आजीवक आदि परमाणुवादी थे। यह बात अब अजानी नहीं रही। कई देशी-विदेशी लेखकों ने इसकी चर्चा की है। हालांकि उनका परमाणुवाद, परमाणु संबंधी आधुनिक जानकारी के मुकाबले बहुत पिछड़ा हुआ था। यह सुनकर कुछ विचित्र-सा लगता है कि यायावर आजीवकों की गणित के क्षेत्र में भी खासी पैठ थी। हम सोच ही नहीं पाते कि नंगे बदन, खाली हाथ यायावरी करने वाले, भिक्षा के सहारे एक वक्त खाकर जीवन बिताने और समाज से कटकर रहने वाले श्रमण गणित के जानकार, बल्कि कुछ तो उसके महापंडित भी होते थे। सच तो यह है कि सभ्यता के आरंभिक चरण में प्रकृति के सान्निध्य में रहकर, उसका करीब से अध्ययन करने वाले श्रमण, ज्ञान और अनुभव का चलता-फिरता विश्वविद्यालय हुआ करते थे। आरंभिक भारतीय गणित के विकास में जितना योगदान आजीवक, जैन और बौद्ध श्रमणों का है, उतना किसी और का नहीं है। इस तथ्य से भी हम सब परिचित हैं कि भारत में गणित का व्यावहारिक उपयोग सिंधु-सभ्यता के दौर से ही आम हो चला था। उनके पास दूरी मापन के लिए सूक्ष्म स्केल, कोण मापने के लिए बेलनाकार उपकरण, द्रव्यमान मापन हेतु बाट आदि थे। वृत, त्रिकोण, आयत, वर्ग जैसी ज्यामितीय आकृतियों के सटीक निर्माण से वे परिचित थे। उन्होंने द्रव्यमान और दूरी (लंबाई) के मापन हेतु एकसमान पद्धति विकसित की थी। द्रव्यमान मापन के लिए प्रयुक्त बाटों के विश्लेषण से दशमलव प्रकृति की मापन इकाई के प्रयोग की पुष्टि होती है। सबसे छोटे से क्रमशः बड़े होते बाटों के बीच – 0.05, 0.1, 0.2, 0.5, 1, 2, 5, 10, 20, 50, 100, 200 और 500 की आनुपातिक शृंखला प्राप्त होती है। खुदाई के दौरान लंबाई मापन के भी कई पैमाने भी खोजे जा चुके हैं। एक दशमलव पैमाना 1.32 इंच (3.35 सेंटीमीटर) की माप की इकाई पर आधारित था, जिसे अब ‘सिंधु इंच’ कहा जाता है। एक और मापनी मिली है, जिसपर 0.367 इंच की लंबाई अंकित है।
हड़प्पावासियों का गणित विषयक ज्ञान उनकी विशिष्ट नगर-निर्माण शैली, भवनों, बंदरगाहों, मुहरों, बर्तनों, जहाज-निर्माण आदि से आंका जा सकता है। मापन इकाइयों की यह सटीकता हड़प्पा-सभ्यता के अवसान के साथ गायब होने लगी थी। भारत पहुंचे आर्यों की सिंधुवासियों के ज्ञान-विज्ञान तथा उनकी बौद्धिक उपलब्धियों में कोई रुचि न थी। इसलिए पराभव की दिशा में बढ़ रही सिंधु सभ्यता का ज्ञान-विज्ञान उसी के साथ लुप्त होने लगा था। समाज पुनः आदिम अवस्था की ओर बढ़ चुका था। सटीक निशानों वाली हाथी दांत की मापनी के स्थान पर ‘अंगुल’ आ गया था। ऋग्वेद में विराट पुरुष के विस्तार के वर्णन हेतु अंगुल ही काम आता है–
“विराट पुरुष, जिसके हजार सिर, हजार आंखें और हजार पैर हैं, जिसने पृथ्वी को सब दिशाओं में घेरा हुआ है – का विस्तार पृथ्वी से दस अंगुल अधिक है।”[1]
इस उलझन में पड़ने से पहले कि हजार सिर, हजार आंखों, हजार पैरों वाले विराट पुरुष को अंगुल में मापने वाला कौन महामानव रहा होगा, किसने अंगुलियों से मापकर बताया होगा कि विराट पुरुष का विस्तार पृथ्वी के विस्तार से दस अंगुल अधिक है, यह जान लेना जरूरी है कि ऋग्वैदिक काल(!) में बड़ी लंबाई के मापन हेतु ‘शुल्ब’ का प्रयोग किया जाता था। जिसके नाम पर संस्कृत में कई ग्रंथों की रचना की गई है। ‘अमरकोश’ में ‘शुल्ब’ का अर्थ ‘रस्सी’, ‘रज्जु’ आदि बताया गया है।[2] चूंकि आजीवक सिंधु घाटी की प्राचीन श्रमण-परंपरा के प्रतिनिधि थे, इसलिए गणित के व्यावहारिक ज्ञान का बोध तथा उसके विकास में योगदान, उनके लिए अनहोनी बात नहीं रही होगी। ‘एन्साइक्लोपीडिया ऑफ तमिल लिटरेचर’ में बताया गया है कि आजीवक श्रमण ब्रह्मांड विज्ञान, भूगोलशास्त्र और ज्योतिष के अध्ययन-अध्यापन में दक्ष होते थे। इन सबके लिए गणित का ज्ञान आवश्यक था।[3] चीनी ग्रंथों में आजीवकों को आयुर्वेद का जानकार बताया गया है। गिरधारीलाल व्यास के अनुसार–
“भारत में वैदिक काल से भी पहले से विज्ञान (कृषि, भवन और उपयोगी उपकरणों का निर्माण संबंधी ज्ञान) और गणित (अंकगणित और रेखागणित) संबंधी अनेक खोजें होती चली आ रही थीं, जिनका विकास दर्शन के साथ-साथ चलता रहा है। आर्यों ने वैदिक और औपनिषदिक काल में इस पूर्ववर्ती ज्ञान (विज्ञान और गणित) का भरपूर उपयोग किया और साथ ही दार्शनिक चिंतन के साथ इनका भी विकास किया … यद्यपि पुरोहित वर्ग ने गणित ज्योतिष को फलित ज्योतिष (टीपणा, जन्मकुंडली, टेवा, मुहूर्त आदि) या वेदांग ज्योतिष बनाकर ठगी का धंधा चालू कर दिया, जिससे अध्यात्मवाद की अंधता को अवश्य लाभ पहुंचा, किंतु भौतिक जीवन के यथार्थों ने हर जगह और हर मौके पर उसे पछाड़ दिया।”[4]
विडंबना देखिये, स्वातंत्र्योत्तर भारत में जितनी ऊर्जा वैदिक गणित के शोध के नाम पर खर्च की गई, गणित की खोज पर उतना ध्यान नहीं दिया गया। और तो और जैन व बौद्ध ग्रंथों में उपलब्ध गणितीय संदर्भों की भी तथाकथित मुख्यधारा के लेखकों द्वारा उपेक्षा ही की गई। धीरे-धीरे यह सच अब सामने आ रहा है कि वैदिक ऋषियों द्वारा प्राग्वैदिक गणित के ज्ञान को, केवल यज्ञ-वेदियों के निर्माण तक सीमित कर देना – गणित के लोकोपयोगी उपयोग से लोगों का ध्यान हटाने वाला सिद्ध हुआ था। उसके बाद गणित को ज्ञान की विशिष्ट शाखा यानी ऐसा ज्ञान मान लिया गया, जिसका जनसाधारण से कोई प्रत्यक्ष संबंध न हो। गणित के सीमित उपयोग का नकारात्मक असर उसके विकास और संरक्षण पर भी पड़ा। परिणाम यह हुआ कि सिंधु सभ्यता के पराभव के बाद प्रगति का नकारात्मक दौर आरंभ हुआ। उसके बाद तो 1700 ईसा पूर्व अपने पराभव की शुरुआत के समय, जिस स्तर पर सिंधु सभ्यता थी, गंगा-यमुना के संकुल में पनपी आर्य सभ्यता को उस स्तर तक पहुंचने में लगभग एक हजार वर्ष (ईसा पूर्व सातवीं शताब्दी) लग गए।
