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‘शूद्र विद्रोह’ : एक कंपल्सरी रीडिंग

कांचा आइलैय्या शेपर्ड की यह पुस्तक शूद्र कहने से केवल ओबीसी वर्गों की ओर इशारा नहीं करती, बल्कि दलित, आदिवासी और पिछड़े सभी को शूद्र मानती है। इन तीनों वर्गों के पारस्परिक सम्मिलित क्रांति से ही भारत में समानता-स्वतंत्रता आधारित सभ्यता का निर्माण किया जा सकता है। पढ़ें, अजय कुमार साव की यह समीक्षा

प्रो. कांचा आइलैय्या शेपर्ड एक प्रसिद्ध भारतीय चिंतक हैं। हिंदी में अनूदित इनकी सद्य प्रकाशित पुस्तक ‘शूद्र विद्रोह : ताकि बन सके आत्मनिर्भर भारत’ एक महत्त्वपूर्ण दस्तावेजी ग्रंथ है। इस पुस्तक को पढ़ने के पश्चात् यह विचार आया कि यदि मैं किसी विश्वविद्यालय का कुलपति होता तो इसे पाठ्यक्रम में ‘कंपल्सरी रीडिंग’ घोषित कर देता। इस पुस्तक में लेखक ने भारतीय परंपरा की जड़ को तलाश करने का प्रयास किया है। उनके मुताबिक, भारतीय परंपरा की जड़ें सिंधु घाटी सभ्यता में हैं। वे सिंधु घाटी सभ्यता को शूद्र सभ्यता अर्थात् यहां के मूलनिवासियों की सभ्यता मानते हैं। उनका कहना है कि “ऋग्वेद के पूर्व के काल में शायद शूद्र शब्द का प्रयोग उत्पादक और राष्ट्रवादी तबके के लिए किया जाता था”[1] यहां तत्कालीन ‘शूद्र’ शब्द से लेखक का आशय वर्तमान में भारत के दलित, आदिवसी और पिछड़े वर्ग से है, जो आर्यों के आक्रमण के पश्चात् दास बना लिये गए।

लेखक के अनुसार भारत में जो भी पिछड़ापन, अंधविश्वास, अशिक्षा और विषमता है, उसका एकमात्र कारण ‘ब्राह्मणवाद’ है। भारत में पूंजीवाद का उदय तो हुआ लेकिन वह ब्राह्मणवाद का दमन करके नहीं, अपितु ब्राह्मणवाद से खाद-पानी लेकर। भारत में ब्राह्मणवाद और पूंजीवाद एक दूसरे के पर्याय हैं। वर्तमान भारत में पूंजीवादी वही है जो एक विशेष वर्ग से आता है। भारत की विषमतामूलक सामाजिक व्यवस्था के कारण यहां रूस, फ्रांस आदि देशों में जैसी कभी कोई क्रांति नहीं हो पाई। इस विषमतामूलक संरचना में प्रमुख भूमिका ब्राह्मणवाद की है। मंडल आयोग की रिपोर्ट में बहुत मार्के की एक बात कही गई है जो भारत के निम्न वर्गों के आर्यों के उपनिवेश बनने के कारणों को स्पष्ट करती है। इसे कांचा आइलैय्या उद्धृत करते हैं– “जाति-व्यवस्था की असली सफलता यह नहीं कि उसने ब्राह्मणों की श्रेष्ठता को बनाए रखा, बल्कि उसकी असली सफलता यह रही कि उसने निम्न जातियों की चेतना को इस तरह परिवर्तित कर दिया कि वे धार्मिक पदक्रम में अपने निचले दर्जे को स्वाभाविक मानने लगे।”[2]

