कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) केवल देश के हालात पर एक व्यंग्यात्मक टिप्पणी थी, मगर वह भारत माता के लाखों युवा सपूतों की आशा का केंद्र बन गई। यह संयोग मात्र नहीं है। दरअसल सीजेपी उन लोगों की आवाज़ बन गई है जो भ्रष्ट व्यवस्था से आजिज़ आ चुके हैं और बदलाव चाहते हैं। मगर सवाल यह है कि बदलाव की इस पुकार में मुसलमान, दलित और आदिवासी कहां हैं?
सीजेपी का जन्म भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की एक तीखी टिप्पणी से हुआ। उन्होंने मीडिया और सोशल मीडिया में व्यवस्था के मुखर युवा आलोचकों को कॉकरोच की संज्ञा दी। आम आदमी पार्टी से जुड़े रहे अमरीका निवासी अभिजीत दिपके ने सोशल मीडिया ‘एक्स’ पर कॉकरोच जनता पार्टी की नींव रखी और ट्वीट करना शुरू कर दिया। जल्दी ही उन्हें लाइक्स मिलने लगे, लोग उनकी बातों को शेयर करने लगे और उन पर लोग अपने विचार व्यक्त करने लगे। कुछ ही दिनों में सीजेपी ने सनसनी फैला दी और उसे देश के जीने की आशा बताया जाने लगा।
शुरुआत में इस नई पार्टी ने अपना घोषणापत्र सोशल मीडिया मंचों जैसे इंस्टाग्राम, फेसबुक और एक्स पर प्रकाशित किया। इसमें पांच मांगे थीं– (1) सेवानिवृत्ति के बाद जजों को राज्यसभा में न भेजा जाए, (2) अगर एक भी वैध मतदाता को वोट देने के हक से महरूम किया जाता है तो मुख्य चुनाव आयुक्त को यूएपीए [गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम] के तहत गिरफ्तार किया जाए, (3) संसद और मंत्रिपरिषद में महिलाओं को 50 फीसद आरक्षण दिया जाए, (4) अंबानी और अडानी के मीडिया संस्थाओं के लाइसेंस रद्द किया जाएं ताकि मीडिया स्वतंत्रता से काम कर सके और (5) जो विधायक या सांसद अपनी पार्टी छोड़कर दूसरे पार्टी में शामिल होते हैं उन्हें 20 साल तक चुनाव लड़ने की पात्रता न हो।
केवल दो दिन में ही सीजेपी ने इंस्टाग्राम पर 2.2 करोड़ फॉलोअर जुटा लिए, जो सत्ताधारी भाजपा के फॉलोअर्स से अधिक थे। करीब 40,000 से अधिक लोगों ने औपचारिक रूप से इस नई पार्टी की सदस्यता ले ली। सोनम वांगचुक जैसे नामचीन सामाजिक कार्यकर्ताओं के उससे जुड़ने से इस आंदोलन को और गति मिली। वांगचुक ने कहा कि वे ‘मानसेवी [ऑनरी] कॉकरोच’ हैं और घोषणा की कि वे 6 जून को सीजेपी द्वारा दिल्ली में आयोजित विरोध प्रदर्शन में हिस्सा लेंगे। बॉलीवुड से अनुराग कश्यप और सोनाक्षी सिन्हा इंस्टाग्राम पर सीजेपी के फॉलोअर बन गए और तृणमूल कांग्रेस की सांसद महुआ मोइत्रा और कीर्ति आज़ाद ने इस व्यंग्यात्मक अभिव्यक्ति को गंभीर राजनीतिक विमर्श की तरह लिया।
यह सब अद्भुत है। मगर एक मुसलमान चिंतक बतौर मैं इस आनंदोत्सव में शामिल होने को तैयार नहीं हूं। मुझे लगता है कि इस पूरे तमाशे में से कुछ गायब है – और वह बहुत महत्वपूर्ण है।
सीजेपी के घोषणापत्र को एक बार फिर से पढ़िए – ध्यान से और तसल्ली से। खुद से पूछिए इसमें मुसलमान कहां हैं, इसमें दलित कहां हैं? इसमें आदिवासी कहां हैं? क्या इसमें कहीं खून के प्यासी भीड़ द्वारा मासूमों की लिंचिंग है? क्या इसमें बुलडोज़र न्याय से जुड़े सवाल हैं? क्या इसमें वक्फ कानून में बदलाव है? क्या इसमें एक धर्म विशेष के दो करोड़ नागरिकों का प्रणालीगत आर्थिक एवं सामाजिक बहिष्करण है? क्या इसमें ग्रामीण क्षेत्रों में होने वाली जातिगत हिंसा है, जिसमें लोगों की जानें जाती हैं और जिसकी चर्चा इंस्टाग्राम पर कभी नहीं होती?