अत: ‘आर्यभटीय’ का भाष्य करते समय भास्कर-प्रथम कटाक्ष के अंदाज में जब यह कहते हैं कि आचार्यश्रेष्ठ ने पूर्ववर्ती मस्करीपूरण, मुद्गल, पूतना के लाखों श्लोकों में व्याप्त गणितीय ज्ञान को मात्र कुछ श्लोकों में कैसे सीमित कर दिया था, तो इसपर हैरानी नहीं होनी चाहिए। आर्यभट ने बख्शाली पाण्डुलिपि[5] का भी कोई संज्ञान नहीं लिया था, जो उनके समय में मौजूद रही होगी। भोजपत्र पर लिखी गणित की इस पांडुलिपि के कुल 70 पृष्ठ प्राप्त हुए हैं। उनमें भी बीच-बीच से कुछ पन्ने गायब हैं। कुछ कटे-फटे हैं, कुछ की इबारत नष्ट हो चुकी है। हॉर्नले के अनुसार यह किसी बड़े जैन या बौद्ध ग्रंथ का हिस्सा प्रतीत होती है।[6] ब्रिटिश इतिहासकार जॉन विलियम केय इससे इत्तफाक नहीं रखते। उनके अनुसार यह हिंदुओं का काम है। इस संबंध में हमें ध्यान रखना होगा कि बख्शाली पांडुलिपि मूल कृति न होकर, आधी-अधूरी नकल है, जिसे संभवतः दो या अधिक लोगों ने तैयार किया था। उनमें से एक ने अपना परिचय ‘छजक नामक ब्राह्मण का पुत्र’ के रूप में दिया है।
विद्वान् लेखक कंवल भारती ने अपनी पुस्तक ‘आजीवक परंपरा और कबीर’ में आर्यभट (476 ईस्वी) को आजीवक मतावलंबी माना है। वे लिखते हैं– “इसी आजीवक दर्शन के गर्भ से भौतिकवादी दर्शन का जन्म हुआ, जिसने भारत के ब्राह्मण धर्म को गहराई से प्रभावित किया और पांचवी शताब्दी में आर्यभट जैसे महान गणितज्ञ भी उसके अनुयायी हुए।”[7] आर्यभट को ब्राह्मण सिद्ध करने के लिए कुछ परिवर्ती लेखकों ने उनका नाम आर्यभट्ट लिखा है। तर्क यह दिया गया कि यह कदाचित छांदस त्रुटि के समाहार के लिए किया गया है। लेकिन इससे श्लोक के मायने ही बदल जाते हैं। भट्ट का अर्थ पढ़ा-लिखा अथवा विद्वान है। जबकि भट का अर्थ सेवादार या सैन्य सेवाएं देने वाला। कुछ शताब्दियों से ‘भट्ट’ जन्मना ब्राह्मण के लिए रूढ़ हो चुका है। पांचवी शताब्दी, जो कि आर्यभट का समय है, में ‘पढ़ा-लिखा’ तथा ‘विद्वान’ जैसे शब्द जाति या वर्णसूचक कतई न थे।
‘आर्यभटीय’ के प्राचीन टीकाकारों – भास्कर प्रथम (छठी शताब्दी) और ब्रह्मगुप्त (सातवीं शताब्दी) – ने ‘आर्यभटीय’ के लेखक का नाम ‘आर्यभट’ ही लिखा है। ब्रह्मगुप्त की कृति ब्रह्मस्फुट सिद्धांत की 1621 ईस्वी की प्रतिलिपियों में भी आर्यभट का नाम ‘आर्यभट’ या ‘आचार्य आर्यभट’ प्रयुक्त हुआ है; तथा इसके लिए ‘जगाद् चार्यभटः’, ‘आचार्य आर्यभटोक्त’, ‘इत्यार्यभटप्रोक्ता’ जैसे संबोधन आए हैं। वॉल्टर यूजीन क्लार्क ने ‘भट’ के अंग्रेजी पर्याय के रूप में ‘हायरलिंग’ तथा ‘मर्सेनरी’ दिए हैं।[8] इनका अर्थ है– भाड़े के लिए हथियार उठाने वाला सैनिक, भाड़े का मजदूर, ऐसा व्यक्ति जो केवल आजीविका के लिए सेना में काम करता हो। प्राचीन भारत में भाड़े लिए हथियार उठाने वाले सैनिकों के संगठन होते थे, जो धन के बदले अपनी सेवा प्रदान करते थे। ‘अर्थशास्त्र’ (9.2.38) में ‘श्रेणीबलं’ शब्द आया है, जिसे डॉ. रमेशचंद्र मजूमदार तथा प्रोफेसर देवदत्त रामकृष्ण भंडारकर ने सैन्यबलों अथवा सैनिकों की श्रेणियां कहा है।[9] ध्यातव्य है कि दक्षिण भारत में पांचवी-छठी शताब्दी में आजीवक, जैन तथा बौद्ध धर्म-दर्शनों का प्रभाव था तथा समाज जातीय आधार पर उस तरह नहीं बंटा था, जैसे उत्तर-भारत का समाज। ऐसे में आवश्यकतानुसार भाड़े पर सैन्य-सेवाएं उपलब्ध कराने वाले संगठनों की उपस्थिति से इंकार नहीं किया जा सकता। संभव है आर्यभट के पूर्वज तथा परिजनों की आजीविका का आधार भाड़े पर सैन्य सेवा प्रदान करना रहा हो।
आर्यभट के बाद भास्कर प्रथम (600-680 ईस्वी) पर आते हैं। उन्होंने ‘आर्यभटीय’ की प्रामाणिक टीका लिखी थी। कुछ लेखकों (बिना स्रोत का हवाला दिए) ने उन्हें निषाद कुल में जन्मा कहा है।[10] यह भी पता चलता है कि उन्होंने ज्योतिष संबंधी ज्ञान अपने पिता से प्राप्त किया था। यदि आर्यभट्ट को आजीवक मान लिया जाए तो कह सकते हैं कि मस्करी-पूरण से आरंभ हुई महान आजीवक गणितज्ञों की परंपरा, कम से कम भास्कराचार्य प्रथम तक चली आती है। तमिल काव्य मणिमैखले के अनुसार यही दौर था जब दक्षिण में आजीवक धर्म-दर्शन फल-फूल रहा था। लेकिन सीधे-सीधे यह मान लेने में एक कठिनाई है। पुस्तक के आरंभ में ही ‘सत्यां देवतां परं ब्रह्म’ द्वारा ब्रह्मा के प्रति आस्था दर्शाकर स्वयं आर्यभट ने इस संभावना को कमजोर कर दिया है।[11] मगर यह भी सच है कि ‘आर्यभटीय’ की मूल प्रतिलिपि उपलब्ध नहीं है। बाद के ब्राह्मण लेखकों ने, जिन्हें आर्यभट की स्थापनाएं अपनी परंपरा की विरोधी लगती थीं, उनके लिखे को प्रदूषित करने की कोशिश जमकर की है। ऐसे में प्रथम श्लोक के प्रक्षेपण की संभावना को नकारा नहीं जा सकता। यह जानना भी महत्त्वपूर्ण हो सकता है कि ब्राह्मण गणित, ज्योतिष, आयुर्वेद को लौकिक ज्ञान मानकर उसकी उपेक्षा करते थे। इस क्षेत्र में प्रमुख योगदान श्रमण धर्मों का रहा है। आजीवक धर्म-दर्शन को लोकायत कहने का यह भी एक कारण था। ‘आर्यभटीय’ की टीका में भास्कर प्रथम आर्यभट पर ‘मस्करी-पूरण’ जैसे प्राचीन भारतीय गणितज्ञों के विपुल वाङ्मय की उपेक्षा का आरोप लगाया है; तथा ‘गणितविदो मस्करी-पूरण’ लिखकर इन पूर्ववर्ती गणितज्ञों की सराहना की है।
संस्कृत वाङ्मय में ‘मक्खलि’ ही ‘मस्करी’ हैं। ‘सामञ्ञफल सुत्त’ में उन्हें तथा पूरण कस्सप को बुद्ध के समकालीन छह प्रमुख दार्शनिकों में दर्शाया गया है। जैन परंपरा पूरण कस्सप को पार्श्वनाथ तथा गोसाल को महावीर का समकालिक मानती है। बौद्ध ग्रंथों में हालांकि उन्हें अक्रियावाद (पूरण कस्सप), नियतिवाद (मक्खलि गोसाल), उच्छेदवाद (अजित केशकंबलि) जैसे दर्शनों का प्रवर्त्तक माना है। वास्तव में वे पांचों अनीश्वरवादी-भौतिकवादी धारा में आते हैं। जैन विद्वान् मुनिश्री नागराज मक्खलि गोसाल, पूरण कस्सप आदि के साथ बुद्ध और महावीर की परंपरा को भी एक ही दर्शन समुदाय का हिस्सा मानते हैं–
