“लुप्त खजाने शायद ही कभी हमेशा के लिए खो जाते हैं…उन्हें तो केवल इंतज़ार होता है किसी जिज्ञासु का, जो आए और उन्हें ढूंढ निकाले…” (अज्ञात)
(यह लेखों की उस शृंखला में पांचवां लेख है, जो डॉ. आंबेडकर के जीवन की भुला, मिटा या नज़रअंदाज़ कर दी गई घटनाओं पर आधारित है – या फिर ऐसी घटनाओं पर जिनके बारे में यह मान लिया गया है कि वे अतीत के अंधेरे में गुम हो गई हैं। इन घटनाओं के बारे में कोई भी जानकारी – चाहे वह कितनी ही मामूली क्यों न हो – जुटाने के लिए ज़रूरी था अभिलेखागारों को खंगालना, नए सिरे से पड़ताल करना या ऐसे बेहतर प्राथमिक स्रोत ढूंढ निकालना जो निष्पक्ष हों, भले ही फिर उनका आंबेडकर से कोई संबंध न हो। मेरी यह स्पष्ट मान्यता है कि आंबेडकर के बारे में कई चीजों को खोजा जाना और उनके बारे में लिखा जाना बाकी है। यह छोटा–सा लेख चैथम हाउस में उनके एक भाषण के बारे में है। साथ ही, मैंने इसमें उनके ऐसे व्याख्यानों और भाषणों के बारे में कुछ जानकारी शामिल की है, जो 1930 के दशक के प्रारंभ में गोलमेज़ सम्मेलनों के आसपास वे अमरीका, इंग्लैंड और कनाडा में देने वाले थे।)
लंदन में आयोजित गोलमेज सम्मेलनों – जिनमें आंबेडकर ने हिस्सा लिया – ने हमें अपने पक्ष की पैरवी करने की उनकी अद्भुत क्षमता से परिचित करवाया। उनकी इस क्षमता की थाह यह लेख तो छोड़िए, कोई पुस्तक नहीं पा सकी है। उनके जीवनी लेखक और अन्य रचनाकार अभी तक उन सामग्रियों से ही जूझ रहे हैं जिसे डॉ. आंबेडकर और हमारे लोग संरक्षित कर सके हैं। वे यह समझने का प्रयास कर रहे हैं कि अभी तक संरक्षित सामग्रियों ने भारतीय राजनीति की अब तक की दिशा को और उसके भविष्य को किस प्रकार प्रभावित किया है। यह शर्मनाक है कि उनमें से अधिकांश ने इन सामग्रियों के अध्ययन और विवेचन को केवल गांधी और आंबेडकर के बीच टकराव तक सीमित कर दिया है और वे तथ्य को नजरअंदाज कर रहे हैं कि आंबेडकर ने किस प्रकार इस पूरे नॅरेटिव को वैधानिक नज़रिए से प्रस्तुत किया। असल में वे संपूर्ण चित्र देख ही नहीं पा रहे हैं। इसका मुख्य कारण है दुनिया को देखने का सवर्णों का नज़रिया, जो हमेशा की तरह अदूरदर्शी और निहित स्वार्थों से प्रेरित है।
गोलमेज सम्मेलन, बैठकों की एक शृंखला थी जिनमें संवैधानिक सुधारों और भारत की भविष्य की सरकार पर चर्चा की जानी थी। पहला गोलमेज सम्मेलन सन् 1930 के नवंबर महीने के मध्य में शुरू हुआ। मगर इस सम्मेलन में आंबेडकर को आमंत्रित करने की मांग करीब एक साल पहले ही उठाई जा चुकी थी और वह भी एक बहुत अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान से – वह स्थान जहां एक जनवरी, 1818 को पुणे के कोरेगांव में युद्ध हुआ था।[1]
डॉ. आंबेडकर के लिए इसका अर्थ था एक बार फिर पश्चिमी दुनिया में लौटना और उस अवसर का उपयोग हमारे हितों को बढ़ावा देने के लिए करना। इन यात्राओं के संबंध में अब तक अज्ञात कुछ घटनाओं और पहलुओं के बारे में जानना हमने प्रारंभ ही किया है। इनमें शामिल हैं वे विस्तृत केबिल (समुद्री तार) जो आंबेडकर ने उस जहाज से भारत भेजे थे, जिसमें वे यात्रा कर रहे थे। इसके अलावा जहाज के लंदन पहुंचने से पहले उसमें यात्रा कर रहे लोगों के बीच कई दौर की चर्चाएं और बहस हुईं। इस लेख में उन घटनाओं की चर्चा करूंगा जिनका विवरण आंबेडकर द्वारा भेजे गए केबलों में नहीं है।
चैथम हाउस, इंग्लैंड (नवंबर, 1931)
चैथम हाउस, जिसे रॉयल इंस्टीट्यूट ऑफ़ इंटरनेशनल अफेयर्स भी कहा जाता है, वैश्विक स्तर पर कूटनीति और विदेश नीति के क्षेत्र में काम करने वाले अग्रणी संस्थानों में से एक है। यह लंदन में स्थित सेंट जेम्स पैलेस – जहां गोलमेज सम्मेलन आयोजित थे – से कुछ ही दूरी पर स्थित है। सन् 1923 में रॉयल इंस्टीट्यूट की स्थापना के पूर्व चैथम हाउस ब्रिटेन के प्रधानमंत्री का आधिकारिक निवास हुआ करता था। यह संस्थान जानेमाने ‘चैथम हाउस नियम’ का जनक भी है। इस नियम को अब कई शीर्ष थिंक टैंको जैसे काउंसिल फॉर फॉरेन रिलेशन्स, कार्नगी एनडाउमेंट फॉर पीस, म्युनिख सिक्युरिटी कान्फ्रेन्स[2] एवं ब्रूकिंग्स इंस्टीट्यूशन[3] द्वारा भी अपना लिया गया है। इस नियम का उद्देश्य है संस्थान में ऐसा वातावरण निर्मित करना जिससे वहां अपने विचार व्यक्त करने वालों को यह भरोसा हो कि उनकी बातें बाहर नहीं जाएंगीं। चैथम हाउस नियम अपने सदस्यों पर यह बंदिश लगाता है कि वे जब भी किसी भी बैठक में उन्हें मिली जानकारी को सार्वजनिक करें तो यह सुनिश्चित करें कि वे वक्ता का नाम उद्धृत न करें और न ही यह बताएं कि यह जानकारी उन्हें इंस्टीट्यूट की बैठक से हासिल हुई है।

स्वाभाविकतः गोलमेज सम्मेलनों के आमंत्रितों को विविध विषयों पर और अलग-अलग फॉर्मेट में चैथम हाउस में भाषण देने के लिए निमंत्रित किया गया।[5] इनमें शामिल थे– आंबेडकर, ह्यूबर्ट कार (ब्रिटिश प्रतिनिधि), मोहम्मद शफी (मुस्लिम प्रतिनिधि), सरदार उजल सिंह (सिक्ख प्रतिनिधि) एवं गांधी। जहां गांधी ने एक आम से विषय ‘भारत का भविष्य’[6] पर बोलना तय किया, वहीं आंबेडकर और उनके सह-वक्ताओं ने सजगतापूर्वक एक ज्यादा बारीक विषय चुना। यह विषय था ‘भारतीय अल्पसंख्यकों की समस्याएं।’ जहां गांधी का भाषण इंस्टीट्यूट के प्रकाशन ‘इंटरनेशनल अफेयर्स’ में प्रकाशित किया गया, वहीं भारतीय अल्पसंख्यकों पर दिए गए भाषण संस्थान के दस्तावेजों में गुम हो गए।
10 नवंबर, 1931 को आंबेडकर, ह्यूबर्ट कार, मोहम्मद शफी और सरदार उजल सिंह ने भारतीय अल्पसंख्यकों की स्थिति पर अपनी बातें रखीं। मैं इन सभी के भाषणों पर बात करना चाहूंगा, परंतु हमारे विषय के दायरे के भीतर रहने के लिए मैं केवल उस हिस्से की बात करूंगा, जिसमें डॉ. आंबेडकर ने कहा कि “भारतीयों का एक ऐसा बड़ा तबका है जिसे हिंदू धर्म कोई मान्यता नहीं देता और शायद इसी तबके की आवाज़ भारत के संवैधानिक विकास के लिए जिम्मेदार लोगों को सबसे ध्यानपूर्वक सुननी चाहिए।” अपने 15 मिनट के भाषण (शायद एक घंटे का कुल समय चारों वक्ताओं के बीच बराबर-बराबर बांटा गया था) में आंबेडकर ने अत्यंत कुशलता से तत्कालीन भारत की एक बटा छह आबादी के साथ हिंदुओं द्वारा किए जा रहे व्यवहार के प्रत्यक्ष अनुभवों को श्रोताओं के समक्ष रखा।

Dr Ambedkar’s speech at Chatham House, 10 November 1931 by fpbooks
साभार : नेशनल लाइब्रेरी ऑफ़ आस्ट्रेलिया में स्थित चैथम हाउस अभिलेखागार। गेल [7] के सौजन्य से
अपने भाषण की शुरुआत में डॉ. आंबेडकर ने कहा कि भारत में डिप्रेस्ड क्लासेस की आबादी लगभग 4.35 करोड़ है। उन्होंने कहा कि राजनीतिक उद्देश्यों के लिए इस आबादी को हिंदुओं से अलग माना जाना चाहिए। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह आंकड़ा उन्होंने साइमन कमीशन के दस्तावेजों से लिया है और यह एक सीमित प्रशासनिक भौगोलिक क्षेत्र का है। उन्होंने कहा कि अगर डिप्रेस्ड क्लासेस की संपूर्ण आबादी को गिना जाए तो वह कम से कम छह करोड़ होगी जो कि जर्मनी की आबादी के बराबर और फ्रांस व इंग्लैंड की आबादी से अधिक है।
