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उत्तर प्रदेश : एसआईआर की भीतरी तह, जिसे चुनाव आयोग हर हाल में ढंकना चाहता है

बीएलओ ने कहा ‘इस तरह वो हमारे पास से सारे फॉर्म उठाकर ले गए और वहां जो संविदा पर या अन्य तरह से काम करने वाले लोग हैं, उनको दे दिया फीड करने के लिए। इस तरह जो व्यक्ति 2003 की मतदाता सूची में था, उसका भी नाम तीसरे विकल्प में डाल दिया गया है। जो नहीं था पर जिसके मां-बाप थे, उसका नाम भी तीसरे विकल्प में डाल दिया है।’ पढ़ें, सुशील मानव की यह जमीनी रपट

गत 23 दिसंबर को उत्तर प्रदेश की विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) की मसौदा सूची ज़ारी कर दी गई। इस प्रक्रिया में उत्तर प्रदेश में 2.89 करोड़ लोगों को मतदाता सूची से बाहर करने के लिए चिह्नित किया गया है। बिहार समेत अब तक जिन राज्यों में एसआईआर हुआ है, उनके आंकड़ों पर एक सरसरी नज़र डालें तो बिहार में 47 लाख, राजस्थान में 41.85 लाख, मध्य प्रदेश में 42.74 लाख, तमिलनाड़ु में 97 लाख, पश्चिम बंगाल में 58 लाख, पुडुचेरी में 1 लाख, छत्तीसगढ़ में 27.34 लाख, अंडमान व निकोबार में 64 हज़ार, केरल में 24.08 लाख, गुजरात में 73.7 लाख, गोवा में एक लाख और लक्षद्वीप में 1,429 लोगों को मतदाता सूची से बाहर करने के लिए चिह्नित किया गया है। एसआईआर के आगामी तीसरे-चौथे चरण में भी लगभग 50 करोड़ मतदाताओं को इस प्रक्रिया से गुज़रना पड़ेगा और एक अनुमान है कि पूरे देश में क़रीब 12-15 करोड़ लोगों को मतदाता होने का अधिकार खोना पड़ सकता है।

उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद जिले के दक्षिणी ग्रामीण क्षेत्र में एसआईआर की प्रक्रिया में लगे एक बीएलओ ने बताया कि उनके पास जो सूची थी, उसमें जांच के लिए 1286 मतदाता थे। अधिकांश लोग उनके गांव के ही थे और कुछ पड़ोस के तीन गांवों के लोग थे। वे बताते हैं कि चूंकि मामला उनके गांव-जवार का था, इसलिए उनकी कोशिश यह थी कि किसी का भी नाम न कटने पाए। किसी को भी बाद में परेशान न होना पड़े, इसके लिए उन्होंने दौड़-धूपकर सबको खोज निकाला। उन्होंने बताया कि एसआईआर के तहत तीन श्रेणियों में लोगों की पहचान की जा रही है। पहली श्रेणी, ‘सेल्फ’ (स्वयं), जिसमें वे लोग शामिल किए जाते हैं, जिनका नाम 2003 की सूची में था और 2025 में जारी सूची में भी मौजूद है। दूसरी श्रेणी ‘प्रोजेनी’ (वंशज) की है, जिसमें वे लोग शामिल किए जाते हैं, जिनका नाम 2003 की सूची में नहीं था, लेकिन 2025 की सूची में है। ऐसे लोगों को अपने माता-पिता की जानकारी के पक्ष में दस्तावेज देने होते हैं। वहीं तीसरी श्रेणी ‘नाइदर’ (लावारिश) की है, जिसमें वे लोग शामिल किए जाते हैं, जिनका नाम न तो 2003 की सूची में था और न ही 2025 की सूची में।

