भारत के विश्वगुरु होने के दावे पर वही लोग विश्वास नहीं करते, जो रात-दिन इसे दोहराते रहते हैं। अच्छा होता यदि सैंधव-जनों शत-सहस्रों पुरों को ध्वस्त करने के बजाय इंद्र उस सभ्यता की ज्ञान संपदा को सहेजने का प्रयास करता। पता करता कि विश्व की सर्वाधिक विकासमान नागरी सभ्यता शिक्षा और संस्कृति को सहेजने तथा उसके प्रसार के लिए कौन-से टूल इस्तेमाल करती थी। लेकिन आत्ममुग्ध आर्यों ने निर्माण के बजाय ध्वंस का रास्ता चुना। इसलिए शब्दों के सहारे अमरता की खोज का दावा फिलहाल प्रचीन मिस्र को जाता है, जिसने अपनी 4500 वर्ष पुरानी कविताओं को भी सहेज कर रखा है, उन कविताओं को, जिनमें उनके मजदूरों तथा शिल्पकारों के पसीने की गंध और सपने छिपे हैं।
कहते हैं कि भाषा बनी तो समाज बना। समाज बना तो संस्कृति बनी। संस्कृति बनी तो सभ्यता पंख पसारने लगी। ज्ञानानुभवों का आदान-प्रदान आसान होता गया। इसके लिए जरूरत पड़ी शिक्षकों की। ऐसे ज्ञान-संवाहकों की जो ज्ञानानुभवों की निरंतर विस्तार लेती परंपरा को गति प्रदान कर सकें। जो पुराने ज्ञान को सहेजकर, नए के सृजन में सहायक हों। यह किसी एक सभ्यता या संस्कृति में नहीं हुआ, बल्कि अलग-अलग देशों में, अलग-अलग सभ्यताओं के बीच, अलग-अलग कालखंडों और भिन्न-भिन्न चरणों में लगातार हुआ।
भाषा ने सभ्यता और संस्कृति को पंख दिए तो संस्कृति और सभ्यता ने भी भाषाओं को सहेजकर रखने में कोई कसर नहीं छोड़ी। पूरी दुनिया के मनीषी इस काम में लगे रहे। मानवता के उन सार्वकालिक शिक्षकों का जन्म अलग-अलग देशों की अलग-अलग संस्कृतियों और विभिन्न कालखंडों में भले हुआ हो, ज्ञान और ज्ञानार्जन की उनकी चाहत ‘वसुधैवकुटुंबकम्’ की भावना को सदैव चरितार्थ करती रही। ज्ञान की वैश्विकता का समर्थन करने वाले गीत हर युग में गाए गए–
हमारे पास चारों ओर से शुभत्व की बरसात हो। सत्यान्वेषण को समर्पित कल्याणकारी विचार चारों ओर से निर्बंध आते रहें।[1]
नए ज्ञान और खोज का सिलसिला तो तभी आरंभ हो चुका था, जब से मानव-सभ्यता ने पहली बार आंखें खोली थीं। विराट ब्रह्मांड को खुली आंखों से देखना ही विलक्षणता की अनुभूति थी। भारत के संबंध में भाषा की खोज का सिलसिला भीमबेटका की पहाड़ियों तक ले जाता है। मध्य प्रदेश के विंध्यक्षेत्र की पहाड़ियों में स्थित इन गुफाओं में पाषाण काल और पुरापाषाण काल के 20000-28000 वर्ष पुराने सैंकड़ों शैलचित्र मिले हैं। वे उस कालखंड की याद दिलाते हैं, जब मनुष्य संकेतों की भाषा गढ़ने में लगा था। प्राप्त शैलचित्रों में शिकार खेलते, निशाना साधने का अभ्यास करते, नाचते और उत्सव मनाते हुए मनुष्यों के चित्र हैं। ये हमें भाषा, संस्कृति और समाज के उस आदिम इतिहास तक ले जाते हैं, जिसके अनेक रूप आज के जनजातीय समाजों में भी सुरक्षित हैं। इनसे मिलते-जुलते और कतिपय पुराने चित्र फ्रांस और स्पेन की गुफाओं में भी प्राप्त हुए हैं। उन्हें देखकर सहज पता चल जाता है कि चित्रों के माध्यम से संवाद करने तथा चित्रलिपि गढ़ने की लगभग एक जैसी ललक दुनिया के हर कोने, हर सभ्यता में, प्रत्येक युग में मौजूद थी।