मेरे प्यारे दोस्त डॉ. एस.पी.वी.ए. सांईराम ने मेरा ध्यान बाबासाहेब के कुछ ऐसे लेखों की ओर आकृष्ट किया है जो केवल डिप्रेस्ड क्लासेस की आबादी का अनुमान लगाने पर केंद्रित हैं। उनके भाषण के लिए निर्धारित कम समय के चलते वे यह नहीं बता सके कि अछूतों की आबादी का सही-सही अंदाजा लगाने के लिए उन्हें क्या-क्या पापड़ बेलने पड़े थे। जहां 1911 की जनगणना में अछूतों और अन्यों के बीच अंतर करने के लिए सही परीक्षणों का प्रयोग किया गया था – जिन्हें बाद में चार विभिन्न समितियों ने उचित ठहराया – मगर हिंदुओं ने सन् 1932 के बाद अचानक लोदियन समिति को सौंपे गए प्रतिवेदन में इन्हें चुनौती दे दी। भारतीय मताधिकार समिति के सदस्य बतौर आंबेडकर को प्रांतीय सरकारों के प्रतिनिधियों को एक के बाद एक यह दावा करते हुए सुनना पड़ा कि उनके राज्यों में कोई अछूत है ही नहीं, जबकि पूर्व की जनगणनाओं में इन्हीं सरकारों ने यह स्वीकार किया था कि उनके प्रांत में अछूत हैं। प्रांतीय सरकारों के रूख में यह बदलाव इसलिए आया क्योंकि अछूतों में राजनीतिक जागृति आ गई थी और वे अपने लिए हिंदुओं से अलग प्रतिनिधित्व मांग रहे थे। हिंदुओं ने न केवल मानदंडों को एकसार बनाकर गलत परीक्षणों का उपयोग किया बल्कि उन्होंने अन्य वर्गों को भी डिप्रेस्ड क्लासेस में शामिल करवाने की कोशिश की जबकि यह शब्द केवल अछूतों के लिए इस्तेमाल किया जाता था। इसके साथ ही, अछूतों के बीच तरह-तरह अफवाहें फैलाई गईं जिसके चलते वे अछूत के रूप में अपनी गिनती करवाने से बचें। मुसलमान इस मसले पर हिंदुओं को चुनौती देने की स्थिति में नहीं थे क्योंकि उन्हें डर था कि इससे हिंदुओं के सामने उनकी पोल खुल जाएगी और हिंदुओं को यह समझ में आ जाएगा कि मुसलमानों में भी जातियां हैं, जैसा कि जनगणना प्रशासन का भी कहना था। जहां तक पिछड़े वर्गों का सवाल है उन्हें अपने लिए अलग से प्रतिनिधित्व की मांग करने से ज्यादा आसान यह लगता था कि वे भी अपने आप को डिप्रेस्ड क्लासेस में शामिल करवा लें।[8]
अब हम डॉ. आंबेडकर के भाषण पर फिर वापस आते हैं। इसके बाद उन्होंने बताया कि ‘डिप्रेस्ड क्लासेस’ शब्द को क्यों गढ़ा गया। उन्होंने कहा कि “यह शब्द इसलिए बनाया गया क्योंकि ‘अछूत’ शब्द में शर्मिंदगी निहित थी। शायद हिंदुओं को इस शब्द पर शर्म आई होगी या शायद वे अधिकारी, जो इन लोगों के जीवन के बारे में निर्णय लेते हैं, उन्हें एक ऐसे व्यक्ति के लिए यह अपमानजनक, तिरस्कारपूर्ण और मनहूस शब्द का इस्तेमाल करने में शर्म आई होगी जो किसी दूसरे व्यक्ति से किसी तरह कमतर नहीं है।” फिर उन्होंने अछूत प्रथा के अनोखेपन की चर्चा करते हुए कहा कि ऐसी दूसरी प्रथाओं के बारे में “न तो आधुनिक और न ही प्राचीन इतिहास में हमें कहीं भी कुछ मिलता है। यह एक ऐसी प्रथा है जो हमें ज्ञात किसी भी अन्य सामाजिक व्यवस्था में नहीं थी।” फिर उन्होंने कहा कि इतिहास से हम जानते हैं कि गुलामी और दास प्रथा दुनिया के कई देशों में थी मगर अछूत प्रथा पर आधारित सामाजिक व्यवस्था हमें भारत को छोड़कर कहीं और नहीं मिलती। इस व्यवस्था में मनुष्यों का श्रेणीकरण आर्थिक या बौद्धिक आधार पर नहीं किया जाता बल्कि उन्हें पवित्र और अपवित्र जनों में बांटा जाता है और अगर कोई अपवित्र, किसी पवित्र को छू ले, तो उससे पवित्र, अपवित्र हो जाता है और उसे शुद्धिकरण करना होता है। उनके भाषण का यह हिस्सा उनके उन विचारों की एक झलक देता है जिसे विस्तार देकर उन्होंने अनेक उत्कृष्ट लेख लिखे जिनमें उन्होंने अछूत प्रथा की तुलना रोमन साम्राज्य के केंद्र प्राचीन रोम के सामाजिक ढांचे से की, जिसमें आम नागरिकों और गुलामों जैसी सामाजिक श्रेणियां हुआ करती थीं। उन्होंने मध्यकाल में ब्रिटिश समाज में प्रचलित वर्ग व्यवस्था और मध्यकाल में ही यहूदियों के इतिहास की बात भी की। उन्होंने एशिया, यूरोप और अमरीकी महाद्वीपों में लाए गए अफ्रीकी गुलामों की बदहाली पर भी अपने विचार रखे, जिन्हें वहां के मूल निवासी इंडियंस की तुलना में शारीरिक श्रम करने के लिए अधिक उपयुक्त माना जाता था।[9]
इसके बाद उन्होंने हिंदू समाज की एक विशेषता को समझाने के लिए मानवशास्त्रीय पारिभाषिक शब्द ‘डाइकोटोमस डिवीजन (द्विभाजी विभाजन)’ का इस्तेमाल करते हुए बताया कि दोनों समूहों के सदस्यों के बीच जन्म से लेकर मृत्यु तक कभी कोई संपर्क नहीं होता। कोई गैर-अछूत चाहे कितने भी पाप कर ले, चाहे उसका चरित्र कितना ही गिरा हुआ क्यों न हो, चाहे वह कितना ही दुष्ट क्यों न हो, वह हमेशा गैर-अछूत ही बना रहेगा। इसके विपरीत, कोई अछूत चाहे कितनी ही बौद्धिक निपुणता हासिल कर ले, चाहे उसका नैतिक चरित्र कितना ही उच्च क्यों न हो या उसकी आर्थिक स्थिति कितनी ही बेहतर क्यों न हो वह अपनी मृत्यु तक अछूत ही रहेगा। फिर उन्होंने जाति प्रथा की कठोरता की चर्चा करते हुए बताया कि कैसे उसमें ‘एनडोसमोसिस’ (अंत:परासरण) पूरी तरह प्रतिबंधित है। इसके विपरीत, वर्ग व्यवस्था में निम्न वर्ग के लोग यदि उच्च वर्ग में पहुंच जाते थे तो उनका चरित्र और पहचान बदल जाती थी।
गोलमेज सम्मेलनों में जिन धर्मनिरपेक्ष संवैधानिक सुधारों पर चर्चा की जा रही थी, कदाचित उनके संदर्भ में डॉ..आंबेडकर ने अपने श्रोताओं का ध्यान इस ओर भी आकर्षित किया कि अछूत प्रथा केवल एक धार्मिक या सामाजिक समस्या नहीं है, बल्कि यह एक नागरिक समस्या है जो “देश के नागरिकों के नागरिक अधिकारों को प्रभावित करती है[10] और घर की चहारदीवारी से बाहर निकलकर सार्वजनिक रिश्तों को भी निर्धारित करती है।”
जैसा कि पहले भी बताया जा चुका है, आंबेडकर ने हमारे लोगों के वास्तविक अनुभवों के आधार पर अपनी बातें रखीं। उन्होंने कहा कि ब्रिटेन, जहां के श्रोताओं से वे मुखातिब थे, के विपरीत, “भारत में सड़क सार्वजनिक धन से बनाई जाती है मगर डिप्रेस्ड क्लासेस को उसका उपयोग करने की इजाजत नहीं होती। आप सार्वजनिक धन से एक कुंआ खोद सकते हैं परंतु डिप्रेस्ड क्लासेस को अपने लिए पानी लेने वहां जाने की इजाजत नहीं होगी। आप सार्वजनिक धन से एक स्कूल बना सकते हैं मगर डिप्रेस्ड क्लासेस को वहां जाने का अधिकार नहीं होगा…।” उन्होंने यह भी कहा कि सार्वजनिक परिवहन वाहनों और नाईयों की दुकानें भी डिप्रेस्ड क्लासेज की पहुंच से बाहर हैं। कुल मिलाकर उन्होंने यह रेखांकित करने का प्रयास किया कि अछूत प्रथा एक नागरिक समस्या है। मैं कल्पना कर सकता हूं कि उनके श्रोता, जिन्होंने न तो कभी भारत में काम किया होगा और न ही कभी भारत आए होंगे, यह सुनकर किस कदर भौचक्का रह गए होंगे कि हिंदुओं ने सदियों तक इस तरह की सामाजिक व्यवस्था को कायम रखा।
उन्होंने आगे कहा कि जल्द ही भारत का शासन अंग्रेजों की जगह हिंदुओं के हाथों में आ जाएगा। ऐसे में डिप्रेस्ड क्लासेस को राजनीतिक सुरक्षा की जरूरत पड़ेगी, क्योंकि वे जानते हैं कि डिप्रेस्ड क्लासेस और उनकी प्रगति व भलाई के प्रति हिंदुओं का सदियों पुराना शत्रुता भाव रातों-रात खत्म नहीं होगा।