“महावीर और बुद्ध के समकालीन कुछ और भी धर्माचार्य थे; जो अपने आपको तीर्थंकर कहते थे। पूरण कश्यप, मक्खलि गोसाल, अजित केशकंबलि, पकुध कच्चायन तथा सञ्जय वेलट्ठिपुत्त आदि उनमें मुख्य थे। बौद्ध वाङ्मय में उन्हें अक्रियावाद, नियतिवाद, उच्छेदवाद, अन्योन्यवाद तथा विक्षेपवाद के प्रवर्त्तक कहा गया है। यद्यपि आचार-विचार में उनमें भेद अवश्य था। पर, वे सबके सब श्रमण-संस्कृति के अंतर्गत माने गए हैं। ब्राह्मण-संस्कृति यज्ञ-प्रधान थी और श्रमण-संस्कृति त्याग, वैराग्य और संयम प्रधान। श्रमण शब्द की विद्वानों ने कई प्रकार से व्याख्या की है। कुछ विद्वानों ने इसे श्रम, सम और शम पर आधृत माना है। फलतः तपश्चर्या का उग्रतम स्वीकार, जातिगत-जन्मगत उच्चत्व का बहिष्कार तथा निर्वेद का पोषण; पर इसमें अधिक बल दिया जाता रहा है। श्रमण-परंपरा के अंतर्वर्ती ये सभी आचार्य याज्ञिक तथा कर्मकांड-बहुल संस्कृति के विरोधी थे। यह एक ऐसी पृष्ठभूमि थी, जो प्राकृतों के विकास और व्यापक प्रसार का आधार बनी। भगवान महावीर और बुद्ध ने लोक-भाषा को अपने उपदेशों का माध्यम बनाया। संभव है, उपर्युक्त दूसरे धर्माचार्यों ने भी लोक-भाषा में ही अपने उपदेश दिए होंगे। उनका कोई साहित्य आज प्राप्त नहीं है।”[12]

यह संभावना भी व्यक्त की जाती है कि बौद्ध एवं जैन धर्मों की ओर से मिल रही चुनौती से निपटने के लिए पूरण कस्सप और मक्खलि गोसाल ने अपने संघों का परस्पर विलय कर लिया था। संभव है उसके बाद ही एकीकृत संघ को ‘मस्करी-पूरण का संघ’ कहने की प्रथा चली हो, जो आगे चलकर केवल ‘मस्करीपूरण’ में सिमट गया हो। वैसे भी संस्कृत में अल्पविराम, कॉमा आदि योजक चिह्नों का प्रयोग नहीं किया जाता। इसलिए ‘मस्करीपूरण’ का आशय आजीवक द्वय, मस्करी और पूरण से ही लेना चाहिए। परवर्ती जैन साहित्य में कुछ ऐसे ग्रंथ हैं, जिनमें उन दोनों को एकल व्यक्ति के रूप में ही दिखाया गया है; इन ग्रंथों के नाम हैं– ‘अष्टसहस्री’ (9वीं शताब्दी), ‘भावसंग्रह’ (10वीं शताब्दी), ‘दर्शनसार’ (10वीं शताब्दी), ‘अष्ठपाहुड’ (श्रुतसागर टीका, 6वीं शताब्दी) आदि।[13] इनमें ‘मस्करीपूरण’ का नाम अज्ञानवादी के रूप में आया है। महावीर के संवसरण में वेदपाठी ब्राह्मण (विप्पो वेयव्भासी) इंद्रभूति गौतम को महत्त्व दिये जाने पर मस्करीपूरण को आश्चर्य हुआ। यह कहते हुए कि उन जैसे जैन शास्त्रों के पण्डित (ण मुणइ जिणकहियसुयं सम्पइ), ग्यारह अंगों के ज्ञाता (एयारसंगधारिस्स) की उपेक्षा से पता चलता है कि यह सभा ‘अज्ञान’ को ही पूजती है – वे संवसरण का बहिष्कार कर बाहर निकल आए थे।
मस्करीपूरण दो व्यक्ति थे अथवा एक?
हमारी प्राथमिकता यह जानने की है कि मस्करीपूरण एकल व्यक्तित्व हैं अथवा दोॽ जैन ग्रंथों में मक्खलि गोसाल और पूरण कस्सप के जीवन के बारे में मिली-जुली जानकारी मिलती है। इससे कुछ विद्वानों का मानना है कि मक्खलि गोसाल और पूरण कस्सप एक ही व्यक्ति के अलग-अलग नाम हैं। ‘जैन सिद्धांत कोश’ में पूरण कस्सप और मक्खलि गोसाल को एक ही व्यक्ति कहा गया है। उनके अनुसार, ‘पूरण कस्सप का गुरुप्रदत्त नाम द्वारपाल था। उसे यह नाम पसंद न आया। इसलिए गुरु से पृथक होकर अकेला रहने लगा … बौद्ध मत वाले इसे ही मक्खलि गोसाल कहते हैं।[14] अन्य लेखकों का कहना है कि पूरण कस्सप के असली नाम का पता नहीं है। वे अपने स्वामी के यहां द्वारपाल का काम करते थे। वहां से भाग आने के बाद उन्होंने अपना नाम पूरण रख लिया था। ‘विआहपण्णत्ती’ सहित अन्य जैन ग्रंथों में महावीर और गोसाल के प्रव्रज्याकाल का सविस्तार विवरण दिया है। दोनों अपने प्रव्रज्याकाल में एक-दूसरे के करीब आए थे। छह वर्षों का लंबा कालखंड उन्होंने साथ-साथ बिताया था। ‘विआहपण्णत्ती’ में उसका सविस्तार वर्णन है। उस लंबे वृत्तांत में पूरण कस्सप का नाम एक बार भी नहीं आया है। ‘विआहपण्णत्ती’ के एक शतक में पूरण नाम के एक गाथापति का भी उल्लेख है, लेकिन वह मक्खलि गोसाल से अलग और स्वतंत्र है। पूरण गाथापति की कहानी की बुनावट अन्य जैन दृष्टांतों से मेल खाती है। धनाढ्य पूरण गाथापति अपनी समृद्धि से ऊब जाता है। उसे लगता है कि वह उसके पिछले अच्छे संस्कारों का फल है, जो धीरे-धीरे समाप्त होते जा रहे हैं। दुबारा अच्छे कर्मों के संचय के लिए वह प्रव्रजित होने का फैसला कर लेता है।
आचार्य अभिनवगुप्त (10वीं शताब्दी) के शिष्य और तंत्रशास्त्र के पंडित आचार्य क्षेमराज (10वीं से 11वीं शताब्दी) की कृति ‘श्रीस्वच्छंदतंत्रम्’ को 64 शैवागमों में प्रमुख स्थान प्राप्त है। इसमें ‘मस्करी’ और ‘पूरण’ की गिनती शीर्ष पंक्ति के ऋषियों में की गई है। उन्हें दृश्यमान और अदृश्यमान का ज्ञाता बताया है। जैन और बौद्ध ग्रंथों में आजीवकों के बारे में बताया गया है कि वे निमित्तवाचन द्वारा आजीविका चलाते थे। आचार्य क्षेमराज ने ‘पूरण’ और ‘मस्करी’ को एक-दूसरे से स्वतंत्र और शीर्षतम स्थान पर रखा है। ऋषियों में भौतिकवादी और भाववादी दोनों श्रेणियों के विद्वान् सम्मलित हैं। सूची में गालव नाम के दो ऋषि शामिल हैं, उनमें से एक भौतिकवादी है–
“…मस्करी, पूरण, कृत्स्न, कपिल, काश, सनत्कुमार, गौतम, वशिष्ठ, आद्यांशक, कश्यप, पराशर, नासिकेतु, गालव, भौतिक, शाकल्य, दुर्वासा, वाल्मीकि, गालव, पिप्पलाद, सौमित्रि, वायुपुत्र और भदंत रहते है। मस्करी से लेकर भदंत तक ये बाईस गुरुश्रेष्ठ, दृष्टादृष्ट को बतलाने वाले, पहली पंक्ति के गुरु हैं।”[15]
