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देखें, जगत के प्रकाश को

इस क्रिसमस पर हम झिलमिलाते बल्बों और साज-सज्जा से आगे देखें – हमारे जगत के उस प्रकाश को देखें, जो अंधेरे से भरी हमारी दुनिया में इसलिए आया है ताकि वह व्यक्तियों, परिवारों और समुदायों को ही नहीं, बल्कि देशों को भी आलोकित कर सके।

आदि में शब्‍द था, शब्‍द परमेश्‍वर के साथ था और शब्‍द परमेश्‍वर था। उसके द्वारा सब कुछ उत्‍पन्न हुआ और जो कुछ भी उत्‍पन्न हुआ, वह उसके बिना उत्‍पन्न नहीं हुआ। उसमें जीवन था, और यह जीवन मनुष्‍यों की ज्‍योति था। वह ज्‍योति अंधकार में चमकती रही, और अंधकार उसे नहीं बुझा सका। (बाइबिल; यूहन्ना 1: 1-5)

क्रिसमस एक दिलकश त्यौहार है। अलग-अलग लोगों के लिए इसके अलग-अलग मायने हैं। और इससे जुड़ी यादें भी सबके लिए अलग-अलग हैं। आज जिंगल्स की आवाज़ दिल्ली के मॉलों में भी सुनी जा सकती है।

मैं जब बच्ची थी तब दमन में रहती थी। उस समय दमन, पुर्तगाल का उपनिवेश था। मुझे याद है कि हम लोग आधी रात को चर्च में प्रार्थना में शामिल होते थे और जब हम वहां से लौटते तब हम पाते थे हॉट चॉकलेट और तरह-तरह के मुंह में पानी लाने वाले व्यंजनों से भरी टेबल। हमारे लिए तोहफे खरीदे जाते थे। मगर उन्हें छुपा दिया जाता था ताकि हम क्रिसमस के दिन उन्हें खोल सकें।

हम लोग क्रिसमस ट्री को सजाते-संवारते थे और नेटिविटी (ईसा मसीह के जन्म) की झांकी बनाते थे। मगर सच तो यह है कि क्रिसमस ट्री का क्रिसमस से कोई लेना-देना नहीं है। मनुष्य द्वारा निर्मित परंपराएं तो वहीं हैं: मनुष्य निर्मित।

दरअसल, क्रिसमस हमारे निर्माता ईश्वर के बारे में है, जो हमेशा से था और जो एक मनुष्य, ईसा मसीह, के रूप में मानवता का हिस्सा बना। यह उत्सव अंधकार को प्रकाश से चीरने के बारे में हैं।

हम यह जानते हैं कि यह अवतार जानते-बूझते और एक निश्चित उद्देश्य की पूर्ति के लिए लिया गया था। वह इसलिए लिया गया था ताकि हमारे गुनाहों को माफ़ किया जा सके; वह इसलिए लिया गया था ताकि हम अपने अंदर वास कर रही उसकी आत्मा के सहारे अंधकार से भरी हमारी दुनिया में प्रकाश का स्रोत बन सकें। और वह यह कर सकता है, क्योंकि उसे मानने वाले गुड फ्राइडे और ईस्टर संडे को उसकी मौत और उसके पुनर्जीवन का उत्सव मनाते हैं।

दिल्ली के विभिन्न व्यवासयिक परिसरों में क्रिसमस के मौके पर की गई सजावटें

दुनिया उस समय भी अंधेरे से डूबी थी। आज यह अंधेरा और घनीभूत हो गया है। युद्धों और प्राकृतिक आपदाओं के चलते बर्बादी का मंज़र सब ओर हैं। लोग मर रहे हैं और घोर दुख भोग रहे हैं। सब कुछ, बहुत बुरा है, बहुत ही बुरा। बच्चे अपने माता-पिता का क़त्ल कर रहे हैं।

महामारी के बाद से हम बीमारियों और मौतों का अनवरत सिलसिला देख रहे हैं। सभी आयुवर्गों के लोग अचानक मौत के शिकार हो रहे हैं। हार्ट अटैक, स्ट्रोक और अन्य बीमारियां बढ़ रहीं हैं। हमारा पूरा ध्यान इंटरनेट पर है और हम हमारे परिवारों से दूर हो रहे हैं। हमारे बच्चों को वहशी अपने जाल में फंसा रहे हैं। बुजुर्ग तरह-तरह के फरेबों का शिकार बन रहे हैं। जिंदा रहना महंगा होता जा रहा है। जलवायु परिवर्तन पृथ्वी को नष्ट कर रहा है।