उन्होंने अपने श्रोताओं को यह समझाया कि हिंदू सचमुच यह मानते हैं कि वे डिप्रेस्ड क्लासेस से श्रेष्ठ और उच्च हैं और अपनी इस श्रेष्ठता और उच्चता को बनाए रखने और उसे एक ठोस स्वरूप देने के लिए उन्होंने एक विशिष्ट नैतिक आचार संहिता निर्धारित की है। इस आचार संहिता के अंतर्गत उन्हें डिप्रेस्ड क्लासेस के सदस्यों का कोई ऐसी पोशाक पहनना भी मंजूर नहीं होता जो वे परंपरागत रूप से नहीं पहनते आ रहे हैं। इसी तरह, अगर उन्हें लगता है कि वे किसी के सलाम के हकदार हैं तो उसका उन्हें सलाम न करना भी इस संहिता का उल्लंघन माना जाता है। आंबेडकर ने हिंदुओं की संकीर्ण मानसिकता के कई उदाहरण दिए। उन्होंने कहा कि हिंदू नहीं चाहते कि डिप्रेस्ड क्लासेस का कोई व्यक्ति उच्च वर्गों के बराबर दर्जा हासिल करने की आकांक्षा तक पाले। उन्होंने कहा कि कई बार गांवों में केवल इस बात पर बवाल हो जाता है कि डिप्रेस्ड क्लासेस का कोई सदस्य मोजे पहने हुए गांव से निकल गया या उसका विवाह समारोह उतना ही भव्य था जितना कि किसी उच्च जाति के व्यक्ति का होता है। इसे हिंदू अपना अपमान मानते हैं।
उन्होंने इस तथ्य की ओर भी ध्यान दिलाया कि डिप्रेस्ड क्लासेस उन शक्तिशाली बहुसंख्यकों – जो वर्चस्व को अपना हक़ मानते हैं – के सामने लाचार हैं क्योंकि वे देश के किसी एक भाग में केंद्रित नहीं हैं बल्कि पूरे भारत में बिखरे हुए हैं। वे गांव की सीमा पर रहते हैं और उनका गांव में रहने वालों से कोई संपर्क-संबंध नहीं होता। इसका नतीजा यह है कि हर टकराव और संघर्ष में एक तरफ होते हैं गोलबंद हिंदू, जिनकी संख्या बहुत बड़ी होती है और दूसरी तरफ डिप्रेस्ड क्लासेज के लोगों के छितरे हुए छोटे-छोटे समूह।
आंबेडकर ने यह भी बताया कि डिप्रेस्ड क्लासेस आर्थिक दृष्टि से दूसरों पर निर्भर हैं। उनमें से बहुत कम के पास नौकरियां या जमीनें हैं। सार्वजनिक सेवाओं और कुछ व्यवसायों में उन्हें प्रवेश ही नहीं मिलता क्योंकि वे अछूत हैं और उनका स्पर्श प्रदूषणकारी माना जाता है। फिर उन्होंने डिप्रेस्ड क्लासेस के शोषण की तुलना आयरलैंड के लोगों के दमन से की।[11] उन्होंने कहा कि अगर डिप्रेस्ड क्लासेस कोई भी ऐसा काम करते हैं जिससे हिंदू अप्रसन्न हों या जो हिंदुओं की निगाहों में गलत और सामाजिक नियमों के खिलाफ हो तो उन्हें संपूर्ण बहिष्कार का सामना करना पड़ता है। ऐसे में पूरे समुदाय का आर्थिक जीवन ठप्प पड़ जाता है और वे झुकने पर मजबूर हो जाते हैं।
उन्होंने यह भी बताया कि कानून और व्यवस्था बनाए रखने के लिए ज़िम्मेदार संस्थाएं केवल हिंदुओं से भरी हुई हैं जो विवादों – जिनमें से कई के नतीजे में क़त्ल होते हैं, संपत्तियां नष्ट होती है और घर जला दिए जाते हैं – में उच्च वर्गों का साथ देते हैं, निम्न वर्गों का नहीं।
इस तरह आंबेडकर ने अछूत प्रथा के नागरिक पक्ष पर प्रकाश डाला। उनका दृढ़ मत था कि डिप्रेस्ड क्लासेज को जब तक पर्याप्त राजनीतिक सुरक्षा उपलब्ध नहीं होगी तब तक वे धार्मिक और आर्थिक दृष्टि से अत्यंत शक्तिशाली हिंदू बहुसंख्यकों, जिनके पास हथियार भी हैं, के शासन के अधीन रहने को राजी नहीं हो सकते। उन्होंने अपना भाषण यह कहते हुए ख़त्म किया कि भारतीय लोकतंत्र में सभी वर्गों को प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए– “क्षेत्रीय लोकतंत्र के सिद्धांत ऐसे समाज पर लागू नहीं किए जा सकते जो व्यक्तियों का मूल्यांकन उनके रहवास के क्षेत्र के आधार पर नहीं बल्कि धार्मिक और सामाजिक आधारों पर करता है। अगर आप इस तरह के समाज में बिना किसी संशोधन के क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व का सिद्धांत लागू करेंगे तो मुझे इसमें तनिक भी संदेह नहीं है कि आप राजनीतिक लोकतंत्र की जगह लोकतंत्र के स्वांग का निर्माण करेंगे। हम इस देश की राजनीतिक प्रगति में बाधा नहीं बनना चाहते। हम यह नहीं कहते कि भारतीय अपने देश की नियति का निर्धारण स्वयं करने की क़ाबलियत नहीं रखते। हम यह भी नहीं कहते कि भारत को स्वतंत्र करने के लिए और इतंजार किया जाए। हम सिर्फ यह कहते हैं कि आज जो परिस्थितियां हैं, उनके चलते अगर आप सत्ता का हस्तांतरण करना चाहते हैं, तो उसकी शर्तें ऐसी होनी चाहिए जिससे भारत में एक असली और सच्चा लोकतंत्र स्थापित हो।”[12]
बर्मिंघम टाउन हाल, ब्रिटेन (जनवरी, 1931)

डिप्रेस्ड क्लासेज के करीब 10,000 लोगों ने बंबई के दामोदर ठाकरसे हाल के नज़दीक एक मैदान में इकट्ठा होकर आंबेडकर को जोशपूर्ण और शानदार विदाई दी। इस मौके पर आंबेडकर ने अपने श्रोताओं से कहा कि वे ब्रिटिश सरकार के सामने उनका पक्ष रखेंगे। उन्होंने यह भी कहा कि वे स्वराज के खिलाफ नहीं हैं। (बशर्ते उसमें इन वर्गों को राजनीतिक सुरक्षा उपलब्ध हो) उन्होंने यह भी कहा कि वे अपनी पुरानी पत्रिका का प्रकाशन फिर से शुरू करेंगे और इसका नया नाम ‘जनता’ होगा। उन्होंने आगे की अपनी योजना का खुलासा करते हुए बताया कि गोलमेज सम्मलेन के बाद “वे इंग्लैंड में कुछ और दिन रूकेंगे ताकि अपना एक अन्य उद्देश्य भी हासिल कर सकें….वे रूस, जर्मनी, अमरीका और जापान जाकर वहां डिप्रेस्ड क्लासेस की ओर से प्रोपेगेंडा करेंगे … उन्होंने यह वायदा भी किया कि अगर संभव हुआ तो वे उनकी बात लीग ऑफ़ नेशंस के समक्ष भी रखेंगे।”[13] आंबेडकर 4 अक्टूबर, 1930[14] को पी एंड ओ कंपनी के जहाज ‘वाइसराय ऑफ़ इंडिया’ (जिसे पहले ताजमहल के नाम से जाना जाता था) से 21 अन्य प्रतिनिधियों के साथ इंग्लैंड के लिए रवाना हुए। यह जहाज अदन[15] और स्वेज़ नहर[16] के रास्ते इंग्लैंड गया। रास्ते में आंबेडकर ने मिस्र के पिरामिड भी देखे। जहाज में उन्होंने गोलमेज सम्मेलन के अन्य आमंत्रितों जैसे ए.पी. पात्रो, प्रभाशंकर पट्टानी और रशब्रुक विलियम्स के साथ कई दौर की अनौपचारिक बातचीत की। इन चर्चाओं का मुख्य विषय यह था कि राजे-रजवाड़ों की शक्तियों को किस हद तक केंद्रीय सरकार को समर्पित या प्रत्यायोजित किया जाए और ब्रिटिश भारत से उनके रिश्ते कैसे हों।[17] यह जहाज 24 या 25 अक्टूबर को लंदन पहुंचा। इस यात्रा के दौरान उन्हें रैमसे मैकडोनाल्ड, इशबेल मैकडोनाल्ड, एस. रोवन एटकिनसन, बड़ौदा के महाराजा और महारानी एवं श्री व श्रीमती जिन्ना व अन्यों ने दोपहर के भोजन पर आमंत्रित किया।[18]
जैसा कि भाउराव गायकवाड़ को लिखे गए उनके पत्र[19] से जाहिर है होता है कि आंबेडकर लंदन में थे जब ‘बर्मिंघम गजट’ में एक विज्ञापन छपा जिसमें बताया गया था कि बर्मिंघम (जो लंदन से बहुत दूर नहीं है) के नवशास्त्रीय एवं रोमन फोरम शैली में बने टाउन हॉल में 12 जनवरी 1931 को शाम 7 बजे भारत की स्वतंत्रता की मांग के समर्थन में एक निशुल्क आमसभा आयोजित की गई है। विज्ञापन में कहा गया था कि इस सभा के वक्ताओं में गोलमेज सम्मेलन में भारतीय डिप्रेस्ड क्लासेस के प्रतिनिधि डॉ. आंबेडकर के अलावा श्रीमती डेसपार्ड[20], श्रीमती बृजलाल नेहरू (जवाहरलाल नेहरू की रिश्ते की बहन), डॉ. के.टी. पॉल (गोलमेज सम्मेलन में भारतीय ईसाइयों के प्रतिनिधि), एवं श्री ए. फेनर ब्रोकवे (संसद सदस्य)[21] शामिल होंगे व इसकी अध्यक्षता श्री होरेस जी. एलेक्जेंडर[22] करेंगे। आंबेडकर निश्चित रूप से टाउन हॉल गए होंगे और उन्होंने वहां भाषण भी दिया होगा क्योंकि इससे अन्यथा विश्वास करने का कोई कारण नहीं है। दुखद यह कि, वह भाषण अब तक ढूंढ़ा जाना बाकी है और शायद वह हमेशा के लिए गुम हो चुका है। उसके बारे में हम तभी कुछ जान सकते हैं जब अन्य वक्ताओं के भाषण हमें मिल सकें और उनमें आंबेडकर के भाषण की कुछ चर्चा हो। उन्होंने अपने भाषण में जो कहा होगा उसकी कल्पना करना कठिन जरूर है मगर असंभव नहीं। उन्होंने निश्चित रूप से अपनी सामान्य शैली के अनुरूप इतिहास से उदाहरण दिए होंगे। उन्होंने निश्चित तौर पर यह मांग की होगी कि भारत को ब्रिटिश राज से छुटकारा मिलना चाहिए मगर इसके साथ ही अल्पसंख्यकों के लिए पर्याप्त राजनीतिक सुरक्षा उपलब्ध करवाई जानी चाहिए।