यदि नागरी सभ्यताओं की बात करें तो विश्व की सर्वाधिक विकसित और फैलाव वाली सभ्यता सिंधु सभ्यता रही है। उसकी सुविन्यस्त नगर संरचना दुनिया-भर के पुरावेत्ताओं को लुभाती आई है। भीमबेटका, फ्रांस, स्पेन आदि की गुफाओं में हम चित्रलिपियों से रू-ब-रू होते हैं। सिंधु सभ्यता तक आते-आते चित्र-लिपियां संकेत-लिपि में बदलने लगी थीं। सिंधु सभ्यता के नागरिकों की उद्यमशीलता, उनकी अनूठी नगर-सरंचना, मापन-प्रणाली, व्यापार, जलपरिवहन के संसाधनों के विकास से ही नहीं, उन 450 (ब्रायन वेल के अनुसार लगभग 694) से अधिक अक्षर-प्रतीकों के माध्यम से भी आंकी जानी चाहिए, जिसके माध्यम से वे अपने ज्ञानानुभवों को सहेजने की क्षमता विकसित करने में लगे थे, जिन्हें समझने की कोशिश में दुनिया-भर के प्राच्यःविद् आज तक लगे हुए हैं।
मिस्र को प्राय: उसके पिरामिडों के लिए जाना जाता है। वहां के राजाओं को पुनर्जन्म पर विश्वास था। इसलिए मृत्यु के बाद मृत देह को सहेजने के लिए उन्होंने अनूठी पिरामिड कला का आविष्कार किया था, जिन्हें विश्व के सात आश्चर्यों में गिना जाता है। आश्चर्य इस बात का है कि जहां कुछ मिस्रवासी अमरता की चाहत में पिरामिडों के निर्माण पर जोर देते थे, वहीं कुछ उन्हें अनश्वर मानकर, शब्द-सामर्थ्य की मदद से अमरत्व प्राप्त करना चाहते थे। भाषा और लेखन कला के समर्थन में गीत रचे जा रहे थे। इन गीतों में कहा गया था कि अकूत, पानी की तरह बहाई गई धनराशि से बने स्मारक, एक-न-एक दिन खंडहर हो जाएंगे, लेकिन लिखे गए शब्द, उनसे बनी इबारत, भाषा-शैली और पुस्तकें हमेशा-हमेशा बनी रहेंगी।

मिस्र के डेअर-अल-मदीना से रामेसाइड पांडुलिपियां प्राप्त हुई हैं। उनमें एक ‘लेखक की अमरता’ शीर्षक युक्त पांडुलिपि लेखकीय सृजन के महत्व पर केंद्रित है। अभी तक की पुरातात्विक खोजों में हम इसे भाषा-सामर्थ्य और सृजनशीलता की प्रशस्ति में रचा गया सर्वप्रथम दस्तावेज मान सकते हैं। पिरामिडों की शक्ल में अमरता चाहने वाले मिस्रवासियों को उस लेख में बताया गया था कि शब्द अमरता सुनिश्चित करने का सबसे कारगर साधन है। समय की काई स्मारकों को चाट जाती है, परिवार, दोस्त, रिश्तेदार समय के साथ बिछुड़ जाते हैं। मगर खूबसूरत भाषा में सहेजे गए लेख, वक्त के सीने पर चांद-सितारों से टंक जाते हैं। इसलिए यदि कोई अमरत्व की चाहत रखता है तो उसे सब कुछ छोड़, केवल लेखन-सामर्थ्य हासिल करने पर जोर देना चाहिए। 1200-1300 ईस्वी पूर्व के एक काव्य-लेख का संपादित अंश सम्मोहन पैदा करने वाला है। लंबी कविता का शीर्षक था– ‘लेखन से अमरत्व की कामना’ और इसकी बानगी देखिए–
