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कथावाचक कांड : ओबीसी अब भी बेपेंदी के लोटे

गत 21 जून को उत्तर प्रदेश के इटावा में पिछड़े वर्ग के दो भागवत कथावाचकों को ब्राह्मणों द्वारा अपमानित किया गया। इस घटना में एक ब्राह्मणी महिला का मूत्र भी उनके ऊपर छिड़का गया। इस घटना पर व्यापक प्रतिक्रियाएं सामने आईं। बुद्धिवाद और तर्कवाद के आलोक में जेर-ए-बहस पढ़ें, सुशील मानव की यह रपट

उत्तर प्रदेश के इटावा के जिला मुख्यालय से 35 किलो मीटर दूर एक गांव है– दादरपुर। इस गांव में 103 घर ब्राह्मण हैं। इसके अलावा ठाकुर व दलित समुदाय के लोग भी बड़ी संख्या में हैं। गांव के किनारे एक मंदिर है, जहां सामाजिक सहभागिता से समय-समय पर धार्मिक कार्यक्रम होते रहते हैं। मंदिर के रख-रखाव का ज़िम्मा वृद्ध पुजारी रामस्वरूप दास करते थे। दो साल पहले 2023 में मंदिर में भागवत कथा हुई थी। मंदिर के पुजारी ने गांव के लोगों की सहमति और चंदा लेकर इस साल भी यह आयोजन करवाया। गत 21 जून को कथा शुरू हुई। खबर यह आई कि कथावाचक मुकुटमणि यादव और संत सिंह यादव को ब्राह्मण लोगों ने अपमानित किया व उनके साथ मारपीट की। वायरल वीडियो में कथावाचकों ने कहा कि उनकी जाति के कारण उन्हें मारा-पीटा गया और एक ब्राह्मण महिला का मूत्र छिड़का गया।

भागवत कथा के लिए गांव के ही ब्राह्मण परिवार जयप्रकाश तिवारी और रेणु तिवारी को मुख्य यजमान बनाया गया। जयप्रकाश गुजरात के जामनगर जिले के देवरिया गांव में दुकान चलाते हैं। जबकि उनका पूरा परिवार हरिद्वार में रहता है। ये लोग अपने पुश्तैनी गांव दादरपुर तभी आते हैं जब कोई कार्यक्रम होता है।

क्या आपको कथावाचक मुकुटमणि के बारे में पता नहीं था? दैनिक भास्कर के रिपोर्टर के सवाल पर जयप्रकाश तिवारी कहते हैं कि “इन लोगों को बाबा रामदास लेकर आए थे। सबको पता था कि वे यादव हैं। व्यास और संत की कोई जाति नहीं होती। जो पढ़ेगा, वो बनेगा। लेकिन यहां मामला दूसरा है। जयप्रकाश कहते हैं कि 21 जून की रात कथा खत्म होने के बाद हमारे घर पर इनके लिए भोजन की व्यवस्था थी। ये लोग हमारे घर के अंदर खाना खाने गये। मेरी पत्नी का हाथ पकड़कर बोले खाना खिलाओ, 7 दिन मेरी ख़ूब सेवा करो, पुण्य मिलेगा। इससे मेरी पत्नी हड़बड़ा गई और मेरे पास आई। हम अंदर गये तो ये लोग हड़बड़ाकर तुरंत ही बाहर निकल गए। हड़बड़ाहट में उनकी झोली से दो आधार कार्ड गिर गए। नाम और तस्वीर दोनों में एक थी, लेकिन जाति एक में अग्निहोत्री और दूसरे में यादव लिखी थी। उनके साथ मेरे घर पर कुछ नहीं हुआ। वे लोग कथा-स्थल पर गए तो वहीं गांव के कुछ लड़कों ने उनके बाल काट दिए।” 

इसके अलावा जयप्रकाश तिवारी इसमें राजनीतिक दल को भी शामिल करते हैं और आरोप लगाते हैं कि “उनलोगों ने हमें धमकी दी कि जुबान मत खोलना। हमारा डायरेक्ट संबंध सपा से है, घर से उठवा लेंगे।” 