Newspaper notice for Dr Ambedkar’s speech at Birmingham Town Hall, 12 January 1931 by fpbooks
साभार : बर्मिंघम गजट, 10 जनवरी 1931, पृष्ठ 2
माउंट वर्नन पब्लिक स्कूल, अमरीका (दिसंबर, 1932)

ब्रिटिश सरकार ने कम्युनल अवार्ड की घोषणा की, जिसके अंतर्गत डिप्रेस्ड क्लासेस को पृथक मताधिकार दिया जाना था। इसके लिए आंबेडकर ने जी-जान से लड़ाई लड़ी थी। मगर दुनिया को क्या मालूम था कि इस पर गांधी अपने वर्ग के हितों की रक्षा करने के लिए अत्यंत तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करेंगे। आंबेडकर ने खेद प्रकट करते हुए कहा कि गांधी, जिन्होंने कभी भारत की स्वतंत्रता के लिए आमरण अनशन नहीं किया, डिप्रेस्ड क्लासेस को विशेष प्रतिनिधित्व दिए जाने के खिलाफ आमरण अनशन करने के लिए तैयार थे। आंबेडकर ने यह भी कहा कि गांधी ने अन्य अल्पसंख्यकों के लिए पृथक मताधिकार स्वीकार कर लिया मगर उनसे ही भारतीय समाज के सबसे दमित वर्ग, अर्थात डिप्रेस्ड क्लासेस, के लिए पृथक मताधिकार को खारिज करवाया।
24 अक्टूबर, 1932 को गांधी के राजनीतिक समर्थकों ने आंबेडकर के साथ पूना पैक्ट पर दस्तखत किए। उसी दिन न्यूयार्क के कई अखबारों में एक सूचना छपी, जिसे नीचे प्रकाशित किया गया है। इसमें कहा गया था कि माउंट वर्नन पब्लिक स्कूल टीचर एसोसिएशन द्वारा माउंट वर्नन पब्लिक स्कूल, न्यूयार्क में ‘फॉल एंड विंटर अध्ययन पाठ्यक्रम’ के भाग के रूप में 15 व्याख्यानों की शृंखला में से एक व्याख्यान आंबेडकर द्वारा दिया जाएगा। यह व्याख्यानमाला अखबार में सूचना के प्रकाशन के करीब दो हफ्ते बाद 4 अक्टूबर, 1932 को शुरू होनी थी और आंबेडकर को ‘इंडिया’ विषय पर 13 दिसंबर, 1932 को भाषण देना था। स्थानीय समाचारपत्र ‘डेली आर्गस’, जिसमें यह सूचना छपी थी, में यह भी कहा गया था कि हर व्याख्यान के कुछ दिन पहले समाचारपत्र दो ऐसी पुस्तकों के नाम प्रकाशित करेगा जिन्हें पढ़ने से श्रोताओं को संबंधित व्याख्यान को समझने में आसानी होगी। आंबेडकर ने अपने व्याख्यान के श्रोताओं के लिए अखबार के अनुरोध पर दो पुस्तकों की सिफारिश की थी या नहीं, यह ज्ञात नहीं है।
माउंट वर्नन कोई साधारण स्कूल नहीं था। उसके द्वारा आयोजित व्याख्यानमाला में कई मेधावी और जाने-माने व्यक्ति शामिल होने वाले थे। सबसे पहला व्याख्यान डच-अमरीकी इतिहासविद हेंडू वेन लून को देना था। उनके व्याख्यान का विषय था– ‘टू हैव ओर टू बी’ (हासिल करें या बनें)। उनके व्याख्यान का मुख्य तर्क यह था कि हमें अपने चरित्र का विकास करने से संतोष मिलता है न कि संपत्ति इकट्ठा करने से।[24] अगला भाषण प्रिंस्टन अध्येता एडवर्ड केमरर को देना था। एडवर्ड केमरर वह व्यक्ति थे जिन्होंने अमरीका के फेडरल रिजर्व के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और दक्षिण अमरीका से लेकर मध्य यूरोप तक कई देशों की आर्थिक नीतियां तैयार करने में योगदान दिया। अन्य वक्ताओं में शामिल थे कोलंबिया विश्वविद्यालय में शिक्षित बुद्धिजीवी जैसे जोन अर्सकिन (यह अमरीकी शिक्षाविद् ‘शिक्षा में नई दिशाएं’ विषय पर बोलने वाले थे), विलियम टी. फोस्टर (एक अन्य अमरीकी शिक्षाविद् जिनके व्याख्यान का विषय था– ‘मनुष्य, धन और मशीनें), पॉल ची-मंग (एक कूटनीतिज्ञ जो चाइना इंस्टीट्यूट इन अमरीका का संचालन करते थे और जो ‘सुदूरपूर्व’ विषय पर बोलने वाले थे)। अन्य वक्ता भी अनुभवी कूटनीतिज्ञ व अर्थशास्त्री थे, जो विभिन्न विश्वविद्यालयों और संस्थाओं से संबद्ध थे।
माउंट वर्नन पब्लिक स्कूल के बारे में जो वर्णन हमें मिलता है, उससे ऐसा लगता है कि वह मेनहट्टन, न्यूयार्क से करीब एक घंटे की दूरी पर स्थित वह स्थान होगा जिसे अब ‘रेड ब्रिक स्कूलहाउस म्यूजियम’ कहा जाता है।[25] अब हमारे सामने कुछ अनुत्तरित प्रश्न हैं। आंबेडकर ने व्याख्यान देने के लिए यह स्थान क्यों चुना? क्या इसका सुझाव उन्हें कोलंबिया विश्वविद्यालय के किसी व्यक्ति ने दिया था, विशेषकर इसलिए क्योंकि कई वक्ता इसी विश्वविद्यालय से थे? अगर हां, तो वे कौन थे? दुखद रूप से , कम-से-कम अभी तक तो हमारे पास इन प्रश्नों के कोई उत्तर नहीं हैं।

इस घोषणा के एक हफ्ते बाद अखबार ने 1 अक्टूबर, 1932 को एक सूचना प्रकाशित की जिसमें कहा गया था कि आंबेडकर के भाषण का विषय होगा– ‘आज के भारत की समस्याएं’। इस सूचना में भी व्याख्यान के पहले पढ़कर आने के लिए किताबों के बारे में कोई सुझाव नहीं दिया गया था। यह भी संभव है कि किताबों के बारे में सुझाव देने के लिए जो पत्र आंबेडकर को लिखा गया होगा वह उनके बंबई के परेल स्थित निवास के पते पर भेजा गया होगा क्योंकि उन्होंने लंदन के लिए रवाना होने के पूर्व इसी पते से पत्राचार किया होगा।

इसी कड़ी में अखबार ने 3 अक्टूबर, 1932 और 21 अक्टूबर, 1932 (नीचे प्रकाशित) को एक अन्य विज्ञापन प्रकाशित किया जिसमें आंबेडकर को उन 15 वक्ताओं की सूची में शामिल किया गया था जिनके भाषण एक डॉलर प्रति सीट का भुगतान कर सुने जा सकते थे। दुखद यह कि तब आंबेडकर गोलमेज सम्मेलन की कार्यवाहियों में उलझे हुए थे और माउंट वर्नन के श्रोताओं को भारत की वर्तमान समस्याओं पर उनके विचार सुनने का अवसर नहीं मिल सका।[26] वे 19 दिसंबर[27] तक लंदन में ही थे और ऐसे में यह संभव नहीं था कि वे एटलांटिक महासागर के पार न्यूयार्क शहर के बाहरी हिस्से में कोई व्याख्यान दे पाते।
Notice for Dr Ambedkar’s Vernon Public School Lecture by fpbooks
साभार : द डेली आर्गस, माउंट वर्नन, न्यूयॉर्क, 3 अक्टूबर 1932, पृष्ठ 2
Local newspaper lists Dr Ambedkar as one of the speakers for the Vernon Public School lecture by fpbooks
साभार : द डेली आर्गस, माउंट वर्नन, न्यूयॉर्क, 21 अक्टूबर 1932, पृष्ठ 9
डेली आर्गस, माउंट वर्नन, न्यूयार्क में 8 दिसंबर, 1932 को छपी सूचना (नीचे प्रकाशित) इस शृंखला में आखिरी थी। यह नोटिस आंबेडकर के व्याख्यान की तारीख के कुछ ही पहले प्रकाशित किया गया था और इसमें कहा गया था कि चूंकि आंबेडकर अमरीका नहीं आ सकेंगे इसलिए उनके स्थान पर एक अन्य वक्ता व्याख्यान देंगे। शायद आंबेडकर ने लंदन से आयोजनकर्ताओं को यह संदेश भेजा होगा कि वे व्याख्यान देने के लिए न्यूयार्क नहीं आ सकेंगे।
Notice about Dr Ambedkar being unavailable for Mount Vernon School Lecture by fpbooks
साभार : द डेली आर्गस, माउंट वर्नन, न्यूयॉर्क, 8 दिसंबर 1932, पृष्ठ 12
इसके बाद भी जब आंबेडकर के व्याख्यान का दिन आया तब तक अखबार यह भूल चुका था कि वे नहीं आ सकेंगे और 13 दिसंबर को उसने यह सूचना (नीचे प्रकाशित) छापी कि आंबेडकर उस रात भाषण देंगे!
