[दलित-बहुजनों के लिए अप्रैल माह विशेष मायने रखता है। इस महीने की 11 तारीख को जोतीराव फुले और 14 तारीख को डॉ. आंबेडकर की जयंती पूरे देश में लोग धूमधाम से मनाते हैं। जोतीराव फुले का जन्म 11, अप्रैल 1827 को हुआ था और इस लिहाज से यह वर्ष उनके जन्म के दो सौवीं जयंती का आगाज है। फारवर्ड प्रेस इस अवसर पर प्रस्तुत कर रहा है जोतीराव फुले व उनके विचारों पर आधारित आलेखों की शृंखला। आज पढ़ें डॉ. सुरेश कुमार का यह आलेख]
इतिहास के आईने में देखा जाए तो उन्नीसवीं सदी का उतरार्द्ध सामाजिक सुधारवादी आंदोलनों के तनावों की सरगर्मियों से भरा रहा। जहां एक तरफ ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन का पतन हुआ, और शासन की बागडोर महारानी विक्टोरिया के हाथों में आ गई थी। औपनिवेशिक कालीन भारतीय बौद्धिकों के एक तबके ने विक्टोरिया शासन को उगते हुए सूर्य की रोशनी की तरह देखा था। लिहाज़ा, औपनिवेशिक राजसत्ता और भारतीय बौद्धिकों के बीच अपनी-अपनी अस्मिताओं को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए एक नए सिरे की जद्दोजहद शुरू हुई। इसी जद्दोजहद के दरमियान बहुजन पृष्ठभूमि से आने वाले बौद्धिकों को यह अहसास हुआ कि औपनिवेशिक और देशी सत्ता की आपसी गठजोड़ ने शूद्रों और दलितों पर अपनी धार्मिक ताबेदारी लादकर उन्हें सांस्कृतिक और धार्मिक तौर पर गुलाम बनाकर सार्वजनिक क्षेत्र के संसाधनों से वंचित कर दिया है। उन्नीसवीं सदी में जोतीराव गोविंदराव फुले (1827-1890) ने इस धार्मिक और सांस्कृतिक ताबेदारी के विरुद्ध पहलकदमियों को अंजाम देकर बहुजन विमर्श का एक मारक आख्यान खड़ा किया।
ब्राह्मणवादी स्रोतों की व्याख्या करते हुए फुले ने पाया कि वर्ण-व्यवस्था की एक उत्पाद जाति केवल सामाजिक श्रेणी के अनुक्रम का निर्धारण नहीं करती बल्कि सामाजिक अवसरों और आर्थिक विषमता को बढ़ावा देने वाली एक जालिम प्रणाली है। जाति-प्रथा जैसी विषम व्यवस्था के रहते हुए बहुजन अस्मिताएं सामाजिक तौर पर स्वीकृत नहीं हो सकती थीं। लिहाजा, उन्होंने शूद्रों और दलितों को सार्वजनिक क्षेत्र में हिस्सेदारी के लिए जाति-व्यवस्था के विरुद्ध एक अभियान छेड़ दिया।
ब्राह्मणवादी सर्वभौमिकता के खिलाफ़ अपने अभियान में सबसे पहले फुले ने औपनिवेशिक सत्ता को सूचित करना उचित समझा। उनका आरोप था कि औपनिवेशिक सत्ता का रवैया ब्राह्मणवादी निर्मितियों के साथ दोस्ताना है। यदि ऐसा नहीं तो औपनिवेशिक शासकों द्वारा हिंदुओं के धर्म और कानून में हस्तक्षेप न करने का वचन नहीं लिया जाता। उन्होंने अपने तर्क की पुष्टि में कहा कि औपनिवेशिक सत्ता के कायम होने पर दलितों और पिछड़ी जातियों की सामाजिक हैसियत ऊपर नहीं उठी। महात्मा फुले का दावा था कि औपनिवेशिक शासक ऊंची जाति के हिंदुओं के झांसे में आकर शूद्रों की वास्तविक स्थिति से बिल्कुल अनभिज्ञ हैं। उन्हें इस बात की कोई खोज-खबर नहीं है कि ऊंची श्रेणी के हिंदू वंचित समुदाय के साथ गुलामों जैसे व्यवहार करते हैं।
