे हैं– राम द्वारा बाली की कायरतापूर्ण हत्या, रावण की मौत के बाद कठोर शब्दों में सीता को स्वीकार करने से उनका इंकार और वर्णाश्रम के ऊंच-नीच के नियमों के चलते शूद्र संत शंबूक की हत्या – इन नियमों के मुताबिक शूद्रों के लिए तपस्या करना वर्जित था। ‘रामायण’ के एक अन्य अध्येता डॉ. दिनेश चंद्र सेन (1866-1939) भी अपनी बांग्ला पुस्तक ‘रामायणी कथा’ (1904) में राम द्वारा छिपकर बाली की हत्या उस समय किए जाने पर सवाल उठाते हैं जब वह अपने छोटे भाई सुग्रीव के साथ मल्लयुद्ध में उलझा हुआ था। सुग्रीव राम के साथी भी थे। सेन लिखते हैं, “मौत के ठीक पहले बाली ने राम से कई कटु शब्द कहे। बाली ने राम से कहा– ‘आप धर्म की ध्वजा लेकर चलते हैं लेकिन आप ऐसे हैं नहीं … आप धोखेबाज हैं। आप दशरथ का पुत्र होने के लायक नहीं हैं।’”

राजशेखर बसु व दिनेश चंद्र सेन

सेन को बाली का ये कथन न्यायोचित एवं उसके धर्म के अनुरूप लगे। इसलिए इस बात की संभावना कम है कि महान कवि वाल्मिकी राम के इन कृत्यों को व्यक्तिगत रूप से उचित मानते थे। (सेन, 1904:73) राम का सुग्रीव की ओर झुकाव स्पष्ट था। राम ने बाली से कहा था कि सुग्रीव के साथ उनका गठजोड़ है, इसलिए सुग्रीव का शत्रु उनका भी शत्रु है। यहां अपनी पुस्तक के 74वें पृष्ठ पर दिनेश चंद्र ने एक अत्यंत दिलचस्प फुटनोट जोड़ा है– “इस भाग को पढ़ने के बाद रवींद्रनाथ ने कहा था– ‘हमें सभी प्रकार की झिझक और संकोच को त्यागकर स्पष्ट शब्दों में यह कहना चाहिए कि राम ने यह बुरा कार्य करके ठीक नहीं किया, दिनेशबाबू इस संदर्भ में क्यों झिझक रहे थे?’” (सेन, 1925:74)

शत्रुघ्न ने भी अपने बड़े भाई का अनुसरण करते हुए अपने शत्रुओं का नाश करने के लिए द्वन्द युद्ध के नियमों और आचार संहिता का उल्लंघन किया।

लवणासुर का वध 

वाल्मिकी के आश्रम में राम और सीता के दो पुत्रों लव और कुश के जन्म के बाद राम के छोटे भाई शत्रुघ्न च्यवन ऋषि के आश्रम में गए। रात में च्यवन ऋषि ने उन्हें लवणासुर का किस्सा सुनाया जो एक शक्तिशाली असुर था। लवणासुर के पास एक अत्यंत घातक हथियार था, जिससे उसने मंधाता नामक एक राजा और उनकी पूरी सेना को मार दिया था। इसलिए च्यवन ऋषि ने शत्रुघ्न को सुझाव दिया कि वे लवणासुर का वध उस समय करें जब वह अस्त्रहीन हो। तदानुसार शत्रुघ्न लवणासुर के पास गए और उसे द्वंद्व युद्ध करने की चुनौती दी, लेकिन उसे अपना घातक हथियार लेने का अवसर नहीं दिया। शत्रुघ्न ने बेशर्मी से द्वंद्वयुद्ध के मूलभूत नियमों का उल्लंघन किया। लवणासुर ने निडरता से शत्रुघ्न पर बड़े-बड़े पेड़ फेंकने शुरू किया। इनमें से एक पेड़ से लगी चोट से शत्रुघ्न बेहोश हो गए, हालांकि वे अपने बाण से इन पेड़ों को टुकड़े-टुकड़े कर सकते थे। लवणासुर ने सोचा कि शत्रुघ्न की मृत्यु हो गई है, और अब उसे अपने हथियार की जरूरत नहीं है। होश मे आने पर जब शत्रुघ्न ने पाया कि लवणासुर अभी भी अस्त्रहीन हैतब उन्होंने अपने शक्तिशाली धनुष-बाण से उसे निशाना बना लिया। (बसु, 1946:450-451)