Notice says Dr Ambedkar is the speaker at Mount Vernon Lecture despite his unavailability by fpbooks
साभार : द डेली आर्गस, माउंट वर्नन, न्यूयॉर्क, 13 दिसंबर 1932, पृष्ठ 12
फोर्ड हॉल फोरम, अमरीका (1932)

Dr Ambedkar named as one of the speakers for the Ford Hall Forum by fpbooks
साभार : द बोस्टन ग्लोब, 3 अक्टूबर 1932, पृष्ठ 20
माउंट वर्नन हाईस्कूल में आयोजित आंबेडकर के व्याख्यान के संबंध में सूचनाएं अखबारों में आयोजन के कुछ महीने पहले प्रकाशित होनी शुरू हो गई थीं। मगर फोर्ड हॉल फोरम में उनके व्याख्यान के मामले में ऐसा नहीं हुआ। सन् 1908 में स्थापित फोर्ड हॉल फोरम, अमरीका का सबसे पुराना निशुल्क सार्वजनिक व्याख्यान आयोजित करने वाली संस्था है और वह अब भी शीर्ष बुद्धिजीवियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की मेजबानी करती रहती है। जिस दिन – अर्थात 3 अक्टूबर, 1932 – को ‘द डेली आर्गस’, माउंट वर्नन ने ऊपर उल्लेखित सूचना प्रकाशित की, उसी दिन आंबेडकर का नाम ‘द बोस्टन ग्लोब’ में छपी एक सूचना में उन वक्ताओं की सूची में शामिल था जो फोरम में बोलने वाले थे। फोरम के 25वें वार्षिक आयोजन की शुरुआत 16 अक्टूबर रविवार की शाम को न्यूयार्क के हेवुड ब्राउन के व्याख्यान से होने वाली थी। उनके व्याख्यान का विषय था– “इट सीम्स टू मी” (मुझे ऐसा लगता है)। दुखद यह कि फोरम की रजत जयंती समारोह के संबंध में इस विज्ञापन में यह नहीं बताया गया था कि आंबेडडकर सहित अन्य वक्ता किस दिन अपने व्याख्यान देंगे और उनके व्याख्यानों के विषय क्या होंगे। परंतु जब मैंने फोर्ड हॉल फोरम से संपर्क किया तो उन्होंने मुझे अत्यंत प्रसन्नतापूर्वक 1932-1933 के आयोजन का निमंत्रणपत्र उपलब्ध करवा दिया जिसमें कहा गया था कि आंबेडकर के व्याख्यान का विषय होगा “भारत में अछूतों की वर्तमान स्थिति।” दुखद पहलू यह कि, उस मौके पर जो व्याख्यान आयोजित हुए उनका लिप्यांतरण उपलब्ध नहीं है। हो सकता है कि उन भाषणों को लिप्यांतरित किया ही न गया हो। फोर्ड हॉल फोरम के व्याख्यान फोर्ड बिल्डिंग में आयोजित होते थे जो एशबर्टन प्लेस व बोडेन चौराहे पर बोस्टन के बीकम हॉल मोन्यूमेंट के ठीक सामने थी। मगर यह भवन अब अस्तित्व में नहीं है।
Dr Ambedkar figures in the Ford Hall Forum 1932-1933 Season Program by fpbooks
सीजन कार्ड (1932-33) में डॉ. आंबेडकर का नाम। साभार : सफक विश्वविद्यालय
इस वार्षिक आयोजन में व्याख्यान देने के लिए अनेक विख्यात लोगों को आमंत्रित किया गया था। इनमें शामिल थे प्रोफेसर जूलियन हक्सले, जो उस दौर के जाने-माने विकासवादी जीवविज्ञानी थे और जिनकी पुस्तकें आंबेडकर के संग्रह में थीं। डॉ. जूलियस कर्टसियस, हिटलर के जर्मनी पर काबिज़ होने के पहले जर्मनी के वायमा रिपब्लिक के विदेश मंत्री थे। उन्होंने उस ‘यंग प्लान’ को लागू करने में भूमिका निभाई थी जो प्रथम विश्वयुद्ध में जर्मनी को हुए नुकसान की भरपाई के बारे में था। जापान की बेरोनेस इशिमोटो (केटो शीजुए) एक पूर्व समुराई परिवार में जन्मी थीं और आगे चलकर 20वीं सदी के जापान में परिवार नियोजन और प्रजनन अधिकारों की अग्रणी पैरोकार बनीं।[29] नार्मन एंजेल एक ब्रिटिश पत्रकार, वक्ता और लेबर पार्टी के संसद सदस्य थे। वे चैथम हाउस (रॉयल इंस्टीट्यूट ऑफ़ इंटरनेशनल अफेयर्स) से भी जुड़े हुए थे और व्याख्यान के अगले साल (1933) उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार से नवाजा गया।[30] डॉन रोसको पाउंड एक विख्यात विधिवेत्ता और सन् 1936 तक हार्वर्ड लॉ स्कूल के डीन थे। प्रोफेसर फिलिक्स फ्रेंकफर्टर भी कानून के विख्यात ज्ञाता थे, जिन्होंने जानीमानी संस्था ‘अमेरिकन सिविल लिबर्टीज यूनियन’ (एसीएलयू) की स्थापना की थी। उसके अगले साल वे 32वें अमरीकी राष्ट्रपति फ्रेंकलिन डी. रूजवेल्ट के सबसे नजदीकी कानूनी सलाहकार बने और कुछ समय बाद उन्हें अमरीका के सुप्रीम कोर्ट में जज के रूप में नियुक्त किया गया।
फिर 31 अक्टूबर, 1932 को यह घोषणा की गई कि आंबेडकर तीसरे गोलमेज सम्मेलन में भाग लेंगे।[31] इसके अगले हफ्ते 7 नवंबर को वे इंग्लैंड जाने के लिए बंबई के एलेक्जेंड्रा डॉक से लायड ट्रायसटीनो कंपनी के जहाज विक्टोरिया पर सवार हुए।[32] जहाज से उन्होंने शिवतारकर को चिट्ठी लिखकर कहा कि वे बिना भूले हर हफ्ते टाइम्स, क्रॉनिकल, फ्री प्रेस, केसरी और जनता की प्रतियां उन्हें भेजते रहें।[33] आंबेडकर 19 नवंबर, 1932[34] को लंदन के विक्टोरिया स्टेशन पहुंचे। सन् 1931 के अंत में लंदन की अपनी पिछली यात्रा के विपरीत इस यात्रा में वे व्याख्यान देने के लिए समय नहीं निकाल सके। वे एस.एस. गंगे स्टीमर से भारत लौट गए और 23 जनवरी, 1933[35] को बंबई पहुंच गए। इस तरह, उस समय के पश्चिम ने उन्हें सुनने का मौका खोया और हमने आज उन्हें पढ़ने का।
वर्मोंट विश्वविद्यालय, अमरीका (नवंबर, 1932)

19 अक्टूबर, 1932 को जब आंबेडकर भारत से रवाना भी नहीं हुए थे तब ‘द बर्लिंगटन फ्री प्रेस एंड टाइम्स’ में एक सूचना प्रकाशित हुई कि वर्मोंट विश्वविद्यालय में एक व्याख्यानमाला आयोजित होगी जिसमें आंबेडकर भी एक वक्ता होंगे। प्रोफेसर जॉन डेवी का जन्म वर्मोंट में हुआ था और सन् 1904 में कोलंबिया विश्वविद्यालय में शिक्षण कार्य शुरू करने के पहले वे और उनके भाई इसी विश्वविद्यालय के विद्यार्थी थे। प्रोफेसर डेवी को विश्वविद्यालय के कैंपस में ही दफनाया[37] गया है और उनकी कब्र पर एक बहुत मार्मिक स्मृति लेख[38] उत्कीर्ण है। आंबेडकर के स्वयं के शब्दों में उनका सारा बौद्धिक जीवन प्रोफेसर डेवी की देन था। भारत से आंबेडकर ने प्रोफेसर डेवी या प्रोफेसर जे.टी. शाटवेल या कोलंबिया में अपने किसी अन्य परिचित से संपर्क स्थापित किया होगा, जिसने उनसे इस व्याख्यानमाला में भाग लेने का अनुरोध किया होगा। अगर गोलमेज सम्मेलनों में उनकी व्यस्तता न होती तो आंबेडकर अपने प्रोफेसर से वर्मोंट विश्वविद्यालय में जरूर मिलते। बीस साल बाद आंबेडकर एक बार फिर कोलंबिया विश्वविद्यालय पहुंचे। मगर उनके आने के कुछ ही समय पूर्व प्रोफेसर डेवी की मृत्यु हो चुकी थी।