उक्त बीएलओ ने जानकारी दी कि उन्होंने 1286 में से 592 लोगों को सेल्फ में और बाक़ी सबको प्रोजेनी में वर्गीकृत कर दिया। वे आगे बताते हैं कि “नाइदर की श्रेणी में मैंने शून्य लोगों को दिखाया था। लेकिन अपलोड करने के लिए स्कूल में शिक्षकों की ड्युटी लगायी गई थी। जब फॉर्म अपलोड होने के बाद मैंने चेक किया तो हैरान रह गया कि मेरी लिस्ट में 342 लोग नाइदर में डाल दिए गए हैं। मैंने समय रहते सबको अपने मोबाइल से फिर से ठीक किया। यदि मैं समय रहते यह नहीं करता तो इतने लोगों को नाहक ही परेशान होना पड़ता, नोटिस का सामना करना पड़ता और तहसील के चक्कर काटने पड़ते। सब मेरे ही गांव-जवार के थे, यह सोचकर ही मैंने जानबूझकर किया।”

जिन 342 लोगों को ज़बर्दस्ती तीसरे विकल्प ‘नाइदर’ में डाला गया, वे किस धर्म या जाति के लोग थे? इस सवाल के जवाब में उक्त बीएलओ कहते हैं कि “अधिकांश तो ब्राह्मण थे, लेकिन और भी जातियों के लोग थे। कोई ऐसा जाति या धर्म को टारगेट करके नहीं किया गया था।” बीएलओ बताते हैं कि गांवों में मोबाइल नेटवर्क की बहुत ज़्यादा समस्या रहती है। कई बार एक फॉर्म को फीड करने में आधे घंटे से भी अधिक समय लग जाता है। ऐसे में तीसरे विकल्प में आसानी से हो जाता है, तो यह डेडलाइन के प्रेशर में और अपनी नौकरी बचाने और एफ़आईआर से बचने के लिए किया गया है ताकि किसी तरह डेडलाइन के अंदर ही सारे फॉर्म फीड हो जाएं, चाहे किसी भी विकल्प में हो जाएं।”

पहले बीएलओ पर काम का दबाव बनाया, फिर मदद के नाम पर सर्किट हाउस और नगर निगम से की गयी फीडिंग

इलाहाबाद के ही उत्तरी शहरी क्षेत्र में एसआईआर प्रक्रिया को अंजाम देने वाला एक बीएलओ बताता है कि सितंबर-अक्टूबर, 2025 में 10-12 दिन का बीएलओ के लिए ट्रेनिंग कार्यक्रम चलाया गया था। वहां बताया गया था कि 2003 की वोटिंग लिस्ट से 2025 की वोटिंग लिस्ट का मिलान करके उन मतदाताओं को ढूंढा जाए, जिनके नाम 2003 की सूची में थे और 2025 की सूची में है। जो लोग 2003 की सूची में नहीं थे, लेकिन 2025 की सूची में हैं उनको काग़ज़ दिखाना है। ट्रेनिंग में हमें बताया गया है कि उनको 13 में से एक दस्तावेज़ देना होगा। यदि कोई आदमी आधार कार्ड को अपने प्रूफ के लिए दे रहा है तो वह ‘आधा काग़ज़’ है। उसके साथ में कोई एक और काग़ज़ सबमिट करना पड़ेगा।

बीएलओ ने आगे कहा कि मान लीजिए कि मुझे 5000 वोटरों में 1200 वोटरों को ढूंढना है। तो बहुत मेहनत और भाग-दौड़ के बावजूद 353 लोगों की मैचिंग या टैली नहीं हुई। समयाभाव के चलते, जब फॉर्म जमा करने तहसील गया तो वहां अधिकारी बोल रहा है कि जितना है उतना ले आइए, और लोगों को छोड़िए और लिख दिजीए कि ये लोग नहीं मिले। रात को ये लोग वॉट्सअप करते हैं, फोन करते हैं, धमकाते हैं।