राजशेखर बसु की कृति ‘वाल्मिकी रामायण’ व दिनेश चंद्र बसु की कृति ‘रामायणी कथा’ का आवरण पृष्ठ

शंबूक की कहानी

शंबूक का किस्सा ‘रामायण’ के उत्तरकांड में वर्णित है। वह इस प्रकार है। एक दिन एक ब्राह्मण राम के पास अपने मृत पुत्र की देह लेकर आया और बोला कि संभवतः उनके [राजा] के पापों के कारण ही उसके पुत्र की मृत्यु हुई। ब्राह्मण ने राम को धमकी दी कि यदि उन्होंने उसके पुत्र को दुबारा जीवित नहीं किया तो वह अपनी पत्नी के साथ आत्महत्या कर लेगा। ब्राह्मण का विलाप सुनकर राम ने अपने ब्राह्मण सलाहकारों वशिष्ठ, मार्कंडेय, कश्यप और नारद से चर्चा की। राम ने अपने ब्राह्मण सलाहकारों से कहा कि वे ब्राह्मण के पुत्र की मृत्यु के संभावित कारण का पता लगाएं। नारद ने कहा कि “सतयुग में तपस्या करने का अधिकार केवल ब्राह्मणों का था और उस काल में किसी का असामयिक निधन नहीं होता था। त्रेता युग में क्षत्रियों ने भी तपस्या करना शुरू कर दिया और ब्राह्मणों और क्षत्रियों के बीच का अंतर मिट गया और चार श्रेणियों वाली वर्ण-व्यवस्था कायम हुई। इसके बाद द्वापर युग आया और वैश्य भी तपस्या करने लगे, लेकिन उस समय भी शूद्रों को तपस्या करने की पात्रता नहीं थी … महाराज कोई मूर्ख शूद्र कुछ हासिल करने के लिए तपस्या कर रहा होगा और उसके इसी पाप की वजह से इस ब्राह्मण के पुत्र की मृत्यु हुई।” (बसु, 1946: 453-454)

नारद की इस सलाह के मुताबिक राम ने तपस्या कर रहे शूद्र की तलाश शुरू की और दक्षिण में एक बड़े तालाब के पास एक व्यक्ति को तपस्या करते पाया। बसु लिखते हैं कि उनके बीच यह बातचीत हुई। राम ने कहा, “मैं राजा दशरथ का पुत्र हूं और मैं जिज्ञासावश तुमसे यह पूछ रहा हूं कि तुम तपस्या का कष्ट क्यों उठा रहे हो? तुम्हारा लक्ष्य क्या है? तुम किस वर्ण के हो– ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र? मुझे सच-सच बताओ।” शंबूक ने उत्तर दिया, “मैं देवता बनना चाहता हूं और देवों के साम्राज्य को जीतना चाहता हूं। मैं झूठ नहीं बोलूंगा। मैं शूद्र हूं और मेरा नाम शंबूक है।” (बांग्ला से मेरे द्वारा अनुदित)

राजशेखर बसु इसके आगे लिखते हैं कि शंबूक की ये बातें सुनते ही राम ने तुरंत अपनी बड़ी-सी तलवार म्यान से निकाली और शंबूक का सिर धड़ से अलग कर दिया। (बसु, 1946:454) इसके बाद राम ने देवताओं के राजा इंद्र से ब्राह्मण के पुत्र को दुबारा जीवित करने की प्रार्थना की। उनकी प्रार्थना स्वीकार हुई और सभी देवताओं ने राम पर पुष्प वर्षा कर उन्हें आशीर्वाद दिया। ब्राह्मण लड़के को दुबारा जीवित करने के लिए शूद्र संत की हत्या जरूरी थी! इसके बाद देवताओं ने राम को कई बहुमूल्य आभूषण भेंट किए। (बसु, 1946:455) मानवविज्ञानी सुरजीत सिन्हा ने राम द्वारा शंबूक के वध का जिक्र इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र, नई दिल्ली में 1993 में दिए गए प्रथम एन.के. बोस स्मृति व्याख्यान में किया था, जो 1997 में प्रकाशित किया गया। सिन्हा कहते हैं, “इस बात के लिखित दस्तावेज उपलब्ध हैं कि कैसे ब्राह्मण अक्सर अधीनस्थ समुदायों के उच्च ‘सांस्कृतिक’ दर्जे की ओर उन्नत होने को रोकते थे।” बोस का विचार है कि “रामायण में हमें बताया जाता है कि राम को कैसे शंबूक नामक शूद्र का वध करना पड़ा जो आध्यात्मिक उन्नयन की आकांक्षा की पूर्ति के लिए वह कार्य कर रहा था जो सिर्फ द्विज कर सकते थे।” (सिन्हा, 1993:8)