व्याख्यानमाला की शुरुआत 22 नवंबर, 1932 को जोन क्लेयर मिनोट के व्याख्यान से होना थी जो “…बोस्टन हेराल्ड के साहित्यिक संपादक एवं मशहूर आलोचक व वक्ता थे।” वे हाल में प्रकाशित पुस्तकों पर अपने विचार साझा करने वाले थे। दूसरे वक्ता आंबेडकर थे, जिनके बारे में यह कहा गया था कि वे “…असाधारण रूचियों वाले इंसान हैं और भारत में एक महत्वपूर्ण व प्रभावशाली व्यक्ति हैं। वे गोलमेज सम्मेलन में एक प्रतिनिधि हैं, बांबे लेजिस्लेटिव काउंसिल के सदस्य हैं, डिप्रेस्ड क्लासेस इंस्टीट्यूट के संस्थापक व अध्यक्ष हैं, और अछूतों के हितों के लिए तीखी और जोरदार लड़ाई लड़ने के लिए जाने जाते हैं और इसके लिए उन्हें सराहना भी मिली है। डॉ. आंबेडकर अपनी विद्वता, भारत के वित्तीय मसलों के बारे में अपने उत्कृष्ट ज्ञान और अपनी राजनीतिक हैसियत के बावजूद, हिंदू सामाजिक व्यवस्था के लिहाज से अछूत हैं। वे 9 दिसंबर की शाम ‘वर्तमान भारत की सामाजिक समस्याएं’ विषय पर व्याख्यान देंगे।” इस परिचय में आंबेडकर की जिस एकमात्र शैक्षणिक उपलब्धि का जिक्र नहीं था वह यह था कि वे बैरिस्टर भी थे। शायद किसी दिन इस उद्धरण की भाषा से यह अंदाजा लग सके कि इसे किसने लिखा और समाचारपत्रों को भेजा था।
तीसरे वक्ता वियना विश्वविद्यालय में भौतिकी के प्रोफेसर आर्थर हास थे। उन्हें भौतिकशास्त्र में नोबेल पुरस्कार के लिए चार बार नामित किया गया था। इनमें से दो बार उन्हें नामित करने वाले अल्बर्ट आइंस्टीन थे। आइंस्टीन ने उन्हें पहली बार सन् 1917 में नामित किया, जिस साल आइंस्टीन ने अपना सामान्य सापेक्षता का सिद्धांत प्रतिपादित किया था। और दूसरी बार 1921 में, जब आइंस्टीन को स्वयं यह पुरस्कार प्रदान किया गया था। लुई डे भोगली, जिन्होंने 1937 में स्वयं नोबेल पुरस्कार जीता था, ने भी हास को एटोमिक मॉडल्स[39] पर उनके काम के लिए नोबेल पुरस्कार के लिए नामित किया था। कुल मिलाकर वे एक अत्यंत मेधावी भौतिकशास्त्री थे। सारे व्याख्यान रॉबर्ट हल फ्लेमिंग म्यूजियम में आयोजित किए जाने थे। इस भवन को अब फ्लेमिंग म्यूजियम ऑफ़ आर्ट कहा जाता है और यह विश्वविद्यालय के कैम्पस के बीचो-बीच स्थित है।
Dr Ambedkar introduced as one of the speakers at the University of Vermont Lectures by fpbooks
साभार : द बरलिंगटन फ्री प्रेस एंड टाइम्स, 19 अक्टूबर 1932,पृष्ठ 7
विश्वविद्यालय ने अगली सूचना 26 अक्टूबर को जारी की, जिसे ‘द मॉनिटर, बर्लिंटन और वर्मोंट’ ने प्रकाशित किया। इसमें भी कार्यक्रम का वही विवरण था और साथ में बताया गया था कि आंबेडकर, जो ‘भारतीय मामलों के जानकार’ हैं, भी एक वक्ता होंगे।
The Monitor names Dr Ambedkar as a speaker at the University of Vermont Lecture Series by fpbooks
साभार : द मॉनिटर, बार्टन, वर्मोंट, 26 अक्टूबर 1932, पृष्ठ 2
मगर आंबेडकर इंग्लैंड में गोलमेज सम्मेलनों की कार्यवाही में व्यस्तता के चलते अमरीका नहीं जा सके। अतः ‘बर्लिंटन फ्री प्रेस एंड टाइम्स’ ने आंबेडकर के व्याख्यान की निर्धारित तिथि से करीब दस दिन पहले, 29 नवंबर, 1932 को, यह घोषणा प्रकाशित की कि वे अपना व्याख्यान नहीं दे सकेंगे और उनका स्थान कनाडा के व्यवसायी, समाजसेवी व राजनीतिज्ञ सर हर्बर्ट आमेस लेंगे।
मेरे प्रिय मित्र डॉ एस.पी.वी.ए. सांईराम ने हाल में मुझे यह जानकारी दी है कि वर्मोंट प्रांत सन् 2023 से आंबेडकर जयंती को ‘समानता दिवस’ के रूप में मनाता आ रहा है हालांकि उन्हें शायद इस संदर्भ का पता नहीं होगा।[40]
Dr Ambedkar unavailable to speak at University of Vermont lectures, Sir Herbert Ames to take his place by fpbooks
साभार : द बरलिंगटन फ्री प्रेस एंड टाइम्स, 29 नवंबर 1932,पृष्ठ 6
पीपुल्स फोरम, चर्च ऑफ़ द मसाया, कनाडा (नवंबर, 1932)
बड़े दिन की छुट्टियों के कारण तीसरे गोलमेज सम्मेलन की कार्यवाही लंबी खिंच गई और इस कारण आंबेडकर कनाडा नहीं जा सके। अगर वे कनाडा जाते तो भारत में गांधी और कांग्रेस द्वारा किए जा रहे ढकोसलों का दुनिया के सामने पर्दाफाश करते। एस.पी.वी.ए. सांईराम ने मुझसे 1916 में आंबेडकर को कोलंबिया विश्वविद्यालय में उनके मित्र राबर्ट मेकफोल द्वारा लिखा गया एक पत्र साझा किया है। उस वक्त आंबेडकर की विश्वविद्यालय में पढ़ाई खत्म होने की कगार पर थी। मेकफोल ने आंबेडकर को लिखा कि वे अमरीका की ईस्ट कोस्ट से बाहर निकलकर अमरीका के अन्य हिस्सों को देखें और लंदन के लिए निकलने से पहले कनाडा में उनसे मिलें। यह आंबेडकर का कनाडा जाने का पहला मौका होता।[41] इसके करीब 15 साल बाद, 28 अक्टूबर, 1932 को ‘द गजट मॉन्ट्रियल’ में एक सूचना छपी जिसमें कहा गया था कि पीपुल्स फोरम के उस वर्ष के सत्र का आरंभ जिद्दू कृष्णमूर्ति द्वारा किया जाएगा। कृष्णमूर्ति को ‘एक युवा दार्शनिक’ बताते हुए यह कहा गया था कि पिछले कुछ सालों से उन्हें एक नए मसीहा के रूप में देखा जा रहा है। सन् 1945 में आंबेडकर ने जिद्दू कृष्णमूर्ति और उनकी गुरु एनी बेसेंट के बारे में जो लिखा था, उसकी ओर सांईराम ने मेरा ध्यान आकर्षित किया है। आंबेडकर ने एनी बेसेंट की जातिवादी सोच के बारे में विस्तार से बताते हुए लिखा था, “श्रीमती एनी बेसेंट एक सेवनिवृत ब्राह्मण रजिस्टार के पुत्र श्री कृष्णमूर्ति को भविष्य के मसीहा के रूप में तैयार करने के लिए जानी जाती हैं … जहां तक मुझे पता है वे अछूतों से गहरी घृणा करती हैं …।”[42]
जो सूचना प्रकाशित की गई थी, उसके अनुसार रविवार 13 नवंबर को आंबेडकर मॉन्ट्रियल के चर्च ऑफ़ मसाया (जो वर्मोंट विश्वविद्यालय के नजदीक ही था) में ‘भारत, गांधी और अछूत’ विषय पर बोलने वाले थे। सूचना में यह भी कहा गया था कि इस विषय में वर्तमान में लोगों की बहुत रूचि है। मॉन्ट्रियल में एक-से दिखने वाले कई पुराने चर्च हैं, जिनके चलते मैं इस चर्च को ढूंढ नहीं सका।[43] कहने की ज़रूरत नहीं कि आंबेडकर इस मौके का उपयोग अपने श्रोताओं को उस घटनाक्रम के बारे में बताने के लिए करते जिसके नतीजे में पूना पैक्ट हुआ और वे उस घटनाक्रम के संबंध में अपने विचार भी व्यक्त करते। यह आसानी से उनकी उत्कृष्ट कृति ‘व्हाट कांग्रेस एंड गांधी हैव डन टू द अनटचेबिल्स’ का पहला अध्याय हो सकता था। बाद में, आंबेडकर ने बीबीसी के साथ एक साक्षात्कार में गांधी के बारे में अपनी सोच को बेबाकी से व्यक्त किया। उन्होंने कहा– “मैं आपकी जान की रक्षा करने के लिए तैयार हूं, बशर्ते आप बहुत कठिन शर्तें न रखें। मगर मैं अपने लोगों की जान की कीमत पर आपकी जान की रक्षा नहीं करूंगा। मैं हमेशा कहता हूं कि चूंकि मैं गांधी से उनके विरोधी की हैसियत से मिला था इसलिए मुझे ऐसा लगता है कि मैं अधिकांश अन्य लोगों के बनिस्बत उन्हें बेहतर समझता हूं। उन्होंने अपने विषदंत मेरे सामने खोले और मैं उन्हें अंदर तक देख सकता था … वे पूरी तरह एक दकियानूसी हिंदू थे।”