सन् 1893 में बाल गंगाधर तिलक ने बड़े पैमाने पर गणेश उत्सव मनाने की शुरुआत की। यह घटना भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के हिंदूकरण की पहली बड़ी कार्रवाई थी। तिलक ने व्यापक पैमाने पर गणेश उत्सव की शुरुआत कर और उसे स्वतंत्रता आंदोलन का हिस्सा बनाकर कांग्रेस और स्वतंत्रता आंदोलन का हिंदूकरण किया। इसके जरिए उन्होंने गोखले, नौरोजी आदि के धर्मनिरपेक्ष कांग्रेस को हिंदू कांग्रेस में बदलना शुरू कर दिया।
तिलक ने ही 1894 में शिवाजी (छत्रपति शिवाजी महाराज के नाम पर) उत्सव की शुरुआत की। उन्होंने शिवाजी को हिंदू-स्वाभिमान और विदेशियों के प्रति घृणा से जोड़ा। धर्मनिरपेक्ष शिवाजी को मुसलमानों के खिलाफ नफरत करने वाले और उनके खिलाफ युद्ध लड़ने वाले के रूप में प्रस्तुत किया। उन्हें ब्राह्मण-गाय का सबसे बड़ा संरक्षक घोषित किया गया। गणेश उत्सव की तरह ही शिवाजी उत्सव को ब्रिटिश हुक्मरान के खिलाफ स्वतंत्रता आंदोलन से जोड़ दिया। इस प्रकार शिवाजी का सांप्रदायिक और ब्राह्मणवादी रूप गढ़कर उनको मोहरा बनाकर कांग्रेस और राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन का खुले तौर पर ब्राह्मणीकरण शुरू हुआ।
तिलक ने सामाजिक सुधारों के लिए कांग्रेस के राष्ट्रीय अधिवेशनों के साथ होने वाले सोशल कांफ्रेंस का विरोध किया और उसे बंद करा दिया। उसे आयोजित करने की कोशिश की गई तो उसके पंडाल में आग लगवा दिया गया।
सन् 1905 में कांग्रेस के बनारस अधिवेशन में गोखले और तिलक गुट के बीच तीखा संघर्ष हुआ। और 1907 में सूरत में हुए अधिवेशन में कांग्रेस पार्टी का विभाजन हो गया।
इस प्रक्रिया में हिंदूकरण और ब्राह्मणीकरण के अगुवा रहे लाल-बाल-पाल (लाला लाजपत राय, बाल गंगाधर तिलक और विपिनचंद्र पाल) ने करीब-करीब कांग्रेस पर कब्जा कर लिया। लाला लाजपत राय हिंदू महासभा के एक बड़े नेता थे। विपिनचंद्र पाल वेदांत-दर्शन और वैष्णव विचारधारा के अध्येता और समर्थक के तौर पर खूब जाने जाते हैं। तिलक की मुस्लिम विरोधी घृणा के साथ उनके वर्ण-जाति और पितृसत्ता समर्थक विचारों से हम सब परिचित हैं।
कांग्रेस पर तिलक, लाला लाजपत राय और विपिन चंद्र पाल के कब्जे के दो परिणाम तुरंत ही सामने आए। पहला कांग्रेस के हिंदूकरण ने सबसे बड़े अन्य धार्मिक समुदाय मुसमलानों को यह संदेश दिया कि कांग्रेस पूरे देश की प्रतिनिधित्व करने वाली राष्ट्रीय पार्टी नहीं, मूलत: हिंदुओं का प्रतिनिधित्व करने वाली एक हिंदू पार्टी ज्यादा है। सन् 1906 में मुस्लिम लीग का गठन होता है। यह वही समय था जब कांग्रेस और उसके नेतृत्व में चलने वाले राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन पर हिंदूवादी-ब्राह्मणवादी तिलक, लाला लाजपत राय और थोड़े नरम हिंदू विपिनचंद्र पाल का कब्जा हुआ।