इन मुद्दों पर सीजेपी की चुप्पी केवल एक संयोग नहीं है। यह इस आंदोलन का प्रणालीगत सच है।
सीजेपी ने जो पांच मांगें उठाई हैं, उनसे कोई भी असहमत नहीं हो सकता – चाहे वह पूना का कोई उदारवादी हिंदू हो, टोरंटो में रहना वाला कोई सिक्ख अप्रवासी भारतीय, या फिर इंदौर का कोई कॉलेज विद्यार्थी। सभी इन मांगों के समर्थन में अपना सर हिलाएंगे। न्यायप्रणाली में सुधार, निष्पक्ष चुनाव, आज़ाद मीडिया और सख्त दलबदल विरोधी कानून – ये सभी उस वर्ग के लिए मुद्दे हैं जिसे यह लग रहा है कि व्यवस्था उसके लिए काम नहीं कर रही है। मगर समस्या यह है कि मुसलमानों, दलितों और आदिवासियों के लिए यह व्यवस्था कभी बनाई ही नहीं गई थी। इन वर्गों की शिकायत यह नहीं है कि व्यवस्था बिखर गई है। उनकी शिकायत यह है कि वे हमेशा से व्यवस्था के निशाने पर रहे हैं।
यह अंतर केवल शब्दजाल नहीं है। यह सुधार और न्याय की बीच का अंतर है।
सीजेपी अपने 2.2 करोड़ फॉलोअर्स को विद्यमान भारत के अधिक साफ़-सुथरे, अधिक न्यायपूर्ण और अधिक जवाबदेह संस्करण का सपना दिखा रही है और वे उस पर मंत्रमुग्ध हैं। एक ऐसा भारत, जिसमें सेवानिवृत्ति के बाद जजों को खरीदा नहीं जा सकेगा, एक ऐसा भारत जिसमें आपके वोट की कीमत होगी। ये बिलकुल वाजिब मांगें हैं। मगर ये मांगें उस वर्ग की हैं, जिसे अपेक्षाकृत अधिक विशेषाधिकार पहले से ही हासिल हैं। यह वह वर्ग है जो यह मानता है कि अगर इस देश का मूल ढांचा भ्रष्टाचार से मुक्त हो जाए तो वह सबके लिए बेहतर होगा। मगर मुसलमान, दलित और आदिवासी अपने भोगे हुए अनुभव के आधार पर कह सकते हैं कि यह मान्यता सही नहीं है।
हाथरस की दलित युवती को भ्रष्टाचार-मुक्त न्याय व्यवस्था से ज्यादा ऐसी न्याय व्यवस्था की दरकार थी जो उस पर भरोसा करे। उत्तर प्रदेश में केवल व्हाट्सएप पर किसी संदेश को फॉरवर्ड करने के कारण जेल में सड़ रहे मुसलमान नौजवान को मीडिया की आज़ादी से ज्यादा एक ऐसे देश की ज़रूरत है जो उसे केवल उसके धर्म के कारण मुजरिम न मान ले। सीजेपी का घोषणापत्र इन दोनों के बारे में बात नहीं करता। इसलिए नहीं क्योंकि पार्टी को यह पता नहीं है बल्कि इसलिए कि अगर वह इन दोनों की बात करेगी तो उसके फॉलोअर्स घट जाएंगे। इससे यह आंदोलन खतरनाक और राजनीतिक बन जाएगा। बॉलीवुड के सेलेब्रिटी उससे किनारा कर लेंगे और सोनम वांगचुक उसके साथ अपने जुड़ाव के बारे में स्पष्टीकरण जारी करने में जुट जाएंगे।