[44] जैसा कि पहले बताया जा चुका है, आंबेडकर उस बार कनाडा तो छोड़िए अमरीका भी नहीं जा सके और इस तरह यह भाषण भी नहीं दिया जा सका। कनाडा की यात्रा का अगला अवसर उन्हें एक दशक बाद 1942 में मिला जब इंस्टीट्यूट ऑफ़ पेसिफ़िक रिलेशन ने उन्हें उस संस्थान द्वारा आयोजित एक सम्मेलन में भाषण देने के लिए निमंत्रित किया। आंबेडकर ने इस सम्मेलन में ‘अछूतों की समस्याएं’ विषय पर शोध प्रबंध पढ़ा। इस विषय में व्यापक जनरूचि को देखते हुए उन्होंने इसे एक पुस्तक के रूप में प्रकाशित किया, जिसका शीर्षक ‘मिस्टर गांधी एंड द इमेन्सिपेशन ऑफ़ दि अनटचेबिल्स’ था।[45]
Dr Ambedkar was to speak at the Church of Messiah, Montreal (Canada) on ‘India, Gandhi and the Untoucha… by fpbooks
साभार : द गजट, मोंट्रियल, 28 अक्टूबर 1932, पृष्ठ 5
अफसोस कि किसी भी अन्य अभिलेखागार में इन भाषणों का मसविदा या यहां तक कि उनका संदर्भ भी उपलब्ध नहीं है। हमारे समुदाय के लोगों के लिए डॉ. आंबेडकर की हर टिप्पणी, चाहे वह कितनी ही छोटी क्यों न हो, अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि उससे हम कुछ सीख सकते हैं और उस पर विचार कर सकते हैं।
मैं इस लेख का अंत गोलमेज सम्मेलनों के लिए आंबेडकर के लंदन पहुंचने के अवसर पर एरिश सेलोमोन[46] द्वारा खींची गई तस्वीर से करना चाहूंगा। इस तस्वीर के बारे में कम ही लोग जानते हैं। इसके साथ ही मैं एमरी केलेन[47] द्वारा बनाए गए आंबेडकर के आधिकारिक कार्टून और गोलमेज सम्मेलनों का एक चित्र भी प्रकाशित कर रहा हूं। इन तीनों के लिए मैं नाटिंघम विश्वविद्यालय के प्रति आभारी हूं।


Dr Ambedkar’s official bio for the Round Table Conferences by fpbooks
आधिकारिक ‘कौन क्या है (हू इज हू)’ साभार : नाटिंघम विश्वविद्यालय [50]

[मैं चैथम हाउस (लंदन यूके) व सफक विश्वविद्यालय (बोस्टन यूएसए) जैसे संस्थाओं का आभारी हूं जिन्होंने या तो आंबेडकर के भाषणों को संरक्षित रखा या ऐसे अखबारों को डिजीटाइज किया जिनमें उनके व्याख्यानों के कार्यक्रम से संबंधित जानकारियां प्रकाशित की गईं थीं। हम सभी को इनका आभारी होना चाहिए। जैसा कि मैंने अपने पूर्व के लेखों में भी कहा है, मुझे उम्मीद है कि इन व्याख्यानों से संबंधित जानकारी आंबेडकर की भविष्य में प्रकाशित होने वाली जीवनियों में शामिल की जाएगी। भले ही इनमें से कुछ भाषण दिए नहीं गए परंतु वे यह तो बताते ही हैं कि उन्होंने अपनी सोच और अपने ज्ञान को कैसे साझा किया और साथ ही किस तरह उन्होंने हम लोगों की गरिमा और भारत के भाईचारे को पुनः स्थापित करने के लिए संघर्ष किया। मैं मेरे प्रिय मित्र एस.पी.वी.ए. सांईराम का विशेष रूप से आभारी हूं कि उन्होंने मेरे लेखन की लगातार समीक्षा की और बाबासाहेब द्वारा द्वारा और उनके बारे में लिखे गए असंख्य दस्तावेजों में से मुझे उपयोगी संदर्भ उपलब्ध करवाए। इससे मुझे लेखों की यह शृंखला लिखने में बहुत मदद मिली है। जय भीम!]
संदर्भ
[1] टाइम्स ऑफ़ इंडिया, पृष्ठ 12, 4 जनवरी, 1930
[2] https://securityconference.org/en/events/summits-roundtables-conversations/
[3] https://www.brookings.edu/articles/key-takeaways-reimagining-democracy-globally/
[4] https://www.chathamhouse.org/venue-hire
[5] “जनरल मीटिंग्स, सेक्शन मीटिंग्स एवं ग्रुप मीटिंग्स”। आंबेडकर एक जनरल मीटिंग में वक्ता थे। मुहम्मद शफी ने अपने भाषण की शुरुआत में बताया था कि चैथम हाउस में व्याख्यान देने के लिए उन्हें स्टेनली रीड (ब्रिटिश कंज़र्वेटिव राजनेता जो कुछ समय पूर्व तक टाइम्स ऑफ़ इंडिया के संपादक थे) ने आमंत्रित किया था। संभवतः रीड, जिन्होंने इस जनरल मीटिंग की अध्यक्षता की थी, ने ही बाबासाहेब को उनकी बात रखने के लिए आमंत्रित किया होगा।
[6] https://www.jstor.org/stable/3015844
[7] ऑनलाइन यहां देखें https://catalogue.nla.gov.au/catalog/7822291
[8] अनटचेबिल्स ऑर द चिल्ड्रेन ऑफ़ इंडियाज़ घेटो’ में “फ्रॉम मिलियंस टू फ्रैक्शंस”, बीएडब्ल्यूएस खंड 5
[9] ‘अनटचेबिल्स ऑर द चिल्ड्रेन ऑफ़ इंडियाज़ घेटो’ में “रूट्स ऑफ़ दि प्रॉब्लम : पैरेलल केसेस”, बीएडब्ल्यूएस खंड 5 एवं ‘व्हिच इस वर्स? स्लेवरी ऑर अनटचेबिलिटी’, बीएडब्ल्यूएस खंड 12
[10] इस बात को अपने भाषण में आगे स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा कि “यह धार्मिक समस्या नहीं है”। शायद उनका मतलब यह था कि गैर-हिन्दू धर्मों (जैसे इस्लाम और ईसाइयत) के धर्मग्रंथ जाति को मान्यता नहीं देते मगर इन धर्मों को मानने वाले जो लोग भारतीय उपमहाद्वीप में रहते हैं, उनमें भी जाति प्रथा है। और यह उनके धर्मों के हाशियाकृत तबकों व अन्यों के लिए भी एक नागरिक समस्या है।
[11] उन्होंने आगे चलकर इस विचार को विस्तार दिया :https://baws.in/books/baws/EN/Volume_07/pdf/300
[12] शायद उनका इशारा ‘क्षेत्रीय लोकतंत्र’ पर अमरीकी कैथोलिक बुद्धिजीवी ओरिसटिस ब्राउनसन की कृति की ओर था, जिसमें वे बेंजामिन डिज़रायली द्वारा उनकी कृति ‘द अमेरिकन रिपब्लिक’ में इस शब्द के प्रयोग की चर्चा करते हुए लिखते हैं कि : “अमरीकी संविधान इस अर्थ में लोकतांत्रिक है कि जनता सार्वभौम है, सारे कानूनों का निर्माण और सार्वजनिक मामलों में फैसले जनता के नाम पर किए जाते है। इसके अलावा, देश के शासकों को जनता ही चुनती है और वे जनता के प्रति वफादार होते हैं। मगर वे लोग एक विशेष क्षेत्र से बंधे होते हैं, जिसे, श्री डिज़रायली ‘क्षेत्रीय लोकतंत्र’ कहते हैं। उनका यह नामकरण – जितना वे मानते होंगे – उससे भी ज्यादा उपयुक्त है।” मगर यह साफ़ नहीं है कि क्या ओरिसटिस की कोई पुस्तक आंबेडकर की लाइब्रेरी में थी या आंबेडकर ने क्या कोई ऐसी पुस्तक पढ़ी थी जिसमें ओरिसटिस की कृतियों का हवाला दिया गया हो। आंबेडकर की प्रकाशित कृतियों में ओरिसटिस या जिस अर्थ में ‘क्षेत्रीय लोकतंत्र’ शब्द का इस्तेमाल किया गया है, उनकी कोई चर्चा नहीं है, हालांकि आंबेडकर ने कई मौकों पर डिज़रायली को अवश्य उद्धृत किया है। जो भी हो, बाबासाहेब जो कह रहे हैं वह यह है कि आंख बंद कर लोगों को क्षेत्रीय आधार पर विभाजित करने से पहले समाज में सुधार किए जाने चाहिए। और यही समस्या का सही हल है।