दूसरा, इस कब्जे ने वर्ण-जाति व्यवस्था और पितृसत्ता विरोधी (ब्राह्मणवाद विरोधी) शक्तियों को कांग्रेस से दूर किया। तिलक और लाला लाजपत राय के नेतृत्व वाली कांग्रेस ने जोतीराव फुले और बाद में डॉ. आंबेडकर के मन में कांग्रेस के प्रति एक तीखी नफरत पैदा की। इन लोगों ने कांग्रेस को ब्राह्मण-द्विज कांग्रेस के रूप में देखा।

सन् 1920 में तिलक के निधन के बाद जब कांग्रेस का नेतृत्व गांधी के हाथ में आता है, तो वे तिलक और लाला लाजपत राय की तरह कट्टर हिंदुत्व और द्विज-ब्राह्मण श्रेष्ठता के पैराकार तो नहीं बनते हैं, लेकिन वे तिलक-लाजपत राय की नेतृत्व में हुई कांग्रेस के हिंदूकरण और ब्राह्मणीकरण की प्रक्रिया को रोकते नहीं हैं। यदि नरम शब्दों का इस्तेमाल करें तो कह सकते हैं कि वे रोक नहीं पाते हैं। वे तिलक को राष्ट्रीय नायक के रूप में प्रस्तुत कर कांग्रेस के लिए फंड जुटाने के लिए ‘तिलक फंड’ बनाते हैं। वे अपना आदर्श राज्य के रूप में रामराज्य को प्रस्तुत करते हैं और गौ-रक्षा के सबसे बड़े पैरौकार के रूप में सामने आते हैं। गीता को आदर्श किताब के रूप में प्रस्तुत करते हैं। वेदों और ब्राह्मणों की श्रेष्ठता का गुणगान करते हैं। उन्होंने व्यक्तिगत जीवन और आंदोलन के उपकरणों के रूप में जिन प्रतीकों को चुना, वे हिंदुत्व के वर्चस्व का प्रतिनिधित्व करते थे।
यह सच है कि गांधी के दिलो-दिमाग और विचारों में मुसलमानों या अन्य धार्मिक अल्पसंख्यकों के प्रति कोई नफरत नहीं थी। न ही वे उन्होंने दोयम दर्जे का समझते थे। वे गीता के साथ कुरान को भी सम्मान और आदर से देखते थे, लेकिन हिंदू धर्म की महानता की वकालत तो जोर-शोर से करते ही थे।
नरम हिंदू के रूप में कांग्रेस और कांग्रेस के नेतृत्व में चलने वाले आंदोलन को धार्मिक दायरे (चाहे वह हिंदू हो या मुसलमान) से बाहर नहीं निकाल पाए। कांग्रेस को एक धर्मनिपेक्ष कांग्रेस और राष्ट्रीय आंदोलन को एक धर्मनिरपेक्ष आंदोलन में नहीं बदल पाए। उन्होंने मुसमलानों को अपने साथ करने के लिए उनकी एक बहुत ही रूढ़िवादी धार्मिक भावना को जरूर सराहा। मसलन, खिलाफत आंदोलन (इस्लामिक राजतंत्रवादी खलीफा के शासन के पक्ष में) उनका साथ जरूर दिया। इस प्रकार गांधी ने कांग्रेस से दूर हो रहे मुसलमानों को उनकी पिछड़ी धार्मिक भावना को सहलाकर अपने साथ करने की कोशिश की।
गांधी कांग्रेस को ब्राह्मणीकरण के दायरे से भी बाहर नहीं निकाल पाए। वे स्वयं करीब 1930-32 तक वर्ण-जाति व्यवस्था (ब्राह्मणवाद) को एक महान व्यवस्था मानते रहे। किसी तरह जाति-व्यवस्था के महानता की अपनी सोच से मुक्त हुए तो जीवन के अंतिम समय तक वर्ण-जाति आधारित व्यवस्था का समर्थन करते रहे।