इस तरह के आंदोलनों के लिए एक पारिभाषिक शब्द है – बहुसंख्यक उदारवाद। यह असहमति का लबादा ओढ़े रहता है मगर इसका उद्देश्य बहुसंख्यकों को सुकून और आराम देना होता है। वह सत्ता की आलोचना करता है, मगर पूर्वाग्रहों की नहीं। वह एक बेहतर व्यवस्था चाहता है मगर केवल उन लोगों के लिए जिनके हितार्थ इस व्यवस्था का निर्माण हुआ है। यह शिक्षित, आर्थिक-सामाजिक दृष्टि से ऊंचे उठ रहे लोगों का आंदोलन है जो सत्ता के संस्थानों से निराश हैं। मगर यह उन लोगों की आवाज़ नहीं है, जिन्हें सत्ता के प्रतिष्ठानों में कभी प्रवेश ही नहीं मिला।
यह सब कहने का यह अर्थ नहीं है कि सीजेपी की स्थापना किसी कुत्सित उद्देश्य से की गई है। दिपके का मूल ट्वीट केवल एक मजाक था, जो यथार्थ बन बैठा। और किसी मजाक से यह उम्मीद नहीं की जा सकती है कि वह सबकी मुक्ति, सबकी भलाई की अवधारणा की बात करेगा। मगर असली खतरा इस आंदोलन की मासूमियत से है। यह 2.2 करोड़ लोगों को अहसास दिला सकता है कि वे एक क्रांति में सहभागी हैं। मगर एक वास्तविक क्रांति, जिसे हिंदू बहुसंख्यकवाद, जातिवाद और मुसलमानों के खिलाफ राज्य-प्रायोजित हिंसा से मुकाबला करना होगा, इस क्रांति के दृश्यपटल से गायब है।
महुआ मोइत्रा इस व्यंग्यात्मक अभिव्यक्ति को महत्व देती हैं। अनुराग कश्यप उसमें शामिल हो जाते हैं। यह कोई मामूली बात नहीं है। यह बताती है कि सीजेपी दरअसल क्या है और किन मुद्दों में उसकी कोई रूचि नहीं है। मोइत्रा मुसलमानों के बारे में तभी बात करती हैं जब उन्हें लगता है कि इससे चुनाव में उन्हें लाभ होगा। एक फिल्म निर्माता बतौर कश्यप चुनिंदा आज़ादियों पर मुखर हैं मगर बाकी पर चुप। सीजेपी को उनके समर्थन से यह जाहिर है कि इस पार्टी की कुछ अनकही सीमाएं हैं।

पसमांदा-बहुजन ऐसा आंदोलन क्यों खड़ा नहीं कर सकते?
मगर इससे पहले कि सब सीजेपी की समालोचना में जुट जाएं, इससे पहले कि दलित-बहुजन और पसमांदा मुसलमान बुद्धिजीवी खुद ही स्वयं का हाशियाकरण करने लगें और उसे विश्लेषण बताने लगें। इसके पहले कुछ कठिन प्रश्न पूछे जाना ज़रूरी हैं। क्या कारण है कि अमेरिका में बस चुके एक पूर्व आप कार्यकर्ता का मजाक 2.2 करोड़ लोगों द्वारा समर्थित राष्ट्रीय आंदोलन बन जाता है और हम, जिनके पास आंबेडकर, फुले, कबीर, फातिमा शेख और पसमांदा आंदोलन की विरासत है, थोड़ी-सी भी हलचल नहीं मचा पा रहे हैं?