हम अपने आप को ‘भला और अच्छा’ मानते हैं। मगर हम नहीं जानते कि हम जब किसी खतरे में होंगे, तब हमारा व्यवहार कैसा होगा। इसी अंधेरे में ईसा मसीह – जो जगत का प्रकाश है – प्रवेश करता है। हममें से जिनमें इतनी विनम्रता और साहस है कि हम स्वीकार कर सकें कि हम पाप के पुतले हैं, कि हमें उसकी क्षमा की ज़रूरत है, कि हम उसकी शिक्षाओं का पालन करने के प्रति प्रतिबद्ध हैं – ऐसे लोगों को वह उसकी पवित्र आत्मा के ज़रिए मन की गहराईयों से बदलने का मौका देता है। एक बार में एक व्यक्ति के बदलने से भी एक पूरा समुदाय, एक पूरा समाज बदल सकता है। इंग्लैंड में गुलामों को ले जा रहे एक जहाज़ के कड़वी जुबान वाले कप्तान का उस प्रकाश से साक्षात्कार हुआ और वह परमेश्वर का भक्त बन गया। परमेश्वर की शान में उसके द्वारा लिखित गीत जैसे ‘अमेजिंग ग्रेस’ आज भी गाए जाते हैं। जॉन न्यूटन नामक उस कप्तान ने ब्रिटेन की संसद के एक युवा सदस्य – जो स्वयं भी ईश्वर के प्रभाव से परिवर्तित हो चुका था – को इस बात के लिए राजी किया कि वह ब्रिटिश साम्राज्य (भारत भी उस समय उसका हिस्सा था) में गुलाम प्रथा के उन्मूलन के लिए प्रयास करे। विलियम विल्बरफ़ोर्स ने संसद के अंदर और उसके बाहर इसके लिए अथक अभियान चलाया। अंततः उसके प्रयासों को सफलता मिली और 1833 में जब वह मृत्युशैय्या पर था, तब उसे समाचार मिला कि संसद ने गुलामी उन्मूलन अधिनियम पारित कर दिया है। भारतीय समाज की कुछ विशिष्टताओं के चलते भारत के लिए उसी आशय का अधिनियम एक दशक बाद पारित हुआ।

परमेश्वर जो बदलाव हममें लाता है, वह हमें उसे प्रतिबिंबित करने वाले प्रकाश के नन्हें पुंजों में परिवर्तित कर देता है और हम प्रेम के वशीभूत हो अपने आसपास के लोगों का भला करने लगते हैं।

अगर हमारे जीवन में ईसा मसीह न होते तो फारवर्ड प्रेस भी न होता।

मत्ती 13:33 में ईसा, परमेश्वर के राज्य की तुलना खमीर से करते हैं, जो बहुत कम मात्रा में होते हुए भी आटे के एक बड़े ढेर को बदल सकता है।

हमारे सामने विलियम कैरी का उदाहरण है जिन्होंने अकेले ही भारत का चेहरा बदल दिया। ईसा के अनुयायियों ने ही भारत में शिक्षा के प्रसार और बीमार व ज़रूरतमंद लोगों की देखभाल के काम की शुरुआत की। स्कॉटिश मिशनरियों से प्रभावित जोतीराव और सावित्रीबाई फुले लड़कियों और दलितों और शूद्रों के लिए स्कूल खोलने वाले देश के पहले दंपत्ति बने। महात्मा फुले आगे चलकर भारत में सामाजिक क्रांति के पितामह और बाबासाहेब आंबेडकर के प्रेरणास्रोत बने। आंबेडकर ने उनके मूल्यों को भारत के संविधान का हिस्सा बनाया।

क्या ईसा के अनुयायी पूरी तरह निष्कलंक रहे हैं? बिल्कुल नहीं। बाइबिल कहता है कि ऐसा कोई भी नहीं है जो पूरी तरह निष्कलंक हो। हम सब गुनहगार हैं और उसकी कृपा से ही हम हैं। वह हमारी कमियों के बावजूद हमारे ज़रिए हमारे आसपास के लोगों को अपने आशीर्वचन देता है। वह हम सब का निर्माता है और वह हम सबसे प्यार करता है, चाहे हमारी जाति या नस्ल कोई भी हो।

आईये इस क्रिसमस पर हम झिलमिलाते बल्बों और साज-सज्जा से आगे देखें – हमारे जगत के उस प्रकाश को देखें, जो अंधेरे से भरी हमारी दुनिया में इसलिए आया है ताकि वह व्यक्तियों, परिवारों और समुदायों को ही नहीं, बल्कि देशों को भी आलोकित कर सके।

(अंग्रेजी से अनुवाद : अमरीश हरदेनिया)


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लेखक के बारे में

डा. सिल्विया कोस्का

डा. सिल्विया कोस्का सेवानिव‍ृत्त प्लास्टिक सर्जन व फारवर्ड प्रेस की सह-संस्थापिका हैं

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