लेखक को यह पुस्तक लिखने की प्रेरणा 2020 के किसान आंदोलन से मिलती है। 2014 के बाद भारत में जो पार्टी सत्ता में आई है वह मूलतः दक्षिणपंथी ब्राह्मणवादी पार्टी है। इसके शीर्ष नेता सभी ब्राह्मण रहे हैं। वर्तमान में यह पार्टी भले सामाजिक समरसता का ढोंग करे और कहे कि इसके मंत्रिमंडल में सबसे ज्यादा एससी, एसटी और ओबीसी हैं तथा प्रधानमंत्री के पद पर भी पिछड़े वर्ग के ही लोग हैं, लेकिन यह सब छलावा है। इस दल के सर्वेसर्वा आरएसएस वाले हैं। उन्हीं का नियंत्रण इस दल और इस सरकार पर है। किसान आंदोलन के समय आंदोलनरत किसान सभी शूद्र ही थे, जिन्होंने सरकार को घुटनों पर ला दिया। किसानी को हिंदू शास्त्रों (जैसे मनुस्मृति आदि) में शूद्रों का ही कार्य निर्धारित किया गया है।

लेखक ब्राह्मणवादी पुस्तकों के संदर्भ में लिखते हैं, “आर्य-पूर्व भारतीय एक ही नस्ल और एक ही संस्कृति के थे और उन्होंने पशुपालन व कृषि आधारित अर्थव्यवस्था का निर्माण किया। मगर उनके योगदान को वेद, उपनिषद, रामायण और महाभारत जैसी प्राचीन ब्राह्मणवादी संस्कृत पुस्तकों में कोई स्थान नहीं मिला। ये पुस्तकें केवल आर्यों की युद्ध आधारित सभ्यता पर केंद्रित थीं और उन्होंने शूद्र, दलित और आदिवासी वर्गों की श्रम शक्ति एवं उनकी उत्पादन तकनीकी को ज़रा भी तवज्जो नहीं दी। उन्होंने इन वर्गों के लोगों को बुद्धिहीन व निम्न दर्जे का मनुष्य बताया।”[3]

समीक्षित पुस्तक का आवरण पृष्ठ

‘कुदाल और किताब : एक नया सभ्यतागत विमर्श’ अध्याय में लेखक भारत के पिछड़ेपन का एक प्रमुख कारण बताते हैं– “जो सबसे अजीब चीज ब्राह्मणों ने की थी वह था कुदाल सभ्यता (सिंधु घाटी सभ्यता) के निर्माताओं पर उनकी नई खोजों, अनुभवों और उत्पादन प्रक्रियाओं को किताब के रूप में प्रस्तुत करने पर प्रतिबंध लगाना। यही कारण था कि सभ्यता के निर्माण में उनकी भूमिका का दस्तावेजीकरण ही नहीं हो सका। 21वीं सदी आते-आते भारत चीन से बहुत पीछे छूट गया और इसका कारण था कुदाल और किताब की संस्कृतियों को अलग-अलग रखना। किताबों के जरिए कुदाल संस्कृति के विचारों के उत्पादन, निर्माण और प्रसार पर जानबूझ कर प्रतिबंध लगा दिया गया। … किसी भी राष्ट्र-राज्य की सीमाओं में बोली जाने वाली सभी भाषाओं के लिए लिपि विकसित करना एक राष्ट्रवादी कार्यक्रम होता है। लेकिन ब्राह्मणवाद ने आदिवासियों की कोई लिपि विकसित ही नहीं होने दी, क्योंकि वे चाहते थे कि आदिवासियों को भी अपने जीवन, अपने ज्ञान के उद्भव और उन तकनीकों, जिन्हें उन्होंने अस्तित्व में बने रहने के लिए विकसित किया, के बारे में लिखना नहीं चाहिए। कुल मिलाकर, शूद्र, दलित और आदिवासी तबकों को उत्पादन के तरीकों और तकनीकी के विकास के लिए केवल अपनी स्मृति पर निर्भर रहना पड़ा। जाहिर है कि यह एक बड़ी समस्या थी। बहुत छोटे से इलाके में बोली जाने वाली या क्षेत्रीय अल्प विकसित भाषाओं के चलते उनमें परस्पर संवाद विकसित ही न हो सका, जिससे राष्ट्र की प्रगति बाधित हुई।”[4]