इस प्रश्न का उद्देश्य आत्म-निंदा नहीं है वरन रोग की जड़ को पहचानना है। यह इसलिए क्योंकि इस प्रश्न का उत्तर हमारा सामना उन ढांचागत समस्याओं से करवाएगा जिन्हें केवल विचारधारात्मक स्पष्टता नहीं सुलझा सकती।
पहली समस्या है लोगों का ध्यान खींच नहीं पाना। सीजेपी इसलिए वायरल हुई क्योंकि उसका संस्थापक डिजिटल दुनिया से था। वाक्चातुर्य, अपनी बात को कम शब्दों में कहने, और वर्चस्वशाली संस्कृति के सापेक्ष रखा – डिजिटल दुनिया इन सारी क्षमताओं को पुरस्कृत करती है।
दूसरी समस्या ज्यादा दुखद है क्योंकि वह हमारी आतंरिक समस्या है। पसमांदा व दलित-बहुजन आंदोलन हमेशा से शानदार चिंतक पैदा करने में बहुत आगे रहे हैं। मगर वे शानदार संगठक पैदा करने में उतने ही फिसड्डी साबित हुए हैं। इन आंदोलनों की बौद्धिक परंपरा काफी समृद्ध है मगर उनका संगठनात्मक ढांचा बहुत कमज़ोर है। आंबेडकर ने हमें मुक्ति का व्याकरण सिखाया मगर हम उसकी मदद से एक वाक्य भी नहीं लिख सके। लगभग हर दशक में कुछ मेधावी दलित-बहुजन शख्सियतें उभर के आती हैं जो व्यवस्था की बारीकी से समालोचना करते हैं और सत्ताधारी आसानी से उसे नज़रंदाज़ कर देते हैं। ऐसा इसलिए नहीं कि समालोचना गलत होती है, बल्कि इसलिए कि बिना संगठन के समालोचना एक ऐसी चिट्ठी है जिसे लाल डिब्बे में डाला ही नहीं गया।
गठबंधन न बना पाना हमारी तीसरी समस्या है। पसमांदा और दलित दोनों संरचनात्मक हिंसा के शिकार रहे हैं, अलग-अलग कथित धार्मिक बहानों से दोनों को अछूत होने का कलंक ढोने पर मजबूर किया जाता रहा है और आर्थिक दृष्टि से दोनों निचले पायदानों पर हैं। मगर फिर भी पसमांदा मुस्लिम कार्यकर्ता और दलित आंबेडकरवादी कार्यकर्ता अक्सर एक-दूसरे को उतनी ही शिद्दत से संदेह की दृष्टि से देखते हैं, जितनी शिद्दत से वे उदारवादी ब्राह्मणों को अपना साथी मानते हैं। यह खाई स्वाभाविक नहीं है। यह खाई खोदी गई है और समय-समय पर यह सुनिश्चित किया जाता रहा है कि यह भरने न पाए। इस खाई को खोदने वाला राजनीतिक प्रतिष्ठान, कई बहुजन कार्यकर्ताओं से कहीं बेहतर तरीके से यह समझता है कि दलित-पसमांदा गठबंधन पर राज करना उसके लिए बहुत कठिन होगा। सीजेपी के सामने यह समस्या नहीं है। सांस्कृतिक दृष्टि से उसके समर्थक पहले ही एकजुट हैं। वे एक-सी भाषा में बात करते हैं और भारत को कैसा दिखना और होना चाहिए, इस बारे में उनकी सोच एक-सी है। पसमांदा-बहुजन आंदोलनों को भी – उनके बीच के मतभेदों और अंतरों के बावजूद – ऐसी ही एकता कायम करनी होगी। यह काम कठिन है और जल्दी में नहीं होगा। मगर यह ज़रूरी है।
दलित-बहुजन कार्यकर्ताओं को क्या करना चाहिए?
इस प्रश्न का उत्तर बेशक एक कड़वी गोली है, लेकिन ज़रूरी गोली है। दलित-बहुजन कार्यकर्ताओं को ऐसी कुछ चीज़ें करना बंद करना होगा जो वे हमेशा से करते आ रहे हैं और जिन्हें करना उन्हें बहुत भाता है। साथ ही, उन्हें ऐसी कुछ चीज़ें करनी शुरू करनी होंगीं जो उन्हें असहज करती हैं – ऐसी चीज़ें जो नीरस होंगीं, जिन्हें करने में वक्त लगेगा और जिन्हें करने के लिए अहं का त्याग करना होगा। ये ऐसे काम होगें जो जायज़ गुस्से पर आधारित आंदोलन कम ही कर पाते हैं।