फुले के कहने का अर्थ था कि औपनिवेशिक सत्ता के आने से बहुजन जातियों की सामाजिक आर्थिक और शैक्षिक हैसियत में बहुत ज़्यादा सुधार नहीं हुआ है। उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में औपनिवेशिक सत्ता के समक्ष जिस सवाल को फुले ने रखा था, आगे चलकर उसी सवाल को उनको गुरु मानने वाले डॉ. आंबेडकर ने बीसवीं सदी के तीसरे दशक में अंग्रेजों से पूछा था। डॉ. आंबेडकर ने 1930 में आयोजित दलित सम्मेलन के सभापति के हैसियत से पूछा था कि अंग्रेजों की सत्ता में दलित कुआं, तालाब, सराय जैसे सार्वजनिक क्षेत्र के उपयोग से वंचित हैं। यहां तक कि दलित सरकारी महकमों में भी नहीं जा सकते हैं। फिर, अंग्रेजों की सत्ता से दलितों को क्या लाभ हुआ? फुले और आंबेडकर के यह ऐसे मारक सवाल थे जिससे औपनिवेशक शासक बहुत विचलित हो गए थे।

औपनिवेशिक भारत में हिंदू अस्पृश्यता का बड़ा भयंकर बोलबाला था। ब्राह्मणवादी सरंचना के दायरे में शूद्रों-अतिशूद्रों को किसी तरह का आत्म-सम्मान प्राप्त नहीं था। अतिशूद्रों को आठों पहर सवर्ण अभिजनों की छुआछूत की अवमानना का लगातार दंश झेलना पड़ता था। उच्च श्रेणी की हिंदू मनोवृति का जिक्र करते हुए फुले बताते हैं कि ब्राह्मणवादी सरंचना के भीतर शूद्र-अतिशूद्र (पिछड़ी और दलित जाति) को प्रकृति प्रदत्त संसाधनों के इस्तेमाल करने तक की छूट नहीं हैं। यदि कोई शूद्र नदी के किनारे अपने कपड़े धो रहा होता है, यदि इत्तिफ़ाक से कोई ऊंची जाति का हिंदू आ जाता तो शूद्रों को वहां से तत्काल हट जाना पड़ता था। पोथाधारी ब्राह्मण शूद्रों को नदी में स्नान और कपड़े धोता देखकर आग के शोले बरसाने लगते थे। ऐसे कट्टरपंथी हिंदू पवित्रता भंग करने के एवज में शूद्रों को दंडित करने का उपक्रम भी किया करते थे। ऊंची जाति के हिंदू दंड स्वरूप शूद्रों को सिर्फ मानसिक प्रताड़ना ही नहीं देते बल्कि उनके देह को भी चोट पहुंचाते थे। इससे भयंकर शूद्रों के साथ सामाजिक अन्याय और क्या हो सकता था।
शूद्रों की सबसे बड़ी त्रासदी यह भी थी कि वह कट्टरपंथी हिंदुओं की उद्दंडता की शिकायत औपनिवेशिक सत्ता से भी नहीं कर सकते थे। यदि शूद्र ब्राह्मणों के अत्याचार की शिकायत करते तो परंपरावादी हिंदू धार्मिक पवित्रता भंग करने का हवाला देकर उल्टे उन्हें ही फंसा देते थे।
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महात्मा फुले के मुताबिक यदि सरकार से शिकायत करें तो चारों तरफ ब्राह्मणशाही का जाल फैला हुआ था; बल्कि शिकायत करने का खतरा यह रहता था कि खुद ही सजा भोगने का मौका न आ जाए। देखा जाए तो फुले अपने उपरोक्त कथन से औपनिवेशिक सत्ता को संबोधित कर यह बता रहे थे कि ब्राह्मणशाही दलित-पिछड़ी जातियों के लिए अजगर के समान है। जोतीराव फुले ने