बीएलओ अपने कार्य अनुभव के आधार पर बताता है कि 35-40 प्रतिशत लोगों की फीडिंग तीसरे विकल्प यानी ‘नाइदर’ वाले विकल्प में हो रही है। मैं 1200 लोगों की टैली करके भी 353 लोगों को नहीं खोज पाया, जो नहीं मिले वो तीसरी श्रेणी में डाल दिए गए। नाइदर वाले लोगों को बीएलओ के हाथों या मोबाइल मेसेज से या पोस्ट से कैसे भी नोटिस भेजी जाएगी। उनको काग़ज़ जमा करना पड़ेगा।

बीएलओ आगे बताता है कि “इसके साथ ही एक खेल और हुआ है। पहले तो उन्होंने हम बीएलओ पर बहुत दबाव डाला कि ज़ल्दी काम करके दो। इतना प्रतिशत करके दो नहीं तो एफआईआर होगा, वेतन रोका जाएगा, सस्पेंड कर दिये जाएंगे। इसी दबाव से कई बीएलओ मरे। यह सब मैसेज वॉट्सअप ग्रुप में आता था और एसडीएम को मेंशन किया जाता था। फिर जब उन्होंने मौका देखा कि काम नहीं हो रहा है तो कहा कि आप लोग फीडिंग मत करो। फीडिंग का काम तहसील में होगा, सर्किट हाउस, नगर निगम में होगा। इस तरह वो हमारे पास से सारे फॉर्म उठाकर ले गए और वहां जो संविदा पर या अन्य तरह से काम करने वाले लोग हैं, उनको दे दिया फीड करने के लिए। इस तरह जो व्यक्ति 2003 की मतदाता सूची में था, उसका भी नाम तीसरे विकल्प में डाल दिया गया है। जो नहीं था पर जिसके मां-बाप थे, उसका नाम भी तीसरे विकल्प में डाल दिया है। उन्होंने सबको उठाकर एक तरफ़ से तीसरे विकल्प में फीड कर दिया है।

खेत में बैठकर मतदाता सूची का मिलान करते एसआईआर कर्मी

बीएलओ आगे बताया कि “उन्होंने एप पर मेरा मोबाइल नंबर डाला ओके किया तो ओटीपी आया। फिर उन्होंने फोन करके हमसे कहा कि हम तहसील से बोल रहे हैं, साहेब ने कहा है फीडिंग के लिए ओटीपी बताइए। अधिकारी बोल रहे हैं, जल्दी से ओटीपी बताइए, आपका काम आसान हो जाएगा। तो आसान क्या हुआ। आप समझिए कि जिन लोगों का नाम 2003 की सूची में है (यानी सेल्फ विकल्प वाले) और जिन लोगों का नाम नहीं है लेकिन उनके माता-पिता का है (यानी प्रोजेनी विकल्प वाले) विकल्प के लिए आप को कम से कम 15 बार ऑप्शन क्लिक करना पड़ेगा। तमाम जानकारियां दर्ज करनी पड़ेंगीं। लेकिन ‘नाइदर’ जो कि तीसरा विकल्प है, उसमें सिर्फ़ 3 चीज़ें भरनी पड़ती हैं– जन्मतिथि, मोबाइल नंबर और माता-पिता का नाम। बस ओके हो गया। फिर फॉर्म की फोटो खींची हो गया। यहां इस प्रक्रिया में केवल पांचच बटन दबानी पड़ रही हैं, उन दोनों विकल्पों के लिए आपको 15 बटन दबाना पड़ता है। तो ज़्यादा आसान क्या है? सर्वर वैसे ही डाउन चलता है, सारा समय बफरिंग ही करता रहता है। तो वे लोग सबको तीसरे विकल्प में ही ढकेल दिये।”