साहसी भरत

दिनेश चंद्र सेन के अनुसार भरत ‘रामायण’ का बेदाग चरित्र था, लेकिन विडंबना यह थी कि वह कैकेयी जैसे दुष्ट व्यक्तित्व का पुत्र था जो दशरथ की पत्नियों में एक थी। ‘वाल्मिकी रामायण’ में राम, सीता और लक्ष्मण को 14 साल वनवास के लिए भिजवाने में कैकेयी की प्रमुख भूमिका बताई गई है, जिसके बाद उसने अपने पुत्र भरत को दशरथ की सहमति से राजगद्दी पर बैठाया। इन 14 वर्षों के दौरान भरत ने संन्यासी जीवन बिताया और नंदीग्राम नामक एक नजदीकी गांव से अयोध्या का राजकाज अच्छे से चलाया। (सेन 1925:121) जब राम वनवास के लिए जा रहे थे तब भरत उन्हें वापिस अयोध्या लाने के लिए अपनी सेना के साथ जंगल पहुंचे तो लक्ष्मण तक ने भरत के इरादे पर शक किया। लक्ष्मण ने यह तक कहा कि वे भरत का वध कर देना चाहते हैं। लेकिन राम को इस बात का पूरा विश्वास था कि भरत उनके साथ विश्वासघात नहीं करेगा और उनका अनुमान सही था, हालांकि राम ने भी सीता से भरत के प्रति अपनी नाराजगी व्यक्त की जब सीता ने भरत की प्रशंसा की। (सेन, 1925:108) भरत के राज के दौरान सरकारी खजाने की आमदनी काफी बढ़ी, साम्राज्य में समृद्धि आई और जनता को कोई शिकायत नहीं थी। लेकिन राम के शूद्र मित्र गुहक के अलावा किसी ने भी भरत की स्पष्ट शब्दों में प्रशंसा नहीं की। गुहक ने कहा, “आप अपनी राजगद्दी राम को लौटाने को तत्पर हैं। आप धन्य हैं। मुझे आप जैसा कोई नहीं मिला।” (सेन, 1925:122)

संदर्भ

बसु, आर. (1946), प्रस्तावना, पृष्ठ 1-7 वाल्मिकी रामायण (आर. बोस द्वारा बांग्ला में अनुदित एवं संक्षिप्तिकृत) एम.सी. सरकार एंड संस, कलकत्ता

सेन, डी. (1925), रामायणी कथा, भट्टाचार्य एंड संस, कोलकाता

सिन्हा, एस. (1993), प्रथम निर्मल बोस स्मृति व्याख्यान, पृष्ठ 1-26, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र, नई दिल्ली

टैगोर, आर. (1907), रामायण, पृष्ठ 5-13, प्राचीन साहित्य, विश्व भारती

(मूल अंग्रेजी से अनुवाद : अमरीश हरदेनिया, संपादन : राजन/नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

अभिजीत गुहा

अभिजीत गुहा विद्यासागर विश्वविद्यालय के नृवंशशास्त्र विषय के पूर्व अध्यापक व इंस्टीट्यूट ऑफ डेवलपमेंट स्टडीज, कोलकाता में पूर्व वरिष्ठ आईसीएसएसआर फेलो रहे हैं। वे 'नेशन बिल्डिंग इन इंडियन एंथ्रोपोलॉजी : बियांड द कोलोनियल एनकाउंटर' (रूटलेज/मनोहर, 2003) पुस्तक के लेखक हैं।

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