इतिहासबोध और अपनी बहुपठिता से ‘आर्य बनाम अनार्य’ की अवधारणा देकर एक नए सिरे से बहस छेड़ दी थी। उन्होंने ब्राह्मणों की अस्मिता को संदेह के दायरे में लाकर खड़ा कर दिया था। फुले का स्पष्ट मत था कि शूद्र और दलित ही देश के मूलनिवासी हैं। आर्य बाहर से आकर छल-बल से यहां के मूल निवासियों को अपना गुलाम और दास बनाकर उन पर असामाजिक संहिताएं लागू की। आर्यों की असामाजिक संहिताओं के चलते शूद्रों और अतिशूद्रों की स्थिति बद से बदतर होती गई। फुले की ‘आर्य बनाम अनार्य’ वाली इसी थ्योरी को आगे चलकर स्वामी अछूतानंद ने विस्तारित किया तथा आदि हिंदू विमर्श को स्थापित किया। इसी विमर्श को कांशीराम ने भी मूलनिवासी के रूप में अपनाया।
महात्मा फुले औपनिवेशिक सत्ता से शूद्रों और अतिशूद्रों की वास्तविक स्थिति में सुधार की आशा रखते हुए भी अपने लिए वैकल्पिक रास्तों की तलाश भी कर रहे थे। मसलन, उन्होंने ब्राह्मणवादी अवधारणा को खारिज करने के लिए शूद्रों और अतिशूद्रों को गोलबंद कर सन् 1873 में ‘सत्य शोधक समाज’ सरीखे क्रांतिकारी संगठन की स्थापना की। बहुजन अवधारणा की दृष्टि से देखा जाए तो ‘सत्यशोधक समाज’ की स्थापना औपनिवेशिक भारत की एक बड़ी परिघटना थी। इस समाज का प्रमुख एजेंडा ब्राह्मणवादी छल-पाखंड के दुष्चक्र से शूद्रों और अतिशूद्रों को मुक्ति दिलाकर उनके भीतर वैज्ञानिक ज्ञानोदय की चेतना को विकसित करना था। फुले ने सत्यशोधक समाज की स्थापना के उद्देश्यों पर रोशनी डालते हुए बताया कि ब्राह्मण, पंडित, जोशी, उपाध्याय-पुरोहित आदि लोगों, जो अपने स्वार्थी धर्म ग्रंथों के द्वारा हजारों साल से शूद्र लोगों को नीच समझकर लूटते आ रहे हैं। उनकी दासता से शूद्र-अतिशूद्र लोगों को मुक्त करने, धर्म और व्यवहार से संबंधित ब्राह्मणों के नकली और स्वार्थी ग्रंथों से मुक्ति दिलाने के लिए उपदेश और ज्ञान के द्वारा शूद्रों-अतिशूद्रों को उनके सही अधिकार समझाने के लिए कुछ जानकार शूद्र लोगों ने पहल की है।
सत्यशोधक समाज का असर यह हुआ कि शूद्रों और अतिशूद्रों ने मिलकर शादी-विवाह और मांगलिक उत्सव में पुरोहितों और पोथीधारियों को बुलाना बंद कर दिया। महात्मा फुले की यह सामाजिक सुधार की पहल परंपरावादी हिंदुओं और पुरोहितों को रास नहीं आई। ऐसे ही कट्टरपंथी हिंदुओं ने सत्यशोधक समाज के एजेंडा से कुपित होकर खलल डालने का प्रयास किया। यहां तक कि कट्टरपंथियों की ओर से सत्यशोधक के सदस्यों को सामाजिक बहिष्कार की धमकी भी दी गई थी। औपनिवेशक भारत में सत्यशोधक समाज का व्यापक असर यह हुआ कि शूद्रों और अतिशूद्रों ने ब्राह्मणवादी कर्मकांडों से किनारा कर लिया।