वे आगे बताते हैं कि इससे हम बीएलओ के सामने समस्या आ गई। किसी तरह मुस्लिम समुदाय के लोगों के बीच ये बातें पहुंच गईं। उन लोगों ने हमारे सामने लंबी लाइन लगाना शुरू कर दिया। कहने लगे– “भैय्या हमारा फॉर्म दिखाइये, वेरीफाई कीजिए कि किस सेक्शन में फीडिंग हुआ है।” उन्होंने पूछा कि जब सब कुछ सही था, यानी 2003 और 2025 की सूची में नाम था तो हमारा नाम तीसरे विकल्प में कैसे चला गया है? यह सब खेला तहसील और सर्किट हाउस से हुआ है। केवल ओटीपी बताने से मेरी सारी मेहनत पर पानी फिर गया। लोगों के बीच मुझे लेकर एक अविश्वास पैदा हुआ है। मैपिंग के आधार पर फीडिंग करने के बजाय चीज़ें गड़बड़ की गईं। लोग रोज़ आकर देखवा रहे हैं कि मेरा नाम तो नहीं हट गया। जिन लोगों ने ओटीपी लेकर गड़बड़ फीडिंग किया है, उनका तो कुछ नहीं होने वाला है। यहां तक कि लोगों की फोटो स्कैन करनी चाहिए, फॉर्म स्कैन, तब फोटो स्कैन सबमिट करना होता है। लेकिन उन्होंने फोटो स्कैन तक नहीं किया है। जो फोटो फॉर्म में लगी है उसी से ओके हो जाता है। मेरे सामने खड़े होकर एसडीएम तहसीलदार ने कहा कि फोटो की क्या ज़रूरत है भाई, बिना फोटो के कीजिए। तो वहां यही सब हुआ है। तो जिन लोगों को नगर निगम, सर्किट हाउस में बैठाकर रातों-दिन फीडिंग हो रही है, वे लोग कहां से आए हैं, ऑन पेपर आए हैं कि हवा-हवाई, ये सब हमें नहीं मालूम है।

महोबा जिले के कबरई विकासखंड के श्रीनगर गांव में तो एसआईआर प्रक्रिया की गड़बड़ी ने सारी हद ही पार कर दी है। दरअसल 23 दिसंबर, 2025 को एसआईआर की मसौदा सूची प्रकाशित होने के बाद, जब बीएलओ संबंधित सूची लेकर गांव पहुंचे तो पता चला कि ग्राम पंचायत में मौजूदा ग्राम प्रधान समेत 2300 लोगों के नाम मतदाता सूची से ग़ायब हो गए हैं। इससे पूरी प्रक्रिया पर सवाल खड़ा हो गया है। मामला सुर्खियों में आने के बाद फ़िलहाल गांव के लोगों को 24-30 दिसंबर के दरमियान संबंधित फॉर्म भरकर अपना दावा प्रस्तुत करने के लिए कहा गया है।

निर्वाचन नामावली में बड़ी गड़बड़ी सामने आने के बाद बीएलओ स्तर के अधिकारयों ने जिला निर्वाचन अधिकारी से शिक़ायत करते हुए कार्रवाई की मांग की है। वहीं बीएलओ का आरोप है कि सैंकड़ों मतदाताओं के नाम बिना उचित जानकारी और प्रक्रिया के काट दिये गए हैं। इससे ग्रामीणों में आक्रोश है और लोग इसके लिए बीएलओ को ज़िम्मेदार ठहरा रहे हैं।