[13] बीएडब्ल्यूएस, खंड 17, भाग 3, https://baws.in/books/baws/EN/Volume_17_03/pdf/91
[14] टाइम्स ऑफ़ इंडिया, 2 अक्टूबर 1930। इस यात्रा को इसलिए स्थगित किया गया क्योंकि सम्मलेन की तारीख के पीछे खिसकने की संभावना थी।
[15] टाइम्स ऑफ़ इंडिया,18 अक्टूबर, 1930
[16] भाऊराव गायकवाड़ को पत्र दिनांक 11 अक्टूबर 1930। ‘खंड 21, कोर्रेस्पोंडेंस’ से
[17] टाइम्स ऑफ़ इंडिया, 27 अक्टूबर 1930
[18] टाइम्स ऑफ़ इंडिया, 12 दिसंबर 1930
[19] पत्र दिनांक 15 जनवरी 1931 जिसे 42, क्लिफ्टन गार्डन्स, मायदा वेल से प्रेषित किया गया था।
[20] एंग्लो-आयरिश शारलॉट डेसपर्ड, लन्दन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स के पूर्व विद्यार्थी, महिलाओं को मताधिकार देने के समर्थक, उपन्यासकार और आयरलैंड में स्वशासन के समर्थक थे। साउथ एशियन ब्रिटेन की उनकी जीवनी यहां उपलब्ध है : https://southasianbritain.org/people/charlotte-despard/
[21] एक समाजवादी, औपनिवेशिकता विरोधी और महिलाओं के मताधिकार के समर्थक। चर्चिल आर्काइव्ज ट्रस्ट में उनकी जीवनी यहां उपलब्ध है : https://archives.chu.cam.ac.uk/collections/research-guides/the-member-for-africa-fenner-brockway
[22] गांधी और ब्रिटिश सरकार के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाने वाले एक क्वेकर (एक प्रोटोस्टेंट ईसाई पंथ का सदस्य)। उनकी जीवनी यहां देखी जा सकती है :https://www.quakersintheworld.org/quakers-in-action/192/Horace-Alexander
[23] दस्तावेज यहां उपलब्ध है : https://visitingamuseum.com/2024/07/10/chatham-township-historical-society-red-brick-schoolhouse-museum-24-southern-boulevard-chatham-nj-07928/
[24] हाथीट्रस्ट साईट पर उपलब्ध : https://hdl.handle.net/2027/uc1.$b593963
[25] वर्णन यहां उपलब्ध है : https://www.nj.gov/dca/njht/funded/sitedetails/Mount_Vernon_School.shtml
[26] ‘थॉट्स ऑन पाकिस्तान’ की भूमिका में उन्होंने अस्थिर विचारों और स्थापित दृष्टिकोण के बीच का अंतर साफ़ किया है।
[27] टाइम्स ऑफ़ इंडिया, 20 दिसंबर 1932
[28] यहां देखिये : https://dc.suffolk.edu/fhf-images/index.2.html
[29] जीवन वृत्त : at https://archive.mith.umd.edu/gcr/public/displayPerson.php%3Fid=22.html
[30] नोबेल पुरस्कार समिति द्वारा जारी उनका जीवन वृत्त यहां उपलब्ध है : https://www.nobelprize.org/prizes/peace/1933/angell/biographical/
[31] ब्रिटिश संसद की कार्यवाहियों का विवरण यहां उपलब्ध है : https://api.parliament.uk/historic-hansard/commons/1932/oct/31/round-table-conference-delegates
[32] टाइम्स ऑफ़ इंडिया, 8 नवंबर 1932
[33] राष्ट्रीय अभिलेखागार, पत्र दिनांक 10 नवंबर 1932 : आइडेंटिफायर : NAIDLB00017255
[34] टाइम्स ऑफ़ इंडिया, 21 नवंबर 1932
[35] टाइम्स ऑफ़ इंडिया, 24 जनवरी 1933
[36] यहां उपलब्ध : https://www.vermontpublic.org/vpr-news/2021-10-01/fleming-reimagined-a-university-museums-journey-to-decolonize-its-collection
[37] यहां उपलब्ध : https://www.findagrave.com/memorial/279/john-dewey
[38] जब आंबेडकर कोलंबिया विश्वविद्यालय से अपनी एलएलडी की डिग्री प्राप्त करने के लिए न्यूयॉर्क की ओर यात्रा कर रहे थे, उसी दौरान प्रोफेसर डेवी की मृत्यु हो गई थी।
[39] नोबेल पुरुस्कार से सम्बंधित दस्तावेज यहां उपलब्ध हैं : https://www.nobelprize.org/nomination/archive/show_people.php?id=3756
[40] समस्त उद्घोषणाएं यहां प्रकाशित हैं : https://governor.vermont.gov/search/node?keys=Ambedkar
[41] पत्र यहां उपलब्ध हैं : https://baws.in/letters?letter=054b5bf4e96f4619a33755fd7c39cf68
[42] ‘व्हाट कांग्रेस एंड गांधी हैव डन टू द अनटचेबिल्स’ इसे यहां पढ़ा जा सकता है : https://baws.in/books/baws/EN/Volume_09/pdf/32
[43] मेरे अंदाज़ से यह मोंट्रियल स्थिति दि युनिटेरियन चर्च रहा होगा https://www.ucmtl.ca/
[44] सन् 1955 की शुरुआत में लिया गया एक साक्षात्कार, जिसका लिप्यान्तरण यहां उपलब्ध है : https://baws.in/books/baws/EN/Volume_17_01/pdf/456
[45] ‘मिस्टर गांधी एंड दि इमेनसीपेशन ऑफ़ द अनटचेबिल्स’ की भूमिका से; बीएडब्ल्यूएस खंड 9; यहां उपलब्ध है : https://baws.in/books/baws/EN/Volume_09/pdf/422
[46] वे कदाचित दुनिया के पहले फोटो पत्रकार थे जिन्होंने अपने इरमनोक्स कैमरा से अनेक बेबाक तस्वीरें लीं। वे अपना कैमरा अपने हैट में छुपाकर रखते थे ताकि उनके चित्रों के पात्र कैमरा देखकर असहज न हो जाएं। उन्हें नाजियों ने गिरफ्तार कर लिया और 1944 में ऑशविट्ज़ यातना कैंप में उनकी मृत्यु हो गई।
[47] अग्रणी व्यंग्य चित्रकारों में से एक जिन्हें प्रथम विश्वयुद्ध में जबरदस्ती हंगरी की सेना में भर्ती किया गया था और जो जीवनपर्यंत युद्ध के विरोधी रहे। मूल छायाचित्र यहां उपलब्ध है : https://www.nottingham.ac.uk/research/groups/conferencing-the-international/images/representations/kelen/kelen-ambedkar-bhimrao-ramji.jpg
[48] मूल छायाचित्र यहां उपलब्ध है : https://www.nottingham.ac.uk/research/groups/conferencing-the-international/representations/candid-camera.aspx?MediaGallery_List_GoToPage=2
[49] मूल छायाचित्र यहां उपलब्ध है : https://www.nottingham.ac.uk/research/groups/conferencing-the-international/representations/caricature.aspx?MediaGallery_List_GoToPage=5
[50] दस्तावेज यहां उपलब्ध है : https://www.nottingham.ac.uk/research/groups/conferencing-the-international/documents/india-office-guides/rtc1-delegates.pdf
[51] मार्कड अप (संशोधित व परिष्कृत) दस्तावेज यहां उपलब्ध है : https://www.nottingham.ac.uk/Research/Groups/Conferencing-the-International/images/Representations/IO-Guides/Ambedkar-markups.jpg
(मूल अंग्रेजी से अनुवाद : अमरीश हरदेनिया, संपादन : नवल/अनिल)
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