यदि आप अमरता की चाहत रखते हैं तो लेखन-सामर्थ्य हासिल कीजिए
उन्होंने अपने लिए तांबे का धर्मस्थल नहीं बनवाया
न गगनचुंबी स्तंभ वे बनवा पाए
अपने नाम को यादगार बनाए रखने के लिए उन्होंने अपना वारिस भी नहीं छोड़ा
लेकिन अपने शब्दों के माध्यम से
उनमें सुरक्षित संदेश के माध्यम से उन्होंने अपने (सहस्रों) वंशज प्राप्त कर लिए हैं।
पुस्तकें उनके लिए पुरोहित हैं
तख्ती लाडली संतान जैसी
शिक्षण-स्थल हैं उनके असली धर्मस्थान
कृतियां उनकी संतति
शिलाखंड (जिसपर अक्षर उकेरे जा सकें) उनकी भार्या हैं
बड़े से लेकर छोटे तक (शब्द) उन्हें खजाने के रूप में मिले हैं।
लेखक, उन सबका सर्जनहार है।
एक दिन धर्मस्थान खंडहर बन जाएंगे
पुजारी दुनिया छोड़कर जा चुके होंगे
मजारों में लगी होगी दीमक, शब्द गायब हो चुके होंगे
लेकिन कलम से उकेरे गए नाम
जिन्हें लिखा गया था उनके बचपन में, हमेशा सुरक्षित रहेंगे
उनकी मदद से वे जीवित रहेंगे अनंतकाल तक।[2]
इतिहास-सिद्ध सत्य है कि इबारतें, इमारतों से ज्यादा टिकाऊ और भरोसेमंद होती हैं, उनमें बसी यादें देर तक सांस लेती हैं। इसलिए अपने नाम को किसी-न-किसी माध्यम से इतिहास में टांक देने की कोशिश बड़े से बड़े विजेता ने की है। सिकंदर जैसा महायोद्धा अपने साथ इतिहासकारों की टोली लेकर चलता था। महमूद गजनवी ने फिरदौसी को वचन दिया था कि वह ‘शाहनामा’ के हरेक पद के बदले एक दीनार (स्वर्ण मुद्रा) पुरस्कार में देगा। फिरदौसी ने अपनी अद्वितीय प्रतिभा का परिचय देते हुए ‘शाहनामा’ की रचना की, जिसमें साठ हजार पद थे। इस बीच बादशाह को फिरदौसी के विरुद्ध भड़का दिया गया। जब वह अपनी कृति के साथ पुरस्कार-राशि की उम्मीद में गजनवी के दरबार में पहुंचा, अपने वादे के विरुद्ध उसने साठ हजार दीनार के बजाय, दिरहम (चांदी के सिक्के) ही भिजवाए; जिन्हें फिरदौसी ने उन्हीं नौकरों में बांट दिया, जो उन्हें पहुंचाने गए थे।
इस अपमान से आहत फिरदौसी ने महमूद गजनवी पर कटाक्ष करते हुए कुछ पद रचे, उनमें प्रशस्ति के साथ-साथ तंज भी था– ‘वक्त से डर बहादुर बादशाह। इस धरती पर कोई हमेशा-हमेशा नहीं रहा।’
बाद में गजनवी को अपनी भूल का एहसास हुआ तो उसने फिरदौसी को पचास हजार दीनार भिजवाए। मगर तब तक बहुत देर हो चुकी थी। दीनार जब फिरदौसी तक पहुंचे तब उस महाकवि को कब्र में दफनाया जा रहा था। आज महमूद गजनवी इतिहास के चंद पन्नों में सिमटा, गुमशुदा जैसा है, जबकि ‘शाहनामा’ वैश्विक इतिहास, कला और संस्कृति की दस्तावेजी कृति है।