गौरतलब है कि कश्मीर पाशुपत संप्रदाय का गढ़ रहा है, जिसका संस्थापक लकुलीश को माना जाता है। गया में बराबर पहाड़ी पर अशोक द्वारा आजीवकों के लिए निर्मित गुफाओं में एक का नाम लोमश ऋषि के नाम पर है, जिन्हें लकुलीश से जोड़ा जाता है। कश्मीर में श्रीनगर के निकट हरवान नामक स्थान से प्राप्त मंदिर के अवशेषों से आजीवक तपस्वी का चित्र प्राप्त हुआ है। ‘राजतरंगिणी’ से भी कश्मीर में आजीवक धर्म की उपस्थिति के संकेत मिले हैं। पूरण कस्सप और गोसाल आजीवकों के प्रमुख शास्ता थे। अतएव शैव संप्रदाय के प्रमुख आगम में ‘मस्करी’ और ‘पूरण’ के सम्मानजनक उल्लेख में आश्चर्यजनक जैसा कुछ नहीं होना चाहिए। इसे देखते हुए मस्करीपूरण को एकल संज्ञा न मानकर अलग-अलग, मस्करी (मक्खलि गोसाल) और पूरण (पूरण कस्सप) दोनों का संयुक्त संबोधन मानना ही तर्कसंगत है। इस विवेचना से एक बात और सामने आती है कि पूरण कस्सप और मक्खलि गोसाल की ख्याति, अन्य समकालीन आजीवक चिंतकों से अधिक थी। इसका कारण उनका बहुआयामी योगदान भी हो सकता है।
प्राचीनतम गणित के चार गैर-ब्राह्मण आचार्य
‘आर्यभटीय’ की टीका में भास्कराचार्य प्रथम ने भारत के आरंभिक गणितज्ञों का दो जगह उल्लेख किया है, जिसमें उन्होंने चार विद्वानों के नाम गिनाए हैं; ये हैं– मस्करी, पूरण, मुद्गल और पूतना। इन्हें हम भारत के प्राचीन गणित की चार शाखाओं का अन्वेषक भी कह सकते हैं। अपने पूर्ववर्ती आचार्य के प्रति आक्षेपनुमा शब्दों में भास्कराचार्य लिखते हैं कि उन्होंने गणित पर उपलब्ध विपुल सामग्री में से सिर्फ उसके ‘मामूली हिस्से’ को सहेजा था। मानो संकेत-भर किया हो। इसके तुरंत बाद आर्यभट की मुश्किल का उल्लेख करते हुए वे लिखते हैं– “मस्करीपूरण, मुद्गल[16] और पूतना ने गणित की प्रत्येक शाखा के लिए एक-एक लाख सूत्रों की रचना की थी, फिर भला आर्यभट उन्हें एक कृति में कैसे समेट सकते थे।”[17] वे आगे लिखते हैं कि आर्यभटीय का गणितपाद (गणित संबंधी अध्याय) भारत के तत्कालीन गणित बोध का वास्तविक चित्रण नहीं करता। वह महज उसके मामूली हिस्से को दर्शाता है। वॉल्टर यूजीन क्लार्क इसे आर्यभट की अपने विचारों के प्रस्तुतीकरण की नीति का हिस्सा मानते हैं। उनके अनुसार आर्यभटीय–
“गणित और खगोल विज्ञान की पूर्ण और विस्तृत कार्यपुस्तिका नहीं है। बजाय उसके यह एक संक्षिप्त वर्णनात्मक कृति प्रतीत होती है, जिसका उद्देश्य उन विषयों और प्रक्रियाओं को आधार-सामग्री के रूप में सामने लाना था जो उस समय सर्वविदित और सर्वमान्य थीं; ताकि वे (आर्यभट) अपने निष्कर्षों की केवल मुख्य विशेषताओं को पाठकों के सामने रख सकें। (आर्यभटीय में) कई सामान्य बातें और कई सरल प्रक्रियाएं स्वयंसिद्ध जैसी मान ली गई हैं … बाद में लिखे गए सूर्यसिद्धांत या कर्णग्रंथों की भांति गणित की संपूर्ण पुस्तक न होकर वर्णनात्मक शैली में लिखा गया सारांश मात्र है।”[18]
भास्कराचार्य प्रथम के अनुसार आर्यभट उन सूत्रों के वास्तविक अन्वेषक नहीं थे। उनकी खूबी थी कि महाभारत और उससे पहले से जो गणित के सूत्र बिखरे हुए थे, उनमें से कुछ को उन्होंने अपनी पुस्तक में गागर में सागर की तरह सहेज दिया था। वे आश्चर्य करते हैं कि आखिर कैसे इन आचार्य (आर्यभट) ने गणित के विपुल ज्ञान को छोटे से ग्रंथ में सहेज दिया है! उनका मानना था कि आचार्य आर्यभट ने गणितपाद नामक अध्याय में व्यावहारिक गणित की केवल सांकेतिक चर्चा की है; जबकि ‘कालक्रियापद’ और ‘गोलापद’ शीर्षक अध्यायों में, जो क्रमशः समय संबंधी गणना तथा ब्रह्मांडीय ज्योतिष पर केंद्रित हैं – वे संबंधित विषयों की सविस्तार चर्चा करते हैं। अतः जिस ‘गणित’ शब्द का प्रयोग आचार्य भट ने किया है; यहां उसका आशय ‘गणित की झलक’ से ही लेना चाहिए; अन्यथा गणित नामक विषय बहुत ही व्यापक है। गणित के आठ व्यवहार उन्होंने गिनाए हैं, वे हैं– मिश्रक (बहुत सी वस्तुओं के मिश्रण-अनुपात से जुड़ी गणनाएं), श्रेणी (बीजगणित), क्षेत्रमिति (भूमिति, क्षेत्रफल आदि), खात (खुदाई के काम से जुड़ा गणित), चिति (ईंटों के ढेर में ईंटों की संख्या का पता लगाना), क्राकचिक (लकड़ी की चिराई से जुड़ी गणनाएं), राशि (अनाज के ढेर से जुड़ा गणित, छाया (शंकु की छाया से समय संबंधी गणना)।[19]
भास्कर प्रथम ने जो उपर्युक्त आठ श्रेणियां गिनाई हैं, उनका संबंध व्यावहारिक गणित से है। ऐसा गणित जो किसानों, खेती किसानी करने वाले किसानों, खेतिहर मजदूरों, ईंट के भट्ठे पर काम करने वाले मजदूरों, कारीगरों, रोजमर्रा का प्रशासन देखने वाले लोगों के काम आता था। इन्हीं वर्गों के बीच आजीवक दर्शन की पैठ थी। व्यावहारिक गणित की इन आठ शाखाओं में प्रथम चार बीजगणित का हिस्सा हैं। भास्कर प्रथम के अनुसार गणित में यावत-तावत् (अज्ञातराशि, सरल समीकरण), वर्गावर्ग (वर्ग समीकरण), घनावर्ग (घन संबंधी समीकरण) तथा विषम (ऐसे समीकरण जिनमें कई अज्ञात होते हैं) – का भी समावेश होता है। इन सभी विषयों से जुड़े गणित से संबंधित नियम, उदाहरणों के साथ मस्करी, पूरण, मुद्गल तथा दूसरे गणितज्ञों द्वारा (स्वतंत्र ग्रंथ के रूप में) संकलित किए गए थे। अपनी छोटी-सी पुस्तक में आर्यभट गणित के इन सभी विषयों का समावेश नहीं कर सकते थे। इसलिए ‘आर्यभटीय’ को ‘गणित की झलक’ कहना ही समीचीन होगा।[20]
श्रमणों में गणित के विधिवत अध्ययन की परंपरा