गौरतलब है कि काम का ओवरलोड, डेडलाइन के भीतर काम पूरा करने का दबाव, वॉट्सअप ग्रुप में एसडीएम एवं अन्य संबंधित अधिकारियों द्वारा सस्पेंड करने और आपराधिक मुक़दमा दर्ज़ कराने की धमकी देकर बीएलओ से मनमुताबिक काम करवाया जा रहा है। इसमें शिक्षक से लेकर आशा कार्यकर्ताओं, आंगनबाड़ी कार्यकर्ता और दूसरे सरकारी विभागों के कर्मचारियों को बीएलओ बनाया गया है। देश में अब तक 36 से अधिक बीएलओ की मौत हो चुकी है। सबसे ज़्यादा उत्तर प्रदेश में 12 बीएलओ, मध्य प्रदेश में 9, गुजरात में 5, पश्चिम बंगाल में 4 और अन्य राज्यों में 6 बीएलओ की मौत की रिपोर्टिंग हुई है। एक बीएलओ बताता है कि देश में 50 से अधिक बीएलओ सुसाइड कर चुके हैं लेकिन हल्ला मचने के बाद अब भी मीडिया में रिपोर्टिंग नहीं हो रही है।

प्रवासी मज़दूरों पर मताधिकार खोने का संकट है

एक बीएलओ इस प्रक्रिया की खामियों को उजागर करते हुए कहता है कि “आज क़दम-क़दम पर आधार कार्ड लगता है। रेलवे का टिकट तक नहीं होता है इसके बिना। अस्पतालों में ऐसे कितने केस हुए हैं कि आधार कार्ड के बिना गर्भवती महिलाओं को लौटा दिया गया है और उनका प्रसव अस्पताल के गेट के सामने सड़क पर हुआ है। इसलिए दूसरे शहरों में क़माने गए लोग अपना आधार कार्ड वगैरह सब अपने साथ लेकर गये हैं। घर पर बूढ़े मां-बाप हैं तो उनके पास न मोबाइल है, न काग़ज़ है। इसी तरह ईंट-भट्ठों पर काम करने वाले लोग पूरा परिवार लेकर चले गए हैं दूसरे प्रदेशों और जिलों में। हम किससे काग़ज़ मांगें?”

उत्तर प्रदेश में कई मतदाताओं के ख़िलाफ़ एफआईआर दर्ज़ करवाया गया है। इस बारे में पूछने पर एक बीएलओ अपने कार्यक्षेत्र का एक दिलचस्प वाकिया सुनाते हैं। वे बताते हैं कि “अमूमन दो गांवों की सरहद मिलती हैं, लेकिन इस केस में तीन गांवों की सरहद मिलती थी। क़रीब 10 घर ऐसे थे जहां लोगों के नाम तीनों गांवों की मतदाता सूची में थे। उनमें इन लोगों का कोई क़सूर नहीं था। तीनों गांवों में प्रधानी का चुनाव लड़ने वाले लोगों ने ही इन लोगों के नाम अपने अपने गांवों के मतदाता सूची में जुड़वा दिये थे। प्रधानी के चुनाव के समय में तीनों गांवों के ये कॉमन लोग वोट के बदले मुर्गा, दारू और पैसा इन्हें देकर वोट दे देते थे। इन लोगों की मौज़ थी। एसआईआर की प्रक्रिया में जब मेरे सामने ये मामला आया तो मैंने इन लोगों की समझाया कि दो जगह फॉर्म भरना ग़ैर-क़ानूनी है, आप लोगों के ख़िलाफ़ केस हो सकता है। इसलिए जिस गांव में आपका घर, खेत-बारी हो, उसी गांव की सूची में नाम रखिए, बाक़ी कटवा दीजिए। फिर वे लोग मान गए। यही यदि कोई ग़ैर-ज़िम्मेदार या असंवेदनशील व्यक्ति होता तो वह समझाने के बजाय दो जगह के फॉर्म भरने के आधार पर उनके ख़िलाफ़ एफआईआर कर देता।”