अनेक भारतीय इतिहासकार व बुद्धिजीवी तिलक के गणेशोत्सव और शिवाजी उत्सव आदि को स्वतंत्रता आंदोलन के द्वारा व्यापक जनता तक पहुंचाने के सफल उपकरण के रूप में देखते हैं। वे लाल-बाल-पाल को स्वतंत्रता आंदोलन को अभिजन दायरे से बाहर व्यापक स्तर तक ले जाने वाले गरमपंथी और गोखले-नौरोजी की तुलना में ज्यादा ब्रिटिश विरोधी के रूप में प्रस्तुत करते हैं।
यह सच है कि स्वतंत्रता आंदोलन को गणेश उत्सव और शिवाजी उत्सव से जोड़कर तिलक ने कांग्रेस को हिंदू कांग्रेस के रूप में प्रस्तुत करके व्यापक लोगों तक विस्तार किया। लेकिन सवाल यह है कि किस कीमत पर? कांग्रेस के हिंदूकरण और ब्राह्मणकीरण से कांग्रेस का फैलाव हुआ, लेकिन इसने ही स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान ही बड़े पैमाने पर हिंदू-मुस्लिम के बीच बंटवारा पैदा कर दिया। ब्राह्मणवाद विरोधी नायकों को कांग्रेस से दूर कर दिया। गांधी की नरम हिंदुत्व और नरम ब्राह्मणीकरण की सोच भी इसे रोक नहीं पाई।
यह तथ्यात्मक तौर पूरी तरह झूठ है कि गांधी के नेतृत्व वाले कांग्रेस को बडे़ पैमाने पर मुसलमानों का समर्थन हासिल था। पेरी एंडरसन अपनी किताब ‘दी इंडियन आइडियोलॉजी’ में बताते हैं कि 1930 के दशक के मध्य में कांग्रेस के कुल सदस्यों में मुसलमान केवल 3 प्रतिशत थे।
नतीजा देश के विभाजन के रूप में सामने आया। किस व्यक्ति ने क्या भूमिका निभाई? किस संगठन ने क्या भूमिका निभाई? किसका क्या असली या नकली उद्देश्य था? ये सब बहसें भारत-पाकिस्तान के विभाजन के संदर्भ में होती रही हैं, हो रही हैं और होती रहेंगी।
भारत के विभाजन को एक चीज रोक सकती थी। वह थी धर्मनिरपेक्षता। अगर स्वतंत्रता आंदोलन का मूल चरित्र धर्मनिरपेक्ष होता और उसके नायकों का मूल चरित्र धर्मनिरपेक्ष होता। न कोई हिंदू होता, न कोई मुस्लिम। धर्मनिरपेक्ष कांग्रेस और धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन हिंदू महासभा के हिंदू राष्ट्र की चाह और मुस्लिम लीग के इस्लामिक राष्ट्र की चाह से निपट सकती थी।
भारत के भारत और पाकिस्तान के रूप में बंटवारे से सबक लेकर नेहरू, आंबेडकर और अन्य लोगों के नेतृत्व में संविधान ने एक धर्मनिरपेक्ष और अब्राह्मणीकृत भारत की नींव रखी। इस पथ पर भारत थोड़ा-थोड़ा आगे बढ़ता रहा।
बहरहाल, नरेंद्र मोदी के युग में अब देश पीछे मुड़कर तिलक-लाला लाजपत राय वाले हिंदू भारत-ब्राह्मणीकृत भारत की ओर तेजी से बढ़ रहा है। जाहिर है कि हिंदू भारत और ब्राह्मणीकृत भारत की जड़े भारतीय इतिहास में बहुत गहरी हैं। भारत के पूर्ण लोकतांत्रिकरण के लिए न केवल आज के हिंदूवादी-ब्राह्मणवादी शक्तियों से निपटना होगा, बल्कि गणेश उत्सव और शिवाजी उत्सव के नाम पर हिंदू भारत-ब्राह्मणीकृत भारत की जो गहरी जड़ें जमाई गईं थीं, उनको भी पूरी तरह उखाड़ कर फेंकना पड़ेगा।
(संपादन : राजन/नवल/अनिल)
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