इसी ‘शाहनामा’ में ‘पंचतंत्र’ से जुड़ा एक किस्सा भी है।[3] सातवीं शताब्दी में ईरान के बादशाह नोशेरवां ने सुना कि भारत में कोई संजीवनी बूटी है, जिसके सेवन से आदमी अमर हो जाता है। बस फिर क्या था 300 ऊंटों के काफिले के साथ शाही हकीम बुर्जोई भारत के लिए निकल पड़ा। (सातवीं शताब्दी में ऐसी ही कोशिश चीनी सम्राट ने भी की थी।) वर्षों खोजने के बाद भी संजीवनी न मिलने से बुर्जोई हताश हो गया। वह अपने देश लौटना ही चाहता था कि एक बुजुर्ग ने विलक्षण पुस्तक के बारे में बताया। बुर्जोई की निराशा आशा में बदल गई। वह राजा के दरबार में पहुंचा। पुस्तक की प्रति मांगी, जिसे देने से राजा ने इंकार कर दिया। लेकिन उसने पढ़ने की अनुमति दे दी। बुर्जोई दरबारियों की मदद से दिन में पुस्तक को पढ़ता और रात के सन्नाटे में, अपनी याददाश्त के सहारे उसे पहेलवी में लिख लेता। पुस्तक पूरी होते ही उसने चुपके से नोशेरवां तक पहुंचा दी। तुरंत जवाब भी आ गया, बादशाह ने कहलवाया था– ‘ज्ञान का समंदर हमारे देश में आ चुका है।’
बुर्जोई वापस पहुंचा तो बादशाह ने उसका खूब सम्मान किया। ईनाम मांगने को कहा। बुर्जोई ने बस इतनी मांग की कि इस पुस्तक के साथ उसके नाम को जोड़ दिया जाए। बादशाह राजी हो गया। उस पुस्तक का नाम था– ‘पंचतंत्र’। भारत में मूल संस्कृत कृति गायब हो गई, तो हकीम बुर्जोई द्वारा किए गए अनुवाद के अनुवादों से नई पुस्तक तैयार की गई। जो समय ‘पंचतंत्र’ के देश से बाहर जाने का था, वही समय लाओ-त्से के भारत आने का था। चीनी लेखक वांग हुआन-त्से ने बादशाह से लाओ-त्से की मूर्ति और उसकी पुस्तक के साथ भारत जाने की अनुमति मागी थी।[4]
ईसा पूर्व छठी शताब्दी भारत और शेष दुनिया में बौद्धिक क्रांति के लिए जानी जाती है, जिसने आने वाली दुनिया की तस्वीर को बदलकर रख दिया था। वह कोई सहसा प्रकट हुआ चमत्कार नहीं था। चमत्कार इसलिए हुआ था क्योंकि मनुष्य चित्रों और प्रतीकों में गढ़ी गई भाषा के जरिए लिपि तैयार कर चुका था। उसकी मदद से वह न केवल अपने, बल्कि दूसरों के ज्ञानानुभवों को भी सहेज सकता था। पूर्वजों से प्राप्त ज्ञान का संहिताकरण कर, उन्हें अगली पीढ़ी को सौंपने का पुनीत कर्म कर सकता था। उससे लाभ उठा सकता था, दूसरों को लाभ उठाने के लिए प्रेरित कर सकता था। सच तो यह है कि मानवेतिहास में वह पहला अवसर रहा होगा, जब मनुष्य के भीतर ‘स्वयंसृष्टा’ होने का भाव जागृत हुआ होगा। इससे उसका आत्मविश्वास बढ़ा। उसे लगा कि अब वह धरती को पहले से बेहतर और रहने योग्य बना सकता है। भारत में लिप्याकरण का ज्ञात इतिहास सिंधु सभ्यता से आरंभ होता है। भाषा और लिपि का आविष्कार होने के बाद उसके जरिए बौद्धिक क्रांति