मस्करी, पूरण जैन ग्रंथों में आए मक्खलि गोसाल और पूरण कस्सप हैं, इससे तो लगभग सभी विद्वानों की सहमति है। लेकिन क्या नंगे, यायावर भिक्षु जिसका जन्म गौशाला में हुआ हो, के गणित का विद्वान् होने की उम्मीद की जा सकती है? अथवा पूरण कस्सप जिनके बारे में कहा जाता है कि श्रमण-शास्ता बनने से पहले वे एक दास थे, के बारे में यह सोचा जा सकता है कि वे गणित में प्रवीण रहे होंगे? पाठक याद करें ‘भावसंग्रह’ आदि जैन कृतियों में मस्करीपूरण के ग्यारह अंगों का ज्ञाता होने के दावे को बिना किसी चुनौती के मान लिया गया है। जैन लेखक उनके दावे पर सवाल नहीं उठाते, बल्कि अपने मनोनुकूल व्याख्या करते हैं। ‘विआहपण्णत्ती’(15.101) से पता चलता है कि गोसाल ने ‘संख्यान’ का विधिवत अध्ययन किया था। ‘अर्थशास्त्र’ और ‘ललितविस्तर’ में ‘संख्या’ अथवा ‘संख्यान’ का अभिप्राय सामान्य गणना से है। गोसाल द्वारा सात पउट्टपरिहारों से पहले गणित का ज्ञान अर्जित करने से प्रतीत होता है कि आजीवक परंपरा में तीर्थंकर बनने के लिए गणित का ज्ञान अपरिहार्य था। ठाणांग सूत्र में संख्यान के दस प्रकार गिनाए गए हैं। उसके अनुसार जिस उपाय से किसी वस्तु की संख्या अथवा परिमाण का ज्ञान हो, वह संख्यान है।[21] उसके दस प्रकार हैं–
| 1 | परिकर्म : जोड़, बाकी, गुणा, भाग आदि से संबंधित गणित |
|---|---|
| 2 | व्यवहार : पाटी गणित यथा श्रेणी, मिश्रक आदि |
| 3 | रज्जु : क्षेत्रमिति, फुट, अंगुल, रज्जु आदि की मदद से लंबाई, चौड़ाई-ऊंचाई या गहराई आदि |
| 4 | राशि : धान्य आदि के ढेर को मापने का गणित |
| 5 | कला-सवर्ण : अंशों वाली संख्या को समान करना तथा औषधियों आदि के निर्माण में विभिन्न घटकों की मात्रा आदि का परिमाणन। |
| 6 | यावत्-तावत् : गुणाकार या गुणा करने वाला गणित |
| 7 | वर्ग : दो समान संख्याओं का गुणनफल यथा चार को चार से गुणा करना |
| 8 | घन : तीन समान संख्याओं का गुणनफल |
| 9 | वर्ग-वर्ग : वर्ग का वर्ग |
| 10 | कल्प : चीरी गयी और चीरी जाने वाली लकड़ियों की माप का गणित |
‘अर्थशास्त्र’ में शिष्य को निर्देश दिया गया है कि उसे ‘मुंडन-संस्कार के अनंतर अक्षराभ्यास तथा गणना आदि का विधिपूर्वक अभ्यास करना चाहिए’।[22] अनार्य गणित विद्या में प्रवीण थे; यह भविष्यपुराण से भी प्रमाणित होता है। एक कथा के अनुसार बलि ने मय नामक दैत्य को बुलाकर कहा–
“‘दैत्येंद्र! सुकंदर (सिकंदर) नामक म्लेच्छपति हम लोगों की उन्नति के लिए सदैव तत्पर रहता है। मेरी आज्ञा है कि तुम उसकी सहायता करो।’ बलि की आज्ञा को शिरोधार्य कर कलविद्याविशारद दानव मय, एक सौ दैत्यों के साथ कर्मभूमि में आया। उसने दुष्ट मलेच्छ जाति को ज्योर्तिगणित सहित इक्कीस अध्याय वाले रेखागणित की शिक्षा दी। तब ज्योर्तिविद्या में पारंगत होकर उन मलेच्छों ने सात पुरियों का निर्माण कराया। उन यंत्रों के प्रभाव से, वहां जितने भी लोग थे, सब मलेच्छत्व (बौद्ध धर्म) को प्राप्त हो गए।”[23]
महाभारत में मय दानव का नाम वास्तुविद् के रूप में आया है। रामायण में वानर प्रजाति के नल-नील का उल्लेख है। दोनों समुद्र पर पुल बना देने के विशेषज्ञ थे। इसमें आश्चर्यजनक है– एक सौ इक्कीस अध्यायों वाले रेखागणित का उल्लेख। यदि एक अध्याय में न्यूनतम आठ से दस पृष्ठ भी मान लिए जाएं तो लगभग एक हजार पृष्ठों की कृति। सिकंदर के समय ग्रीक में यूक्लिड की ज्यामिति की बहुत चर्चा थी। एक सौ इक्कीस अध्यायों वाले रेखागणित का उल्लेख क्या यह दर्शाने के लिए था कि ग्रीक में यूक्लिड का ज्ञान भारत से गया था! इसके साथ-साथ कुछ ठोस निष्कर्ष भी इससे निकाले जा सकते हैं—
- मय दानव को कलविद्याविशारद (यंत्रविद्याविशारद) कहा गया है। आधुनिक संदर्भों में इसका नाम होगा, तकनीकी या प्रौद्योगिकीय विशेषज्ञ। इसके अलावा वह वास्तुविद भी था। इसका उस विद्या से ‘मलेच्छों’ ने सातों नगरों की स्थापना तथा उनमें ऐसे यंत्रों की व्यवस्था की थी कि जो भी उन यंत्रों को अपना लेता (उनका लाभ उठाने लगता) – वह मलेच्छ (बौद्ध) बन जाता था।[24] साफ है कि ब्राह्मण रेखागणित तथा प्रौद्योगिकीय ज्ञान को शास्त्रीय ज्ञान की तुलना में हेय मानते थे।
- भविष्यपुराण मध्यकालीन रचना है। उसमें उन्नीसवीं शताब्दी तक प्रक्षेपण होता रहा है। फिर भी 121 अध्याय वाले रेखागणित को यदि किसी प्राचीन सत्य की स्मृति मान लें तो, भास्कर प्रथम के इस कथन कि आर्यभट मस्करीपूरण आदि गणितज्ञों की लाखों श्लोकों की सामग्री के अत्यल्प हिस्से को ही अपनी कृति में समाहित कर पाए हैं; और एक समय था जब वह ज्ञान भारत में लिखित रूप में मौजूद था, सत्य सिद्ध हो जाती है।
- सूर्यसिद्धांत को छठी शताब्दी की कृति माना जाता है। उसके अनुसार मय नामक असुर को ज्योतिष संबंधी ज्ञान स्वयं सूर्य की ओर से प्राप्त हुआ था।[25]
इन उदाहरणों से पता चलता है कि गणित और ज्योतिष का आविष्कार आजीवक, जैन आदि श्रमणों के सौजन्य से हुआ था, इसलिए आरंभ में इन्हें आसुरी विद्या कहा गया। भास्कर प्रथम ने मस्करी, पूरण आदि को विभिन्न आकृतियों का क्षेत्रफल ज्ञात करने की विधि की खोज का श्रेय दिया है। इसका संबंध दैनिक जीवन में काम आनेवाला गणित से है। इसी को ध्यान में रखते हुए, आठवीं शताब्दी में श्रीधर आचार्य ने लोक-व्यवहार में काम आने वाले गणित को लेकर ‘पाटीगणित’ (त्रिशतिका) की रचना की थी।[26] ‘आर्यभटीयम्’ में व्यावहारिक गणित की केवल झलक मौजूद है। क्षेत्रमिति से संबंधित उसमें एक नियम मिलता है। उसके अनुसार सभी क्षेत्रों/समतलों का क्षेत्रफल ज्ञात करने के लिए उनके पार्श्वों (पार्श्व भुजाओं) की माप लेकर, उनके गुणनफल द्वारा क्षेत्रफल ज्ञात कर लेना चाहिए।[27]
“आर्यभट का नियम सूत्र रूप में है, भास्कर शंका व्यक्त करते हैं कि यदि इस नियम से सभी आकृतियों का क्षेत्रफल ज्ञात किया जा सकता है, तो, क्या इससे पिछले नियमों के बारे में दिये गये तर्क गलत सिद्ध हो जाएंगे?