इलाहाबाद के दक्षिणी ग्रामीण क्षेत्र के ही एक और बीएलओ बताते हैं कि उन लोगों को कोई प्रॉपर ट्रेनिंग नहीं दी गई थी। बस एक दिन मीटिंग में बुलाकर बता दिया गया कि आप लोगों को यह काम करना है। वे बताते हैं कि गांवों में तो कोई प्रॉपर मकान नंबर नहीं होता है। उन्हें जो सूची सौंपी गई थी, उनमें मतदाताओं के न तो पिता के नाम थे, न ही अन्य (जातीय सूचना) सूचना थी। एक फॉर्म दिखाते हुए वे बताते हैं कि “देखिए, इस महिला का नाम कलावंती है। गांव में स्त्रियों के नाम कोई नहीं जानता है। लोग उन्हें उनके मायके के नाम से जानते हैं, या उनके पति के नाम से। इसी तरह युवा लड़कों को उनके पिता के नाम से जाना जाता है। गांव में मकान नंबर नहीं, जातीय बस्तियां या टोले, मोहल्ले होते हैं। अगर इस महिला के नाम के साथ इसकी जाति लिखी होती तो उस जाति के टोले में जाकर भी इसकी खोज की जा सकती थी। सिर्फ़ नाम और क्रमसंख्या के आधार पर किसको कहां ढूंढ़ें?”

बीएलओ एक अन्य समस्या पर ध्यान खींचते हुए बताते हैं कि इस प्रक्रिया की बिल्कुल शुरुआत में तहसील स्तर के अधिकारी ने उन्हें साफ़ आदेश दिया था कि फॉर्म ले जाओ और नाम देखकर लोगों को बांट दो, और उनसे बोलो कि एक सप्ताह में फॉर्म भरकर वापस करें। लेकिन मैंने आदेश के ख़िलाफ़ जाकर काम किया। मैंने फॉर्म किसी को नहीं दिया, बल्कि अपने हाथों से भरा, फिर लोगों को दिखाया, उनके हस्ताक्षर करवाए और वापस तहसील में लाकर जमा किया। गांव के पुरुषों और स्त्रियों का शिक्षा स्तर कैसे और किस तरह का है, यह सब जानते हुए भी अधिकारी लोग ऐसे ग़ैर-ज़िम्मेदाराना प्रक्रिया और आदेश ज़ारी कर देते हैं। इससे लोगों को बेवजह की परेशानी उठानी पड़ती है।”

क्या इस प्रक्रिया में अन्याय या पक्षपात की गुंजाइश है, जैसा कि विपक्ष आरोप लगाता है। इस सवाल के जवाब में एक बीएलओ बताता है कि “देखिए ऐसी कोई भी प्रकिया हो, वह सरकार, प्रशासन और संबंधित मशीनरी पर निर्भर होती है। आप देखिए इसी प्रक्रिया में अयोध्या, काशी और प्रदेश के तमाम पुजारियों और साधु संतों के लिए एक विंडो बनाई गई है। लेकिन इस प्रदेश में जो लाखों घुमंतू जातियों के लोग हैं, उनके लिए क्या प्रावधान किया गया? ज़ाहिर है कि उनकी सत्ता से कोई नज़दीकी नहीं है, न भागीदारी है, न ही वे घुमंतू वर्ग समूह के हैं तो उनके लिए कोई गुंजाइश नहीं है। सबसे ज़्यादा इस एसआईआर प्रक्रिया के चपेट में इन्हीं खानाबदोश जातियों के लोग आए हैं, जिनका कोई स्थायी ठौर-ठिकाना नहीं है। ये लोग सीज़न और मेले के हिसाब से जगह बदलते रहते हैं।”