तथ्य यह है कि बवाल होने के वक़्त तक गांव में किसी को भी नहीं मालूम था कि मुकुटमणि और संत सिंह यादव बिरादरी से हैं। कथा का जो कार्ड छपा था, उसमें भी आचार्य पंडित मुकुटमणि महाराज जी, श्री धाम वृंदावन (मथुरा) लिखा गया था। इटावा जिले के भरथना विधानसभा क्षेत्र से बसपा के पूर्व विधायक व वर्तमान में सर्वजन सुखाय पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष शिव प्रसाद यादव मानते हैं कि कथावाचकों पर जयप्रकाश तिवारी और रेणु तिवारी द्वारा लगाए गए आरोप मनगढ़ंत हैं।

हालांकि दूरभाष पर बातचीत में वे कहते हैं कि कथावाचकाें को अपनी जाति पहले बता देनी चाहिए थी। लेकिन उनके साथ जो दुर्व्यवहार ब्राह्मण समाज के द्वारा किया गया, वह निंदनीय है।

कथावाचक मुकुटमणि यादव व संत सिंह यादव

खैर, यह सवाल अहम है कि जयप्रकाश तिवारी और रेणु तिवारी की ओर से कथावाचकों के खिलाफ कोई प्राथमिकी क्यों नहीं दर्ज कराई गई? रही बात यह कि कथावाचकों की जाति ब्राह्मणों तक कैसे पहुंची तो स्थानीय लोगों के मुताबिक, उनके साथ जो ढोलक वाला लड़का सूरदास था, उसकी दादरपुर गांव में रिश्तेदारी थी। पहले दिन की कथा के बाद वह अपने रिश्तेदार के घर गया। जब वहां उससे कथावाचक के बारे में पूछा गया तो उसने वहां बता दिया कि वे यादव हैं। वहीं मंदिर की देख-रेख करने वाले पुजारी रामस्वरूप दास (पप्पू बाबा) को मुकुटमणि के बारे में पहले से पता था। वे पहले भी मुकुटमणि की भागवत कथा तीन अलग-अलग जगहों पर करवा चुके थे। यहां भी 25 हज़ार रुपए में कथा तय हुई थी। घटना के बाद से ही पुजारी रामस्वरूप फरार है।

वहीं कथावाचक मुकुटमणि यादव का आरोप है कि 21 जून को पहले दिन की भागवत कथा शुरू हुई। जब लोगों को शाम को पता चला कि कथावाचक ब्राह्मण नहीं, यादव हैं तब इसके बाद उनकी चोटी काटी गई, सिर मुंडवाया गया, महिला के पैरों में नाक रगड़वाया गया और महिला का मूत्र छिड़का गया।

अगले दिन घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ। सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने 24 जून को लखनऊ दफ़्तर बुलाकर दोनों कथावचकों से उनकी आपबीती सुनी और 21-21 हज़ार रुपए की आर्थिक सहायता दी। इस अवसर पर अखिलेश यादव ने कहा था– “अगर सच्चे कृष्ण भक्तों को कथा कहने से रोका जाएगा तो कोई यह अपमान क्यों सहेगा? यदि यही होगा तो प्रभुत्ववादी और वर्चस्ववादी लोग घोषित करें कि वे पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) द्वारा दिया गया दान और चढ़ावा कभी स्वीकार नहीं करेंगे।”

मामले के राजनीतिक रंग पकड़ने के बाद इटावा पुलिस सक्रिय हुई और बदसलूकी करने वाले 5 लड़कों को गिरफ़्तार किया गया।

गत 25 जून को कथावाचक मुकुटमणि यादव और सहयोगी संत सिंह यादव को विश्व यादव परिषद द्वारा सम्मानित किया गया। दोनों ने न्यूज चैनल आज तक से बात करते हुए बताया है कि उन्होंने गुरु-शिष्य परंपरा के तहत सिद्ध गुरु के सान्निध्य में रहकर भागवत कथा कहना सीखा है। मुकुटमणि यादव का कहना है कि वे 15 सालों से कथा कह रहे हैं। वे स्नातक हैं। जबकि संत यादव ने बीएससी (बायोलॉजी) की पढ़ाई की है। वे शिक्षण कार्य करते थे और कोविड के बाद काम छूट गया तो सहायक आचार्य बन गये।