“‘ऐसा नहीं होगा।’ वे स्वयं इसका जवाब देते हैं, ‘पिछले नियम व्यर्थ नहीं है। इस नियम से क्षेत्रफल की गणना और उसका सत्यापन दोनों संभव हैं … मस्करी, पूरण, पूतना आदि ने इस नियम की अनुशंसा की है। उपर्युक्त विधि द्वारा क्षेत्रफल निकालने के बाद गैर-आयताकार आकृतियों को आयताकार आकृति में परिवर्तित करके उनका सत्यापन कर लेना चाहिए, ऐसा निर्धारित किया गया है। केवल आयत ही है जिसका क्षेत्रफल स्पष्ट होता है। विभिन्न आकृतियों क्षेत्रफल ज्ञात करने की इस विधि की खोज मस्करी, पूरण, पूतना आदि गणितविदों ने की थी।”[28]
भास्करचार्य ने जिस विश्वास के साथ अपने पूर्ववर्ती आचार्य आर्यभट पर आक्षेप लगाया है। उससे साफ है कि उसके समय तक प्राचीन गणितज्ञों मस्करी, पूरण, मुद्गल और पूतना की कृतियां स्वतंत्र रूप से विद्यमान थीं। अपनी टीका के लिए भास्कर प्रथम ने उन्हीं को आधार बनाया था। संभावना यह भी कि वे ग्रंथ पूरी तरह से गणित केंद्रित रहे होंगे, न कि ज्योतिष केंद्रित जैसा कि आर्यभट के समय इसकी परंपरा-सी बन चुकी थी। प्राचीन भारतीय गणितज्ञों को क्षेत्रमिति, त्रिकोणमिति, अंकगणित और बीजगणित की खोज का श्रेय दिया जाता है। वराहमिहिर के बाद भारत का गणित संबंधी संपूर्ण ज्ञान ज्योतिषशास्त्र (विशेष रूप से फलित ज्योतिष) के इर्द-गिर्द सिमटने लगा था। ‘गणितपाद’ शीर्षक वाले अपेक्षाकृत छोटे अध्याय को छोड़ दिया जाए तो ‘आर्यभटीय’ भी ज्योतिषशास्त्र से जुड़ी कृति है।
गणित के अध्ययन की सुदीर्घ व्यवस्था
‘आर्यभटीय’ से लगभग दो शताब्दी पुरानी बख्शाली पांडुलिपि में हम पाते हैं कि समस्याओं के समाधान के नियम, उदाहरण के साथ उनके सत्यापन भी दिए हैं। ‘आर्यभटीय’ तो पद्यात्मक सूत्रों में लिखी गई है। उसमें सत्यापन की गुंजाइश कम ही थी। टीकाकार भास्कर प्रथम सत्यापन विधि का प्रयोग सीमित मामलों में प्रयोग करते हैं। श्रीधर (9वीं शताब्दी) की ‘त्रिशतिका’ (पाटीगणित) तथा भास्कर द्वितीय (बारहवीं शताब्दी) की ‘लीलावती’ आदि कृतियों में भी सिर्फ नियम और उदाहरण हैं, सत्यापन नहीं। तथापि भास्कर प्रथम के उल्लेख से प्रतीत होता है कि मस्करी, पूरण आदि द्वारा लिखे गये प्राचीन गणित विषयक ग्रंथों में नियमों और उदाहरणों के साथ-साथ, निष्कर्ष के सत्यापन के नियम भी सम्मिलित थे। डॉ. कृपाशंकर शुक्ल भी मानते हैं कि मस्करी, पूरण आदि की कृतियों में गणित के मूलभूत नियमों तथा उदाहरणों के साथ-साथ उनके सत्यापन के नियम भी शामिल थे।
दरअसल मस्करी, पूरण आदि जिन दिनों गणित की नींव रख रहे थे, उन दिनों नियमों तथा निष्पत्तियों पर अपना तथा दूसरों का भरोसा जीतने के लिए सत्यापन का होना अत्यावश्यक था। हम यह भी कह सकते हैं कि गणित के प्रथम आचार्यों मस्करी, पूरण आदि से आर्यभट् तक आते-आते गणित संबंधी शोध तथा प्रयोग-अनुप्रयोग का लंबा समय बीत चुका था। डॉ. शुक्ल आगे लिखते हैं कि गणित संबंधी पाठों के प्रस्तुतीकरण के लिए मस्करी, पूरण आदि के ग्रंथों में जिस विधि का उपयोग किया था; लगता है उसी को बाद के गणित के ग्रंथों में अपनाया गया था।[29]
पहले से उपलब्ध ज्ञान-विज्ञान का टोटमीकरण कर, उसे अपनी संस्कृति के अनुसार ढालने की प्रवृत्ति लगभग हर देश, हर संस्कृति की रही है। ब्राह्मण इस कार्य में सर्वाधिक दक्ष रहे हैं। उनका एकमात्र उद्देश्य होता है, ज्ञान-परंपरा पर कब्जा कर, उसे किसी न किसी बहाने वैदिक मूल का सिद्ध कर देता। यह कोशिश गोवर्धनपीठ के शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद की पुस्तक ‘नेचर ऑफ नंबर्स’ में भी देखी जा सकती है। भास्कर प्रथम द्वारा उद्धृत चार प्राचीन गणितज्ञों– मस्करी, पूरण, पुद्गल और पूतना द्वारा गणित की चार शाखाओं पर किया गया कार्य उन्हें ‘ब्रह्मा की चतुष्पदी’ जैसा नजर आता है। बावजूद इसके उनकी सराहना करनी होगी कि आजीवक या श्रमण परंपरा का नाम लिए बिना ही उन्होंने वैदिक गणित पर उनके प्रभाव को सार्वजनिक स्वीकृति दी है–
“मस्कर, पूरण, मुद्गल और पूतना मानो गणित के चार पादों (शाखाओं, स्तंभों) की ओर इशारा करते है, जैसे विराट पुरुष के चार चरण। यहां मस्करी का अर्थ कलन गणित (एल्गोरिदम) का संग्रह हो सकता है (मस्क : दोहराए जाने वाला व्यायाम, मस्करी : दंड साथ लेकर चलने वाला); जबकि मुदगल (मुद्ग : दाल का दाना) का अर्थ हो सकता है– असतत/विविक्त गणित। पूरण और पूतना गणित की दो विपरीत शाखाएं प्रतीत होती हैं – यथा समाकलन (इंटीग्रल कैलकुलस) और अवकलन (डिफरेंशियल कैलकुलस)।”[30]
भास्कराचार्य प्रथम ने मस्करी-पुरण-पुद्गल पूतना आदि को स्पष्ट रूप से गणित का सम्मानित आचार्य (मस्करि-पूरण-मुद्गल-प्रभृतिभिराचार्ये निबद्धं कृते) और महान गणितज्ञ (यस्माद् गणितविदो मस्करि-पूरण-पूतनादयः) सम्बोधित किया है।[31] ब्राह्मण ग्रंथों में हालांकि आजीवक दार्शनिकों के प्रति असम्मानजनक भाषा का प्रयोग मिलता है। अधिकांश स्थानों पर ‘पाषण्ड’, ‘अधार्मिक’ आदि कहकर उनकी आलोचना की गई है; किंतु महाभारत में ही एक स्थान पर उनका सम्मानजनक उल्लेख मिलता है। शरशैय्या पर लेटे भीष्म से मिलने जो देवता, ऋषि आदि पहुंचे थे, उनमें पूरण आदि भी शामिल थे–
“भास्करी, पूरण, कृष्ण तथा परमधार्मिक सूत, ये संपूर्ण ऋषि तथा इनके अतिरिक्त और भी अनेक श्रद्धा, दम और शम से युक्त महातपस्वी मुनियों से घिरकर पुरुष सिंह भीष्म इस प्रकार शोभित हुए, जैसे नक्षत्रों के बीच चंद्रमा की शोभा दीख पड़ती है।”[32]
उन ऋषियों में सबसे पहला नाम ‘भास्करि’ का आता है। इस नाम के किसी भी प्राचीन ऋषि के बारे में जानकारी नहीं मिलती। गणितज्ञ भास्कराचार्य का समय बहुत बाद का है। इसलिए इस बात की पर्याप्त संभावना है कि मूल पाठों में ‘मस्करी’ नाम ही रहा हो, जिसे बिगाड़कर भास्करि कर दिया गया हो। ठीक ऐसे ही जैसे गया स्थित बराबर की गुफाओं से ‘आजीवक’ नाम को मिटाने की आपराधिक साजिश की गई थी। स्वामी निश्चलानंद ने ‘भास्करि’ को ‘मस्करी’ ही माना है; वे लिखते हैं–