को गति देने का काम जैन और बौद्ध दार्शनिकों के साथ-साथ वैदिक मुनियों और मनीषियों ने किया। बाद में लोग इस परंपरा को आगे बढ़ाने के लिए लगातार आते रहे। उनकी संख्या अनगिनत है– बृहस्पति, परमेष्ठिन, अत्रि, याज्ञवल्क्य, प्रवहण जैवेलि, आरुणि, अगस्त्य, रैक्व, मक्खलि गोसाल, पूरण कस्सप, बुद्ध, महावीर, गौतम, कणाद, कपिल गौतम आदि। इस काम में स्त्रियां भी पीछे नहीं रहीं। कम अवसरों के बावजूद लोपामुद्रा, मैत्रेयी, गार्गी, मातंगी और खना जैसी विदूषियां ज्ञान-परंपरा को सहेजने और विस्तार देने के लिए हमेशा आगे आती रहीं। छठी शताब्दी में जन्मी खना ने कृषि और मौसम के पूर्वानुमान पर जनमानस में प्रचलित ज्ञान के आधार पर छोटी-छोटी कविताएं लिखी हैं, जिन्हें ‘खना के वचन’ कहा जाता है। उसमें एक ‘वचन’ इस प्रकार है–
खाटे खटाय लाभेर गांति, तार अर्धेक माथाय छाती
घरे एसे पूछे वात, तार घरे हा-भात, हा-भात।
यानी, जो किसान स्वयं हल चलाता है, वह पूरी फसल अपने घर ले जाता है। नौकरों के साथ खेती करने वाला किसान सिर्फ आधा ही पाता है। जो घर बैठे-बैठे नौकरों से काम लेता है, वह खाली हाथ रह जाता है।
भाषायी शिक्षण-संरक्षण एवं ज्ञान-विज्ञान की उन्नत परंपरा को सहेजने, संवारने और समृद्ध करने का काम निरंतर चलता रहा। इसके लिए भाषायी उपकरण गढ़ने तथा पहले से गढ़ी हुई भाषा का मानकीकरण करने वालों में शाकटायन, यास्क, कौत्स, पाणिनि, तोलकप्पियार, कात्यायन, पतंजलि आदि व्याकरणाचार्यों के नाम आते हैं। समानांतर रूप से भाषा को समृद्ध करने का काम भी लगातार चलता रहा। अत्रि, अग्निवेश्यायन (चरक संहिता के प्रमुख लेखक), सुश्रुत, जीवक आदि ने आयुर्वेद को समृद्ध किया, तो मस्करीपूरण, मुद्गल, पूतना, आर्यभट्ट, भास्कराचार्य, श्रीधर, ब्रह्मगुप्त आदि महान गणितज्ञ के रूप में सराहे गए।[5] भाषा का मंजा हुआ रूप दक्षिण में संगम कालीन कविता, महाभारत, रामायण, जैन, बौद्ध और उपनिषदादि ग्रंथों में देखने को मिला। युद्ध की विभीषिका से गुजर रहे समाज को कृष्ण ने अपने गूढ़ संदेश में कहा था– ‘मनुष्य के लिए मनुष्य से बढ़कर कुछ भी नहीं है।’[6]
ज्ञान के सृजन और संवितरण का काम किसी एक देश, सभ्यता या संस्कृति के भरोसे कभी नहीं था। बल्कि जहां-जहां मनुष्यता ने आंखें खोलीं, वहां-वहां ज्ञान की फसल लहलहाने लगी। भारत से बाहर ग्रीक में सुकरात, डेमोक्रिटिस, जीनो, प्लेटो, अरस्तु ने बौद्धिक क्रांति का नेतृत्व किया तो चीन में कन्फ्युशियस, हुआंग लाओ, लाओत्से गणित, ज्योतिष, रसायन, स्थापत्य आदि क्षेत्रों में अपनी धाक जमाने में कामयाब रहे। बुद्ध ने ओजमयी भाषा में संदेश दिया, ‘अपना दीपक आप बनो’ (‘अप्पदीपो भव’)। वहीं सुकरात बोले– ‘शुभत्व ही ईश्वर है’। मगध-वैशाली युद्ध की विभीषिका देख गोसालक के मुंह से निकला था– ‘शांति ही श्रेष्ठ है’ (शांतिर्वः श्रेयषि, अष्ठाध्यायी भाष्य 6.154.1) वहीं अरस्तु ने याद दिलाया– ‘मनुष्य विवेकशील प्राणी है।’