इटावा के बकेवर थानाक्षेत्र के गांव दादरपुर में 26 जून को उपद्रव हुआ। पुलिस पर पथराव और सरकारी गाड़ी को क्षतिग्रस्त करने के आरोप में 21 लोगों के ख़िलाफ़ मुक़दमा दर्ज़ करके 19 लोगों को जेल भेज दिया गया। दरअसल दादरपुर घटना के विरोध में इंडियन रिफॉर्मर्स आर्गेनाइजेशन व अहीर रेजीमेंट के संस्थापक अध्यक्ष गगन यादव ने थाने का घेराव करने का आह्वान किया था। गत 5 जुलाई को अखिल भारतवर्षीय ब्राह्मण महासभा नामक एक संगठन अचानक तमाम अख़बारों की सुर्खियों में आया। दरअसल इस संगठन ने आजमगढ़ में सपा कार्यालय की गृह प्रवेश की पूजा कराने वाले 5 ब्राह्मणो को समाज से बहिष्कृत करने की घोषणा की। साथ ही कहा गया कि समस्त सनातन समाज का कोई भी कर्मकांडी इन पांचों से किसी भी प्रकार की पूजा-पाठ या कर्मकांड न कराए।

इटावा मामले की जांच का ज़िम्मा झांसी पुलिस को सौंपकर 90 दिन में रिपोर्ट मांगी गई है। झांसी के सीनियर एसपी बीबीजीटीएस मूर्ति ने पूंछ थाना प्रभारी जे.पी. पाल को जांच टीम का प्रभारी बनाया है। यह टीम पूरे मामले की जांच के लिए गत 1 जुलाई को इटावा पहुंची थी। घटनास्थल के निरीक्षण के बाद कथावाचकों के गांव जवाहरपुरा पहुंची। टीम को उनके घरों पर ताला लटका मिला और मोबाइल स्विच ऑफ पाया गया।

एक यूट्यूबर से बातचीत में जातिवादी टिप्पणी करने का आरोप लगाकर गत 28 जून को समाजवादी पार्टी डेलीगेशन ने एसएसपी इटावा से मिलकर रेणु तिवारी के खिलाफ़ थाना बकेवर में केस दर्ज़ करवाया।

कानपुर देहात के निवासी व शोषित समाज दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष रामचंद्र कटियार कहते हैं कि “ब्राह्मणवाद हमेशा चाहता है कि लोग वर्ण-व्यवस्था मानें। रामायण में तो यह प्रसंग भी आया है और तुलसीदास ने लिखा भी है कि अब शूद्र पूजा-पाठ करा रहे हैं, तपस्या कर रहे हैं। यही कलियुग है। अब चूंकि देश और उत्तर प्रदेश में भाजपा की सरकार है तो वे इसी व्यवस्था को लागू करना चाहते हैं। इटावा में जो घटना घटित हुई है, उसका पहला निहितार्थ तो यही है। यह घटना बताती है कि अब पहले वाली बात रह नहीं गई है। दूसरी बात यह है कि यदि दलितों और पिछड़ों को ब्राह्मणों से अपमान मिलता है तो वहां जाना ही क्यों।” वे आगे कहते हैं कि “इस घटना का एक सकारात्मक प्रभाव यह हुआ है कि पूरे इलाके के पिछड़ी जातियों में ब्राह्मण कर्मकांडियों और पुरोहितों के खिलाफ आक्रोश है। यहां तक कि लोगों ने अपने गांव में बैनर लगा दिया है कि उनके यहां अब कोई ब्राह्मण से पूजा-पाठ नहीं कराएगा।”

जाति और भागवत कथा के संबंध में काशी विद्वत परिषद जैसी संस्था का कहना है कि भागवत कथा कहने का अधिकार सभी हिंदुओं को है। वहीं ज्योतिष पीठ उत्तराखंड के शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद ने कहा कि “कथावाचकों पर जल छिड़का गया या मूत्र, सवाल यह है कि इसका परिणाम क्या रहा? अगर वे पवित्र हो गए तो फिर उनसे कथा क्यों नहीं सुनी? जब जल या मूत्र छिड़कने का कोई प्रभाव ही नहीं रहा है, तो आपने छिड़का क्यों?”