सबसे पहले, आंदोलन को अपने नेताओं को बुद्धिजीवियों और संगठकों में बांटना चाहिए। इसलिए नहीं क्योंकि एक ही व्यक्ति बुद्धिजीवी और संगठक दोनों नहीं हो सकता बल्कि इसलिए क्योंकि हमें एक ही व्यक्ति से दोनों काम करने की उम्मीद नहीं करनी चाहिए। यदि कोई अध्येता वक्फ कानूनों में संशोधनों की धज्जियां उड़ाते हुए एक तीखा और तार्किक लेख लिख सकता है तो हमें उससे यह अपेक्षा नहीं करनी चाहिए कि वह मेरठ में मतदान बूथ स्तर पर कार्यकर्ताओं का समन्वय भी करे। ये दोनों काम करने के लिए अलग-अलग कौशल और अलग-अलग स्वभाव की ज़रूरत होती है। और इनमें लगने वाला समय भी अलग-अलग होता है। यदि वामपंथ के पैर भारत से लगभग उखड़ गए हैं तो इसका एक कारण यह है कि वामपंथी पार्टियां चाहती थीं कि उनके बेहतरीन विचारक, उतने ही बेहतरीन ज़मीनी कार्यकर्ता भी हों। नतीजे में ऐसे लोग उभरे जो जिनकी दोनों कामों में दक्षता औसत दर्जे की थी। दलित-बहुजन संगठनों को सोच-समझ कर श्रम विभाजन करना होगा। चिंतकों को चिंतन करने दें और संगठकों को संगठन। चिंतक अपने विचार साझा करें मगर संगठकों से यह उम्मीद न की जाए कि वे प्रकाशन-योग्य विश्लेषण करें।
दूसरे, दलित-बहुजनों के संगठनों के अंदर जातिगत विभेदों और ऊंच-नीच से कड़ाई और ईमानदारी से निपटा जाए। बहुजन समाज पार्टी (बसपा) में जाटवों का दबदबा, महाराष्ट्र के आंबेडकरवादियों में महारों का वर्चस्व और सभी दलितों का प्रतिनिधि होने का दावा करने वाले संगठनों में वाल्मीकियों और मुसहरों की अनुपस्थिति – ये सब कोई नज़रअंदाज़ करने लायक मामूली चीज़ें नहीं हैं। ये ढांचागत विरोधाभास हैं, जिनसे फायदा उठाने में हमारे विरोधी कोई कसर बाकी नहीं रखते। जहां तक दलित-बहुजन आंदोलन का सवाल है, वह या तो ऐसा कुछ होने से इंकार करता आया है या उसे स्वीकार करते हुए भी बदलाव करने के लिए तैयार नहीं रहा है।
तीसरी और सबसे व्यावहारिक बात यह है कि दलित-बहुजनों को संवाद के उन चैनलों पर काबिज़ होना चाहिए जिन्हें अब तक वे या तो दूसरों से उधार लेते आए हैं या जिन्हें उन्होंने दूसरों के हवाले कर दिया है। सीजेपी इंस्टाग्राम पर वायरल हो गई। मगर दलित और पसमांदा कार्यकर्ता मुख्यतः जो लेखन करते आये हैं, उसे वे ही लिखते हैं और वे ही पढ़ते हैं। उर्दू में लंबे-लंबे लेख और आंबेडकरवादी पत्रिकाएं निश्चित रूप से कोई न कोई भूमिका अदा करती आई हैं मगर वे उस तरह की एकजुटता का निर्माण नहीं कर सकीं हैं जो 2.2 करोड़ लोगों को एक हफ्ते में एक मंच पर ले आए। इसका कतई यह आशय नहीं है कि हम वायरल होने की खातिर सूक्ष्म और गहन विश्लेषण को दरकिनार कर दें। इससे आशय यह है कि हम यह समझें कि संवाद के माध्यम विचारधारा-निरपेक्ष नहीं हैं और यह भी कि डिजिटल मैदान को उच्च जातियों की संस्कृति के प्रसार के लिए खाली छोड़ देना कोई सिद्धांतवादी कवायद नहीं है। यह बिना किसी के कहे आत्मसमर्पण करना है।
पिट्ठू सीजेपी से बेहतर प्रतिरोध कैसे हो
यहां मैं पिट्ठू शब्द का उपयोग जानते-बूझते कर रहा हूं। सीजेपी पसमांदा-बहुजनों की शत्रु नहीं है। लेकिन यह किसी भी शत्रु से ज्यादा खतरनाक है। यह एक ऐसा आंदोलन है जो बहुजनों की ऊर्जा का उपयोग करेगा, बहुजन उसके विरोध प्रदर्शनों में हिस्सा लेंगे, बहुजन उसके संदेशों को शेयर करेंगे और वह बहुजनों की राजनीतिक साख का उपयोग करेगा। मगर यह उनसे जुदा वर्ग के हितों को पूरा करेगा। ऐसा इसलिए नहीं होगा क्योंकि यह आंदोलन पसमांदा-बहुजनों के प्रति कोई द्वेष भाव रखता है, बल्कि ऐसा उसके नियंताओं की प्रकृति के कारण होगा। अगर बहुजन सीजेपी का बिना शर्त समर्थन करते हैं तो वे अपना ही हाशियाकरण करेंगे, हालांकि उन्हें लगेगा कि वे एकजुटता का प्रदर्शन कर रहे हैं।