28 जनवरी को इलाहाबाद में प्रथम रविकिरण जैन व्याख्यान को संबोधित करते हुए वरिष्ठ पत्रकार और सीएसडीएस से जुड़े प्रोफ़ेसर अभय दूबे एसआईआर की प्रक्रिया के जन्म को बूथ लेवेल एजेंट (बीएलए) से ज़ोडते हैं। वे बताते हैं कि भारतीय चुनाव प्रणाली को कैप्चर करने के लिए यह सब हो रहा है। भाजपा का मत प्रतिशत अभी 36.5 प्रतिशत है। उसने अपना मत प्रतिशत 40 पहुंचाने के लिए एसआईआर करवाया है। मतदाता का नामांकन अभी तक चुनाव आयोग और सरकार की ज़िम्मेदारी थी, मतदाता की नहीं। लेकिन एसआईआर में यह मतदाता की ज़िम्मेदारी है कि वह अपना नामांकन करवाये। अपना काग़ज देकर वो साबित करे कि वह इस देश का नगारिक और मतदाता है कि नहीं है। पहले चुनाव आयोग के कर्मचारी जाकर फॉर्म भरकर जमा करते थे। सारा काम वो करते थे, किसी मतदाता को दौड़-भाग करने की ज़रूरत नहीं होती थी। लेकिन इन लोगों ने बीएलए (बूथ लेवेल एजेंट) की कटेगरी बनाने के साथ ही सारे समीकरण बदल दिए हैं। संविधान में पार्टी नाम का कोई ज़िक्र नहीं है। ये तो दल-बदल क़ानून के लागू होने के बाद पार्टी का ज़िक्र पहली बार आया। चुने हुए जनप्रतिनिधियों का एक समूह सरकार बनाएगा। तो दल-बदल विरोधी क़ानून से राजनीतिक पार्टियों को एक क़ानूनी रूप मिलना शुरू हुआ। लेकिन पार्टी के आधार पर जैसे ही बीएलए कल्पित किया गया, राजनीतिक दल चुनाव प्रणाली के अंग बन गए। तो जो काम चुनाव आयोग के कर्मचारियों का था वो बीएलए ने ले लिया। इस देश में जहां 80 करोड़ लोग मुफ़्त अनाज पर पल रहे हैं, 67 प्रतिशत आबादी गांवों में रह रही है, अकुशल मज़दूरों की विशाल संख्या है, उनसे यह उम्मीद करना कि अपने मतदान का उपयोग करने के लिए अपने आपको मतदाता बनाने के लिए, वो फॉर्म भरकर दें, कामकाज छोड़कर तहसील की दौड़ भाग करें, यह सब मज़ाक़ नहीं तो और क्या है।

अभय दूबे आगे कहते हैं कि जैसे ही उन्होंने इस चीज़ को बदला, एक बहुत बड़ा खाली स्पेस था, जिसमें वो बहुत सारे नामों को खारिज़ कर सकते थे, और मनचाहे नामों को जोड़ सकते थे। इस प्रक्रिया के लिए उन्होंने गुंजाइश निकाली बीएलए के बनने से। बीएलए बनने से ही एसआईआर अस्तित्व में आई। एसआईआर का भारत के क़ानून और संविधान में कहीं कोई ज़िक्र नहीं है। जो लोकप्रतिनिधित्व क़ानून है, 1960 का उसमें एसआईआर का ज़िक्र नहीं है। बीएलए और ईवीएम से बूथ स्तर की परिणाम निकलना संभव हुआ है कि कौन पार्टी किस बूथ पर जीती है। एक-एक बूथ पर कौन किसका मतदाता है, यह बीएलए जानता है। एसआईआर में भी बीएलए लगे हुए हैं। आप आगे ख़ुद ही अंदाज़ा लगा लीजिए इस प्रक्रिया की पारदर्शिता का।

एक बीएलओ से जब हमने बीएलए के एसआईआर में लगे होने की जानकारी मांगी तो उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश में सिर्फ़ दो ही पार्टियों के पास बीएलए हैं– भाजपा और सपा। और यह सच है कि एसआईआर में लोंगो की पहचान और तलाश करने में बीएलए की मदद ली जा रही है।

(संपादन : नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

सुशील मानव

सुशील मानव स्वतंत्र पत्रकार और साहित्यकार हैं। वह दिल्ली-एनसीआर के मजदूरों के साथ मिलकर सामाजिक-राजनैतिक कार्य करते हैं

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