उनका कहना है कि “किसी भी जाति का व्यक्ति अपनी जाति के लोगों को भागवत कथा सुना सकता है। लेकिन सभी जातियों को भागवत कथा सुनाने का अधिकार केवल ब्राह्मणों के पास है।”

प्रयागराज जिले के फूलपुर तहसील के बाबूगंज बाज़ार में तिराहे पर चाय समोसा की दुकान लगाने वाले सतीश मोदनवाल कहते हैं कि “इटावा का मामला सामाजिक से ज़्यादा राजनीतिक है। तमाम जातियों के बाबा टीवी पर कथा कहते हैं, उनका कहां विरोध होता है। आप देखिए संत रामपाल सोनीपत (हरियाणा) के कथावाचक जाट समुदाय से हैं। भोले बाबा उर्फ़ नारायण साकार हरि उर्फ़ सूरजपाल उत्तर प्रदेश के एटा जिले के हैं और दलित समुदाय से आते हैं। हरियाणा के महेंद्रगढ़ जिले के बाबा रामदेव यादव परिवार से आते हैं। राम कथावाचक के पर्याय बन चुके मोरारी बापू ओबीसी समुदाय से आते हैं। आसाराम बनिया हैं। रामरहीम भी ग़ैर-ब्राह्मण है।”

ग्राम कनौजा कला की नीलम प्रजापति इस मामले में प्रतिक्रिया देते हुए कहती हैं कि “मैंने उस घटना के तमाम वीडियो सोशल मीडिया पर देखे हैं। वह वीडियो जिसमें कथावाचक का बाल काटा जा रहा है, वह वीडियो जिसमें वो कह रहा है कि मेरी कोई जाति नहीं है, और वह वीडियो भी जिसमें उसे एक महिला का पैर छूने के लिए और महिला से माफ़ी मांगने के लिए कहा जा रहा है। आप एक मिनट के लिए शांत-चित्त होकर सोचिए कि किसी व्यक्ति को किसी महिला के पैरों पर गिरकर माफ़ी मांगने के लिए कब कहा जाता है? जब वह उस महिला के प्रति अपराधी होता है तब। जब कोई किसी समाज, जाति समुदाय के प्रति दोषी होता है तो उसे महिला के पैर में नाक रगड़ने के लिए नहीं कहा जाता है। तब उसे दूसरी तरह से अपमानित किया जाता है। लेकिन जातिवाद के सवाल ने स्त्री के प्रति अपराध को हाशिए पर डाल दिया।” 

इस घटना को लेकर बाबा रामदेव का भी एक बयान आया है। उन्होंने कहा कि– “यदुवंशी कृष्ण की कथा यादव नहीं करेगा तो कौन करेगा। बात यहां जात-पात की नहीं है, हमारा भगवान भी दूसरे छीन लेंवे, बताओ ये कोई बात हुई।”

तो क्या यादव अपने ईश्वर पर दावा कर रहे हैं? क्या ज्ञान की सत्ता (ख़ासकर धार्मिक ज्ञान) पर ब्राह्मणों के एकाधिकार को यादवों द्वारा चुनौती के तौर पर देखा जाए, जैसा कि उपनिषद काल में क्षत्रियों ने ब्राह्मणों के सामने पेश किया था?