तो फिर सीजेपी से अधिक प्रभावी प्रतिरोध की शक्ल क्या होनी चाहिए? उसकी शक्ल उससे मुकाबिल इंस्टाग्राम अकाउंट नहीं हो सकती और न ही उसके खिलाफ मीम अभियान हो सकता है। और अगर हम एक प्रेस विज्ञप्ति जारी कर सीजेपी की मज़म्मत करेंगे तो उससे कुछ भी हासिल नहीं होगा, बल्कि उससे यह लगेगा कि मज़म्मत करने वाले सीजेपी की लोकप्रियता से जलभुन रहे हैं और यह भी कि सीजेपी को निशाना बनाया जा रहा है। इसकी बजाय, पसमांदा-बहुजन कार्यकर्ताओं को एक समानांतर आंदोलन का निर्माण करना चाहिए – सीजेपी के प्रतिस्पर्धी बतौर नहीं वरन उसकी कमियों की पूर्ति करने की एक कोशिश के रूप में। दलित बुद्धिवीवियों, मुस्लिम पसमांदा अध्येताओं, ओबीसी समुदाय के नेताओं और आदिवासियों के हक के लिए संघर्षरत संगठनों को एक साथ मिलकर सीजेपी के एजेंडा में नए बिंदु जोड़ने की बात करनी चाहिए। उन्हें यह कहना चाहिए कि सीजेपी की पांचों मांगें एकदम उचित और सही हैं, मगर वे काफी नहीं हैं। ये कुछ और मांगें हैं जो भारत की दो-तिहाई से भी ज्यादा जनता की हैं। अगर वे इन मांगों को अपने एजेंडा में शामिल करते हैं तो उनका आंदोलन सच्चे अर्थों में समावेशी बन जाएगा और अगर वे ऐसा नहीं करते तो उनके 2.2 करोड़ फॉलोअर्स को पता चलेगा कि दरअसल यह किनकी और किनके लिए क्रांति है।
यह तो हुई सीजेपी से जुड़ा तात्कालिक मुद्दा। मगर इससे भी ज्यादा ज़रूरी है एक दीर्घकालिक कार्यक्रम। इसके लिए मुसलमानों, दलितों और आदिवासियों को एक साथ आना होगा। यह ज़रूरी नहीं कि वे एक संयुक्त पार्टी का गठन करें। मगर उन्हें एक गठबंधन बनाना होगा जिसमें इनमें से हरेक का संगठनिक ढांचा और संवाद चैनल सबके इस्तेमाल के लिए उपलब्ध हों और जिसके घटक गठबंधन के सामूहिक हितों और मांगों के खातिर अपने हितों को पीछे रखने को तैयार हों। वे विशिष्ट मुद्दों पर बात करें, ऐसे मुद्दों पर जिनके मामले में जीत हासिल की जा सकती है – जैसे भूमि अधिकार, जैसे जातिगत जनगणना और जैसे यूएपीए के तहत कैद मुसलमान, आदिवासी और दलित राजनैतिक कैदियों की रिहाई। ये ठोस मुद्दे हैं और इनके मामलों में कुछ हो रहा है या नहीं यह पता लगाया जा सकता। ये ऐसे मुद्दे नहीं हैं जो ‘प्रणालीगत सुधारों’ के कुहासे में खो जाएं।
सीजेपी के सामने असली मुद्दा यह नहीं है कि वह 6 जून को दिल्ली में अपने प्रदर्शन स्थल को लोगों से भर सका या नहीं। मुद्दा यह है कि कैमरों के सामने और नारों के शोर के बीच वह ऐसी बातें कहने की हिम्मत जुटा पाती है या नहीं जो उसके फॉलोअर्स को असहज करें।
तब तक हम लोग, जो यह जानते हैं कि वे असली कॉकरोच कौन हैं जिनसे व्यवस्था वाकई नफरत करती है, केवल ध्यान से पूरे घटनाक्रम पर नज़र रख सकते हैं। मगर हमें कोई भ्रम पालने की ज़रूरत नहीं है।
(मूल अंग्रेजी से अनुवाद : अमरीश हरदेनिया, संपादन : नवल/अनिल)
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