यहां स्पष्ट है कि कुदाल संस्कृति से आशय है– श्रमण या उत्पादन संस्कृति। ‘संस्कृत : एक कुदाल विरोधी भाषा’ उप-अध्याय में लेखक कहते हैं, “वैदिक साहित्य के सृजन के हजारों साल बाद तक भी शूद्रों को एक साझा भाषा सीखने से वंचित रखा गया। द्विजों – चाहे वे केरल में रहते हों या कश्मीर में, गुजरात में या असम में – सभी संस्कृत जानते थे, उनके ग्रंथ इसी भाषा में थे और उसी ने उन्हें जोड़े रखा। अब अंग्रेजी में लिखने वाले अधिकांश भारतीय लेखक द्विज हैं (और कहने की जरूरत नहीं कि उनमें से अधिकांश ब्राह्मण हैं)। उन्होंने संस्कृत को त्याग दिया है क्योंकि वह उन्हें न तो दुनिया और न भारत में आगे बढ़ने के अवसर प्रदान करती है और न ही उन्हें सत्ता और शक्ति देती है। इसके भारत के कृषकों और शिल्पकारों और उनकी उत्पादन प्रक्रिया के लिए दो निहितार्थ हैं। द्विजों ने शूद्रों और दलितों से अतीत में अपने विचारों और ज्ञान को साझा नहीं किया। शूद्र, दलित और आदिवासी जब साक्षर बन भी गए और उन्होंने अपनी-अपनी क्षेत्रीय भाषाओं में अपने काम के बारे में पुस्तकें लिख लीं तब भी उनके सीमित भाषाई घेरे के बाहर के लोग उनके लेखन को पढ़ नहीं सके। इससे कुदाल संस्कृति की उन्नति बाधित हो गई और इस संस्कृति के झंडाबरदार अपने ज्ञान और तकनीक को रचनात्मक प्रक्रियाओं से बेहतर नहीं बना सके। नियंत्रण और प्रबंधन की इस प्रणाली से शूद्र, दलित और आदिवासी तो प्रभावित हुए ही, इससे भारत की सभ्यता को भी भारी क्षति हुई।”[5]