गिरधरपुर गांव के निवासी और पेशे से वकील राम कृपाल यादव इस सवाल से इत्तेफाक़ रखते हैं। वे कहते हैं कि “बिल्कुल इसे इसी तरह देखा जाना चाहिए। हर समाज संस्कृतिकरण करके अपने से उच्च जाति की संस्कृति को अपनाना चाहता है, क्योंकि उसे ऐसा लगता है कि वे लोग अपनी संस्कृति के कारण ही समाज में उच्च स्थिति में बने हुए हैं। अतः हर पिछड़ा सामाजिक समूह अपने से उन्नत सामाजिक समूह का सांस्कृतिक अनुसरण करता है।”

वे आगे कहते हैं कि “इसी संस्कृतिकरण की प्रक्रिया के तहत तमाम पिछड़ी जातियों में पुरोहिताई करने वाले लोग बहुत तेज़ी से पैदा हुए हैं। मेरी ही जान-पहचान में यादव, पटेल और विश्वकर्मा समुदाय के कई लोग हैं जो शादी-विवाह, कथा, निकासन (बच्चों का नामकरण) आदि करवाते हैं। लेकिन बस अपनी जातियों में ही, या फिर अपने से निचली जातियों में।” वे आगे कहते हैं कि “इस मामले में मंदिर के पुजारी ने सारा खेल किया है। अगर वह पुजारी भागवत कथा के लिए ब्राह्मण पुरोहित को ले जाता तो वह पुजारी को ढेला भी नहीं देता। यादव पुरोहित से उसने 25 हज़ार में अपना हिस्सा तय किया होगा। इसीलिए पुरोहित की जाति का भेद खुलते ही पुजारी गांव छोड़कर भाग गया।”

ग्राम गिरधरपुर के राजकुमार विश्वकर्मा बताते हैं कि “विश्वकर्मा समाज में कई लोग पंडिताई का काम करवाते हैं। वे लोग भी बस शादी विवाह करवाते हैं। लेकिन कभी कोई समस्या या विरोध नहीं हुआ। ये लोग अधिकांशतः अपनी ही जाति समुदाय के बीच यह काम करवाते हैं।” 

इसी तरह मनेथू गांव के मूलचंद पटेल शादी-विवाह करवाने का काम करते हैं। सराय हुसैना में एक बुजुर्ग यादव हैं। वे काफ़ी दिनों से पंडिताई करते हैं। तिसौरा गांव में एक पटेल हैं। ऐसे ही ममहिया, मुस्काबाद, सेख्खापुर (शेख़पुर), मूल्हापुर आदि गांवों के लगभग एक दर्जन पटेल हैं, जो पांडिताई का काम करते हैं। लेकिन वे केवल शादी-विवाह करवाते हैं। मरनी-करनी का क्रिया-कर्म नहीं करवाते। उसके लिए ब्राह्मण पुरोहित बुलवाते हैं।  

झूंसी निवासी और पेशे से शिक्षक राज कुमार पांडेय इस मामले को व्यावहारिक नज़रिये से देखने पर ज़ोर देते हैं। वे कहते हैं कि यदि जातियों के इतिहास और मौजूदा स्थिति पर तुलनात्मक दृष्टि डाली जाए तो तमाम वर्णों और वर्णों के भीतर जातियों का जो परंपरागत कार्य था, वह बहुत हद तक छिन्न-भिन्न हो गया है। तमाम पारंपरिक कार्यों में महंगी तकनीकी, शिक्षा और पूंजी के दम पर दूसरी जातियों ने वर्चस्व क़ायम कर लिया है। लेकिन पुरोहिताई के कार्य में ब्राह्मणों का वर्चस्व जस-का-तस क़ायम है। एक ओर जहां आज रोज़गार का संकट है, शिक्षा महंगी है। वहीं दूसरी ओर सबको शादी-विवाह सबसे शुभ मुहूर्त पर ही करना है। इसके चलते कई बार ऐसा होता है कि किसी एक लगन पर कई-कई शादियां पड़ जाती हैं, इतनी संख्या में पुरोहित नहीं आ पाते हैं। ऐसी स्थिति में ब्राह्मण पुरोहित सवर्ण यजमान को वरीयता देता है, यह कहकर कि ग़ैर-सवर्णों में तो बिना साइत-सुतार और पुरोहित के भी शादी हो जाती है। इसी अभाव और तिरस्कृति ने ओबीसी जातियों के बीच पुरोहित का एक नया वर्ग पैदा किया है। जो ख़ुद को अपनी जाति के सामान्य लोगों से उच्च मानता है। इससे उच्चताबोध के साथ-साथ सम्मान और रोज़गार की संभावना भी जुड़ी है। 