विश्व के ख्यातिनाम शिक्षकों में से एक कन्फ्युशियस से जब पूछा गया कि सबसे शक्तिशाली क्या है तो उन्होंने बिना हिचके कहा– ‘सहृदयता’। मनुष्य करुणा के महत्व को पहचानकर ही मनुष्य बन सकता है। दक्षिण में तिरुवेल्लुवर ने ‘तिरुक्कुरल’ की रचना कर, बताया कि कैसे और किन शर्तों पर मनुष्य बना जा सकता है और किन गुणों के अभाव में मानुष अमानुष की कोटि में चला जाता है। मनुष्य तथा मनुष्यता के निर्माण में ज्ञान की वैश्विकता को रेखांकित करते हुए, उन्होंने कहा था– विद्वान के लिए पूरी धरती उसका परिवार है। हर देश उसका अपना देश है। फिर लोग सांस रहने तक ज्ञानार्जन के काम में असावधानी क्यों बरतते हैं![7]
लेकिन भाषा और शिक्षा की दृष्टि से देखें तो बाजी फिर मिस्र के हाथ रही। मिस्र के राजा अमरता की खोज में पिरामिडों में पैसा खर्च कर रहे थे, वहीं पतहोतेप (2500 ईस्वी पूर्व), जैसे साधारण लोग अपने बच्चों को पढ़ाने-लिखाने पर जोर दे रहे थे– “तुम उसे अतीत की बातें सिखाओ ताकि वह महान लोगों की संतानों के लिए आदर्श बन सके। उसमें सुनने की शक्ति आ जाए, जिससे वह हर दिल की गहराई तक पहुंच जाए। उससे बातें करो, क्योंकि कोई भी व्यक्ति जन्म से बुद्धिमान नहीं होता।” [पतहोतेप (मिस्र, 2500 ईस्वी पूर्व), पतहोतेप की शिक्षाएं]
पतहोतेप का जिक्र हुआ है तो मिस्र के त्जरू इलाके के दुखा-खेत्ती (1292-1189 ईस्वी पूर्व) को भूल जाना घोर नादानी होगी। पतहोतेप ने लेखन की महत्ता को रेखांकित किया था, तो दुआ-खेत्ती ने अपने बेटे पेपी को, जब वह उसे अपने घर की दक्षिण दिशा में स्थित बस्ती के सर्वश्रेष्ठ स्कूल में भर्ती करने लेकर जा रहा था, उसे शिक्षा के महत्त्व के बारे में समझाया था। चलते-चलते वह विभिन्न पेशों की चर्चा पुत्र से करता है। इनमें सुनार, लुहार, बढ़ई, नाई, भट्टे पर ईंट पाथने वाला, पेशेवर सैनिक, कुम्हार, जंगल साफ करने वाला मजदूर, किसान, माली, धोबी, खेतिहर मजदूर, बुनकर, लकड़हारा, राजमिस्त्री, चटाई बुनने वाला, पत्थर तराश, बहेलिया, व्यापारी आदि शामिल हैं। वह करीब-करीब हर पेशे को अपने विमर्श में ले आता है। उनमें से हरेक की खूबी और उनमें लगने वाली कमरतोड़ मेहनत और उसकी त्रासदी की बात करता है।
यह काव्य-लेख पिता की पुत्र के भविष्य की चिंता और शिक्षा के इतिहास के एकदम शुरुआती पन्ने पर ले जाती है। कविता को पढ़कर कोई भी समझ सकता है कि यह किसी आम इंसान के हृदय की अभिव्यक्ति है। एक सपना है, जो माता-पिता अपनी संतान को लेकर देखते हैं। शिक्षा के इतिहास का यह महत्वपूर्ण दस्तावेज है।[8]