“महाभारत में भीष्म से मिलने पहुंचे मुनियों भास्करि (मस्करि) तथा पूतना शामिल थे। मौद्गल्य (मुद्गल गौत्र) का जिक्र भी है, लेकिन वे गणितज्ञ भी थे, इसपर महाभारत में कुछ नहीं कहा गया है। बोधपाहुड की श्रुतसागर टीका तथा आचार्य कुंदकुंद के भावपाहुड में मस्करी तथा पूरण को गणितज्ञ बताया गया है। गणित की इस सभी शाखाओं ने दर्शनशास्त्र को समृद्ध करने का काम किया, लेकिन बुद्ध के बाद वे बिखर गईं। मक्खलि गोसाल, पूरण कस्सप तथा मुद्गल की शाखाओं को उखाड़ने का उल्लेख बौद्ध ग्रंथों में हुआ है। संभवतः उसी काल में अहिंसा के नाम पर गणित और शल्य चिकित्सा के औपचारिक ग्रंथों का भी अंत हो गया था। यह देखना खासा दिलचस्प है कि (वैदिक) गणित के कुछ सूत्रों के नाम पूरणापूरणाभ्याम (पूरा करने तथा विपरीत क्रिया द्वारा), व्यष्टि-समिष्ट (एक से पूर्ण तथा पूर्ण को एक मानते हुए) जैसे नामों से मिलते हैं।”[33]
वैदिक गणित अपने आप में भ्रमात्मक अवधारणा है। लोक तथा लोकविद्याओं को हिकारत की निगाह से देखने वाले वैदिक जनों से गणित तो क्या मानवोपयोगी किसी भी नए आविष्कार की उम्मीद नहीं की जा सकती थी। लेकिन यह सच है कि गोवर्धनपीठ के शंकराचार्य भारतीकृष्ण तीर्थ के नाम से किन्हीं वी.एस. अग्रवाल ने वैदिक गणित नाम से जो पुस्तक प्रकाशित की थी, उसमें ‘पूरणापूरणाभ्याम्’, व्यष्टि-समिष्ट नामक सूत्र भी शामिल हैं।[34] पुस्तक की बाकी सामग्री पांचवी-छठी शताब्दी के बाद के गणितीय स्रोतों से ली गई है।
पुनश्चः जैन ग्रंथों के अनुसार अपने परिनिर्वाण के बाद गोसाल को अनेकानेक भवों से गुजरना पड़ा था। उनका अंतिम भव जैन श्रमण दृढ़प्रतिज्ञ कुमार के रूप में था। औपपातिक सूत्र आदि ग्रंथों में दृढ़प्रतिज्ञ कुमार को गाथापति की संतान बताया गया है। लिखा है कि जब दृढ़प्रतिज्ञ कुमार की आयु आठ वर्ष से कुछ ही अधिक थी; तब उन्होंने लिखना, पढ़ना, गणित आदि 72 विद्याओं का ज्ञान हासिल कर लिया था।[35]
सवाल यह है कि गणित, विज्ञान के क्षेत्र में इतनी दखल रखने के बावजूद पूरण कस्सप और मक्खलि गोसाल के गणित संबंधी योगदान को उपेक्षित क्यों कर दिया गया? इसका उत्तर भास्कर प्रथम के उस सवाल में छिपा है कि आखिर आचार्य आर्यभट ने मस्करी, पूरण, पूतना आदि गणितविदों के गणित के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण योगदान की उपेक्षा क्यों की थी? यदि उनके पास इन आचार्यों के गणित की प्रत्येक शाखा पर लिखे लाखों सूत्र थे तो क्यों उन्होंने गणित संबंधी विवेचन को मात्र कुछ सूत्रों तक सीमित कर दिया था? जिन शाखाओं पर आर्यभट ने ज्यादा ध्यान दिया था, उनमें कालक्रियावाद का संबंध ज्योतिष से था। जबकि गोलपाद का संबंध यज्ञ-वेदियों के निर्माण से। वस्तुत: पांचवीं-छठी शताब्दी वह दौर था, जब ब्राह्मण मनीषा अपने स्वार्थ के लिए ज्ञान का टोटमीकरण करने में लगी थी। व्यावहारिक गणित की उपेक्षा कर जाने-अनजाने आर्यभट ने भी उसका साथ दिया था। हालांकि ज्ञान के असली टोटमीकरण की नींव रखी थी उन्हीं के समकालीन वराहमिहिर ने। आजीवक, जैन और बौद्ध श्रमणों द्वारा अर्जित गणित और खगोल-विज्ञान से संबंधित ज्ञान को जातकों के लक्षण और फलित ज्योतिष से जोड़कर, वराहमिहिर ने अज्ञानता का ऐसा बीज बोया था; जिसका अंधेरा आज तक भारतवासियों को भटका रहा है।
संदर्भ
[1] सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात्
स भूमिं विश्वतो वृत्वात्यतिष्ठद्दशाङ्गुलम्। ऋग्वेद 10.90.1
[2] शुल्ब (न) बराटक (पु) रज्जु (स्त्री)। अमरकोशः, शूद्रवर्ग 2.10.27.1-2
[3] एन्साइक्लोपीडिया ऑफ तमिल लिटरेचर, भाग तीन [1996 : 19]
[4] गिरधारी लाल व्यास, भारतीय दर्शन में भौतिकवाद [2004 : 33]
[5] गणित की इस प्राचीनतम पाण्डुलिपि की खोज पाकिस्तान के पेशावर जिले के बख्शाली गाँव में 1881 में हुई थी। यह गाँव ऐतिहासिक तक्षशिला विश्वविद्यालय से लगभग 100 किलोमीटर दूर है। पाण्डुलिपि शारदा लिपि में है। उसकी भाषा उत्तर-पश्चिम की प्राकृत है, जिसे गाथा बोली भी कहा जाता है। पाण्डुलिपि के पहले और अन्तिम पृष्ठ उपलब्ध न होने के कारण इसके लेखक/लेखकों के बारे में पता चलना मुश्किल है। कार्बन डेटिंग से इसका लेखन काल तीसरी-चौथी से लेकर सातवीं शताब्दी तक माना गया है। मगर लिप्प्यंकन में इस्तेमाल हुई भिन्न लिपियों को देखते हुए विद्वानों की राय है कि उसे अलग-अलग समय में लिखा गया होगा। बख्शाली पाण्डुलिपि ने ‘आर्यभटीय’ से भारत में गणित की प्राचीनतम कृति होने का श्रेय छीन लिया है! पाण्डुलिपि में गणित के प्रश्नों को हल करने के जिन सूत्रों का प्रयोग किया गया है, उनमें से कई आर्यभट के सूत्रों से भिन्न हैं। संभावना है कि 13वीं शताब्दी तक पूरी पाण्डुलिपि या पुस्तक उपलब्ध रही होगी।
[6] रुडोल्फ हॉर्नले, ऑन दि बख्शाली मेनुस्क्रिप्ट [1887 : 12]
[7] कंवल भारती, आजीवक परंपरा और कबीर [2010 : 41]
[8] प्रोफेसर वाल्टर यूजीन क्लार्क, आर्यभटीय ऑफ आर्यभट [1930 : vii-viii],
[9] डॉ. रमेशचंद्र मजूमदार, कोऑपरेट लाइफ इन एन्शीएंट इंडिया [1922 : 28]
[10] वेब लिंक्स, https://shorturl.at/kj2K3 तथा https://shorturl.at/pMIuv
[11] सत्याँ देवताम् परं ब्रह्म। आर्यभटीय 1.1
[12] मुनिश्री नागराज: ‘आगम और त्रिपिटक: एक अनुशीलन’, भाग दो [1982 : 155]
[13] मष्करिपूरणाद्यन्यजनेभ्योतिशयवता। अष्टसहस्री [1974 : 11 (पादटिप्पणी)]
[14] जिनेंद्र वर्णी, जैन सिद्धांत कोश भाग 3 [1944 : 82]
[15] मस्करी पूरणः कृत्स्नः कपिलः काश एव च, सनत्कुमार, गौतमवसिष्ठाद्यांशकास्तथा।
मस्कर्यादिभदन्तान्ता दृष्टादृष्टस्य वादिनः, द्वाविंशतिर्गुरुवराः प्रथमा पङ्क्तिरिष्यते— आचार्य क्षेमराज, श्रीस्वच्छंदतन्त्रम्- IV[2005 : 1074, 1077-1078]
[16] मुद्गल एक ऋषि के अलावा एक प्रकार की दाल का भी नाम है। यहां नामोत्पत्ति का दूसरा कारण उचित प्रतीत होता है। वैशेषिक दर्शन के मूल सिद्धांतकार कणाद के नाम की उत्पत्ति भी ‘कण’(अन्नकण) से हुई है। डॉ राजाराम का मानना है कि कणाद किसी ‘उलूक’ नामक महर्षि के वंश में जन्मे थे। कणाद नाम के बारे में प्रशस्तपादभाष्य (छठी शताब्दी) की टीका न्यायकंदली (दसवीं शताब्दी) के लेखक श्रीधर भट्ट के अनुसार, ‘शास्त्रकर्ता का यह नाम इसलिये पड़ा क्योंकि वे रास्ते में गिरे हुए अन्नकणों का कपोत की भांति चुन-चुन कर आहार करते थे। वैशेषिक दर्शन के आलोचक मानते हैं कि कणाद ने जिस तरह जीव अन्नकणों को चबाकर निःशेष कर देते हैं, ऐसे ही वैशेषिक दर्शन के आख्यता ने परमाणु दर्शन की मूल भावना (परमाणुवाद) को नष्ट कर उसका आध्यात्मीकरण किया था—इसीलिए उन्हें कणाद कहा गया (कणादमिति तस्य कापोतीं वृत्तिमनुतिष्ठतो रथ्यानिपतितांस्तण्डुलकणानादाय प्रत्यहं कृताहारनिमित्ता संज्ञा।)। श्रीधर भट्ट ने इसे आलोचकों की हताशा की देन बताया है—‘कोई उपाय न रहने के कारण कणों को खाइये’ यह आक्षेपयुक्त उक्ति उनके लिये देखी जाती है (अत एव ‘निरवकाशः कणान् वा भक्षयतु’ इत्युपालम्भस्तत्रभवताम्) ।’