पाली ग्रामसभा के कुर्मी टोले में कुर्मी लड़कों को लेकर रामलीला शुरू करने वाले राजेंद्र पटेल आज पाली ग्रामसभा के अलावा बाबूगंज बाज़ार समेत लगभग आधा दर्जन गांवों में रामलीला और दशहरा का संचालन करते हैं। वे कहते हैं कि “पूर्वी उत्तर प्रदेश में मौर्य समाज के लोगों द्वारा शुरू हुआ तेरही (मृत्यु भोज) के मौके पर ब्राह्मण भोज का बहिष्कार मुहिम हाल ही में इलाहाबाद में यादवों ने आगे बढ़ाने की कोशिशि की। हालांकि इस पर भी कई लोगों ने सवाल उठाया कि विरोध तेरही जैसे पूरे कार्यक्रम का होना चाहिए, न कि केवल ब्राह्मण-भोज का। हुआ यह कि उन्होंने तेरहवें दिन की जगह पर किसी भी रैंडम दिन में भंडारा कर रहे हैं। पनीर और रसगुल्ला बनवा रहे हैं। पांच सौ से लेकर दो हज़ार लोगों को खाना खिलाने का दावा कर रहे हैं। तो इस तरह से एक बुराई को रूप बदलकर आगे बढ़ाया जा रहा है। यादव कथावाचक भी तो उन्हीं ब्राह्मणवादी वर्णवादी बातों को ही आगे बढ़ा रहा है, जो भागवत में लिखा है। लिखा तो ब्राह्मणों ने ही है ना?” 

राजेंद्र कुमार आगे कहते हैं कि “इसी साल कुर्मी समुदाय की एक महिला कथावाचक का भी विरोध किया गया था लेकिन तब इतना शोर-शराबा नहीं हुआ था, क्योंकि पटेल बिरादरी सत्ता पार्टी के साथ है। यादव बिरादरी मुख्य विपक्षी दल का वोटर माना जाता है। इसलिए हल्ला ज़्यादा रहा है।” वे आगे कहते हैं कि “इसे बड़े राजनीतिक फलक पर देखने समझने की ज़रूरत है। लोकसभा चुनाव से पहले डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्या ने लगातार मथुरा मंदिर और ईदगाह विवाद को लेकर सपा प्रमुख को घेरा था। तब भाजपा ने मुसलमानों और यादवों को एक-दूसरे के ख़िलाफ़ खड़ा करने की कोशिश की थी। जबकि ये दोनों वर्ग यानी मुस्लिम और यादव सपा के कोर वोटर माने जाते हैं। अब भाजपा मथुरा क़ॉरिडोर के बहाने लगातार इस मुद्दे को बनाये रखना चाहती है। इससे पहले 2014 से ही भाजपा ने ओबीसी आरक्षण में यादव बनाम ग़ैर-यादव और दलित आरक्षण में जाटव बनाम ग़ैर-जाटव का विभाजन करके उत्तर प्रदेश में पिछले 5 चुनावों में निर्णायक सफलता हासिल की है।”

बहरहाल, ये सभी प्रतिक्रियाएं बताती हैं कि उत्तर प्रदेश का पिछड़ा समाज ब्राह्मणों को चुनौती तो दे रहा है, लेकिन ब्राह्मणवाद को नहीं। अभी भी जातियों का बंटवारा कायम है और जातियों में ब्राह्मणवाद को बढ़ावा दिया जा रहा है। ब्राह्मणवाद के खिलाफ ओबीसी एकता तो बहुत दूर की बात है। 

(संपादन : राजन/नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

सुशील मानव

सुशील मानव स्वतंत्र पत्रकार और साहित्यकार हैं। वह दिल्ली-एनसीआर के मजदूरों के साथ मिलकर सामाजिक-राजनैतिक कार्य करते हैं

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