| पिता की पुत्र को शिक्षा : दुआ-खेत्ती (1292 -1189 ईस्वी पूर्व) |
|---|
| पिता ने पुत्र से कहा : मैंने हिंसक पिटाई देखी है आदमी को जबरन श्रम के लिए गिरफ्तार होते हुए भी देखा है तुम अपना मन लिखने में लगाओ— देखो, लेखन से बढ़कर कुछ भी नहीं है यह एक शाही आदमी की तरह है लेख के अंतिम संदेश को खुद पढ़ो, उसमें लिखा मिलेगा ‘लेखक, चाहे जैसे घर में वास करे– गरीब नहीं हो सकता’ --- मैं चाहता हूं कि तुम अपनी मां से ज़्यादा लेखन को पसंद करो इसकी खूबसूरती को पहचानो क्योंकि यह किसी भी पेशे से बढ़कर है, धरती पर इसके बराबर कुछ भी नहीं है ---- मैं किसी मूर्तिकार को मिशन पर या सुनार को बोझा ढोने के काम पर लगे नहीं देखता लेकिन मैं तांबे के कारीगर को अपनी भट्टी के मुहाने पर मेहनत करते हुए देखता हूं उसकी उंगलियां मगरमच्छ की खाल जैसी हैं उसके पसीने की बदबू मछली के अंडों से भी बदतर है सुनो! छेनी चलाने वाला शिल्पकार मजदूर से ज्यादा मेहनत करता है लकड़ी उसका खेत है हल धातु उसके लिए एक भी रात चैन की रात नहीं होती काम शुरू करने से पहले जब भी वह अंगड़ाई लेता है रात उसके लिए दीपक जला देती है माला बनाने के लिए जौहरी सबसे कठोर पत्थरों का उपयोग करके दूसरे पत्थर में छेद करता है जब वह जड़ाई पूरी कर लेता है, उसकी भुजाएं थकान से टूटी हुई होती हैं रात्रि भोजन के समय वह जमीन पर बिछ जाता है नाई शाम के अंत तक लगातार बुलावे पर, खुद को लगातार सड़क से सड़क पर घसीटता है लोगों को दाढ़ी बनाने के लिए खोजता रहता है। वह अपना पेट भरने के लिए अपनी भुजाओं पर हिंसा करता है, जैसे मधुमक्खियां अपने परिश्रम से खाती हैं। व्यापारी अपने बच्चों को कमाई सौंपकर फिर पहाड़ी इलाके की ओर चला जाता है शेरों और एशियाई लोगों से डरता है। जब वह मिस्र में लौटकर आता है, तभी खुद को फिर से पहचानता है --- देखो, किसी भी लेखक को न भोजन की कमी महसूस होती है न राजसी वस्तुओं और सुख-सुविधाओं की न ही मान-सम्मान की... |
ज्ञान-विज्ञान और सांस्कृतिक समन्वय का जो दौर प्राक्वैदिक और वैदिक काल से आरंभ होकर, ईस्वी शताब्दी के आसपास तक चला था, उसने मध्य काल में एक बार फिर दस्तक दी। इस बार मध्य एशिया से लोग आए। कुछ हमलावर के रूप में तो कुछ अपनी-अपनी संस्कृति के हरकारे बनकर। उससे सभ्यता, संस्कृति और इतिहास के सम्मिलन का दौर आरंभ हुआ। सांस्कृतिक मेल-मिलाप की प्रक्रिया आगे बढ़ी।