कांचा आइलैय्या शेपर्ड भारत में फैले ब्राह्मणवादी दर्शनों को भ्रामक अथवा शूद्रों के खिलाफ़ षड्यंत्रकारी मानते हैं, उनके अनुसार भारत का एकमात्र दर्शन है– कृषिवाद। वे अध्यात्म में भी श्रम के पक्ष में हैं। धर्म में श्रम की महत्ता के लिए वे बाइबिल का उदहारण देते हैं, साथ ही ब्राह्मणवादी पुस्तकों की तुलना करते हैं जिसमें श्रम के बारे में कोई बात नहीं बताई गई है। हड़प्पा सभ्यता के मूल में भी यही कृषिवाद है। लेखक ‘हड़प्पा के कृषिवाद की वापसी की जरूरत’ उप-अध्याय में लिखते हैं, “वैदिक ग्रंथों के लेखन के बाद से पूर्व वैदिक कृषिवाद को किनारे कर दिया गया, क्योंकि खाद्यान्न उत्पादन, समुदायवाद और समतावाद इसके आधार हैं। भारतीय ब्राह्मणवाद समुदायवाद का विरोधी है, क्योंकि यह कृषिवाद की उन्नति में मुख्य भूमिका अदा करता है और साथ ही मनुष्यों की बीच बराबरी को भी प्रोत्साहन देता है। समुदायवाद के रहते जीवन के किसी भी क्षेत्र में जाति की संस्कृति अपना घर नहीं बना सकती थी। वेदों ने समाज को चार वर्णों में विभाजित किया। मगर यह श्रेणीकरण श्रम विभाजन पर आधारित नहीं था, बल्कि शूद्रों पर ब्राह्मणवाद की सामाजिक और आध्यात्मिक प्रभुता पर आधारित था। इस श्रेणीकरण ने कृषिवाद की प्रगति को बाधित किया और इस तरह भारत को आधुनिक युग में प्रवेश करने नहीं दिया। मगर भारत में कृषिवाद का एक लंबा इतिहास था जो हड़प्पा की सभ्यता से शुरू होता था। उस समय से ही कृषि उत्पादन के क्षेत्र में प्रयोग शुरू हुए। वैदिक काल में हड़प्पा के पूर्व/मूल निवासियों को शूद्र गुलाम घोषित कर दिया गया। हड़प्पा की सभ्यता का अंत, चाहे अपने आप हुआ हो या उसे नष्ट किया गया हो, के बाद से गुलाम बना दिए गए शूद्रों को प्रवासी आर्यों द्वारा सभी आध्यात्मिक अधिकारों से वंचित कर दिया गया। आर्यों ने अपने ग्रंथों में कृषिवाद को आध्यात्मिक अछूत बना दिया। आधुनिक काल में आरएसएस और हिंदुत्व के पैरोकारों की भी मोटे तौर पर यही विचारधारा है। उनका राष्ट्रवाद उतना ही ब्राह्मणवादी है जितना कि प्राचीन संस्कृत अध्यात्मवाद है।”[6] इसी कृषिवाद विरोधी सत्ता ने तीन काले कृषि कानून लाए थे जो भारतीय कृषि को पूंजीवाद की फैक्ट्री का उत्पाद बनाना चाहते थे।

हम देख सकते हैं कि कांचा आइलैय्या शेपर्ड की यह पुस्तक वर्तमान संदर्भों के साथ-साथ भारतीय अतीत में आर्यों के उपनिवेश की कितनी गहनता से जांच करती है। ब्राह्मणवाद से पटी हुई भारत की धरती को स्वतंत्र कराने के लिए एक शूद्र क्रांति की आवश्यकता है। इस पुस्तक में लेखक ने वर्ण, जाति, धर्म, भाषा, लिंग और क्षेत्र के आधार पर शूद्र कैसे गुलाम बनाए गए और आज भी बने हुए हैं, इसके कारणों की मानीखेज व्याख्या करते हैं। लेखक का मूल उद्देश्य है– कृषिवादी आध्यात्मिक दर्शन की स्थापना जो भारत के मूल निवासियों का वास्तविक दर्शन है।

यह पुस्तक शूद्र कहने से केवल ओबीसी वर्गों की ओर इशारा नहीं करती, बल्कि दलित, आदिवासी और पिछड़े सभी को शूद्र मानती है। इन तीनों वर्गों के पारस्परिक सम्मिलित क्रांति से ही भारत में समानता-स्वतंत्रता आधारित सभ्यता का निर्माण किया जा सकता है।

समीक्षित पुस्तकशूद्र विद्रोह : ताकि बन सके आत्मनिर्भर भारत

लेखककांचा आइलैय्या शेपर्ड

प्रकाशकफारवर्ड प्रेस, नई दिल्ली

मूल्य : 350 रुपए

संदर्भ :

[1] शेपर्ड, कांचा आइलैय्या, शूद्र विद्रोह : ताकि बन सके आत्मनिर्भर भारत, पृष्ठ xiii

[2] वही

[3] वही

[4] वही, पृष्ठ 63

[5] वही, पृष्ठ 65-66

[6] वही, पृष्ठ 166-167

(संपादन : नवल/अनिल)

लेखक के बारे में

अजय कुमार साव

लेखक तेजपुर विश्वविद्यालय, असम में हिंदी साहित्य के शोधार्थी हैं

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