उलूक मुनि के बारे में संस्कृत-ग्रंथों से कोई खास जानकारी नहीं मिलती। सिवाय इसके कि वायुपुराण(23.216) में कणाद तथा उलूक दोनों को सोमशर्मा नामक पण्डित की संतान बताया गया है (सोमशर्मा द्विजोत्तमा…कणादश्च उलूको वत्स एव च। वायुपुराण 23.215-216)। वैशेषिक दर्शन के ग्रंथों में उनके प्रथम प्रस्तावक के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं मिलती। चीनी बौद्ध ग्रंथों की टीका से कुछ नए तथ्य सामने आते हैं। बौद्ध विद्वान कुमारजीव ने शत-शास्त्र का चीनी भाषा में अनुवाद किया था। इस ग्रंथ की टीका चीनी बौद्ध लेखक शी-त्सांग(549-623 ईस्वी) ने की थी। अपनी टीका में शी-त्सांग ने वैशेषिक दर्शन तथा उसके मूल प्रवर्त्तक के बारे में लिखा था कि उसके नाम ‘उलूक का अर्थ है—उल्लू… वे बुद्ध से आठ सौ वर्ष पहले हुए थे। उलूक दिन-भर अपने ग्रंथ की रचना करते तथा रात्रि में भिक्षाटन के लिए जाते थे… उन्हीं की कृति को वैशिषिक(सूत्र) कहा जाता है। उसमें 1,00,000 श्लोक थे। उलूक का मुख्य दर्शन असत-कार्यवाद का षष्टवर्गीय सिद्धांत है, जिसमें उन्होंने स्वयं(आत्मन् या आत्मा) को संज्ञान से भिन्न माना है। अपनी टिप्पणी के लिए शी-त्सांग के चीनी बौद्ध विद्वान कव्हेई शी से प्रेरणा ली थी। कव्हेई शी ने लिखा था– स्रष्टि के निर्माण के अंतिम दौर में, जब जीव अनंतकाल तक जीवन जीते थे, एक तीर्थंकर का जन्म हुआ। उनका नाम उलूक था। वे दिन में दुनियादारी से एकदम दूर घने जंगल के निविड़ एकांत में तपस्या करते थे, और रात्रि को जब लोग अपने दैनिक कार्यों से निवृत्त होकर आराम करने जा रहे होते, तब वे भिक्षाटन के लिए निकलते थे। उनकी यह जीवनशैली उल्लू के समान थी। इस कारण उनका नाम उलूक पड़ा। उन्हें ‘कण-भुज’ अथवा ‘कण-भक्ष’ भी कहा जाता था। इसमें ‘कण’ का अर्थ है ‘अन्न’ अथवा चावल ’का कण’ है। जबकि ‘भुज’ अथवा ‘भक्ष’ का अर्थ ‘खाना’ है। रात को जब वे भिक्षा के लिए निकलते तो युवतियां तथा बच्चे उन्हें देखकर डर जाते थे। किसी को कोई कष्ट न हो, इसलिए एक दिन वह उनसे मीलों दूर चला गया। वहां जब भी भूख लगती तो जंगल से चावल या अनाज के कण बीनकर खाने लगे। परिणामस्वरूप उनका उपनाम ‘कण-भक्षी’ पड़ गया। कालांतर में वही कणाद बना कहा जाने लगा। संभव है मुद्गल कणाद उलूक मुनि का ही दूसरा नाम रहा हो, अथवा ये उनकी परंपरा के ऋषि रहे हों।
[17] अमर्त्य कुमार दत्त, स्टडीज ऑफ हिस्ट्री ऑफ इन्डियन मैथमेटिक्स [2010 : 162]
[18] प्रोफेसर वाल्टर यूजीन क्लार्क, आर्यभटीय ऑफ आर्यभट [1930 : viii-ix]
[19]. तथा च, आचार्येण गणितपादे गणितवस्तु दिङ्मात्रमेवाभिहितम्, कालक्रियागोलयो कालक्रिया गोल (वस्तु) विशेषेण। अवश्यमयमर्थोऽभ्युपगन्तव्य— कि़ञ्चिद गणितमिति। अन्यथा हि महद् गणितवस्तु, अष्ठौ व्यवहारा मिश्रक-श्रेढी-क्षेत्र-खात-चिति-क्राकचिक-राशि-च्छायाभिधायिनः। आर्यभटीयम ऑफ आर्यभट्, गीतिकापाद 1[1976 : 6], अनुवाद-संपादन कृपाशंकर शुक्ल।
[20]. एतदेकैकस्य ग्रंथलक्षणलक्ष्यं मस्करि-पूरण-मुद्गल प्रभृतिभिराचार्यैनिबद्धं कृतं, स कथमनेनाचार्येणाल्पेन ग्रन्थेन शक्यते वक्तुम्। तत्सुष्ठूक्तमस्माभिः किञ्चिद् गणितम् विशेषतः कालगोलाविति। एवमियमार्या व्याख्याता। आर्यभटीयम ऑफ आर्यभट्, गीतिकापाद 1[1976 : 7] तथा टी ए सरस्वती अम्मा, ज्योमेट्री इन एन्शीएंट एण्ड मेडीवल इण्डिया [2009 : 68]।
[21] दसविधे संखाणे पण्णत्ते, तं जहा : परिकम्मं ववहारो रज्जू, रासी कला-सवण्णे य
जावन्ताति वग्गो, घण्णो य तह वग्गवग्गोवि। कप्पो य। स्थानांगसूत्रं [2004, 10.100]।
[22] वृत्तचौलकर्मा लिपि, संख्यानं, चोपयुञ्जीम। अर्थशास्त्र 1.5.7
[23] सुकन्दरो मलेच्छपति सदा मद्वर्द्धने रतः। सहायं तस्य दैत्येन्द्र कुरु शीघ्र ममाज्ञया॥
इति श्रुत्वा वलेर्वाक्यं शतदैत्यसमन्वितः। कर्मभूम्यां मयः प्राप्तः कलविद्याविशारदः॥
म्लेच्छजातीन्नरान्दुष्टान् रेखागणितमुत्तमम्। एकविंशतिमध्यायं कलवेदमशिक्षयत्॥ भविष्यमहापुराणम्, प्रतिसर्गपर्वम् [2006, 21.46-48]
[24] यन्त्राणि कारयामासुः सप्तस्वेव पुरीषु च… तदधो ये गतालोकास्ते सर्वे म्लेच्छतां गताः। भविष्य महापुराणम् प्रतिसर्गपर्वम् [2006, 21.49-50]
[25]. अल्पाविशिष्टे तु कृते मयो नाम महासुरः …आराधयन् विवस्वन्तं तपस्तेपे सुदुश्चरम् तोषित स्तपसा तेन प्रीतस्तस्मै वरार्थिने ग्रहाणां चरितं प्रादान्मयाय सविता स्वयम्। सूर्य सिद्धांत [1999, 1. 2-4 ]
[26]. लोकव्यवहारार्थ गणितं संक्षेपतो वक्ष्ये। श्रीधराचार्य पाटीगणित [1959, 1.1]
[27]. सर्वेषां क्षेत्राणां प्रसाध्य पार्श्वे फलं तदभ्यासः। आर्यभटीयम्, गणितपाद 9[1976 : 66]
[28]. सर्वेषां क्षेत्राणां फलं निर्देष्टव्यम्। कथम्? प्रसाध्य पार्श्वे। ‘प्र’-शब्दः प्रकृष्टवाची, प्रकर्षेण पार्श्वे साधयित्वेति… अथ सर्वशब्दस्य निरवशेषवाचित्वान्निरवशेषाण्येव क्षेत्राण्याक्षिप्यन्ते, तस्मात् सर्वक्षेत्राणां फलस्यानैव सूत्रेण सिद्धत्वात् पूर्वाभिहितसूत्राभिधानमनर्थकम्। नानर्थकम्. प्रत्ययकरणं फलं चानेनोच्यते। अभिहितानां क्षेत्राणा फलस्य प्रत्ययकरणम्। यस्माद् गणितविदो मस्करी-पूरण-पूतनादयः सर्वेषां क्षेत्राणां फलमायतचतुरश्रक्षेत्रे प्रत्याययन्ति। भास्करप्रथम भाष्य आर्यभट्टीय, गणितपाद 9 [1976 : 67].
[29]. डॉ कृपाशंकर शुक्ल, आर्यभटीयम ऑफ आर्यभट् [1976 : 54-55 भूमिका].
[30]. स्वामी निश्चलानन्द सरस्वती, नेचर ऑफ नंबर्स [107-108]
[31]. डॉ कृपाशंकर शुक्ल, आर्यभटीयम ऑफ आर्यभट् [1976 : 7. 67].
[32]. भास्करिः पूरणः कृष्णः सूतः परमधार्मिक
एतैश्चान्यैर्मुनिगणैर्महाभागैर्महात्मभिः। शान्तिपर्व, राजधर्मानुशासन [1929 : 47.12]
[33]. स्वामी निश्चलानन्द सरस्वती, नेचर ऑफ नंबर्स [2012 : 108]
[34] शंकराचार्य भारती कृष्णतीर्थ महाराज, वैदिक गणित[1981 : 1-1a]
[35]. तए णं से कलारिए तं दढपइण्णं दारगं लेहाइयाओ, गणियप्पहाणाओ, सउणरुय— पज्जवसाणाओ वावत्तरिकलाओ सुत्तओ य अत्थओ य करणओ य सेहाविहिति, सिक्खाविहिति। औपपातिक सूत्र [2003, 107], विआहपण्णत्ती [2007, 15. 187]
(संपादन : नवल/अनिल)
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