बेमिसाल प्रतिभाएं इस दौर में जन्मीं, जिन्होंने पूर्वजों से प्राप्त ज्ञान-विज्ञान को सहेजने, उसका विवेचन-विश्लेषण करने में अपनी अद्वितीय प्रतिभा का प्रदर्शन किया। कुमारिल भट्ट, रामानुजाचार्य, बुद्धघोष, नागार्जुन, अभयदेव सूरि जैसे पांडित्य के धनी इस कालखंड में जन्मे। तो कबीर और रैदास जैसे कवि भी जन्मे, जिन्होंने न केवल एकेश्वरवादी ज्ञान परंपरा से प्राप्त ज्ञान का लोक की भाषा में अनुवाद किया, मौलिक सृजनधर्मी भी बने। वहीं दूसरी ओर प्रतिक्रियावादी परंपरा को आगे बढ़ाने वाले तुलसी और सूर जैसे कवि भी हुए बने। ज्ञान और संस्कार की यह परंपरा कभी न रुकी, न थमी। भारत में प्रवहण जैवेलि, आरुणि, पश्चिम में प्लेटो, अरस्तु से बढ़ती हुई न्यूटन, आइंस्टीन, मारिया मांटेसरी, जोतीराव फुले, सावित्रीबाई फुले, पेरियार, आंबेडकर, रविंद्रनाथ ठाकुर, महर्षि दयानंद, विवेकानंद, ईश्वरचंद्र विद्यासागर, गिजु भाई बधेका, मां आनंदमयी से होती हुई आज तक निरंतर प्रवहमान् है।
भाषा और विकास का बहुत करीबी संबंध है। बालक अपने विकासक्रम के दौरान भाषा सीखता है, फिर जैसे-जैसे वह बड़ा होता है, उसका भाषायी संस्कार और सामर्थ्य भी बढ़ता चला जाता है। यही नहीं, मानव विकास में सहायक होने वाली भाषा समय के साथ-साथ खुद भी विकसित होती जाती है। भाषा के नए-नए अपररूपों, शब्द-सामर्थ्य और उसके सामाजिक-सांस्कृतिक फैलाव को समझने के लिए भाषा-शिक्षण की आवश्यकता पड़ती है। इससे भाषा/बोली के दो रूपों का पता चलता है। पहला वह जो बालक अपने माता-पिता-परिजनों के सान्निध्य में स्वतः सीखता चला जाता है। अपने परिवार, समाज आदि से जो सभ्यता और संस्कृति वह ग्रहण करता है, उसके माध्यम के रूप में भाषा भी स्वतः चली आती है। भाषा के इस रूप को मातृभाषा कहते हैं।
दूसरा वह जिसे मनुष्य अपने विवेकीकरण के लिए, अपने अभिव्यक्ति सामर्थ्य को सुधारने तथा स्वयं को समाज के लिए यथा-सामर्थ्य उपयोगी बनने के लिए समाजीकरण के दूसरे दौर में सीखना आरंभ करता है और समय के साथ निरंतर सीखता चला जाता है। इसके माध्यम से मनुष्य स्वयं को न केवल अधिकाधिक उपयोगी सिद्ध कर सकता है, अपितु अपने लिए भी अधिक सुख-साधन और आत्मतुष्टि प्राप्त कर सकता है।
संदर्भ :
[1] आ नो॑ भ॒द्राः क्रत॑वो यन्तु वि॒श्वतोऽद॑ब्धासो॒ अप॑रीतास उ॒द्भिदः॑..ऋग्वेद 1-89-1
[2] दि इमोर्लिटी ऑफ राइटर :
https://www.ucl.ac.uk/museums-static/digitalegypt/literature/authorspchb.html
[3] हिस्ट्री ऑफ इंडिया भाग 3, संपादन ए वी विलियम जेक्सन, दि ग्रोलर सोसाइटी लंदन, [1906 : 32 तथा परिशिष्ट एक]
[4] रसिक बिहारी जोशी, लोकायत इन एन्शीएंट इंडिया एंड चाइना
[5] गणितविदो मस्करीपूरण… भास्कर प्रथम, आर्यभटीय
[6] न मानुषात् श्रेष्ठतरं हि किञ्चितः.. महाभारत, शांतिपर्व 180.12
[7] तिरुकुरल 40.7
[8] उद्यमों पर तंज, दि इंस्ट्रक्शन ऑफ दुआ-खेत्ती,
https://ancientegyptonline.co.uk/instructions-dua-khety/
(संपादन : नवल/अनिल)