उन्नीसवीं सदी में कई ज्वलंत मुद्दों में से एक स्त्री-समस्या भी ज्वलंत मुद्दा बनकर उभरी थी। शूद्रों और अतिशूद्रों की तरह स्त्रियां ब्राह्मणवादी पितृसत्ता की अवमानना की प्रबल शिकार थीं। औपनिवेशक भारत का यह वही दौर था जब स्त्री-समस्या को भद्रवर्गीय मूल्यों में ढालकर उनकी संभावनाओं और इच्छाओं पर अंकुश लगाने का उपक्रम किया जा रहा था। यहां तक कि प्रगतिशील कहलाने वाले आर्य समाजी (आर्य समाज का गठन सत्यशोधक समाज के दो साल बाद हुआ था।) भी स्त्री-समस्या पर मुखर तौर पर बोलने से परहेज करते थे। ऐसे में फुले ने स्त्री अधिकारों की पहलकदमियों को न सिर्फ अंजाम दिया बल्कि उनकी प्रगति में रोड़ा बनने वाली संरचना की शिनाख्त भी की थी। इस महान विचारक और शिक्षाविद् ने सिर्फ हवा-हवाई बातें नहीं की, बल्कि अपने व्यक्तिगत प्रयासों से स्त्रियों को सबल बनाने के लिए स्कूल खोला। जब ताराबाई शिंदे और पंडिता रमाबाई पर हिंदू सुधारकों का कोप अपने चरम पर था, उस समय फुले ने परंपरावादी हिंदुओं की परवाह न करते हुए, बड़े दमखम से उनका साथ दिया। उच्च श्रेणी की स्त्रियां आज भले ही फुले को अपना हितैषी न मानती हों, लेकिन हमें इतिहास के स्रोतों के प्रति ईमानदारी दिखाते हुए, यह स्वीकार करना पड़ेगा कि महात्मा फुले अपने समकालीनों में सबसे बड़े स्त्री हितैषी और उनके अधिकारों के पैरोकार के तौर पर हमारे सामने प्रस्तुत होते हैं।
महात्मा फुले एक सजग बौद्धिक थे। उन्होंने शूद्रों के सांस्कृतिक सबलीकरण, शादी-विवाह और उत्सव के समय पुरोहितों से सावधान रहने का फार्मूला भी पेश किया। इतना ही नहीं उन्होंने जीवित रहते हुए अपनी वसीयत भी लिखी थी। बहुजन बौद्धिकों से मेरा आग्रह है कि फुले की इस वसीयत से एक बार जरूर गुजरना चाहिए। एक बौद्धिक और दूदर्शी की तरह फुले ने अपनी इस वसीयतनामा में लिखा था कि यदि मेरा बेटा सत्यशोधक और सामाजिक काम को आगे बढ़ाने में असफल होता है, तो बहुमत से सत्यशोधक की जायदाद किसी होशियार शूद्र लड़के के दे दी जाए। मेरे मरने के बाद मेरे मृत शरीर को ब्राह्मणों को छूने नहीं देना चाहिए, यहां तक कि उनकी छाया से भी मेरे शरीर को दूर रखा जाए।
फुले उन्नीसवीं सदी के महानतम व्यक्तियों में से एक थे, जिन्होंने औपनिवेशिक भारत में तमाम बहसों और विमर्शों की नुमाइंदगी करते हुए ब्राह्मणवादी अवधारणा और उसकी निर्मितियों को चुनौती पेश की थी। भारतीय नवजागरण के जनक्षेत्र में सच्चे अर्थों में उनका विचार और साहित्य पुनर्जागरण की केंद्रीय धुरी था। उनके चिंतन और विचार का मुख्य प्रोजेक्ट ब्राह्मणवादी ताकतों के विरुद्ध था। उन्होंने ‘गुलामगिरी’ जैसे मारक और बौद्धिक किताब लिखकर इस विमर्श को दिशा दी कि ब्राह्मणशाही शूद्रों, अतिशूद्रों, किसानों और स्त्रियों के प्रगति में सबसे घातक अवरोध है। जिस दौर में ऊंची जाति के लोग वेद-पुराणों को अपने सिरहाने रखकर सोते और झोले में डालकर चलते थे, ऐसे माहौल में ब्राह्मणवाद के विरुद्ध मोर्चेबंदी की पहल करना निश्चित ही कोई मामूली बात नहीं थी।
(संपादन : नवल/अनिल)
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